बच्चो के साथ जीवन जीते अभिभावक
आप यदि भारत या किसी अन्य देश में आत्महत्या के बारे में जानकारी हासिल करोगे। तब आपको पता चलेगा कि गरीब देश या राज्य में लोग आत्महत्या कम करते है बल्कि अमीर देश या राज्यों में लोग अधिक आत्महत्या करते है। आपको ये जानकर हैरानी हुई या नहीं?संसार में अमरीका और यूरोप के देशो में आत्महत्या का औसत ज्यादा है। वैसे ही भारत में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में आत्महत्या ज्यादा की जाती है। बनिस्वत गरीब राज्यों या देशो के ?
अमीर या मध्यम वर्ग के लोगो के बच्चे ही अधिक आत्महत्या करते है। इसका कारण उनका बचपन में सभी जरूरतों का पूरा होना है। अभिभावक उनकी इच्छा पूरी करते समय, ऐसा महसूस करते है जैसे उनकी अपनी इच्छा, इस रूप में पूरी हो रही है। .
बचपन में बच्चो की इच्छाएं पूरी करने में अभिभावक समर्थ होते है। लेकिन जैसे -जैसे वे बड़े होते है, समाज से जुड़ते है। उनकी इच्छाएं दुसरो पर निर्भर हो जाती है। बाहर के लोग उनसे जुडी सभी इच्छाएं पूरी करना जरूरी नहीं समझते। तभी आपने आजकल 7 साल के बच्चो की आत्महत्या की खबरे भी सुनी होंगी। जबकि आजादी से पहले आपको इस तरह की खबर सुनाई नहीं देती होंगी।
पहले समय में बच्चे संयुक्त परिवार में रहते थे। कोई भी उन्हें गलती होने पर डांट और मार सकता था। उनके अंदर अपमानित होने पर सहन करना सिखाया जाता था। । उन्हें समाज द्वारा ,नौकरी में या शादी के बाद के जीवन में अपमानित होने पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था।
एकल परिवार में अभिभावक, बाहरी व्यक्ति के द्वारा कहे गए हर शब्द को, बच्चे के साथ खुद को भी जोड़ लेते है। उन्हें वह अपमान बच्चे से ज्यादा खुद का अपमान लगता है इसलिए बच्चे को हर अपमान से बचाने में दूसरो से सम्बन्ध तोड़ने में भी देरी नहीं करते जिसके कारण बच्चो को अपमानित होने की आदत नहीं होती।
- बाद में बड़े होने पर अपमान सहने पर उन्हें दुनियाँ वीरान लगने लगती है। वो आत्महत्या का रास्ता चुन लेते है।
- ऐसे में यदि आप सारे जीवन अपने बच्चो को जीवित देखना चाहते है। तो उनकी सभी जरूरते कभी पूरी मत कीजिये।
- यदि उनकी इच्छाएं पूरी करते है तो उसके साथ कुछ शर्ते जरूर रखे..
- उन्हें कभी -कभार थप्पड़ मारने में बुराई नहीं है।
- क्योंकि समाज आपके समान दयालु नहीं होता। उन्हें हर कदम पर अपमान और प्रतियोगिता का सामना करना पड़ेगा।
- उन्होंने यदि जीवन में कभी अपमान नहीं सहा होगा तब उन्हें सुशांत सिंह के सामान कदम उठाने में देर नहीं लगेगी।
आप खुद सोचिये चार बहनो का दुलारा,मन्नतो से माँगा गया बेटा , [पढ़ने -लिखने में विलक्षण ,जिस रास्ते पर कदम रखा हर जगह सफलता पाई। ऐसे इंसान को किसी ने डांटने के बारे में सोचा होगा। कभी नहीं ? इसलिए वह इस वक्त समाज की बेरुखी सहन नहीं कर सका।
ऐसी बेरुखी फिल्म लाइन में बहुत लोगो ने सहन की है। लेकिन जिन्दा है। बाद में सफल भी हुए है। यदि आप मेरे विचार से सहमत है। तो अन्य लोगो तक पहुंचाने की कोशिश कीजिये क्योंकि बच्चे के जीवन में अभिभावकों की आत्मा बसती है। उनकी मौत का जख्म बहुत कम लोग सहन कर पाते है।
ऐसा दुःख किसी और को सहना न पड़े इसलिए अधिक से अधिक लोगो तक इसे शेयर करे।

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