#क्या शादी केवल दो लोगों का मिलन है… या आत्माओं का समझदार संगम? #जल्दी में लिया गया फैसला… या समय की कसौटी पर परखा गया हमसफर? आपकी पसंद क्या होगी…❤️✨
Madhurima Pathak की प्रोफाइल फ़ोटो

आरंभ मे शादी दो लोगों के मिलन से शुरू होता है । उसके बाद एक दूसरे को जानने का सिलसिला शुरू होता है । पहले समय मे इंसान दूसरों पर अपनी इच्छा थोपने की कोशिश नहीं करता था । हर इंसान का काम बंटा हुआ था । वह अपनी सीमा मे रहकर काम करता था ।

औरत और पुरुष मे गुण अलग होते है जिसके कारण उनके काम करने का तरीका अलग होता था जिसे दोनों स्वीकारने की कोशिश करते थे । हर पुरुष पत्नी मे माँ के समान गुण तलाशता था । औरत पति मे पिता के समान गुण ढूँढने की कोशिश करती है । क्योंकि पति का व्यवहार पत्नी के समय अलग होता है लेकिन बेटी के सामने वह अच्छा साबित होने की भरसक कोशिश करता है जिसके कारण पिता संसार के हर पुरुष की अपेक्षा अच्छा होता है । जिसका प्रतिरूप पति मे तलाशा जाता है जो पत्नी के लिए नही हो पाता है।

भारत मे रिश्ते दो इंसानों से नहीं बनते उनके लिए पूरे समाज की भागीदारी होती है । यानि परिवार के साथ सभी तरह के रीति रिवाज निभाने की जिम्मेदारी भी उठाई जाती है । इंसान शादी के बाद पूर्ण कहलाता है । पूर्णता का मतलब शारीरिक मिलन के अलावा भी होता है । जो आजकल लोग समझ नहीं पा रहे है ।

भारत मे हर पूजा पाठ मे जोड़े के बैठने का रिवाज है जिनका किसी कारण संबंध टूट जाता है वह पूजा नहीं कर पाते है । यहाँ तक पत्नी या पति के मरने के बाद इंसान अपने बच्चों की शादी के समय भी पूजा के काम नहीं कर पाता है । उसे इनसे अलग कर दिया जाता है या शुभ काम मे सामने नहीं आता है ।

बच्चे के पालने मे दोनों का योगदान जरूरी है इस कारण शादी अनिवार्य होती है अकेले इंसान के लिए इस जिम्मेदारी को निभाना कठिन होता है । इसलीये शादी जरूरी बना दी गई इससे दोनों को राहत मिलती है ।

समाजिक ताना -बाना सही तरह से बनाए रखने के लिए शादी होती है । अकेला इंसान अपने जैसे लोगों के साथ सही तरह से व्यवहार कर पाता है । धीरे -धीरे उसका व्यवहार बदलने लगता है या वह समाज से कटना शुरू हो जाता है ।शादी से स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है ।

अधिकतर उम्र बडने पर अकेलेपन से घबरा कर शादी के लिए तैयार हो जाते है इंसान समाजिक प्राणी होने के कारण हमसफ़र ढूँढता है । इसे चुनते समय सारी कसोटी रखी रह जाती है । मुझे लगता है इंसान कितनी भी कोशिश कर ले । उसे साथी मे कुछ समय बाद कमियाँ दिखाई देने लगती है । हमेशा इंसान को दूसरे का साथी सही और अपना साथी गलत लगता है । मैंने आजतक कोई इंसान ऐसा नहीं देखा जो अपनी शादी को मानसिक रूप से सही समझता है । वह भले शब्दों मे बयान न करे लेकिन उसमे बदलाव की इच्छा रहती है ।

रिश्ते ऊपर से बनकर आते है क्योंकि जिससे शादी होती है वह जरूरी नहीं जाना पहचाना इंसान हो । भारत मे अधिकतर शादी अनजान से होती है जिसे धीरे -धीरे समझना पड़ता है । उसके बाद वह इतनी गहराई से जुड़ जाते है कि उन्हे अलगाव सहन नहीं होता है ।

जो प्यार मे पड़कर शादी करते है उनकी शादी के टिकने की संभावना कम होती है वे अहम की लड़ाई मे दूसरे के मन को चोट पँहुचाने मे देर नहीं लगाते है । उनके लिए शादी इच्छा की पूर्ति होती है जहां कमी दिखाई देती है वे रिश्ते तोड़ देते है । इसलीये कहा जा सकता है हम कितना भी सोच विचार कर विवाह करे लेकिन वह ऊपर से निर्धारित होता है किससे कब और कहाँ मिलना और बिछड़ना है सब पूर्व निर्धारित होता है ।

अधिकतर हिन्दू धर्म के अनुसार हम पूर्व जन्मों का ऋण चुकाने या पाने के लिए परस्पर मिलते है । जिसका निर्देश भगवान देता है । कोई इंसान जीवन मे सुख देने के लिए आता है । कुछ लोग केवल दुख देने के लिए जुडते है जिसे इंसान का प्रारब्ध या पूर्व जन्मों का फल कहा जाता है ।

भारत मे अधिकतर पुनर्जन्म को माना जाता है जिसका मतलब हर इंसान इस जन्म मे पूर्व जन्म के रिश्तों के अधूरेपन को पूर्ण करने के लिए मिलता है । कुछ कर्ज चुकाने आते है तो कुछ पिछला कर्ज वसूलने के लिए दुनियाँ मे आते है । जीवन कर्मों के फल के अनुसार बनता है । कुछ कर्मों के फल इसी जन्म मे मिल जाते है कुछ फलों को पाने के लिए दुबारा जन्म लेना पड़ता है ।

बहुत कम लोग शादी को सही फैसला मानते है उनके अनुसार प्यार और शादी के वक्त दिमाग घूम जाता है । जिसके कारण पहले समय मे लड़के को लड़की पसंद करने नहीं ले जाया जाता था । बड़े लड़की को देखकर रिश्ता तय करते थे । उसके गुण पर विचार करते थे सुंदरता मायने नहीं रखती थी उस समय अधिकतर शादी निभ जाती थी ।

आजकल शादी मे सबसे ज्यादा महत्व लड़के और लड़की की इच्छा का होने के कारण परिवार की राय मायने नहीं रखती वे उन्हे भाग्य के भरोसे छोड़ देते है । जिसके कारण सही और गलत की जिम्मेदारी बड़े नहीं लेते है । उन्हे अपने भरोसे जिम्मेदारी उठानी होती है ।

शादी को किसी कसोटी पर परखा नहीं जा सकता है यह परिवर्तनशील होती है । जिसमे दोनों को संबंध बनाने के लिए झुकना होता है । शादी शारीरिक,आर्थिक ,समाजिक ,भौतिक,पारिवारिक और मानसिक जरूरत को पूरा करती है । इसलीये सभी शादी करना चाहते है । विरले ही शादी करना पसंद नहीं करते है ।

शादी इस जन्म मे जरूरी है । इसे आत्मा का मिलन कहने मे संकोच नहीं करती क्योंकि दूर रहने वाले क्यों और किस प्रकार परस्पर जुडते है यह सोचने की बात है । जिसे इंसान जानता नहीं उसके साथ सारी उम्र गुजार देता है । जो पहले सगे थे उनका महत्व कम हो जाता है । अनजान इंसान की जिम्मेदारी निभाने और उन्हे पूर्णता देने मे जीवन होम कर देता है । मेरे ख्याल से शादी आत्मा के साथ शरीर का मिलन है जिसका निर्देश ऊपर से मिलता है जिसका निर्वाह करने धरती पर आना पड़ता है ।

मेरे ख्याल से जिससे शादी होनी होती है उसके अनुसार हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है हम न चाहते हुए भी उससे शादी करने के लिए मजबूर हो जाते है बाद मे भले इस फैसले पर पछताते रह जाए लेकिन शादी के समय जो होना होता है वैसे फैसले के लिए मजबूर हो जाते है । जिसे दिमाग का घूम जाना भी कहा जा सकता है।

शादी दो शरीरों के मिलन से अधिक आत्मा का मिलन कहा जा सकता है जिसे मिलने के लिए प्रारब्ध मजबूर कर देता है ।

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