क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि~ लोग भक्ति का प्रदर्शन तो करते हैं? मगर चाल-चलन-सलूक *उल्टें बाॅंस बरेली को* अपनाते है? क्या *सच्ची आस्था* दिखावें में है? या फ़िर विनम्रता में? कहीॅं लोग मन्दिर की सीढ़ियाॅं चढ़कर भीतर का संतुलन नहीं भूल रहें हैं? 🧑‍🎤
Madhurima Pathak की प्रोफाइल फ़ोटो

इंसान भक्ति मन की शांति के लिए करता है । इससे दूसरों का संबंध नहीं होता है वह निराशा के समय भगवान की तरफ देखता है । जब दयनीय स्थिति आती है संसार से भरोसा उठ जाता है उसे भगवान के दरबार मे शांति मिलती है इंसान स्वार्थी होने के कारण भगवान की भक्ति करता है ।

अधिकतर भक्ति करते समय इंसान भगवान से माँगता है वह सुख बना रहे इसकी तलाश मे मंदिर जाता है । उसे स्वार्थी कहा जा सकता है । वह चडावे मे 100 रुपये चड़ाता है तो भगवान से हजारों रुपये पाने की उम्मीद करता है । हर चीज मे इंसान का स्वार्थ नजर आता है ।

जीवन मे इंसान जितने काम करता है वह स्वार्थवश करता है । वह उनसे मिलता है जिनसे उसकी इच्छा पूर्ति होती है उनके करीब जाना नहीं चाहता जो उनसे कुछ पाना चाहता है । वह हमेशा उनके करीब रहता है जहां मानसिक या शारीरिक जरूरत पूरी होती है ।

संसार के सबसे बड़े सन्यासी भी मोक्ष चाहते है मोक्ष का मतलब सुंदरतम पाना है जो साधरण इंसान की इच्छा से बहुत अधिक होता है । मेरे ख्याल से जीवन का मतलब पाना होता है छोड़ना नहीं । यदि जीवन मे छोड़ने की इच्छा पैदा हो जाए तो भक्ति की इच्छा न रहे ।

समाज मे आस्तिक लोगों को पसंद किया जाता है इसलीये सभी खुद को आस्तिक दिखाने की कोशिश करते है । जो खुद को नास्तिक दर्शाते है वह समाज से कट जाते है इसलीये मन से भगवान को न मानने वाले भी दिखावे के लिए धर्म कर्म के काम करते है । इससे समय भी कट जाता है एक नया अनुभव भी हो जाता है । कुछ लोग पिकनिक की तरह मंदिर जाना पसंद करते है । कुछ दूसरों के अनुसार चलने के लिए भी आस्था भाव न होते हुए मंदिर चले जाते है ।

एक समय बाद इंसान का नश्वर संसार से मन उठ जाता है ऐसे लोग विनम्र हो जाते है । यह विनम्रता इंसान को दयालु बनाती है । कुछ लोग मंदिर जाने पर भी अक्खड़ बने रहते है । इस तरह के इंसान को दिखावा पसंद कहा जा सकता है । अधिकतर मंदिर जाने वाले विनम्र और दयालु का मिश्रण होता है इंसान का स्वभाव उसे विनम्र या अक्खड़ बनाता हे । इससे भक्ति का संबंध नहीं होता है ।

मंदिर मे जाने वाले अधिकतर लोग सोचते है पूजा करने से भगवान की कृपा बनी रहेगी । उनपर संसार का बुरा असर नहीं होगा । वह जैसा चाहेंगे जीवन वैसा रहेगा । इसलीये कुछ लोग भगवान का वरद हस्त होने के कारण घमंडी बन जाते है । उन्हे लगता भगवान के काम करने से उनके जीवन मे कभी बुरा नहीं होगा ।

वह भगवान के मंदिर जाने को रिश्वत के समान समझते है जैसे रिश्वत लेने वाला गलत करने से पहले अनेक बार सोचता है उसी प्रकार भगवान भी इतनी उपासना करने के कारण उसका बुरा कभी नहीं करेंगे इसलीये वह असंतुलित होते भी दिखाई दे जाए तो बड़ी बात नहीं होगी । जैसे अमीर इंसान पैसे के घमंड मे दूसरों से बुरा व्यवहार करता है उसी प्रकार भक्ति के आधिक्य के कारण इंसान घमंडी भी हो सकता है ।

विनम्र या अक्खड़ होना इंसान का व्यक्तिगत स्वभाव कहा जा सकता है । इससे भक्ति का संबंध नहीं है । भक्ति भाव रखने वाला अपने को तुच्छ समझता है वह हमेशा इच्छा की कृपा चाहता है । उस पर भगवान की कृपा बनी रहे इसलीये गलत काम करने से रुकता है । इसे ईश्वर का डर भी कहा जा सकता है ।

आजकल अनेक जगह cctv लगे होते है जिससे अपराध करने वाले बुरे काम करने से रुके । पहले भगवान की नजर हर जगह होती है उस समय अधिकतर लोग भगवान से डर कर गलत काम नहीं करते थे । अब लोगों के अंदर से डर खत्म हो गए है जिसके कारण हर जगह केमरे लगने लगे है ।

इंसान को सही रास्ते चलने के लिए भगवान का डर जरूरी है। यह डर इंसान को झुकने और दयालु बनने के लिए मजबूर करता है । इंसान कुछ समय के लिए दुनियाँ मे काम करने के लिए आता है कहाँ से आया मृत्यु के बाद कहाँ जाएगा । जब इसका पता नही है तब अपने अस्तित्व पर विचार करने का मन करता है । जिस कारण ईश्वर के की भक्ति करने की इच्छा पैदा हो जाती है ।

जो इंसान खुद को सबकुछ समझते है वह भी गलत होने पर भगवान के दरबार मे झुक जाते है । जब कुछ भी अपने हाथ मे नहीं है तो ईश्वर को स्वीकारना सही है ।जीवन मे कभी न कभी सभी ईश्वर के दरबार मे झुकते है।

तनावमुक्त रहने के लिए भी मंदिर जाता है । इसमे दूसरों से अधिक खुद का स्वार्थ होता है यदि मंदिर जाकर तनावमुक्त रहकर एकाग्रपूर्वक काम करने से सफलता पाई जा सकती है तब ईश्वर का ध्यान करते है ।

संसार के अधिकतर लोग ईश्वर को स्वार्थवश मानते है । इससे भगवान या दूसरों की भलाई से नहीं जोड़ना चाहिए । जो जोड़ते है उनकी स्थिति भटकाव वाली हो जाती है । मन को संतुलित करने के लिए ईश्वर की पूजा करनी चाहिए ।

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