हाँ सभी रिश्ते इंसानी शरीर जैसे होते है । सभी रिश्तों के साथ इंसान रहना चाहता है, लेकिन जब उनके साथ रहता है तब वह संभालना मुश्किल होता है । हर रिश्ते से हम जितनी उम्मीद करते है वह कभी पूरी नहीं हो सकती है । इंसान जितना दूसरों के लिए करता है उससे ज्यादा उसे अपने लिए चाहिए जिसके कारण उसके पास जितने संसाधन होते है उससे बड़ी जरूरत होती है । आधुनिक इंसान हमेशा अपनी जरूरतों के लिए दूसरों से उम्मीद करता है वह उसे पूरी करने की जगह उससे दूरी बनाने लगते है ।
रिश्ते पहले पैसे से निभाए जाते थे । कुछ रिश्तों से पाने की उम्मीद नहीं की जाती थी । उन रिश्तों मे केवल इंसान देने के बारे मे सोचता था जैसे बहन -बेटी का रिश्ता । इसमे पूरी जिंदगी देना पड़ता था । इस कारण बेटी के पैदा होने पर मातम छा जाता था । इंसान के लिए मानसिक रिश्तों से खुशी पाने की जगह भौतिक चीजों की अधिक पाने की इच्छा रहती है । जिससे रिश्तों में कड़वाहट आ रही है ।
अधिकतर भारतीय घरों में बेटे के पैदा होने पर खुशी मनाई जाती है । बेटी को हमेशा मजबूरी मे सहन किया जाता था क्योंकि वह शादी से पहले और बाद मे मायके के लिए जिम्मेदारी बनकर रह जाती थी । जबकि बेटे पर जिम्मेदारी सौंपी जाती थी । जो बेटे लोगों की इच्छा पूर्ति नहीं करते ऐसे बेटों से भी दूरी बनाने लगे है ।
आजकल नन्द अपने मायके से उम्मीद नहीं करती उसके मायके से संबंध अच्छे रहते है जहां नंदे मांगती रहती है वहाँ उन्हे बुलाना भी पसंद नहीं किया जाता है ।
कुछ लोगों के सोचने का तरीका नकारात्मक होता है जिसके कारण वह सामने वाले की अच्छाई को देखने की जगह उसमे केवल बुराई देखते है जिसके कारण वह उसके आने पर दुखी होते है उसकी अनुपस्थिति मे भी बुरी बाते सोचकर दुखी रहते है ।
आजकल लोग दूसरों की अच्छाई के बारे मे सोचना नहीं चाहते यदि दूसरों की तारीफ भी करते है तो वह महफ़िल मे अपनी जगह नहीं बना पाते है उन्हे उसकी बाते झूठी लगती है । दूसरे कहते मिल जाएंगे मुझे नहीं लगता जिसकी तारीफ आप कर रहे हो वह सच मे इतना अच्छा है तुम कुछ बड़ा चड़ा कर कह रही हो ।
लोग दूसरों की बुराई सुनना पसंद करते हैं, जिसके कारण उनकी बातों का दूसरों पर असर हो जाता है । उनका दूसरों को देखने का नजरिया बदल जाता है।
कुछ लोग मन से दूसरों के बारे मे बुरा नहीं सोचना चाहते वह फिर भी अनजाने मे दूसरों के बारे मे महफ़िल मे बुरा बोलते है क्योंकि महफ़िल ऐसी बातों को सुनना पसंद करता है । अधिकतर लोग निंदा सुनने में मज़ा लेते हैं।
आजकल इंसान सकारात्मक तरीके से सोचना भूल गया है, जिसके कारण वह हमेशा दुख में डूबा रहता है । उसकी परवरिश के कारण वह दूसरों की बुरी बाते सोचकर सतर्क रहना चाहता है आधुनिक माहौल मे अच्छे लोग कम और बुरे लोग अधिक मिलते है जिसके कारण सावधानी वश भविष्य की चिंता मे वह दूसरों का बुरा पक्ष अधिक देखता है । ताकि भविष्य में कोई उसे धोखा न दे सके । जीवन मे अधिकतर लोगों को धोखा खाते देखकर इंसान हमेशा हर रिश्ते को पहले शक से देखता है बहुत बार मिलने के बाद भरोसा करता है ।
आजकल अधिकतर इंसान हर रिश्ते से निराश है जिसके कारण वह किसी के सामने अपना दुख नहीं रख पाते है हर इंसान मन का गुबार निकालना चाहता है लेकिन उसे भरोसेमंद साथी नहीं मिल पाता है । पहले समय मे इंसान मन से किसी से भी बात करके तनावमुक्त हो जाता था उसे समस्या का समाधान भी मिल जाता था ।
आजकल भरोसेमंद रिश्ते के अभाव मे इंसान तनावग्रस्त रहकर आत्महत्या करने लगा है क्योंकि उसका जीवन घुटन भरा हो गया है । इस घुटन को निकालने के लिए वह डॉ के पास समस्या का समाधान निकालने जाने लगा है अब उसे किसी रिश्ते पर भरोसा नहीं रहा है । अधिकतर लोग मनोवैज्ञानिक के पास जाते हैं। इसलिए मनोवैज्ञानिकों की मांग बढ़ रही है।
अब इंसान के हर रिश्ते से भरोसा उठ गया है। अधिकतर इंसान खुद को अकेला समझते हैं। आजकल घरों मे लोग मानसिक बीमारियों से ग्रस्त देखे जा सकते है । तनाव का शिकार, मुझे लगता है, बच्चे से लेकर बड़े तक सभी हो रहे हैं। कोई भी इंसान सहज रूप से नहीं जी पा रहा है ।
बहुत सारे लोगों के रिश्ते बाहरी रूप से अच्छे दिखाई दे रहे है लेकिन उनके मन मे खलिश अवश्य होती है काश रिश्तेदार उनके मन के अनुसार काम कर पाते लेकिन इंसानी मन भटकता रहता है जिसके कारण जब खुद नहीं समझ पता उसे क्या चाहिए तो दूसरा इंसान उसकी जरूरत कैसे पूरी कर सकता है ।
हर इंसान की काम करने की सीमा होती है जिसके कारण वह दूसरों की हर जरूरत पूरी नहीं कर पाता है जिसके कारण जो इच्छा अधूरी रह जाती है वह केवल उसके बारे मे सोचकर दुखी रहता है । पूरी इच्छा के बारे मे सोचना नहीं चाहता है इस कारण उसे सभी रिश्तों मे बुराई नजर आती है ।
यदि इंसान सामने वाले की सीमा के बारे मे सोचकर काम करे तो उसे दुख न सहना पड़े । जो रिश्ते निभा रहे हैं, वे सामने वाले की अच्छाई अधिक और बुराई कम देखते हैं। वह हमेशा सोचते है जब पूर्ण सुख हम किसी को नहीं दे पा रहे तो सामने वाला हमे पूर्ण सुख कैसे दे सकता है । वह खुद को उसकी जगह रखकर देखता है जिसके कारण संतुष्ट रहता है वह सभी को अच्छाई और बुराई का मेल समझता है ।
पूरी तरह से किसी का शरीर स्वस्थ नहीं होता है । जो खुद को स्वस्थ समझकर जी रहे होते हैं, वे भी नहीं जानते कि उनके शरीर में कौन से बीमारियाँ पनप रही हैं। साधारण इंसान के साथ डॉ भी अपने शरीर मे होने वाले बदलाव को समझ नहीं पाते है यहाँ तक उस बीमारी के विशेषज्ञ भी अनजान रह जाते है । 39 वर्षीय ग्रेडलीन रॉय और सोहराब लुचमेडियन दिल के विशेषज्ञ भी अपने दिल के बारे मे नहीं जान सके छोटी उम्र मे दुनियाँ से चले गए ।
मै भी इसी श्रेणी मे आती हूँ । मुझे दो हार्ट अटैक पड़े, लेकिन उस समय मुझे पता नहीं चल सका कि मुझे क्या हो रहा है । मैं हमेशा दिल के दर्द को हार्ट अटैक समझती थी । मुझे दिल मे दर्द नहीं हुआ जबकि अन्य लोगों की अपेक्षा मेरी स्वस्थ जीवन शैली थी मेने सपने भी इस बीमारी के बारे मे नहीं सोचा था । सभी को मेरी बीमारी का सुनकर अचंभा होता है । इसलिए किसी को भी अपने शरीर का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है तब रिश्तों के बारे मे जानकारी हासिल करना मुश्किल है ।
जो संतुष्ट जीवन जी रहे है वह केवल रिश्तों की अच्छाई देखते है बुराई के बारे मे नहीं सोचते है । कोई रिश्ता बुराइयों से परे नहीं हो सकता है। सभी रिश्ते अच्छाई और बुराई का मिश्रण होते है हम चाहे तो उनमे बुराई देखकर दुखी रहे या केवल अच्छाई देखकर अच्छा समय गुजारे यह हमारी इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है दूसरे हमे सुख या दुख नहीं दे सकते यह हमारे सोचने के तरीके पर निर्भर करता है ।
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