नहीं, साथी बदलने के लिए बहुत ज्यादा मजबूत होना पड़ता है । अधिकतर औरतें सामाजिक और पारिवारिक दबाव के चलते समझौता करने के लिए तैयार हो जाती हैं। औरतों को समझोंता करना बचपन से सिखाया जाता है इसलीये 90% औरतों को समझोंता करने मे परेशानी नहीं होती है ।
वह साथी में बदलाव लाने की कोशिश करती है। वह इस उम्मीद के सहारे जीवन बिताने के लिए तैयार हो जाती है । उनका साथी आज नहीं तो कल उन्हें समझकर उनके हिसाब से काम करेगा । उनका मन समझेगा । वे भविष्य की उम्मीद मे उसे सहन करती है ।
वह आसानी से साथी नहीं बनाती है आरंभ मे वह अच्छी तरह उसके बारे मे जानकारी हासिल करती है बाद मे संतुष्ट होने पर संबंध बनाए जाते है । यदि उसमे कमी दिखाई देती है तब भी उन्हे खुद पर विश्वास होता है वह अपने अच्छे व्यवहार से उसमे बदलाव ला सकती है ।
यदि वह साथी अपने मे बदलाव लाने के लिए तैयार नहीं होता है तब भी काफी समय तक उस पर कोशिश करने के कारण उसे साथ रहने की आदत पड जाती है जिसके कारण वह उससे दूरी बनाने से झिझकती है ।उसे उसका अभाव डराता है ।
उसे लगता है जब इसमे बदलाव न ला सकी तब जरूरी नहीं दूसरा मेरे अनुरूप काम करे । इसलिये उसी इंसान के साथ रहने के लिए तैयार हो जाती है । वह सोचने लगती है कोई इंसान पूर्ण नहीं होता है तब जरूरी नहीं दुसरा इंसान इससे अच्छा मिले ।
जब साथी में बदलाव नहीं ला पाती, तब उनका आत्मविश्वास भी कम हो जाता है । उसमें कमी रही होगी जिसके कारण साथी बदलने को तैयार नहीं हो रहा है । वह उससे अधिक अपनी कमी के बारे में सोचने लगती है । दूसरे के बारे मे सोचने के लिए इंसान का आत्मविश्वास बड़ा हुआ जरूरी होता है ।
भारतीय लड़कों की परवरिश इस तरह की जाती है जिसके कारण वह स्त्री को दोयम दर्जे की समझते है जिसके कारण वह उसे सम्मान देने की जगह बाकि सभी औरतों के इशारे पर चलने के लिए तैयार रहते है ।
आजकल औरतें खुद को दोयम दर्जे की समझने के लिए तैयार नहीं होती हैं। वे सोचती है जिसके कारण उन्होंने घर बदला, उसके सभी काम करती है वह उसके लिए काम करने की जगह दूसरों की जीहजूरी कर रहा है तब वे बगावत करने लगती है जिसका रूप समाज मे दिखाई देने लगा है ।
यह बगावत औरतें खुशी से नहीं करती, वह मजबूर होकर सख्त कदम उठाती है । आजकल भी पुरुषों की परवरिश इस तरह की जाती है वह पत्नी को सम्मान न दे लेकिन लोग भूल जाते है अब लड़कियों को भी पुरुषों के समान सारी सुविधा के साथ पाला जाता है जिसके कारण उन्हे अपने महत्व का पता होता है । वह अपने को बेकार नहीं समझती है जिसके कारण वह पहले मन की बात शब्दों मे कहती है जब उसका असर नहीं होता तब विद्रोह करने लगती है । जिसके कारण अधिकतर घरों में झगड़ा दिखाई देने लगा है ।
अब घरों मे पुरुषों का वर्चस्व इतना नहीं रहा जिसके कारण पिता या बड़ों के आदेश पर लड़कियां अपने मे बदलाव लाने के लिए तैयार हो जाए । वह माँ के समान त्याग और बलिदान का जीवन जीना नहीं चाहती है। उनका जीवन उन्हें प्रेरणा नहीं देता है । वह अब बड़ों के अनुसार जीवन जीना पसंद नहीं करती है। जिसके कारण अलगाव हो रहे हैं।
वह अब अपने लिए भी जीना चाहती है जिसके कारण वह दूसरों के लिए काम करने के बाद कुछ पाना चाहती है जब नहीं मिलता तब ऐसे रिश्तों से निकलने के लिए तैयार हो जाती है । उनके हिसाब से वह जीवन को एक बार मिलने वाला वरदान समझती है । वह पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करती है । वह जो अब मिला, इसे अच्छी तरह से जीना चाहती है । इसके कारण बड़ों और किसी धर्मगुरु के शब्द उन पर बेअसर साबित होते हैं। वह अपने लिए ठोस कदम उठाने के लिए तैयार हो जाती है ।
वर्तमान समय मे लड़कियों के लिए एक साथी ही जीवन नैया पार लगाने के लिए काफी नहीं है वह सोचती है 'तू नहीं और सही ' जिसके कारण समझोंता नहीं कर पा रही है । वह बुरे इंसान के साथ जीवन तबाह करने की जगह अन्य के बारे मे सोचती है या अकेले जीवन जीना पसंद करने लगी है।
भारत में अब वक्त बदल गया है, जिसके कारण लड़कियां अकेले सभी काम कर रही हैं। मुझे उन औरतों पर हंसी आती है जो अपनी कमजोरी के समय बाप और भाई की धमकी देती हैं। वरना अधिकतर लड़कियों को अपनी ताकत का अहसास हो गया है जिसके कारण वह सीधे धमकी देती है उन्हे किसी चीज का खौफ नहीं रहा है । अब लड़कियों को भी दबंग की श्रेणी में रखा जा सकता है । वह विपरीत हालत का सामना अपने भरोसे पर करने लगी है ।
भारत मे अधिकतर औरते पार्टनर बदलने की जगह समझोंता करती है जब जिंदगी जीना साथी के साथ कठिन होने लगता है तब वह साथी बदलती है । यह उनका गुण नहीं, मजबूरी कहा जा सकता है ।
साथी बदलते समय अधिकतर औरतें मानसिक तनाव की शिकार हो जाती हैं। उसे घर और समाज में प्रोत्साहन नहीं मिलता है, उस समय वह अकेली पड़ जाती है । उनके गुण भी अवगुण के रूप मे देखे जाते है अभी भी वह औरते पसंद की जाती है जो बुरे हालत मे भी साथी की किसी से बुराई न करके चुपचाप सहन करती रहे । इसलिये विद्रोही औरतों को किसी का सहारा नहीं मिलता है । वह हमेशा समाज में रहते हुए अकेली महसूस करती है ।
अकेली औरत का फायदा उठाने वाले अधिक होते हैं। उसे सहारा देने वाले कम होते है । जिसका अहसास उसे होता है । वह साथी केवल अपने भरोसे बदलती है । वह अकेले में रोती है लेकिन समाज का सामना कठोरता से करने के लिए मजबूर हो जाती है । उसका साथ देने के लिए कोई सामने नहीं आता है। उसे हर जगह निंदित किया जाता है यदि सामने निंदा नहीं की जाती तब भी पीछे से उसे गलत शब्द सुनाई देते है जिससे वह आहत होती है ।
सामान्य जिंदगी जीने के लिए अधिकतर औरतें समझोते पर यकीन करती हैं। भारत में 1% तलाक का कारण लोगों में समझोते की आदत है, वरना पुर्तगाल जैसे देशों में तलाक 94% होते हैं। भारत में अधिकतर औरतें अपने साथी में सुधार चाहती हैं, वे उसे बदलना नहीं चाहती हैं। यदि वह बदलाव लाने के लिए तैयार हो जाते है, तब वह उसके साथ बाकी जीवन खुशी से गुजार देती है ।
साथी बदलने पर पुरुष और औरत दोनों तनाव से गुजरते है वह तनावपूर्ण जिंदगी जीना नहीं चाहते है इसलीये दोनों की समझोंता करने की आदत, घर टूटने से बचाती है ।आधुनिक समय मे इंसान जितना शारीरिक परेशानियों से दुखी है उससे अधिक उसे मानसिक परेशानियाँ दुख दे रही है । जिसके कारण मानसिक चिकित्सक की मांग बढ़ गई है। अधिकतर लोगों के मन की शांति खो गई है । जिसके कारण इंसान आत्महत्या करने लगे है
एक बार सोचकर देखे कोई इंसान खुश होकर आत्महत्या नहीं करता है वह अंतिम समय तक हालत बदलने का इंतजार करता है जब सभी रास्ते बंद हो जाते है तभी ऐसा कदम उठाता है । कहा जाता है आत्महत्या करने वाला अंतिम समय तक अपने मन का गुबार किसी के सामने निकाल देना चाहता है जिससे शांत हो सके । वह उस समय भी साथी तलाश रहा होता है जो उसे सांत्वना दे सके । यदि वह पल उसके जीवन से निकल जाता है, तब वह दुबारा मुश्किल से आत्महत्या करता है । बाद में अपनी इस स्थिति पर मजाक भी बना सकता है ।
जीवन मे खुशी बहुत मायने रखती है जिसके लिए वह पूरी उम्र कोशिश करता रहता है इसलीये किसी को दुख के लिए जिम्मेदार नहीं कहा जा सकता है । आधुनिक इंसान खुश रहना भूल गया है। अब लोगों को खुश रहना सिखाने का वक्त आ गया है । सुखी इंसान खुद और दूसरों को सुख दे सकता है; नकारात्मक लोगों को पसंद नहीं किया जाता है।
भारत जैसे देश मे साथी मजबूरी मे बदला जाता है । इससे औरतों को मानसिक शांति नहीं, अनेक तरह के तनाव का सामना करना पड़ता है । इस तरह की औरतों से पुरुष भी जुड़ने से बचते हैं।उन्हे लगता है जो साथी को छोड़ सकती है वह विपरीत स्थिति मे उससे भी अलग हो सकती है उससे अब तक की सखी और रिश्तेदार भी दूरी बनाने लगते है । कोई नहीं चाहता कि उसके परिवार वाले उसके जैसा कदम उठाए । उसके बच्चे भी पिता को छोड़ने वाली माँ को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते है । उसे दुबारा से सब कुछ बदलने के लिए तैयार होना पड़ता है । सब कुछ छोड़ने के लिए बहुत कम औरते तैयार होती है ।
यदि आपका विचार शादी से पहले के बॉयफ्रेंड से है तो वह बदला जा सकता है भारत मे इसका रिवाज नहीं है । जिसके कारण किसी लड़की पर दोषारोपण नहीं किया जाता है । यह संबंध अस्थाई होते हैं। जिसके लिए हर लड़की तैयार होती है आजकल इसे सामान्य रूप मे लिया जाता है । इसके बावजूद साथी बदलने पर दुख अवश्य होता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें