करोना का डर
करोना के कारण घरो पर कहर बरस रहा है। मैने कई घर ऐसे देखे है। जिनमे कमाने वाला इंसान दुनिया से चला गया। उसके छोटे -छोटे मासूम बच्चो को पिता के जाने के मायने नहीं पता। उनकी किस्मत एक रात में कैसे बदल गई। उसका एहसास तक नहीं।
पिता का बुढ़ापे का सहारा एक ही रात में बहुत दूर चला गया। उनकी सुनी आंखे उसे हर तरफ निहार रही है। आज इंसान का हर चीज पर से विश्वास उठ गया है। कुछ भी मायने नहीं रखता। बड़ी -बड़ी कोठियाँ , पैसो से भरे घर, अस्पताल और डॉ पर विश्वास सब खत्म हो गए है।
अब फिर से एक शक्तिमान ईश्वर पर विश्वास जागृत हो गया है। जिसपर उसका हाथ है। वही जीवित बचेगा उसके आलावा कोई तरीका इंसान के पास नहीं बचा। हमारी सारी ताकत उसके सामने हार जाती है।
मैने बर्बाद होते ऐसे घर देखे है। जिसमे आने वालो की बहार रहती थी। लेकिन आज उनके शोक के समय कोई कन्धा नहीं मिल रहा।जिससे लग कर रो सके। सबको उनसे सहानुभूति है। लेकिन बीमारी के डर से उनका कोई सहारा नहीं बन पा रहा। इस दुःख की घडी में उनके आंसू पोंछने वाला दूर -दूर तक दिखाई नहीं दे रहा।
मैने ऐसा परिवार देखा। जिसमे तीन बहनो का अकेला भाई मृत्यु की गोद में समा गया। उसकी मौत पर शौक मनाने जीतने लोग पहुंचे उन सबको करोना ने ग्रस लिया। जब वो लोग अपने परिवार में पहुंचे उनके परिवार के लोगो में करोना हो गया। करोना के बारे में पता चलते ही सारे मौहल्ले वालो ने उनसे नाता तोड़ लिया।
ऐसे माहौल में सहानुभूति जताने से भी लोग डरने लगे है। मेरे सामने ऐसा माहौल पहली बार हुआ है। उस परिवार से लोगो ने हाल -चाल तक नहीं पूछा। इस संकट की घडी में हम चाहते हुए किसी का सहारा नहीं बन पा रहे है। इसे इंसानो की क्रूरता कहे या बीमारी का डर। जिसने इंसानो को पंगु बना दिया है।
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