#HELPLESSNESS

                      बेबसी का आलम 

       मजदूरों की बेबसी पर सबको तरस  आ रहा है। वे अपने पैरो  के भरोसे ,सेंकडो मिल की दुरी भूखे -प्यासे , अपने छोटे -छोटे बच्चो और गर्भवती महिलाओ के साथ तय  कर रहे है। किसी का बच्चा बीच  रास्ते  में पैदा  हो गया। कोई अपने दस दिन के बच्चे को हाथ में उठाये पैदल सफर कर रही है। जबकि कहा जाता है। एक औरत को बच्चे के जन्म के बाद  40  दिन का आराम करना जरूरी है। उनके परिवार के सभी सदस्यों  की बेबसी  मन को दुखी कर देती  है।
        अब बस और रेलगाड़ी चलने लगी है। उनका दुःख पैदल चलने वालो की अपेक्षा कम होना चाहिए लेकिन वे कभी गाड़ी देर से चलने पर ,कभी पानी की कमी के कारण और  कभी खाना नहीं मिलने के कारण तोड़ -फोड़ करने में लगे है। उन्हें आप क्या कहेंगे।
       दुखी इंसान के ऐसे समय में सिर्फ  आंसू बहते है। वे कई दिनों से भूख बर्दास्त कर रहे थे। एकाएक ऐसा क्या हो गया ,उनकी सहनशक्ति कैसे  खत्म हो गयी।
       ये गरीब मजदूरों का दर्द नहीं, बल्कि गुंडे -बदमाश उनके बीच  आ गए है। वे हालत को बदहाल करने में लगे है।
       मैंने गरीबो की बेबसी पर आँसू  बहते देखे है। यदि वे इतने गुस्सेबाज होते तब वे दूसरे शहरों में कैसे इतने दिन भूख सहन कर रहे होते।
       मजदूरों की आड़ में गुंडे सामने आ रहे है। या वे जो भारत की शांति को बर्दाश्त  नहीं कर पा रहे हे 

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