पहले समय मे नियोग प्रथा का चलन था । भीष्म के भाई चित्रांगद और विचित्रवीर्य के बिना संतान मर जाने पर उन्होंने सत्यवती के बेटे वेद व्यास के द्वारा उनकी पत्नी अंबिका और अंबालिका को गर्भवती करवाया था । वह संन्यास का पालन करते हुए बदसूरत हो गए थे । जिसके कारण उनके सामने जाने पर अंबिका ने डर के कारण आँखें बंद कर ली । जिससे धृतराष्ट्र अंधे पैदा हुए ।
जब अंबालिका को व्यास ऋषि के सामने भेजा गया, तो वह उन्हें देखकर डर के कारण पीली पड़ गई । जिसके कारण पांडु पीलिया रोग से ग्रस्त हुए । दोनों बच्चे सिंहासन के हिसाब से स्वस्थ नहीं थे । गद्दी का हकदार स्वस्थ इंसान समझा जाता था । उसके बाद अंबिका को व्यास ऋषि के पास दोबारा भेजा जाने लगा , तब उसने अपनी जगह दासी को भेज दिया । उसने निडर होकर व्यास ऋषि का सामना किया, जिसके कारण विदुर स्वस्थ पैदा हुए । लेकिन दासीपुत्र होने के कारण वह राजा नहीं बन सकते थे । इस कारण स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति का विचार छोड़ दिया गया ।
घर के वारिस को ही संपत्ति सौंपी जाती थी जिसके कारण औरत का अस्तित्व तभी मायने रखता था जब वह कुल को वारिस दे पाती थी । वारिस के अभाव मे संपत्ति परिवार के अन्य लोगों मे बंट जाती थी औरत को पारिवारिक संपत्ति से महरूम कर दिया जाता था । औरत पति के सामने संपत्ति की हकदार होती थी, उसके बाद उनसे सबकुछ छिन जाता था । इसलिए सभी औरते वारिस के लिए पति के सामने और मरने के बाद भी नियोग प्रथा अपनाने के लिए मजबूर हो जाती थी ।
उस समय औरत के लिए पुत्र पैदा करना जरूरी था । इसलिए यह माध्यम अपनाया जाता था । अब इसे भुला दिया गया है । कुछ पति और परिवार अपनी कमी को छिपाने के लिए इसे अपना रहे हैं, लेकिन यह खुले रूप में नहीं है ।
पुरुष की कमी स्वीकारने की जगह सभी दोष औरत पर मड दिए जाते है उसकी जांच करवाना भी जरूरी नहीं समझा जाता है । जिसके कारण जब इस तरह का दबाब बनाया जाता है, तब औरत इसे स्वीकार लेती है ।
1857 के संग्राम का मुख्य कारण दत्तक पुत्र को वारिस न समझा जाना था । आज भी बिना पुत्र की माँ को अधिकार मुश्किल से मिलता है । सभी उसकी संपत्ति पर आँख गड़ाए रहते है । इसलिए वारिस की चाहत मे वह सब कुछ स्वीकार कर लेती है ।
यहाँ अवैध संबंधों के बारे में चर्चा नहीं कर रही है। इसमें औरत की इच्छा के मायने नहीं होते, उसके लिए अपने अस्तित्व को साबित करना मुख्य उद्देश्य होता है।
उस समय जो बड़े निर्धारित करते थे उसके अनुसार औरतों को जीना पड़ता था । आजकल नियोग प्रथा के लिए जरूरी नहीं शारीरक संबंध बनाए जाए । उसके लिए अनेक उपाय किए जाते हैं, बिना शारीरिक संबंध बनाए।यह काफी खर्चीला साबित होता है, जिसके कारण अधिकतर लोग यह नहीं कर पाते हैं।अधिकतर अमीर लोग टेस्ट ट्यूब बेबी का रास्ता अपनाते है ।
वंश बढ़ाने के लिए लालायित लोग नियोग प्रथा का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए पारिवारिक सहमति होती है । या उन्हे इसके लिए विवश किया जाता है । आज भी औरत को पारिवारिक दबाब के कारण झुकना पड़ता है ।
कुछ समय पहले मैं अपनी सखी के मुँह से सुनकर हैरान रह गई । उसकी नन्द के पति ने दूसरी शादी करके बच्चे पैदा किए, जिसका भात देने वह गई थी। सहेली के पति 5 भाई है । मैंने उससे गुस्सा होकर कहा—'जिसके पाँच भाई हैं, उसकी बहन को सौतन का दुख सहना पड़ा । उन्होंने विरोध नहीं किया । वह किसी का बच्चा गोद भी ले सकता था। ' तब उसने कहा, उन्हें अपना बच्चा चाहिए था, इसलिए सभी की सहमति से उसने दूसरी शादी की थी । मुझे इस बात का दुख बहुत समय तक रहा । वारिस न पैदा करने के कारण औरत के सभी गुण नकार दिए गए ।
आधुनिक समय में एक ही घर में रहते हुए उस औरत ने सौतन का दुख किस प्रकार सहन किया होगा? इस बारे मे सोचकर मन सिहर उठता है । यह बात दिल्ली शहर की है । अभी बाकी भारत के क्या हाल हो सकते हैं, सोचकर बताए ।
पुरुष अपनी मर्दानगी को और पत्नी अपने अधिकार और अस्तित्व को साबित करने के लिए इसमें सहयोग देती है । वरना दोनों खुद को कमतर महसूस करते हैं। इसलिए प्रछन्न रूप मे यह प्रथा आज भी चलन मे है। जिन घरों मे नियोग प्रथा के द्वारा बच्चे पैदा होते है वह इसे राज रखते है इसलिए इसे जांचा नहीं जा सकता है ।
अब पति के मरने के बाद नियोग प्रथा से बच्चे पैदा करने की खबर नहीं आती है । क्योंकि इस हालत में देवर से शादी करवा दी जाती है । उसके कारण संपत्ति का बंटवारा नहीं होता है और औरत के भी अधिकार बने रहते हैं।
सभी को पता होता है जल्दी विधवा होने वाली औरते दूसरा विवाह कर सकती है इसलिए उसकी शादी देवर से कर दी जाती है अब दूसरी शादी पर सवाल नहीं उठाए जाते है । जिसके कारण पति के मरने के बाद नियोग प्रथा की जरूरत नहीं रही । देवर से शादी होने के बाद संपत्ति का बंटवारा भी नहीं होता है । औरत को सभी अधिकार मिल जाते है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें