अधिकतर बच्चों को अपने-अपने अभिभावक बुद्धू लगते हैं। इसे समय का अंतर कहा जा सकता था । पहले बच्चे भले अभिभावकों को सम्मान न देते थे, लेकिन शब्दों में गलत नहीं बोलते थे । अब वक्त बदल गया है, जिसके कारण वह जो मन में आता है, उसे बोल देते हैं। अब हर जगह बोलने वाले बच्चे हैं, इसलिए अपने बच्चों को दोष देकर दुखी हो जाएंगे । जो आसपास देख रहे हैं, उसके हिसाब से बोलते हैं।
बच्चे जब तक आर्थिक रूप से समर्थ नहीं होते तब तक उनकी आदतों पर अंकुश लगाया जा सकता है । क्योंकि हाथ मे पैसा न होने के कारण उन्हे आपसे पैसा मांगना पड़ेगा क्योंकि बाहरी दुनियाँ शाब्दिक जाल मे फंसा सकती है लेकिन उनपर आसानी से पैसा खर्च नहीं करती इसलिए इस समय पैसे के जोर पर उसे अपने अनुसार चलने के लिए बाध्य कर सकते है ।
घर के खाने की आदत डालने की कोशिश करे क्योंकि बाहर के खाने के लिए पैसों की जरूरत होगी इसलिए उसे शर्तों के अनुसार पैसा दे । उसकी पसंद का बाहर का खाना किसी अच्छे काम को करने के बाद दे वरना घर के खाने के लिए जोर दे उसकी पौष्टिकता और जरूरत का अहसास कराए ।
जब भी किसी काम के लिए मना करना हो तब आप उसकी कमियाँ अवश्य बताए उसके कारण उसके जीवन मे विपरीत असर के बारे मे बताना जरूरी है । उसके जीवन और भविष्य में किस रूप में इसका असर पड़ेगा, उसके बारे में बताना जरूरी होता है ।
अब बच्चों को डरा कर काम नहीं करवाया जा सकता है इसके लिए उसके साथ दोस्त के समान व्यवहार करना पड़ता है वरना वह छिप कर या झूठ बोलकर गलत काम करते है उन्हे लगता है बड़े रुडिवादी होने के कारण उन्हे आधुनिक बनने से रोक रहे है । इस कारण झूठे बहाने बनाने लगते हैं। जिसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं।
आपका बच्चा घूमने जाने के नाम पर झूठ बोल सकता है इससे बचने के लिए उसके कुछ दोस्तों के फोन नंबर पास रखे । झूठ बोलने पर उसे पकड़ा जा सकता है । एक बार पकड़े जाने पर जब शर्मिंदगी उठानी पड़ती है, तब वह झूठ बोलने से बचेगा ।
बच्चे से मन न होने पर भी बात करें। जब वह आपसे सभी बातें बताएगा, तब आप अपनी राय समय आने पर दे सकते हैं। उसके अच्छे और बुरे परिणाम बताकर सतर्क किया जा सकता है ।बच्चे के सामने व्यस्त होने के बावजूद समय निकालकर उसके मनमाफिक काम करें। इससे वह अपनी सभी बातें आपसे कहने लगता है। उस समय राय दी जा सकती है ।
यदि बच्चे पर गुस्सा भी आए तो बातचीत बंद न करे । क्योंकि गर्म खून होने के कारण वह हर बात मन से लगा लेते हैं। उनकी चुप्पी कहीं हमेशा के लिए न हो जाए । इसलिए बाते करना जारी रखे ।
पहले समय में भगवान के नाम पर बच्चों से काम करवाया जा सकता था । अब वे इससे प्रभावित नहीं होते है इसलिए हमे उनसे काम करवाने के लिए ऐसे हालत पैदा करने पड़ते है जिसके कारण वह हमारे आदेश माने । ऐसा माहौल बनाने से झिझके नहीं ।
बच्चों की जरूरत एक दम पूरी न करे । उसके लिए उसे सब्र करना सिखाए । यदि आप उसकी जरूरत पूरी करने लायक है तब भी उसकी हर इच्छा की पूर्ति न करे । क्योंकि भविष्य में कोई उसकी जरूरत पूरी नहीं करेगा । उसे समझाने की कोशिश करें। जब आप किसी के लिए कुछ करेंगे, तभी वह आपकी इच्छा पूरी करेगा । बिना दिए कुछ नहीं मिलता है । इससे उसके व्यवहार मे बदलाव आएगा ।
बच्चे की जिद पूरी न करे । एक बार पूरी करने पर वह हमेशा जिद करेगा । हमेशा उसकी जिद पूरी नहीं की जा सकती है । जिद्दी बच्चे आपको हर जगह रुसवा करेंगे । इसलिए कुछ समय की कठोरता को बच्चे समझने लगते हैं।
गुस्से में डांटने या मारने की जगह आप बच्चे के सामने गलती होने पर चुप हो सकते हैं। कुछ समय बाद वह आपके चुप होने को गुस्से का प्रतिरूप समझेगा । जिससे डरकर आपके मनमाफिक काम करने लगेगा । क्योंकि छोटे होने पर उसे बड़ों की जरूरत होती है, वह आपको मनाने के लिए अनेक यत्न करेगा ।
बच्चों और अभिभावकों मे उम्र का अंतर होता है हमारे सोचने का तरीका अलग होता है । जिसके कारण हम उन्हें समझ नहीं पाते हैं, इसलिए कुछ उनकी सुने और कुछ सुनाने की कोशिश करें। वह हमारे अनुसार सभी काम नहीं कर सकते है । इसे मन से न लगाए ।
पहले समय में संयुक्त परिवार होते थे । घर की जरूरतें कृषि से पूरी होती थीं, जिसके कारण बच्चों के लिए काम करना अधिक जरूरी नहीं होता था । वह यदि बड़ों की आज्ञा मानते थे तब उनके परिवार की सभी जरूरत पूरी हो जाती थी । उस समय आज्ञाकारी बनकर अच्छा जीवन गुजारा जा सकता था ।
अब कृषि से जुड़े या व्यवसायिक लोग आज्ञाकारी बनकर अच्छी जिंदगी गुजार सकते है लेकिन आजकल अधिकतर लोग नौकरी करते है जिसके कारण उन्हे बाहर की दुनियाँ मे जाकर जीवन -यापन करना पड़ता है जिसमे प्रतियोगिता अधिक है । जो दूसरों की जरूरत के हिसाब से काम करता है, उसे आगे बढ़ने के मौके मिलते हैं, वरना वह पिछड़ जाता है।
आजकल शिक्षा पाने और नौकरी के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है जिसके कारण आज्ञाकारी बच्चे बाहरी दुनियाँ का सामना नहीं कर पाते है । जो आधुनिक दुनियाँ के हिसाब से काम करते हैं, वही सफलता पाते हैं। इसलिए अधिकतर अभिभावको का बच्चे कहना नहीं मानते है क्योंकि सभी बच्चों को वाकपटु और सफल देखना चाहते है जिसका आरंभ परिवार से होता है । अब डरे-सहमे और चुप बच्चे सफलता हासिल नहीं कर पाते हैं।
मेरी परवरिश भी आज्ञाकारी बनाने के हिसाब से हुई थी जब नौकरी की दौड़ मे बाहर निकली तब मुझे साक्षात्कार के समय असफलता मिलती । ऐसा कई बार होने के बाद मैं मुँहफट बन गई । जो मन में जवाब आता था, वैसा जवाब देती थी; उसके बाद सभी साक्षात्कार में सफलता मिलती चली गई । क्योंकि जो हमे नौकरी मे रखता है वह हमसे उम्मीद करता है हम सभी समस्या का समाधान अपने आधार पर कर लेगे । यदि हर समय उसे सामने आना पड़ेगा तो कोई क्यों हमें नौकरी देगा? इसलिए आजकल वाकपटु और तेज तरार बनने की जरूरत पड़ती है इसकी शिक्षा आरंभ मे परिवार से मिलती है । वरना बच्चे डरपोक बनकर असफल रहेंगे ।
मै पूरी तरह आज्ञाकारी बनने के लिए नहीं कह रही लेकिन बड़ों के अनुभव से यदि फायदा होता है उसे जरूर माने क्योंकि वे आपके शुभचिंतक होते है वह कभी आपका बुरा नहीं चाहेंगे । वह मरते दम तक केवल आपकी भलाई सोचते हैं। इसलिए आधुनिक और पुरातन का संगम जीवन में ऊंचाई दिलाता है ।
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