#DRUG ADDICTION

                                    नशे के लत 


    साल के आखिरी दिन लोग अपना दिन नशे के साथ बिताना पसंद करते है। छोटे बड़े सभी के मन में ख़ुशी का मतलब नशे की खुमारी में रहना हो गया है। पहले समय में शराब के नशे तक लोग सीमित  थे। लेकिन अब नशे को पाने के लिए जिंदगी से खिलवाड़ करने से भी नहीं चूकते। 

      आज की रात  नशे में झूमते हुए लोग गाड़ी चलाने  से भी परहेज नहीं करते। उन्हें रोकने के लिए जगह -जगह पर पुलिस  तैनात रहती है। आज की रात इन नशेड़ियों के द्वारा  बहुत सारा चालान (रूपये के रूप में ) सरकार के पास पहुंचेगा। 

     पहले समय में लोग नया  साल परिवार के साथ बिताना पसंद करते थे। लेकिन परिवार में नशे के शौक पर पाबंदी होती है इसलिए लोग अन्य जगहों पर जाकर नया दिन मना रहे है । नशा करने के कारण बहुत दुर्घटनाये होती है जिसके कारण जान और माल  की हानि होती है। 

      आज भी भारत में नशा करने वालो को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है। एक इंसान को उसकी पत्नी ने नशा करने से रोकने की कोशिश की। उसने आपत्ति करने पर पत्नी की पिटाई कर दी। फिर कहा - "मै नशा नहीं छोडूंगा। यदि ज्यादा रोकेगी तो तुझे छोड़ दूंगा। लेकिन नशा किसी हालत में नहीं छोडूंगा। " उस इंसान की छोटी उम्र में मृत्यु हो गई। शराब के कारण ठीक करवा चौथ के दिन जब पत्नी ने व्रत रखा था। वह दुनिया छोड़ कर चला गया।

       आज उसके छोटे -छोटे बच्चो की देखभाल करने की जिम्मेदारी उसकी पत्नी पर आ गयी है। वह रोती हुई इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए मजबूर हो गयी है 

     नशा शराब ,एलएसडी ,गोलियों,अफीम,चरस और हीरोइन तक सीमित  नहीं रहा बल्कि विद्यालयों के बच्चे भी इस लत के शिकार हो रहे है। उन्होंने इसके लिए बड़ो की गलत चीजे चुराने के अलावा  अन्य तरीके  ढूँढ  निकाले  है। इंक फ्लूड ,नेलपॉलिश, गुटका  आदि  खाकर अपने शरीर को बर्बाद कर  रहे है। एक बार इनकी आदत लग जाये तब इन्हे छुड़ाना मुश्किल हो जाता है।

        सिगरेट शुरू में दूसरो  की देखादेखी पी  जाती है। बाद में इसकी आदत पड़ जाती है।  इस पर साफ शब्दों में लिखा होता है स्वास्थ्य के लिए हानिकारक  उसके बाबजूद इसे पीकर लोग मृत्यु की गोद  में समा  रहे है। वे जिंदगी और ख़ुशी में अंतर  नहीं कर पा  रहे है। उन्हें कौन समझाये कि जिंदगी रही तभी खुशिया भी मनाओगे। 

   

     

CARONA TEST REPORT ILLUSION IN GOVERNMENT SECTOR

           सरकारी अस्पताल में टेस्ट रिपोर्ट का मायाजाल 

       


    करोना के समय में टेस्ट कराना  आसान हो गया है। लेकिन इसकी रिपोर्ट पाना उतना ही कठिन है। मै  आपके साथ अपना अनुभव साझा कर रही हूँ।

      मुझे  अंदमान निकोबार द्धीप  समूह घूमने जाना था। उसके लिए करोना  टेस्ट करवाना जरूरी था। मैने उसके लिए कोविद टेस्ट की एम्बुलेंस से टेस्ट करवाया। उन्होंने सेम्पल लेने के बाद कोई पर्ची नहीं दी। उनके अनुसार  सुचना और रिपोर्ट मेरे  फ़ोन पर आ जायेगी । लेकिन कोई सुचना या रिपोर्ट नहीं आयी तब उन्होंने जिस डिस्पेंसरी के बारे में बताया। तब में रिपोर्ट के लिए वहां गयी लेकिन उन्होंने मुझे सही जबाब नहीं दिया। घुमाते रहे मेरी परेशानी बढ़ाते रहे । यहां जाओ या वहां से रिपोर्ट मिलेगी। 

       दूसरी बार मैने  इंदिरापुरम में टेस्ट करवाने की कोशिश की। टेस्ट तो कर दिया। लेकिन कोई पर्ची नहीं दी। उन्होंने एक वेव साइड का पता बता दिया। लेकिन जब उसे खोलने की कोशिश की, तब कुछ खुल नहीं सका। मेरा टेस्ट करवाना बेकार चला गया। 

      तीसरी बार मैने  पोर्टब्लेयर एयरपोर्ट पर टेस्ट करवाया। वहां पर पैसे लगे। लेकिन उन्होंने 15  मिनट में रिपोर्ट दे दी। उसके भरोसे हम अंदमान में घुम सके। वर्ना  पॉजिटिव रिपोर्ट आने पर हमे क़्वारण्टीन में रहना पड़ता या वापिस भेज दिया जाता। लेकिन भगवान की  कृपा से  टेस्ट नेगेटिव आया। मेरा वहां जाना सार्थक हो गया। 

       किसी ने बताया उनकी रिपोर्ट चार दिन पुरानी  थी इसलिए उस रिपोर्ट को नकार दिया गया। उन्हें फिर दुबारा टेस्ट करवाना पड़ा था। 

     उसकी दास्तान  सुनकर मेने किसी को सलाह दी। तुम जाने से दो दिन पहले ही टेस्ट करवाना ताकि तुम्हारी रिपोर्ट का सही फायदा उठाया जा सके। उनकी टेस्ट रिपोर्ट उनके जाने तक नहीं मिल सकी.

       अब उन्हें गए हुए भी एक दिन हो गया है। लेकिन टेस्ट रिपोर्ट अभी तक नहीं आयी। मुफ्त टेस्ट करवाने का ऐसा अंजाम होता है। अब आप ही बताये ऐसे में यदि  हम जैसे लोगो प्राइवेट डॉ  से टेस्ट करवाते तब हमारे कई  हजार खर्च हो जाते। सरकारी काम काज का हाल  मैने  आपको बता दिया है।  अब आपकी मंसा  है आप क्या निर्णय लेते है 

ODD SENSE

                      विचित्र स्वभाव 

आज करोना  काल  में हर तरफ तबाही मचाई हुई है। इसके बाबजूद लोगो ने सबक नहीं लिया। जिसका जहां बस चल रहा है, वह  पैसे बनाने में लगा है। उन्हें जिंदगी और मौत के बीच  झूलते इंसान  की  अहमियत का  अहसास नहीं हो रहा है। उनकी मानवीयता खत्म हो गई है।

        जब किसी का अपना दुनियां से विदा हो जाता है। उसे इसका अहसास है। दूसरे लोगो को लगता है। वे अमर है। उनका  और उनके परिवार का कुछ नहीं बिगड़ेगा। 

      सरकार  लोगो की जिंदगी बचाने  के लिए जितना पैसा खर्च कर रही है। उसका एक चौथाई भी खर्च नहीं किया जा रहा  है। सब अपनी जेब भरने में लगे है। इतने लोगो की  मौत भी उन्हें सम्वेदन शील नहीं बना पा  रही है। 

      जब उनके अपने  की मौत होती है तब उन्हें सब पर गुस्सा आता है।  उनकी  दुनिया वीरान हो जाती है। इस अहसास को यदि वो दूसरो के परिवारों में देख कर, सही रास्ते  पर आ जाये तो  बहुत सारे  परिवार  आबाद रहे । 

    इंसानो का विचित्र स्वभाव मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा है। इंसान दूसरो  की मौत का सच देखकर अपनी मौत की कल्पना क्यों नहीं कर पाता। 

  

jan hai to jahan hai vrna duniya viran hai

                        दीवाली और प्रदुषण 




  पहले दीवाली पर पटाखे चलाते  हुए इतना डर  नहीं लगता था। बल्कि बम्ब  चलाकर  बहादुरी का अहसास होता था। लेकिन कुछ सालो से पटाखे प्रदूषण फैलाते  है। इनके कारण बहुत दिन तक वातावरण में दृश्यता कम हो जाती है।

        सांस  के साथ जलते हुए धुँए  की महक दम  घोंटने लगती है। दीवाली की रात  से ही सांस  लेते हुए दिक्क्त महसूस हो रही है। लेकिन सरकार जितना पटाखों पर बंदिश लगा रही है। लोग उतने ही बहादुर बनने में शान समझ रहे है।

       में जब सड़को पर निकली तब मुझे पटाखों की दुकान दिखाई नहीं दी।पटाखों के शौकीनों को पटाखे मिल रहे है। ऐसा लगता है अंदरखाने मिलीभगत से इनकी बिक्री हो रही  है। शौक़ीन लोग मुँहमाँगे  दामों में खरीद रहे है। उन्हें अपनी अमीरी दिखाने का इससे अच्छा मौका और कहाँ  मिलेगा।  लेकिन इनकी आवाज और धमाके मुझे करवाचौथ की रात  से सुनाई दे रहे है। रात  के बारह  बजे तक मुझे धमाकों की आवाज सुनाई देती रही।  और कितने दिनों तक आवाजे आती रहेंगी पता नहीं। अति हर चीज की बुरी होती है। 

    मुझे साँस से सम्बन्धित बीमारी नहीं है। में प्राणायाम भी करती हूँ।  लेकिन  दीवाली के बाद जी घबराने लगा है। जो सही मायने में मरीज है। उनकी हालत सोच कर घबराहट होती है। 

      करोना  काल  में सबसे ज्यादा सांस्  लेने में दिक्क्त आ रही है। इन दिनों वायरल और जुकाम सम्बन्धित बीमारियाँ  भी फैल  रही है। ये सब कितनी दुखदायी है कोई मुझसे पूछे। लेकिन जो संक्रमित हो भी चुके है वे भी इस समय भूल रहे है। हमारा पूरा जीवन ही सांस  के उतार -चढ़ाव से जुड़ा है। यदि साँस नहीं ले पाएंगे तब इस शरीर का क्या करेंगे। मेने बड़ी उम्र के लोगो को करोना  से ठीक होते देखा है। जबकि जवान लोग अपनी गलत जीवन चर्या के कारण दुनियां छोड़ रहे है। उन्हें जोश में रहते हुए होश नहीं गवाना चाहिए। जान है तो जहाँन  है। वरना दुनिया वीरान है। 

#POWERLESSNESS

                                                   बेबसी 

   


     हम सभ्य समाज में रहते हुए दम  भरते है कि  सब ठीक है। लेकिन कई बार ऐसी घटना घटित हो जाती है। कि  हम सोचने के लिए मजबूर हो जाते है। इसे क्या कहना चाहिए जब एक औरत के लिए जीवन की सारी  सुखद अनुभूतियाँ खत्म हो जाती है.

      मेरी सहयोगी ने जब बताया उसने प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी  छुप -छुप कर की है। मेरे लिए यकीं करना मुश्किल हो गया।

       उसने कहा - मै  सबके सो जाने के बाद पढ़ाई  करती थी। यदि पति की आंख खुल जाती थी। वह  मेरे बाहर होने का  कारण पूछते थे तब मै उन्हें नींद न आने का  कारण बताती थी। कभी नहीं कह पाती  थी कि  बाहर के कमरे में पढ़  रही थी। मेरे हाथ में पूरे  दिन कोई किताब नहीं देख सकता था सब किताब देखते ही गुस्से से उबलने लगते थे। मैने  घर में शांति बनाये रखने के लिए सभी के सामने कभी किताब खोलने की कोशिश नहीं की। 

       मुझे उसकी असमर्थता पर बहुत हैरानी हुई। उसका कारण पूछने पर  उसने कहा - "जब मुझे देखने आये तब उन्होंने सबसे पहले शर्त रखी थी। आपकी बेटी कितनी भी पढ़ी  लिखी है। हम सिर्फ इसी शर्त पर शादी करेंगे। ये कभी नौकरी नहीं करेगी। " मुझे यह शर्त सुनकर बहुत हैरानी हुई। 

    मैने आज के समय में सरकारी नौकरी करने वाली लड़कियों की हाथो- हाथ शादी होती  देखी है। वही एक ऐसा परिवार भी हो सकता  है.यह मेरी कल्पना से बाहर था। 

       मेने उससे पूछा जब तुम्हारी पढ़ने की इतनी इच्छा थी। तब तुमने यह शर्त क्यों स्वीकार की।

    उसने कहा - इस रिश्ते को  देखकर परिवार के लोग इतने खुश थे कि  उनकी ख़ुशी के सामने मुझे अपनी ख़ुशी कोई खास नहीं लगी मैने शादी के लिए हाँ कर दी। वह शादी से पहले MA  बीएड  थी। उसने अच्छे अंको से पढ़ाई  पूरी की थी। उसे पढ़ना बहुत अच्छा लगता था।  

        मैंने  बहुत सारे  लोगो को दिन रात  पढ़ते  हुए देखा है। कोचिंग सेण्टर में जाकर ज्ञान बड़ा कर  भी इन प्रतियोगिताओ में असफल होते देखा है। उनकी एक नहीं अनेक बार की  कोशिश  बेकार गयी। मेरे लिए यह असम्भव कार्य लग रहा था। 

apna ghar

रुक्मी बेटे की शादी करके बहुत खुश थी। उसमे बेटा  उसे बहुत मन्नतो के बाद मिला था। उसकी परवरिश करते समय उसने सुध नहीं ली। उसको बढ़ते देखकर  उसे ख़ुशी मिलती थी। बेटा  पढ़लिखकर सफल व्यवसायी बन गया। उसके घर बैठे रिश्ते आने लगे। तब उन्होंने सभ्य घर की सुशिक्षित लड़की से शादी कर दी। 

    कुछ समय उपरांत उनके घर एक बेटा  और बेटी पैदा हुए। उनके घर में खुशियां ही खुशियां थी। उनके व्यवसाय में भी उन्नति होती चली गई। उसके बेटे ने एक घर नहीं बाल्कि अनेक    घर खरीद लिए। उसकी उन्नति देखकर सब हैरान रह जाते थे। ऐसी स्थिति में भी उनके अभिभावकों ने काम करना नहीं छोड़ा था। उनके पिता सरकारी नौकरी करते थे। साथ ही एक दुकान का ध्यान भी रखते थे। पिता की अनुपस्थिति में माँ दुकान संभालती थी। 

     उनके बेटे ने पॉश कॉलोनी में घर लिया। वे भी बेटे के साथ उस घर में रहने चले गए। कुछ समय के बाद वे वापस अपने पुराने घर में आकर रहने लगे। उस घर में उन्होंने दो मंजिलो पर किरायेदार रख लिए थे। तीसरी मंजिल के एक कमरे वाली  जगह में रहने लगे। 

      इतनी ऊंचाई पर गर्मी भी लगती थी।   

 

सीमाहीन दुख

दुनियां में कई लोगों का दुख मन को झकझोर देता है! मेरे पड़ोस में रंजना से जब मिली ।उसका स्वभाव बहुत अच्छा लगा । वह किराए के छोटे से घर में रहती थी। उसके तीन बच्चे थे बड़ा बेटा दसवीं के पेपर दे रहा था ।बेटी छठी कक्षा में पड रही थी।दूसरा बेटा चोथी कक्षा में पड रहा था।
         जब उसके करीब आई तब पता चला । उसने चार बेटों को जन्म दिया था। लेकिन उस अभागी के बेटे उससे दगा कर गए। पहला बेटा जब कुछ महीनों का था तब वह गांव के घर में रहती थी। वह अपने बेटे को चारपाई पर लिटा कर काम करने चली गई। काम निबटाने के बाद बच्चे के पास आने पर उसने देखा उसका बेटा निर्जीव पड़ा है। उसका गला चारपाई  की रस्सियों में फंसने के कारण मौत हो चुकी है। वह इस सदमे को झेल नहीं सकी।पागल हो गई। इस सदमे के कारण उसे बाकी चार बच्चो को पालने की सुध नहीं रही। उसकी हालत देखकर पागलखाने भर्ती करवाना पड़ा।
        कुछ समय बाद ठीक होने पर वह घर वापस आकर बच्चो की देखभाल करने लगी। अभी तक वह गांव के घर में रह रही थी। जमीनों के कारण उनका झगड़ा चल रहा था। पिछले हादसे को कुछ समय बीता था ।
        एक दिन उनके दूसरे बेटे की लाश खेत में पड़ी मिली। अबकी बार वह औरत ये हादसा बर्दाश कर गई लेकिन उसका पति इस हादसे को सहन नहीं कर सका। वह पागल हो गया। इस बार पति को पागलखाने भर्ती करवाना पड़ा। 
      कुछ समय बाद वह जब पागलखाने से ठीक होकर आया तब उन्होंने गांव छोड़ने का निश्चय कर लिया।क्योंकि आपसी विवाद में वे और बच्चो को खोना नहीं चाहते थे। उन्होंने अपनी भरी पूरी  गृहस्थी  छोड़ दी।
      दिल्ली में आकर एक कमरे के किराए के मकान में रहने लगे। उस समय उनके पास बहुत थोड़ा सा समान था।गरीबी में खुशी से दिन काट रहे थे।
    उनकी मेहनत रंग लाई। उन्होंने एक तीन मंजिला मकान खरीद लिया
     उनका  छोटा बेटा बारहवी के पेपर देने के बाद इंजीनिरिंग के लिए टेस्ट दे रहा था।वह पेपर  में पास नहीं हो पा रहा था। उसके कई प्रयत्न बेकार चले गए थे ।वह इसको सहन नहीं कर पा रहा था। उसने अपने परिवार के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा। 
        तीसरी मंजिल के कमरे मे  जहां पढ़ाई करता था ।एक दिन गले में फांसी लगा कर दुनियां से चला गया। उसने एक बार भी औरो के बारे में नहीं सोचा। उसके जाने के बाद बाकी लोगों का क्या होगा।जब मैने इस हादसे के बाद रंजना को देखा उसे अपने कपड़ों का भी होश नहीं था। वह अपने पति को इस हादसे के बारे में बताने की कोशिश कर रही थी। लेकिन मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी।उसकी हालत देखकर आंसू नहीं रुक रहे थे।इसे कहते है विधि की विडम्बना।
    कुछ समय बाद   जब वह इस सदमे से उबर गई तब मैने उनसे बात की तब उन्होंने बताया उनके तीनों बेटे गले के फंदे से मारे गए। भगवान ऐसे दिन किसी और को न दिखाए।

BIG GRIEF DUE TO OBESITY

               मोटापे के कारण बढ़ते दुःख 

Beautiful TV Actresses Who Recently Trolled For Their Partners, People Call  Them a Mismatch Couple खुशी   खाते  -पीते  परिवार की इकलौती  बेटी थी। सभी के लाढ-प्यार  में पली  प्यारी सी  लड़की थी। बचपन में काम के आभाव में वह गोल मटोल हो गई थी। लेकिन बड़े होने पर उसे अपने मोटे  होने का अहसास हुआ तब उसने  अपने  शरीर को सही रूप देने के लिए कदम उठाने शुरू किये।
      भगवान  ने गोरा रंग और सुंदरता विरासत में दी थी। उस पर उसने अपने शरीर को सही आकर देने की कोशिश की , जिसने उसे पतली दुबली सूंदर लड़की बना  दिया। तब उसकी सुंदरता कयामत ढाने  लगी। जो उसे देखता देखता रह जाता।  उसे भी इस बात का अहसास था। 
        पढ़ाई  पूरी करने के बाद उसके लिए अमीर  घर से रिश्ता आया। लड़का  मोटा था। जबकि खुशी  काफी पतली थी। लेकिन उसे अपने पर भरोसा था। जैसे मैने अपना वजन कम  किया इसका वजन भी कम हो जायेगा। थोड़ी प्रेरणा की जरूरत पड़ेगी। मेरा व्यवहार उसका वजन भी कम करा  देगा। ये सोचकर उसने शादी के लिए हाँ कर दी। 
        शादी के बाद उसने बहुत कोशिश की, माधव का वजन कम करवाने की लेकिन जिसने  कभी शारीरिक श्रम  न किया हो उसके लिए वजन कम करना बहुत मुश्किल होता है।क्योंकि ऐसे में साँस फूलना और पुरे शरीर में दर्द होना लाजमी है। माधव इन दोनों का सामना नहीं कर पाता  था। ये दर्द एक दिन का नहीं बल्कि पूरे  हफ्ते रहता है। यदि इंसान एक हफ्ते इस दर्द को सह ले। उसके बाद दर्द महसूस नहीं होता क्योंकि शरीर को इसकी आदत पड जाती है। लेकिन माधव उस एक हफ्ते के दर्द को लाँघ नहीं पाया। घर में खाने -पीने  का आभाव नहीं था। यदि खाने के प्रति सख्ती बरती जाती तो वह बाहर खा आता लेकिन उसने शरीर के प्रति संजीदगी नहीं दिखाई।  इसलिए वजन बढ़ता चला गया। 
        ख़ुशी ने दो बच्चो को जन्म देने के बाबजूद  अपना वजन बढ़ने नहीं दिया।आज भी वह अपनी उम्र से बहुत कम लगती है। 
         जबकि माधव ख़ुशी के कहने के बाबजूद वजन कम करने के कोई उपाय नहीं करता था। पत्नी का कहा  न मानना  हमारे समाज में शान की बात मानी  जाती है। इसलिए माधव का वजन दिनोदिन बढ़ता चला गया। ख़ुशी का कड़ा रुख  भी माधव पर असर नहीं कर रहा था।
         उनमे दूरियां बढ़ती जा रही थी। ख़ुशी की माधव के प्रति बेरुखी बढ़ती चली जा रही थी। दुनियां ख़ुशी को सख्त औरत के रूप में देखने लगी थी। जो पत्नी का कोई फर्ज नहीं निभा रही। 

#truth of karona

                                          करोना  का सच 

  पिछले दिनों राहुल गाँधी जी ने समाचार में कहा -  "सरकार के द्वारा कोविद के बताये गए आंकड़े गलत है।" मै  इससे सहमत हूँ।  इससे पहले भी कई अन्य लोगो ने इस बात का समर्थन किया है। सरकार  लोगो को डर  से बचाने  के लिए गलत आंकड़े  जारी कर रही  है।
       मेरी पहचान में बहुत सारे लोगो ने इस बात का समर्थन किया है। उनके परिवार के सदस्यों की मौत के बाद जब उनकी लाश नहीं दी गई। तब उन्हें इस बात का अहसास हुआ। उनका परिजन कोरोना से खत्म हुआ है। तब तक अन्य सदस्य भी करोना  से संक्रमित हो चुके थे।
        लोगो की करोना  से मौत होने के बाबजूद उनके मृत्यु प्रमाण पत्र  पर कोई अन्य बीमारी लिखी  जा रही है। मुझे इस सच्चाई पर तब यकीन  हुआ जब मेने मृत्यु प्रमाण पत्र  को अपनी आँखों से देखा। इसलिए सरकार के द्वारा दी जा रही भ्रमित जानकारी पर यकीन करके अपनी जान से खिलवाड़ न कीजिये। भारत में करोना  विकराल रूप ले चुका है।
       आपकी जिंदगी आपके हाथ है। जब तक दवाई बाजार में नहीं मिलती। सरकार के अस्पतालों के भरोसे अपनी जिंदगी को दाव  पर मत लगाइये।  अस्पतालों का बहुत बुरा हाल  है। मरीज ज्यादा और संक्रमित बीमारी होने के कारण देखभाल में लापरवाही बरती जा  रही है।
         प्रायवेट अस्पतालों में भी परिवारिक सदस्य अंदर नहीं जा सकते । डॉ कमरे के दरवाजे से पूछ कर ही इलाज कर रहे है। खाना भी दरवाजे के पास ही रखा जाता है कमरे के अंदर आकर किसी तरह की देखभाल नहीं की जाती है। इलाज का बिल बहुत बड़ा बना दिया जाता है।
         आपकी जान बहुत कीमती है। आपका परिवार इस त्रासदी से कभी उबर नहीं पायेगा। आप अपने परिवार को खड़े रखने वाला स्तम्भ है। इसे गिरने मत दीजिये। सावधान रहे। 

#karona ka dar

                                  करोना का डर 

 Coronavirus Covid 19 Lockdown in India - महाराष्ट्र ...  करोना  के  कारण घरो पर कहर बरस रहा है। मैने  कई घर ऐसे देखे है। जिनमे कमाने वाला इंसान दुनिया से चला गया। उसके छोटे -छोटे मासूम बच्चो को पिता के जाने के मायने नहीं पता। उनकी किस्मत एक रात  में कैसे बदल गई। उसका एहसास तक नहीं। 
       पिता का बुढ़ापे का सहारा  एक ही रात  में बहुत दूर चला गया। उनकी सुनी आंखे उसे हर तरफ निहार रही है। आज इंसान का हर चीज पर से विश्वास उठ गया है। कुछ भी  मायने नहीं रखता। बड़ी -बड़ी कोठियाँ , पैसो  से भरे घर, अस्पताल और डॉ  पर विश्वास  सब खत्म हो गए है। 
      अब फिर से एक शक्तिमान ईश्वर पर विश्वास जागृत हो गया है। जिसपर उसका हाथ है। वही  जीवित बचेगा उसके आलावा कोई तरीका इंसान के पास नहीं बचा। हमारी सारी ताकत उसके सामने हार   जाती है।
        मैने बर्बाद होते ऐसे घर देखे है। जिसमे आने वालो की बहार  रहती थी। लेकिन आज उनके शोक के समय कोई कन्धा नहीं मिल रहा।जिससे लग कर रो सके।  सबको उनसे सहानुभूति है। लेकिन बीमारी के डर  से उनका कोई सहारा नहीं बन पा  रहा। इस दुःख की घडी में उनके आंसू पोंछने वाला दूर -दूर तक दिखाई नहीं दे रहा।
         मैने ऐसा परिवार देखा।   जिसमे तीन बहनो का अकेला भाई मृत्यु की गोद  में समा  गया। उसकी मौत पर शौक  मनाने जीतने  लोग पहुंचे उन सबको करोना  ने ग्रस लिया। जब वो लोग अपने परिवार में पहुंचे उनके  परिवार के लोगो में करोना  हो गया। करोना  के बारे में पता चलते ही सारे मौहल्ले वालो ने उनसे नाता तोड़ लिया। 
        ऐसे माहौल में सहानुभूति जताने से भी लोग डरने लगे है। मेरे सामने ऐसा माहौल पहली बार हुआ है। उस परिवार से लोगो ने हाल -चाल तक नहीं पूछा। इस संकट की घडी में हम चाहते हुए  किसी का सहारा नहीं बन पा  रहे है। इसे इंसानो की क्रूरता कहे या बीमारी का डर। जिसने इंसानो को पंगु बना दिया है। 

# MANIPUR ME CENTRAL SCHOOL KA INSAF

         मणिपुर में केंद्रीय विद्यालय का इंसाफ 

     मणिपुर कारण्टीन सेण्टर में सफाई के लिए आवाज उठाने पर झूठी FIR  लिखवा कर जेल भिजवा दिया। जमानत नहीं होने दी गई। शनिवार और इतवार की छुट्टी होने के कारण चार दिन जेल में रखा गया इसलिए केंद्रीय विद्यालय से निलंबित करके 4  लड़कियों और एक दिव्यांग लड़के को घर बिठा दिया गया। जिन लड़कियों को घर में ऊँची आवाज में अपनी बात रखने का अधिकार नहीं था। उन पर मार -पिटाई के इल्जाम लगाए गए। 
        दिव्यांग लड़के की एक आंख नहीं है। दूसरी आंख का नम्बर दस है। उन पर तरस खाओ।
     मणिपुर में किराये के मकान  से निकाला  जा रहा है। इनका घर दिल्ली ,हरियाणा और गुजरात में होने के कारण ये मणिपुर में सुनवाई के लिए कहाँ ठहरेंगे और कैसे उपस्थिति लगाएंगे। कृपया इनकी मदद कीजिये। 
     हमारी कही सुनवाई नहीं हो रही है। इन सबकी नई नौकरी है। इनके सामने पूरा भविष्य पड़ा है। आप माफीनामा लिखवा चुके है। फिर भी  माफ़ नहीं किया जा रहा। ये कही के नहीं रहेंगे। सभ्य इंसानो को सड़क पर मत लाओ।  

# truth of quarantine center


                                   कवारण्टीन  का सच 

   
  जिस राज्य में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के  जाने पर  बंद का ऐलान  कर दिया जाता है। जहां कमिश्नर किरण बेदी को आधी रात  को शहर छोड़ना पड़ा, सोचो  उस राज्य में साधारण बाहरी  लोगो के साथ कैसा  सलूक होता होगा। 
    बाहरी  लोगो को वहां के लोग स्वीकार नहीं करते। उनके चेहरे और भाषा बिलकुल अलग होने के कारण हम उनके बीच जगह नहीं बना पाते। 
    यदि ऐसे में मणिपुरी लोग हमारी मदद भी करना चाहते है तब उनको भी अलगाववादी लोग अनेक तरह से परेशान करते है। भाषा के आभाव में हम उन्हें अपनी बात सही तरीके  से समझा नहीं पाते। ऐसे में इन स्थानों पर आम बाहरी  इंसान को सोचो कितना डर  लगता है। वह हमेशा डर  कर जीता है। 
       सं 2017  में उत्तर  पूर्वी राज्यों में पहली बार  औरतो और दिव्यांग लोगो की केंद्रीय विद्यालय संगठन  ने नौकरी दी। इससे पहले कभी इन राज्यों में दिव्यांगों और औरतो की नियुक्ति नहीं होती थी। वहां उनकी सुरक्षा और रहने का उचित इंतजाम नहीं किया गया। 
          जिन विद्यालयों में रहने का इंतजाम नहीं होता वहां पर  लोगो के घर जाकर अनजाने लोगो से अपने लिए घर मांगना कितना मुश्किल होता है। ऐसी हालत का सामना मुझे करना पड़ा।  
          केंद्रीय विद्यालय अभी खुले नहीं है। लेकिन उनके प्रधानाचार्य ने उन्हें समय से पहले बुला लिया। जबकि अभी केवल ऑनलाइन क्लासेज हो रही है। ये कक्षाएं कही से भी ली जा सकती है। 
        उनके मणिपुर पहुंचने  पर उन्हें  क्वारंटाइन सेण्टर में रखा गया  .जहाँ किसी तरह की सुविधा नहीं थी। ये सुबह पांच बजे 23..6 . 20   को घर से निकले थे। रात  8  बजे कवारण्टीन में रहने की जगह दी गई। ये  थकने के कारण जल्दी सो गए।  24  को उन्होंने सफाई के लिए बात की। लेकिन किसी ने नहीं सुना। अब ये दो दिन से नहीं नहाये थे। इनके पास कपड़े भी बहुत कम  हे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था । इतने गंदे स्नानागार में कैसे नहाये और कपड़े धोये।  इस समय सफाई कर्मचारी से सफाई को लेकर इनकी कहासुनी  हो गई। उसने थाने  जाकर FIR  दर्ज करवा दी।
        अगले दिन पुलिस 12  बजे इन्हे ले गई। उनके अनुसार इनकी शिकायत दर्ज हुए  दो दिन हो गए थे। अब शनिवार और इतवार की छुट्टी के कारण कोई काम नहीं हो सकेगा। 
      जो  बच्चे कोरोना काल  में घर में घुसते ही घर के हैंडल, चाबी,थैले  साफ करते थे।   सिर  से पैर  तक नहाते थे। उन्हें ऐसे  क़्वारण्टीन केंद्र में ठहराया गया। जहां केवल गंदगी थी। स्नानागार और शौचालय भी गंदे थे। पानी का इंतजाम नहीं था  . 
        जिंदगी हर किसी  को प्यारी होती है। ऐसी गंदगी को साफ करने के लिए कहा  गया तब उन्होंने ध्यान नहीं दिया। झाड़ू, पोंछा जैसे सामान मांगने पर नहीं दिए गए। उन्होंने सोचा हम खुद सफाई कर लेंगे।  साफ जगह रहने से बीमारियों से बच सकते है।   भाषा के आभाव में उन्हें ये लोग अपनी बात समझा नहीं पा  रहे है। 
        खाने का भी सही इंतजाम नहीं था।  विरोध करने पर इन्हे झूठे इल्जाम में फंसा  कर जेल भेज दिया गया उन्होंने एक बार भी हालत बदलने के बारे में नहीं सोचा। 
      नॉन मणिपुरी लोगो से वहां के लोग बहुत नफरत करते है। इससे पहले भारत के  किसी राज्य में आपने  क़्वारण्टीन किये लोगो को जेल जाते सुना है? कभी नहीं ? जिसमे चार लड़कियां और एक दिव्यांग लड़का है। 
        सफाई कर्मचारी ने खुद अपने को घायल कर लिया। FIR  दर्ज करा दी। अब हमारे बच्चे जेल में बंद कर दिए गए है। जिनकी कही सुनवाई नहीं हो रही है। भारत में एक तरफ बेटी बचाओ ,बेटी पढ़ाओ का अभियान चलाया जा रहा है  .तो वही  दूसरी तरफ पढ़ाती हुई बेटियों को जेल में डाला जा रहा है। 
       दिव्यांग पर भी तरस  नहीं खाया जा रहा है। जबसे ये बच्चे वहां गए तभी से ये सभी जगह फरियाद कर रहे थे। किसी ने सुनवाई नहीं की। लेकिन उस सफाई कर्मचारी के आरोप को सच मान कर इन्हे जेल में डाल  दिया गया है।उसके कहे पर किसी ने सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की 
      जेल में भी खाने का इंतजाम नहीं है। वही के एक शुभचिंतक ने दो समय खाना भिजवाया है। देखते है कितने समय तक  वे उन्हें खाना पहुंचाने  की जिम्मेदारी निभाते है  .
           सरकार के ऐसे इंतजामों से मौतों की संख्या हजारो में नहीं बल्कि करोड़ तक पहुंच जाये तो मुझे हैरानी नहीं होगी। 
     अब मुझे लगता है इन्ही हालातो के कारण लोग क़्वारण्टीन केन्द्रो में पहुंचना नहीं चाहते। ट्रेन वाले आउटर पर गाड़ी रुकवा कर उतर  रहे है।  यदि पहुंचते है तो आत्महत्या कर रहे है।
             जेल से निकलने के बाद इन्हे निलंबित कर दिया गया है। अब आप ही बताओ मोदी जी ने सफाई अभियान किसलिए चलाया था। हमे पहले गंदगी में रहने की आदत थी। आपने ही सफाई से रहने का अहसास दिलाया। अब सफाई पर जोर देने पर , ऐसे हश्र के बारे में किसने सोचा था
         लड़कियों की नौकरी मुश्किल से लगती है  .उसपर दूर जाकर नौकरी करने की इजाजत कितने परिवार वाले दे पाते  है।
      दिव्यांग लड़का जिसकी एक आंख नहीं है। दूसरी आंख  का नंबर दस है। ऐसे समय में उस इंसान के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे।  इनका भविष्य अंधकारमय हो गया है। 
        आप केवल कमजोर वर्ग के लिए आवाज बुलंद कर रहे है।   इन रोते  बिलखते दर्द में डूबे  लोगो की आवाज  कौन सुनेगा।
           मणिपुर में अलगाव का दंश इस तरह से लगा है। उनकी मदद करने के लिए कोई तैयार नहीं है। हमे केवल आप  पर भरोसा है।
        पिछले पत्र  का कोई असर  नहीं हुआ। यदि आप हमारी तकलीफ समझते है तो अवश्य कुछ कार्यवाही कीजिये। हमें किसी तरह सूचित कीजिये ताकि हमें अहसास हो की कही हमारी सुनवाई  हो रही है।
      दर्द में डूबे  दिव्यांग और लड़कियों के अभिभावक 
         
    

#LIVE PARENTS AS CHILDREN

               बच्चो के साथ जीवन जीते अभिभावक 

  आप यदि भारत या किसी अन्य देश में आत्महत्या के बारे में जानकारी हासिल करोगे।  तब आपको पता चलेगा  कि  गरीब देश या राज्य में लोग आत्महत्या कम करते है बल्कि अमीर देश या राज्यों में लोग अधिक  आत्महत्या करते है। आपको ये जानकर हैरानी हुई या नहीं?
         संसार में अमरीका और यूरोप के देशो में आत्महत्या का औसत ज्यादा है। वैसे ही भारत में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में आत्महत्या ज्यादा की जाती है। बनिस्वत गरीब राज्यों या देशो के ?
        अमीर या मध्यम वर्ग के   लोगो के बच्चे ही अधिक आत्महत्या करते है।  इसका कारण उनका बचपन में सभी जरूरतों का पूरा होना है। अभिभावक उनकी इच्छा पूरी करते   समय, ऐसा  महसूस करते है जैसे उनकी अपनी इच्छा, इस रूप में पूरी हो रही है। . 
     बचपन में बच्चो की इच्छाएं पूरी करने में अभिभावक समर्थ होते है। लेकिन जैसे -जैसे वे बड़े होते है, समाज से जुड़ते है। उनकी इच्छाएं  दुसरो पर निर्भर हो जाती है। बाहर के लोग  उनसे जुडी सभी इच्छाएं  पूरी करना जरूरी नहीं समझते। तभी आपने आजकल 7  साल के बच्चो की आत्महत्या की खबरे भी सुनी होंगी। जबकि आजादी से पहले आपको इस तरह की खबर सुनाई नहीं देती होंगी।
     पहले समय में बच्चे संयुक्त परिवार में रहते थे। कोई भी उन्हें गलती होने पर डांट  और मार  सकता था। उनके अंदर अपमानित होने पर सहन करना सिखाया जाता था। । उन्हें  समाज द्वारा ,नौकरी में या शादी  के बाद के जीवन में अपमानित होने पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था।
       एकल परिवार में अभिभावक,  बाहरी  व्यक्ति के द्वारा कहे गए  हर शब्द को,  बच्चे के साथ खुद को भी जोड़ लेते है। उन्हें वह अपमान बच्चे से ज्यादा खुद का अपमान लगता है इसलिए  बच्चे को हर अपमान से बचाने  में दूसरो  से सम्बन्ध तोड़ने में भी देरी नहीं करते  जिसके कारण बच्चो को अपमानित होने की आदत नहीं होती।

  •      बाद में  बड़े होने पर   अपमान सहने पर उन्हें दुनियाँ  वीरान लगने लगती है। वो आत्महत्या का रास्ता चुन लेते है।
  •  ऐसे में यदि आप सारे  जीवन अपने बच्चो को जीवित देखना चाहते है। तो उनकी सभी जरूरते कभी पूरी मत कीजिये। 
  •  यदि उनकी इच्छाएं  पूरी करते है तो उसके साथ कुछ शर्ते जरूर रखे..
  •  उन्हें कभी -कभार थप्पड़ मारने  में बुराई नहीं है। 
  • क्योंकि समाज आपके समान दयालु नहीं होता। उन्हें हर कदम पर अपमान और प्रतियोगिता का सामना करना पड़ेगा।
  •  उन्होंने यदि जीवन में कभी अपमान नहीं सहा होगा तब उन्हें सुशांत  सिंह के सामान कदम उठाने में देर नहीं लगेगी। 

       आप खुद सोचिये चार बहनो का दुलारा,मन्नतो से माँगा गया बेटा , [पढ़ने -लिखने में विलक्षण ,जिस रास्ते  पर कदम रखा हर जगह सफलता पाई। ऐसे इंसान को किसी ने डांटने के बारे में सोचा होगा। कभी नहीं ?  इसलिए वह  इस वक्त समाज की बेरुखी सहन नहीं कर सका।
        ऐसी बेरुखी फिल्म लाइन में बहुत लोगो ने सहन की है। लेकिन जिन्दा है। बाद में सफल भी हुए  है।  यदि आप मेरे विचार से सहमत है। तो अन्य लोगो तक पहुंचाने  की कोशिश कीजिये क्योंकि बच्चे के जीवन में अभिभावकों की  आत्मा बसती  है।  उनकी मौत का जख्म बहुत कम  लोग सहन कर पाते  है। 
 ऐसा दुःख किसी और को सहना न पड़े इसलिए अधिक से अधिक लोगो तक इसे शेयर  करे। 

#sushant died due to factionalism

          सुशांत सिंह की मौत गुटबाजों के कारण हुई 


  सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने मुझे झकझोर दिया है। लोगो की संवेदना व्यक्त करके, उसे  श्रद्धांजलि  देना सुखद लग रहा है। लेकिन इतनी छोटी उम्र में भाग्य के दुलारे से जीवन छीन लेने वाले कौन लोग हो सकते है। उसका जानना भी जरूरी है।
      सुशांत  एक विलक्षण विद्यार्थी थे। तभी उन्हें इंन्जीनिरयरिंग के लिए दिल्ली के टेक्निकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया। उसके बाद अपने अभिनय के झुकाव के चलते इंजीनियरिंग छोड़ कर मुंबई जाने की हिम्मत जुटाई। वरना  यहाँ से पढ़ाई  करने वालो की  अच्छी  जगह नौकरी लगते देर नहीं लगती।
         उन्होंने अपने अभिनय के  शौक को पूरा करने के लिए मुंबई में पवित्र रिश्ता जैसे सीरियल में काम करके अपने लिए जगह  बनाई। इसके हिट  होने  पर  फिल्मो में प्रवेश मिल गया। उनकी अधिकतर फिल्मे हिट रही। . उनकी पिछली फिल्म छिछोरे  भी हिट साबित हुई।
      ऐसा क्या कारण था उन्हें मौत को मुँह लगाना पड़ा।  हिट फिल्मो के हीरो को  वेव सीरीज में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
     हमारे देश में मुंबई के  बाहर से आने वालो के रास्ते  बंद करने के लिए सारे  दिग्गज एक जुट हो गए थे। उसे कोई फिल्म मिलने नहीं दे रहे थे।
     जो उन्हें फिल्म में रोल देना चाह  भी रहा था। उसे डराया जा रहा था। जिससे वो उन्हें अपनी फिल्मो  से निकाल  दे।
     ये सिर्फ मेरे विचार नहीं है। बल्कि मुंबई के बहुत सारे  दिग्गज धीमी आवाज में ऐसे ;लोगो को  गिद्ध कह रहे है।नेताओ ने ऐसी गुटबंदी पर सख्ती करने के लिए आवाज उठाई है। 
      यदि आप मुझसे सहमत है।
     ऐसा कैम्पेन  शुरू करे, ऐसे बड़े बैनर की फिल्मे नकार दे। जिससे उनमे  अपने भगवान  होने का अहसास खत्म हो जाये।
        बम्बई से बाहर के लोगो को भी सपने देखने और उन्हें साकार करने का अधिकार होना चाहिए।वरना  आपके परिवार का कोई सदस्य मुंबई की मायानगरी में कदम रखने के बारे में सोच भी नहीं पायेगा।
  यदि आप मुझसे सहमत है तो इसे अधिक से अधिक फ़ैलाने में मेरी मदद कीजिये।  उसकी मौत पर मातम मनाने  का नहीं ऐसे गुटबाजों के खिलाफ एकजुट होने का समय आ गया है।
      यदि आप मुझसे सहमत है तो अधिक से अधिक  इसे शेयर कीजिये।  

#changing equations

                                 बदलते समीकरण 

 महाशक्ति का  पतन किस तरह  हो सकता है। ये आज दिखाई दे रहा है। भारत एक ट्रिलियन डालर से पांच ट्रिलियन डॉलर  के सपने देख रहा  है। पता नहीं ये सपना भारत का पूरा हो सकेगा या नहीं ? जबकि अमरीका इस समय 22  ट्रिलियन डॉलर  के साथ महाशक्ति बना हुआ है।
     आजकल के हालत सोचने पर मजबूर कर  रहे  है। इस महाशक्ति के कमजोर होने का वक्त आ गया है। या फिर से संसार की महाशक्ति के रूप में उठ खड़ा हो जायेगा। अपनी ताकत के घमंड में अमरीका ने कितने देशो को बर्बाद कर दिया, इसका उदाहरण आप कुछ बरस  पीछे  जाकर देख सकते है।
         पहले करोना  के कहर  ने उसे घुटनो पर ला दिया था। अब अश्वेत की मौत  के  कारण उपजा दंगा कब शांत हो पायेगा समझ नहीं आ रहा। भारत में दंगे इतने दिनों तक फैलते नहीं देखे थे। जितने दिन भी दंगे होते थे ,उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाता था।
          इस महाशक्ति के पास सैन्यबल भी है। लेकिन हो सकता है वहां की नेतृत्ब क्षमता के पास इससे निबटने का मनोबल नहीं है।  अब यह दंगा गृह युद्ध का रूप लेता जा रहा है।
        कई  बार लगता है। चीन जैसे विरोधी गुट  के कारण इन दंगो को भड़काया जा रहा है। जिससे अमरीका की महाशक्ति खत्म करके, चीन महाशक्ति के रूप में उठ खड़ा हो। क्योंकि चीन को इस समय रोकने की क्षमता केवल महाशक्तियों (अमरीका,इंग्लैंड ,इटली )  में है। अमरीका के आलावा यूरोप के अधिकतर देश सुलग उठे है। आने वाले समय में हो सकता है शक्ति का झुकाव एशिया की तरफ हो जाये। 

#natural disaster

          प्रकृति का विकराल रूप    

         हड़प्पा ,मोहनजोदड़ो और  लोथल की सभ्यता खत्म कैसे हो गई?  मुझे समझ नहीं आता था। लेकिन अब करोना  काल  के हालात  साबित कर रहे है पूरी सभ्यता कैसे खत्म हो सकती है?
    हमारे  सामने इस समय,आजतक  ग्यारह बार भूकंप आ गए है। मेने कभी इतने कम समय में इतने भूकंप आते कभी नहीं देखे। पूरे  भारत में भूकंप  लगातार आ रहे है
    आपने बंगाल की खाड़ी  में तूफान की तबाही देखी  है ,इसकी हमे आदत पड़  गई है  क्योंकि बंगाल की खाड़ी में अक्सर तूफान आते रहते है।
        लेकिन अरब  सागर में इतना भयानक तूफान 129  साल बाद आया।
      बारिश और बाढ़  की तबाही का सामना  भारतीय लोग  करते रहते है।
      टिड्डीदल का विकराल रूप किसानो की सारी  फसल चट  कर सकता  है । अकाल जैसे हालत पैदा हो  सकते है।
      इस समय कारोबार बंद होने के कारण बेरोजगारी।
     करोना  के कारण होने वाली मौतों ने जिंदगी पर से भरोसा हटा दिया है।
       .यदि इन सब से लोग  बच भी गए। तब भी अधिकतर भारतीय लोग भूख से मर सकते है।
          पहले समय में राम ,कृष्ण और शिवजी के समय में उन्नत जीवन  की कल्पना अतिश्योक्ति लगती थी। लेकिन अब  सभ्यताओं के खत्म होने का कारण समझ में आने लगा है।मेरे मिथक टूटने लगे है।
        

#HORREBAL SITUATION IN CORONA

                          डर  की इन्तहा 

   
   करोना काल  में मजदूरों के प्रवास के बारे में हर तरफ चर्चा हो रही है। लेकिन ऊँची नौकरी करने वाले भी अपने परिवार से कई महीनो से दूर है। उनकी चर्चा कोई नहीं कर रहा।  वो भी अपने परिवार से मिलने के लिए तड़प  रहे है।
         जब कल हवाई उड़ान  चालू हुई तो सरकार की तरफ से बहुत सारी  पाबंदिया लगाई गई है उनमे से एक बानगी आपके सामने पेश कर रही हूँ। 
       मेरे सामने ऐसे लोगो ने अपना परेशानी  बतायी ।
       लोग कहते थे। उनके परिजन ने उनके परिवार के सदस्य  के  मुँह पर तकिया रख कर मार  दिया। उनकी  दम  घुटने से मौत हो गई। 
        करोना  के कारण लोग बहुत सावधानी वरत  रहे है। एयर इंडिया जैसी एयरलाइन्स में चढ़ते समय NH 95  मास्क होना जरूरी है। इसमें हवा आर -पार  नहीं होती। उसके वाबजूद  लोग सावधानी वश उस पर दुप्पटे को भी प्रयोग कर रहे है।  एयरलाइंस वाले एक प्लास्टिक शीट भी इस्तेमाल करवा रहे है। 
      इतनी अधिक सावधानी में इंसान की हालत दमघुटने जैसी  हो जाती  है। वह  कोई और नहीं हम खुद अपना दमघोट रहे है। 
         इन सब का प्रयोग देख कर लगता है बचपन में मुँह खुला रखने की सीख बेकार दी गई। इसे कहते है डर  की इंतहा।  



#FOOD HABBIT

                 
                                              खाने की आदते 

 
         मैंने एक परिवार  ऐसा देखा जहां घर के प्रत्येक सदस्य को उनकी खुराक से ज्यादा खाना दिया जाता था।  पहली बार मैने  जब उनके घर के प्रत्येक  सदस्य को आधा खाना छोड़कर, उठकर जाते देखा, तब मुझे बहुत हैरानी हुई। इसका कारण जानने  पर पता चला. ये शाकाहारी खाना नहीं खाते।
      उनके घर शाकाहारी खाना हमारे कारण बनाया गया था।  इसलिए उठ गए। मुझे बहुत दुःख हुआ वे एक समय भी शाकाहारी   खाना भरपेट  नहीं खा सके।
       उस इलाके के लोग अधिकतर मांसाहारी खाना खाते  है। इसलिए मुझे अजीब लगा ये लोग एक समय भी भरपेट शाकाहारी खाना पसंद नहीं कर सकते। ये लोग अमीर थे। इसलिए उनकी खाने की आदत उनका शौक लगा।
       कुछ दिन बाद मेरा वहां के साधारण लोगो के बच्चो  से वास्ता पड़ा। उनके अंदर भी यही भावना दिखाई दी , एक समय शाकाहारी खाना खाने के बाद, दूसरे समय उन्होंने शाकाहारी खाना खाने से मना कर दिया।
      दिल्ली में रहते समय मेरा वास्ता हफ्ते में एक दिन मांसाहारी खाने वालो से पड़ा था लेकिन पहली बार ऐसे लोगो से वास्ता पड़ा जो एक समय मुश्किल से शाकाहारी खाना खा सकते थे। दूसरे वक़्त शाकाहारी  खाने को देखकर भूखे रहना पसंद करते थे। बच्चो ने शाकाहारी खाने को देखकर रोना शुरू कर दिया।  हैरानी हुई क्या ?

#HELPLESSNESS

                      बेबसी का आलम 

       मजदूरों की बेबसी पर सबको तरस  आ रहा है। वे अपने पैरो  के भरोसे ,सेंकडो मिल की दुरी भूखे -प्यासे , अपने छोटे -छोटे बच्चो और गर्भवती महिलाओ के साथ तय  कर रहे है। किसी का बच्चा बीच  रास्ते  में पैदा  हो गया। कोई अपने दस दिन के बच्चे को हाथ में उठाये पैदल सफर कर रही है। जबकि कहा जाता है। एक औरत को बच्चे के जन्म के बाद  40  दिन का आराम करना जरूरी है। उनके परिवार के सभी सदस्यों  की बेबसी  मन को दुखी कर देती  है।
        अब बस और रेलगाड़ी चलने लगी है। उनका दुःख पैदल चलने वालो की अपेक्षा कम होना चाहिए लेकिन वे कभी गाड़ी देर से चलने पर ,कभी पानी की कमी के कारण और  कभी खाना नहीं मिलने के कारण तोड़ -फोड़ करने में लगे है। उन्हें आप क्या कहेंगे।
       दुखी इंसान के ऐसे समय में सिर्फ  आंसू बहते है। वे कई दिनों से भूख बर्दास्त कर रहे थे। एकाएक ऐसा क्या हो गया ,उनकी सहनशक्ति कैसे  खत्म हो गयी।
       ये गरीब मजदूरों का दर्द नहीं, बल्कि गुंडे -बदमाश उनके बीच  आ गए है। वे हालत को बदहाल करने में लगे है।
       मैंने गरीबो की बेबसी पर आँसू  बहते देखे है। यदि वे इतने गुस्सेबाज होते तब वे दूसरे शहरों में कैसे इतने दिन भूख सहन कर रहे होते।
       मजदूरों की आड़ में गुंडे सामने आ रहे है। या वे जो भारत की शांति को बर्दाश्त  नहीं कर पा रहे हे 

#DEATH IN THE AIR

                  हवा में उड़ती मौत 

    हम अपने घर में खिड़की दरवाजे बंद कर अपने को सुरक्षित समझते है। लेकिन वक़्त किस रूप में हमे तबाह करने आ जाता है। पता नहीं चलता।
        ऐसा ही पाकिस्तान में कराची एयरपोर्ट के पास हुए हादसे से पता चलता है। वहां के लोगो ने कल्पना भी नहीं की होगी, आज का दिन उनका अंतिम दिन होगा। वे सब ईद की खुशियों में खोये हुए थे। 
        प्लेन में आने वाले भी ईद मनाने के उद्देश्य से आये थे। उन्हें क्या पता था उनकी खुशियां मातम में बदल जाएँगी। 
    दुर्घटनाग्रस्त   रिहायशी  आबादी वालो के चेहरे पर हवाइयां साफ दिखाई दे रही थी। उनके लिए इस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। वे बोलने की हालत में भी नहीं थे।
        टूटे हुए मकान, जलता हुआ सामान ,लोगो की लाशे देखकर कुदरत की ताकत के सामने इंसान का बौनापन साफ दिखाई देता है। 

#BIG HEARTED OR NARROW MINDED

                  बड़े दिल का या संकुचित 

          पुराने समय में बाहर के लोगो का सामान अलग रखा जाता था। उस समान को घर के लोग इस्तेमाल नहीं करते थे। इसे में जाति  व्यवस्था से सम्बन्धित समझती थी। मुझे उस समान को इस्तेमाल होने के बाद, उसमे क्या फर्क पड़ा, ये समझ नहीं आता  था।
      मुझे बड़ो के दकियानूसी विचार अच्छे नहीं लगते थे। बाहर वालो के जाने के बाद उन बर्तनो को साफ करके उसमे खाना खाकर देखती थी। ऐसा क्यों किया जाता है। लेकिन कुछ भी समझ नहीं आता था।
       अब कोरोना काल में उसका कारण समझ आ रहा है।  बड़ो से पूछने पर वे  सही जबाब नहीं दे पाते  थे।  सौ सालो में ऐसी महामारी नहीं फैली। इसलिए इसका कारण वायरस की जगह, छुआछूत ने ले लिया था।
        इसलिए बगाबत करने का मन करता था।
        कोरोना खत्म होने के बाद बर्षो तक, लोगो में समान के इस्तेमाल को लेकर ऐसी आदत, सभी में बन जाएगी। अब सभी खुद को  बड़े दिल का दिखाने की अपेक्षा संकुचित हो जायेंगे। 

#VIRUS IN THE ENVIRONMENT

             वातावरण में विषाणु 

 वातावरण में हर समय वायरस होते है। वे कम या ज्यादा होते है लेकिन खत्म कभी नहीं होते। ये जिनकी  प्रतिरोधात्मक शक्ति कम होती है। उसे बीमार कर देते है। जिनकी विषाणुओ से लड़ने की ताकत शरीर में होती है। उनपर कोई असर नहीं कर पाती
        आने वाले समय में कोरोना का विषाणु वातावरण और शरीर से खत्म नहीं होगा बल्कि हम अपनी प्रतिरोधात्मक शक्ति से उससे लड़ने की ताकत बढ़ा  लेंगे या बढ़ जाएगी।
                उसके लिए प्लाज्मा से इलाज किया जा रहा है। जो कोरोना से ठीक हो चुके हे उनमे विषाणु  से लड़ने की ताकत पैदा हो चुकी  है। उनका प्लाज्मा लेकर अन्य  रोगियों को ठीक किया जा   सकता है।
  

#SELF -RELIANT INDIA CAMPAINGN

                                आत्मनिर्भर भारत अभियान 

 
  आत्मनिर्भर भारत बनाने का सपना हमारे नेताओ ने देखा है। सभी आत्मनिर्भर होना चाहते है। लेकिन उसके लिए हमारी  सरकारी व्यवस्था  के काम काज को करने का तरीका  बदलना होगा।
         पुराने समय में सरकारी कर्मचारी जनता का नौकर होता था। जनता के  काम में होने वाली कमियों को दूर करके उन्हें  सही अंजाम तक पहुंचाने  के लिए पूरी कोशिश करते थे।
       अब वे गरीब तबके के लोगो की सहायता करने की जगह  अपने को श्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते है। दूसरो के दुखो को दूर करने की कोशिश नहीं करते।  बल्कि शिकारी नजरो से देखते है इसे अपने जाल में कैसे फंसाया जाये और अधिकाधिक बसूला जाये।
      पहले  कर्मचारी अनपढ़ जनता की मदद के लिए तैयार रहते थे। लेकिन अब उन्हें अनेक तरिके से लूटने वाले अधिक होते है। भारत का  माहौल ऐसा हो गया है कोई किसी पर भरोसा नहीं कर पा  रहा।
      फेरीवालों की मदद के लिए दिया जाने वाला कर्ज, किसानो की तरह उनके अकॉउंट में भेज दिया जाये उसका लाभ हो सकता है। वरना  वह जरुरतमंदो तक कभी नहीं पहुंच सकेगा। 
         ऐसे समय में भारत आत्मनिर्भर कैसे बनेगा। जब मददगार ही लूटने में लगे है। 

#REQUEST FOR POOR

                              गरीबो की फरियाद 


 रेहड़ी वालो को सरकार  की तरफ से दस हजार लोन देने के बारे में कहा गया है। लेकिन ये लोग जब लोन लेने जाते है तब बैंक वाले सही तरह से इनसे बात करना जरूरी नहीं समझते। कम पढ़े लिखे और गरीब लोगो के मन में सरकारी कर्मचारियों का खौफ होता है।
     सरकार बैंक वालो के सामने कर्ज देने से सम्बन्धित  एक लक्ष्य निर्धारित  करती  है.जिसे पूरा करना जरूरी होता है। लेकिन गारंटर के आभाव में,पैसे मिलने  की नाउम्मीदी  के कारण ,जिनका पता किराये का मकान होता है। वे  ऐसे अजनबियों को पैसे देने से डरते है। क्योंकि पैसे वसूली करना मुश्किल होता है।
      बैंक वाले ऐसे वक्त में गरीब लेकिन जान -पहचान वालो को  पैसा देकर अपना लक्ष्य पूरा करते है। इसलिए जरूरतमंद तक चाहते हुए  मदद नहीं पहुंच पाती।
        समाचारो में  पैसो  का जिक्र करते समय समाचार  वाचक ने साथ में कहा  भी था। -"यदि सरकार द्वारा दी राहत सही हाथो में पहुंचने लगे तब देश की तरक्की बहुत तेजी से होगी। "         
           लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पता।धोखेबाजी से बचने के लिए अनेक तरिके अपनाये जाते है।  नौकरी सबको  प्यारी होती है। मुश्किल से मिली नौकरी छोड़ना कोई पसंद नहीं करता ?

#work exemption

                                 चींटी और अफसर


     
  भारत में काम करने वालो के काम करने के तरीके की निगरानी रखने के लिए सरकार  की तरफ से बहुत सारे  नौकर रख दिए गए है। वह  उनके काम में मदद करने की जगह ,उनकी कार्य क्षमता को बढ़ाने की जगह ,कम  कर रहे है। उस पर अनेक प्रतिबंध लगा कर। उसी कारण भारत की जीडीपी बढ़ने की जगह कम होती जा रही है। 
        ये चींटी और अफसर वाली कहानी सही साबित हो रही है। अन्य की दखलंदाजी के कारण उन अफसरों का वेतन का खर्च बढ़  गया है। लेकिन चींटी रूपी आम जनता के काम के उत्पादन में कोई बदलाब नहीं आ रहा है।   चींटी और सरकार दोनों को कोई फायदा नहीं हो रहा। 
      अत काम करने वालो को उनके अनुसार मन लगाकर काम करने की छूट दी जाये।प्रतिबन्ध कम किये जाये।  तब उत्पादन कार्य बढ़ेगा, कम नहीं होगा। 
        करोना  काल  में काम करने की छूट देकर देश की उन्नति में सहायता मिलेगी 

#NATURE'S REVENGE

                               प्रकृति का बदला 


 कुदरत का कहर केसा होता है। लगभग सब भूल चुके थे।  2020  में हमें इस बात का अहसास दिला दिया है. कुदरत के सामने इंसान बहुत छोटा है।
      पूरा संसार इसके सामने हार  मान चूका है। हिन्दू ,मुस्लिम और अन्य धर्मो के  लोग पूजा करने में लगे है। यहां तक की अमरीका की संसद भवन में भी सभी धर्मो का शांति पाठ किया गया।
       यदि यही शांति पाठ  भारत की संसद में हो रहा होता तब आप ही सोचिए केसा शोर मचता।
      अर्थशास्त्री माल्थस का सिद्धांत था "-यदि धरती की जनसंख्या अधिक   बढ़  जाती है। तब कुदरत उसे कम करने का खुद रास्ता तलाश लेती है।"
          ये सिद्धांत मेने बर्षो पहले पढ़ा था। तब उसका मतलब महामारी ,मै  नहीं समझ सकी  थी'. क्योंकि चिकित्सा सुविधाओं के होते हुए मौत का आंकड़ा इतना बढ़ जायेगा इसका अहसास नहीं था।
          आजकल दिल्ली में भूकंप के झटके काफी आने लगे है। इसका मतलब क्या है। समझ नहीं आ रहा। भगवान लगता है इंसानो से रूठ  गया है।


#EXAMPLE OF BRAVERY SHARED FOOD

                            बहादुरी की मिसाल साझा चूल्हा 

   
  मैने  बहुत सारे  लोगो को दावत में जाकर शगन देते देखा था लेकिन वे शादी में खाना न खाने की बात करते थे। मुझे बहुत अजीब लगता था। समारोह में सज -संवर कर जाओ और बिना कुछ खाये आ जाओ। मुझे ऐसे लोगो के साथ समारोह में जाना बिलकुल अच्छा नहीं लगता था।
        लेकिन आने वाला समय दुबारा से ऐसा आ गया है। जो अपने परिवार में करोना के कारण  हादसा देख लेंगे वे बाहर के खाने से तौबा कर लेंगे।
      अब तक मुझे जब कोई समारोह में बुलाता था तो मुझे लगता था वह मुझे इज्जत दे रहा है। लेकिन आने वाले समय में हम सोचने पर मजबूर हो जायेंगे की इज्जत अफजाई के लिए जाये या जिंदगी को गले लगाए।
      मुझे लगता है काफी समय तक दावत में शानो शौकत दिखाना जरूरी नहीं रह जायेगा। बल्कि बहादुर लोग ही समारोह में शामिल हुआ करेंगे। 

#BIRDS RETURN

                                पक्षियों का लौटना 

        
  डल  झील बहुत   बड़ी जगह में फैली हुई है। कहते है पहले की अपेक्षा यह केवल चौथाई रह गई है. उसकी अभी भी विराटता मन को लुभाती है। वहां अलग -अलग परिदृश्य दिखाई देते है। तैरते हुए पार्क, नेहरू पार्क  और चारमीनार भी पार्क का नाम है।
      इस झील के पास ही एक नहर भी बह रही थी। जो गंदे नाले के समान थी। जिससे शहर का गन्दा जल झील में न जा सके। उसके बाहर रहे। इसका नमूना मुझे डल  झील के साफ पानी में दिखाई दिया। उसका पानी इतना साफ था कि  पानी की वनस्पति साफ दिखाई दे रही थी। जैसे कांच में एक बगीचा उगाया गया हो। मै  शिकारे में बैठ कर उसकी सुंदरता एकटक निहारती रही।
    डल झील में   एक तरफ बाजार था। लेकिन वहां का पानी गन्दा और बदबूदार था। क्योंकि उस तरफ मजबूत हाउसबोट और मजबूती लिए दुकाने बनी हुई थी। इस तरफ बहुत सारे लोग घूम रहे थे।  वहां तैरती हुई दुकाने भी थी।  तैरती हुई शिकारों रूपी  दुकानों  में लोग खाते  रहे थे क्योंकि मुझे उस जगह बहुत बदबू आ रही थी।  इस कारण मेरी कुछ भी खाने की इच्छा नहीं हुई।
       अब लॉकडाउन  में इंसानी पहुंच कम होने के कारण, वहां का पानी पहले से ज्यादा साफ हो गया है। पानी के पक्षी भी लौट  आये है। सच में मैने डल झील में पहले कोई पक्षी नहीं देखा था। मेरा वास्ता वहां की ठण्ड और वर्षा से हुआ था। इन हालातो को देखकर लगता है वातावरण बिगड़ने  का कारण केवल इंसान की गलत आदते है। धरती को  बचाने  का काम मानव को करना पड़ेगा वरना अनेक महामारियों से झूझने के लिए तैयार होना पड़ेगा।  

#reward to tax payers

                                      कर देने वालो को  इनाम 

   
    सरकार इस समय कर प्राप्त करने के लिए अनेक उपाय कर रही है। उसके लिए अधिक से अधिक सख्ती बरती जा रही है। लेकिन इसके कारण हमारे उद्योग धंधे बंदी के कगार पर पहुंच गए है। इसके बाबजूद  सरकार तक कर की रकम नहीं पहुँच पा रही है।
         व्यापारी वर्ग भी बिचोलियो को मुँह मांगी रिश्वत देकर कर कम  करवा  रहा है। लेकिन इन सब कारणों  से जनता और सरकार किसी को फायदा नहीं हो रहा है। बल्कि बिचोलियो यानि सरकारी कर्मचारियों की जेब में गलत रूप में पैसा जा रहा है. जिसका देश की उन्नति में योगदान नहीं है। एक की जेब से  कमाई निकल  कर दूसरे की जेब में वह  काली कमाई के रूप में पहुंच रही है।
            व्यापारी उसे बाजार में लगा कर समाज की उन्नति में योगदान दे रहा है। लेकिन  यही धन दीवारों या विदेशी बैंक में पहुंच कर किसका भला कर रहा है। सोचने की बात है। इस समय सरकार सारे उपाय बाजार में पैसे की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कर रही है। लेकिन बाजार में पैसा होगा तभी आएगा। 
         इसके स्थान पर सरकार कर देने वालो को अपने खर्चे की सभी रसीदे दिखाने  के बदले में उन्हें इनाम स्वरूप कुछ फायदे दे, तब कोई भी अपनी कमाई छुपायेगा नहीं। बल्कि अपने खर्च की प्रत्येक रसीद ख़ुशी से सामने रखेगा। इससे  कर का सही आंकलन  करना आसान हो जायेगा। 
       छोटे बच्चे से इनाम के लालच में उसकी सभी अच्छाई-बुराई   सामने लाई  जा सकती है। 
     जानवरो से मुश्किल से मुश्किल काम उनकी प्रकृति के विरुद्ध इनाम के लालच में   करवाये  जा सकते है।                  व्यापारी अकेले व्यापार  नहीं चला सकता। उसे अपने साथ काम  करने वालो की जरूरत होती है। उसकी तरक्की से बेरोजगारी की समस्या हल होगी, साथ ही देश की तरक्की में भी योगदान होगा। 
       सरकार के सारे  संसथान घाटे में चल रहे है। उन्हें पैसा देश की अर्थव्यवस्था से ही प्राप्त होता है। यदि व्यापार ही खत्म हो गया तो देश किसके भरोसे तरक्की करेगा। व्यापारी हमेशा लाभ कमाकर  ही  आगे बढ़ता है। वह कभी घाटे में ज्यादा दिन व्यापार नहीं कर सकता है। 
      आप देख रहे है सारे  साम्यवादी देश तानाशाह बन गए है। या पूंजीवादी बन गए है। साम्यवाद के पतन के बारे में सोचने पर सच्चाई सामने आ जाएगी। 
         उन्हें व्यापारियों को चोर नहीं बल्कि   देश की उन्नति में सहायक समझ कर इनाम देकर उत्साहित करना चाहिए। करोना  के कारण हमारी अर्थव्यवस्था वैसे भी डूबने की हालत में है। उसे सहारे की जरूरत है। 

#IMMUNITY INCREASE

                          अंतिम उपाय 

           
    जब से कोरोना के ज्यादा  फैलने  के बारे में सुना है। मन में डर  समा  गया है। इससे लड़ने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है। इससे केवल अच्छी प्रतिरोधक क्षमता वाले ही जीत  पाएंगे। क्योंकि इसका कोई इलाज नहीं है। हमारी जीवन शैली से ही हमारी जिंदगी और मौत का अंतर् बढ़ेगा। 
         अच्छी प्रतिरोधक  क्षमता वालो पर इसका कोई असर नहीं होगा। उस पर विषाणु  का आक्रमण बेअसर हो जायेगा लेकिन उसके अंदर का विषाणु  दूसरे को बीमार कर सकता है।
       एकदम हम अपनी प्रतिरोधक क्षमता बड़ा नहीं सकते।यदि नियमो के अनुसार आचरण करे तो शायद बदलाव आ जाये।  करोना का असर यदि इलाज नहीं निकला तब सितंबर तक रहेगा। इससे भारत  जैसे देश की ७० % जनता बीमार पड़  सकती है।
       मुझे ऐसे समय में 1920  में डेढ़  करोड़ लोगो  की मौत याद  आ रही है। जबकि उस समय पूरे  संसार की कुल आबादी केवल डेढ़  अरब  थी जबकि भारत की आबादी केवल 25  करोड़ रही होगी। लोगो ने कितना  अधिक  नुकसान देखा होगा। 
      ऐसे समय  में इंसान की निरीहता  याद  आती है। 

#sorcery or virus

                               जादू -टोना या वायरस 

     
     मेरे जानने वाले बहुत सारे  लोग किसी के बीमार पड़ने या किसी की मौत के समय दुसरो पर इल्जाम लगाने से नहीं चुकते  थे। वे किसी की बीमारी के समय इलाज की कमी की अपेक्षा, किसी को जादू -टोना करने वाली ,मनहूस या डायन  करार करने में लग जाते  थे । शातिर लोग ऐसा घटनाक्रम रचते थे कि दूसरा इंसान लाचार  हो जाता था।  ये ऐसा इल्जाम है, उस समय वह औरत कितना भी अपने को सही साबित करने की कोशिश करे, लेकिन इसका यकीन  दिलाना  मुश्किल हो जाता था। कोई भी उसकी बात का यकीन करना नहीं चाहता था  । इसमें किसी को नीचा  दिखाना भी एक कारण होता था।  
      मैने  ऐसे भी लोग देखे है जो अपने बच्चे की मौत का डर  दिखा कर सारे  परिवार की सहानुभूति हासिल कर लेते थे। बच्चे की  सुरक्षा को लेकर अन्य पर जादू -टोना का इल्जाम लगा देते थे।
        दूसरी  औरत का सारा आत्मविश्वास  खत्म कर देते थे और पढ़ाई  लिखाई  को नकार  देते थे। लेकिन उनके दिमाग में एक बार भी ये बात नहीं आती थी।  उनका कहा हुआ झूठ,  यदि  सच हो गया।  तो वे अपना बच्चा भी खो सकते है।
         जबकि दूसरी औरत के आने से पहले वे अपना बच्चा खो चुके होते थे। लेकिन उसके आने के बाद उनके किसी बच्चे की मौत नहीं हुई होती। लेकिन अपने को श्रेष्ट साबित करने के चककर में नीचता की सारी  सीमाएं लांघते उन्हें देर नहीं लगती थी। 
       उन्हें कितना भी समझाओ, इसका कारण वायरस होता है। जादू -टोना नहीं होता है।  लेकिन उन्हें समझ नहीं आता था। 
      पुराने समय में  लोग अनपढ़ होने के कारण , छुपी हुई मौत रूपी वायरस को समझ नहीं पाते  थे। लेकिन कोरोना के समय सरकार ने इतना अधिक प्रचार कर दिया है कि लोग वायरस और अन्धविश्वास में अंतर कर सकेंगे। 
     आज के समय में किसी कमजोर   औरत पर,  किसी अन्य  की मौत का इल्जाम न लगाया जाये , यही मेरी प्रार्थना  है। 

#STICKING LIKE POSTER

                   पोस्टर की तरह चिपकना 

   
   आज मै  आपको दो लड़कियों की लड़ाई की दास्ताँ सुनाने जा रही हूँ। जिसे सुनकर मै  हैरान रह गई।  उनके सामने से निकलते हुए मुझे सुनाई दिया।
      एक लड़की दूसरी लड़की से   कह रही थी। -"तू मुझे समझती क्या है। तुझे इतना मारूंगी की दीवार पर पोस्टर की तरह चिपक जाएगी। तेरे घरवाले तुझे आकर चम्मच से खुरच -खुरच कर  छुड़ायेंगे। "
       उसके बाद में चम्मच से छुड़ाने की कल्पना करने लगी। मेरी हंसी रोके नहीं रुक रही थी। 
      

#weaker take bold step

                            कमजोर का सख्त कदम 

 
   दूसरे विश्व युद्ध के समय तीन  हारे  हुए  देशो पर, मित्र राष्ट्रो  ने  बहुत सारी  पाबंदी लगाई थी। जिससे वो दुबारा शक्तिशाली होकर संसार को विश्व युद्ध की आग में न धकेल सके। इससे कोई और देश होता तो  वह  घुटनो पर आ जाता लेकिन जापान ने उसके बाद भी हिम्मत नहीं छोड़ी,लगातार  विकास करता रहा।
        आज वह विकसित देशो की श्रेणी में आता है। उनके दर्द की दास्ताँ जापान  से ज्यादा कौन  जान सकता है। जापान में आज भी मित्र देशो की सेना, उन के कामो पर पाबंदी लगाने के लिए रहती है। लेकिन उनका सारा खर्चा जापान को चुकाना पड़ता है। 
       हारे  हुए देश के लोगो के  लिए,  विजीत  देश के हर आदेश को मानना  मजबूरी होती है। उसके बीच  भी उन्होंने अपनी अस्मिता बचाये रखी। 
        अमरीका ने  अपने देश के संतरे जबरदस्ती जापान की सरकार को  लेने के लिए विवश किया।  उन संतरो  के जापान में आने के बाबजूद किसी जापानी ने उन्हें खरीदना जरूरी नहीं समझा। जबकि संतरे उनके देश के संतरो की अपेक्षा मीठे थे।  वे पड़े  -पड़े सड़  गए। उसके बाद अमरीका ने कभी ऐसी शर्त नहीं रखी। 
      जापान के लोग  सरकार का विरोध करते समय काम छोड़कर नहीं बैठते बल्कि दुगुना काम करते है। बस बाँह  पर काली पट्टी बांध लेते है। 
     उन्होंने अपने खानपान व्यायाम स्वास्थ्य सम्बन्धी आदतों पर किसी अन्य देश का असर नहीं होने दिया। वहां आज भी सभी  अपने प्राचीन मूल्यों के साथ जी रहे है। उनकी तरक्की देखकर सलाम  करने का मन करता है। सभी देश करोना   के आक्रमण से तबाही के कगार पर पहुँच  रहे है बस जापान के लोग उसके सामने बेबस नहीं दिखाई दे रहे।  

#who wants to die

                              मरना कौन चाहता है 

 
     बिहार की खबर सुनकर हैरानी हुई। जिन्हे  हम भगवान  का दूसरा रूप मानते है। वे अपनी जिम्मेदारी से भाग कर गायब हो गए है। उनका अता-पता नहीं मिल रहा। वे लगभग 300  के आसपास डॉक्टर है। जिनकी सबसे ज्यादा इस समय जरूरत है। वे छुप गए है। 
     कोई भी बीमारी नुकसानदायक होती है। सबसे ज्यादा संवेदनशील जगह अस्पताल होते है। जहां सबसे ज्यादा बीमारियां ठीक होती है। वहीं सबसे ज्यादा स्वस्थ लोग  बीमारियों से प्रभावित होते है। इन डॉक्टरों को डिग्री लेते वक्त किसी ने बताया नहीं था। 
       हरियाणा के दम्पत्ति ने अपना डॉक्टर इस्तीफा दिया। उसे स्वीकार नहीं किया गया। 
     जो ऐसे समय में काम कर  रहे है। उन्हें अपने आप और परिवार से प्यार नहीं हैक्या ?
     कुछ सेवानिवृत डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी समझ कर काम करने फिर से आ गए है। 
    मिस ब्रिटेन  बर्षा जो ग्लैमरस जिंदगी जी रही थी। वह अपना कर्तव्य समझ कर चिकित्सा की डिग्री का इस्तेमाल करने के लिए लोगो की सेवा में उतर  आयी है । इसे आप क्या कहेंगे।
      मुझे लग रहा है। जो गायब हो गए है। वे लाढ -प्यार से  पले  अमीर  अभिभावकों की संतान है। जिन्होंने मेहनत  करके नहीं बल्कि पैसो से डिग्री खरीदी है। 

#out of the clutches of death

                मौत के शिकंजे से बाहर 

   
 सभी देशो ने कोरोना के डर  से लॉकडाउन और कर्फू  जैसे उपाय अपनाये है। लेकिन जापान में किसी  तरह की पाबंदी नहीं लगाई गयी है। वहां पहले जैसा ही काम, कोरोना काल  में चल रहा है। मौत का आंकड़ा भी नहीं बड़ा।  आपको हैरानी हुई या नहीं ?
      इसका कारण उनकी जीवन शैली है। वे आज भी जापानी तरीके  से कम  खाना खाते है। वह अधिकाधिक कच्चा (बिना पका ) खाना खाते  है। पारम्परिक खाने को तबज्जो देते है। बचपन से ही घर और विद्यालयों में खान -पान  का ध्यान रखा जाता है। 
      वहां के लोगो की कमर की नाप का, घर और संस्थान  में ध्यान रखा जाता है। औरतो का कमरनाप 32  इंच और पुरुषो का केवल 34  इंच होना जरूरी है। वरना कम करने के लिए कहा जाता है। 
  जापान में लोगो को विशेष रूप से व्यायाम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जिससे मोटापे से ग्रसित न हो। 
    जापान में लोग अपने घर और बाहर सभी जगह सफाई का ध्यान रखते है।
       उनके रोजमर्रा के व्यवहार में मास्क की आदत होती है। 
       आपको मालूम है। पूरे संसार में सबसे अधिक आयु के लोग जापान में होते है। इन सब उपायों को अपनाने के कारण बहुत सारी  बीमारियों से बचे रहते है। जिनकी रोग से लड़ने की क्षमता बड़ी हुई  होती है उसपर करोना भी असर नहीं दिखा रहा। 
     इन सब कारणों  से वहां की सरकार ने विशेष तौर पर उन्हें  किसी कार्य के लिए बाध्य नहीं किया। वहां के  लोग लॉकडाउन चाहते थे। लेकिन सरकार ने इसे जरूरी नहीं समझा। 

#THE REASON FOR THE CONSTRUCTION OF KHAJURAHO TEMPLE

             खजुराहो मंदिर बनने का कारण 

The legacy of Khajuraho group of monuments - Baisakhi Chatterjee ...     जब मेने इन मंदिरो के  बनने का कारण जाना था तब मुझे विश्वास नहीं हुआ था। लेकिन आज हम उस सच्चाई पर विश्वास करने की स्थिति में है। 
    मेने अपने जीवनकाल में प्रथम बार महामारी का सामना किया है। उसके सामने कैसे सभी लाचार हो गए  है। अनगिनत संख्या में मौते हमे झकझोर रही  है। 
   अब से हजार साल पहले भारत में बहुत युद्ध होते थे । उसमे मौतों की गिनती करना असम्भव है।  मध्य एशिया की स्थिति से आप जान सकते है । 
     भारत में उस समय संन्यासियों को बहुत सम्मान दिया जाता था। जिसके कारण अधिकतर लोग गृहस्थ धर्म का पालन करने की अपेक्षा सँन्यास  लेते थे। 
         मैने  अपने जीवन काल में संन्यास लेने वाले लोगो को नहीं देखा था। जो दिखते   थे  वे ढोंगी लगते थे। लेकिन मोदी और योगी जी को देखकर लगता है। मन से योग लेने वाले भी होते है।
     
       इन सब कारनो  से जनसंख्या बहुत कम  हो गई थी। जनसंख्या होने पर ही किसी राज्य पर राजा राज कर सकते है। ऐसे में कहा जाता है। -चंदेल वंश के राजा- रानी ने इस तरह के मंदिर बनवाने का साहस किया। यहां तक कहा  जाता है। इसके लिए उन्होंने स्वयं मॉडलिंग भी की थी। 
        कुछ विशेष रातो को सामूहिक आयोजन किये जाते थे। जिससे लोग गृहस्थ धर्म में प्रेरित हो। 

#ALCOHOL ADDICTION

                   शराब की लत 

   Covid-19 lockdown turns Kerala into nightmare for tipplers - india ...    शराब पर 70 % टैक्स लगा दिया गया।  पैट्रॉल पर भी टैक्स बड़ा दिया गया है।  हमारी सरकार जितना भी गरीबो की भलाई का  काम करती है। वह इन्ही दोनों के  टैक्स के भरोसे करती है। इन पर टैक्स बढ़ने पर शोर नहीं मचता है। वरना  इनकी लागत  कीमत लगभग  आधी होती है।
       ये आवश्यक सेवाओं में भी नहीं आते है। जिनको शराब की तलब हो वही पीते  है।  तलब  के सामने घंटो लाइनों में खड़े होकर डंडे खाने के लिए भी तैयार है। इनकी लाइन  दुकान खुलने से पहले कई जगह रात  से ही लगनी शुरू हो जाती है। कल हमारे इलाके में सारी  दुकाने शाम 5  बजे पुलिसवालो ने बंद करवा दी।  
      इसका   कारण  पूछने पर बताया। -" आप की दुकानों पर इतने ग्राहक नहीं आ रहे। जबकि शराब की दुकानों की भीड़ पर नियंत्रण रखने के लिए ज्यादा पुलिस की जरूरत है। "
      कई जगह लोग पूरे  महीने के हिसाब से बोतले खरीदते दिखे। जैसे इनके आभाव में मर जायेंगे।
   कुछ देशो में वाहनों की कीमत कम  होती है। लेकिन पैट्रॉल और डीजल की कीमत ज्यादा रखी जाती है  ताकि टैक्स तो मिले  ,  साथ ही सार्वजनिक वाहनों के इस्तेमाल की लोगो में आदत पड़े। इससे  भीड़ और प्रदूषण में कमी आये।  देखते है भारत में इसका क्या रूप दिखाई देता है। 

#REASON TO BE A LEADER

                           नेता बनाने का  कारण 

 गठबंधन की सरकार को किन किन समस्याओं ...    नेतृत्व के गुण  सभी में नहीं होते है। जिसमे होते है वे बचपन से दिखाई देते है। पिछले दिनों मेरी किसी से बहस हो रही थी। उन्होंने कहा - " भारत की सारी  जनता काम  करती है लेकिन सारा श्रेय मोदी जी ले जाते है। "
    उसका गुस्सा सार्थक था। क्योंकि मोदी जी के पास अपना कहने लायक कुछ नहीं है। लेकिन हर जगह मोदी नाम आता है।
     ऐसे में   मुझे अंग्रेजो का समय याद  आया. जब आजादी की लड़ाई चल रही थी। बहुत सारे गुट अलग -अलग लड़ रहे थे।
        उनके आक्रोश को देखकर    अंग्रेजो ने कहा -"तुम अपना एक  नेता बात करने के लिए  हमारे पास भेजो; हम बात करने के लिए तैयार है। यदि   भीड़ में से सभी अपनी बात कहना चाहेंगे।  उन सबके शोर में हमें सही बात समझ नहीं आएगी।" तब कांग्रेस का गठन हुआ था।
      यदि आज सारे  राज्य और प्रत्येक व्यक्ति अपने योगदान का अलग -अलग गुणगान करेगा। तो किस्मे इतनी  सामर्थ्य है। जो इनके सामने खड़ा होकर उनकी बात सुनेगा।
       बिना नेतृत्व क्षमता के हम 1857  की लड़ाई हार  गए थे।  

#corona warrior"s honour

              कोरोना योद्धाओ का सम्मान 

   Corona Warriors Archives - Star of Mysore Coronavirus In Uttarakhand: Indian Army Helicopter Sprinkle ...   सरकार की तरफ से आम जनता को कोरोना योद्धाओ को सम्मान देने हेतु घंटी ,शंख,ताली , थाली बजाओ आदि काम सौपे  गए थे। एक दिन दीप जलाने का काम दिया गया। आज मेने वायुयानों के द्वारा पुष्पवर्षा करते देखा। मुझे बहुत ख़ुशी हुई।
       ये काम बहुत सारे लोगो को ध्यान भटकाने वाले लग सकते है। इससे बीमारों को कोई फायदा नहीं होगा।            लेकिन इस बुरी स्थिति में लोग डरे हुए है। 
वह अपना डर  गुस्से के रूप में इन्ही पर उतारते। लेकिन मोदी जी की पहल के कारण अनेक जगह उन्हें सम्मान दिया जा रहा है। ये केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशो में भी,  इन सभी योद्धाओ  को, लोग सम्मानित कर रहे है। 
       ये योद्धा अपने परिवार को बीमारी से बचाने  के लिए घर नहीं जा पा  रहे। यदि जाते है तो घर के बाहर रहते है।  परिवार से अलग एक कमरे तक खुद को सीमित  कर  रहे है। ताकि उनका प्यारा परिवार संक्रमित न हो जाये।  इनका मौत के आतंक के बीच कार्य सराहनीय है। 
      वरना  पहले डर  के कारण  इन जांबाज  योद्धाओ को लोग घर खाली करने पर विवश कर रहे थे। 

#difference between rupee and dollar

                                    डॉलर और रूपये का अंतर 

 Rupee slips past 74 per US dollar on weak equities, coronavirus ...     जब अंग्रेजो का भारत पर राज्य था तब डॉलर और रूपये की कीमत समान थी। पूरब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के समय में डॉलर 4  रूपये का था।  लेकिन अब दोनों में 78  रूपये का अंतर आ गया है। भारतीय रूपये को इस समय डॉलर के बराबर लाया जा सकता है। लेकिन  यह असम्भव लगता है।
       असंभव भी संभव हो सकता है। यदि भारत में वेतन पर लगने वाला टैक्स हटा लिया जाये। क्योंकि इससे सरकार को केवल सरकारी कर्मचारियों से सही तरह से टैक्स मिलता है। बाकि सभी वर्गो के लोग अनेक जुगाड़ करके टैक्स बचा लेते है।
    केवल  हर चीज पर लगने वाला छिपा हुआ टैक्स बसूला जाये। तब भारतीय हर वस्तु सस्ती हो जाएगी। बाजार में पैसे का आवागमन बढ़  जायेगा। लोगो की क्रयशक्ति बढ़ने से उद्योग धंधे भी फलने -फूलने लगेंगे।
  टैक्स के रूप में पहले सरकार को केवल ढाई पर्सेंट टैक्स मिलता था। अब बहुत सख्ती और gst जैसे   तरिके अपनाने के बाबजूद 5 % पहुंचा है।
       सरकार का खजाना इतनी सख्ती के बाबजूद खाली है। इससे अच्छा भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ाने की सोचे तो ज्यादा अच्छा होगा।  

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...