बड़े दिल का या संकुचित
पुराने समय में बाहर के लोगो का सामान अलग रखा जाता था। उस समान को घर के लोग इस्तेमाल नहीं करते थे। इसे में जाति व्यवस्था से सम्बन्धित समझती थी। मुझे उस समान को इस्तेमाल होने के बाद, उसमे क्या फर्क पड़ा, ये समझ नहीं आता था।मुझे बड़ो के दकियानूसी विचार अच्छे नहीं लगते थे। बाहर वालो के जाने के बाद उन बर्तनो को साफ करके उसमे खाना खाकर देखती थी। ऐसा क्यों किया जाता है। लेकिन कुछ भी समझ नहीं आता था।
अब कोरोना काल में उसका कारण समझ आ रहा है। बड़ो से पूछने पर वे सही जबाब नहीं दे पाते थे। सौ सालो में ऐसी महामारी नहीं फैली। इसलिए इसका कारण वायरस की जगह, छुआछूत ने ले लिया था।
इसलिए बगाबत करने का मन करता था।
कोरोना खत्म होने के बाद बर्षो तक, लोगो में समान के इस्तेमाल को लेकर ऐसी आदत, सभी में बन जाएगी। अब सभी खुद को बड़े दिल का दिखाने की अपेक्षा संकुचित हो जायेंगे।
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