jan hai to jahan hai vrna duniya viran hai

                        दीवाली और प्रदुषण 




  पहले दीवाली पर पटाखे चलाते  हुए इतना डर  नहीं लगता था। बल्कि बम्ब  चलाकर  बहादुरी का अहसास होता था। लेकिन कुछ सालो से पटाखे प्रदूषण फैलाते  है। इनके कारण बहुत दिन तक वातावरण में दृश्यता कम हो जाती है।

        सांस  के साथ जलते हुए धुँए  की महक दम  घोंटने लगती है। दीवाली की रात  से ही सांस  लेते हुए दिक्क्त महसूस हो रही है। लेकिन सरकार जितना पटाखों पर बंदिश लगा रही है। लोग उतने ही बहादुर बनने में शान समझ रहे है।

       में जब सड़को पर निकली तब मुझे पटाखों की दुकान दिखाई नहीं दी।पटाखों के शौकीनों को पटाखे मिल रहे है। ऐसा लगता है अंदरखाने मिलीभगत से इनकी बिक्री हो रही  है। शौक़ीन लोग मुँहमाँगे  दामों में खरीद रहे है। उन्हें अपनी अमीरी दिखाने का इससे अच्छा मौका और कहाँ  मिलेगा।  लेकिन इनकी आवाज और धमाके मुझे करवाचौथ की रात  से सुनाई दे रहे है। रात  के बारह  बजे तक मुझे धमाकों की आवाज सुनाई देती रही।  और कितने दिनों तक आवाजे आती रहेंगी पता नहीं। अति हर चीज की बुरी होती है। 

    मुझे साँस से सम्बन्धित बीमारी नहीं है। में प्राणायाम भी करती हूँ।  लेकिन  दीवाली के बाद जी घबराने लगा है। जो सही मायने में मरीज है। उनकी हालत सोच कर घबराहट होती है। 

      करोना  काल  में सबसे ज्यादा सांस्  लेने में दिक्क्त आ रही है। इन दिनों वायरल और जुकाम सम्बन्धित बीमारियाँ  भी फैल  रही है। ये सब कितनी दुखदायी है कोई मुझसे पूछे। लेकिन जो संक्रमित हो भी चुके है वे भी इस समय भूल रहे है। हमारा पूरा जीवन ही सांस  के उतार -चढ़ाव से जुड़ा है। यदि साँस नहीं ले पाएंगे तब इस शरीर का क्या करेंगे। मेने बड़ी उम्र के लोगो को करोना  से ठीक होते देखा है। जबकि जवान लोग अपनी गलत जीवन चर्या के कारण दुनियां छोड़ रहे है। उन्हें जोश में रहते हुए होश नहीं गवाना चाहिए। जान है तो जहाँन  है। वरना दुनिया वीरान है। 

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