I am retired hindi teacher in govt school. trevller , apne yatra ke anubhav aapke sath share kar rahi hu . yatra me aane vali kathinaiyan aur khushiyan dono me aapke satha rhungi
त्योहार और स्वास्थय
त्यौहार और स्वास्थ्य
आजकल त्योहारों का माहौल है। हर तरफ खुशियाँ छाई हुई है। मन उमंग से भरा हुआ है। रोज अनेक तरह के पकवान बन रहे है। ऐसे त्योहारी मौसम में स्वास्थ्य का ध्यान रखना मुश्किल हो जाता है। हमारे देश में हर त्यौहार के साथ कुछ नियम -कायदे जुड़े हुए है। जिसका पालन करके हम स्वस्थ रहकर त्योहारों का मजा ले सकते है।
आपको यदि याद हो तो आपको अपने घर की पुरानी औरतो की दिनचर्या याद कर लेनी चाहिए। वे पूर्णिमा ,नवरात्रि ,करवाचौथ ,होई जैसे अधिकतर त्योहारों पर व्रत रखती थी। इससे उनका शरीर स्वस्थ रहता था। सिर्फ पूरे दिन पकवान खाना -पीना शरीर को ख़ुशी अवश्य देता है। पर शरीर को ख़राब कर देता है। इसलिए जरूरत के मुताबिक ही खाना चाहिए अनाप -शनाप खाना नहीं चाहिए। शरीर का स्वास्थ्य ही हमें असली ख़ुशी देता है।
ये समय मौसम बदलने का भी है। इस समय हम गलत कपड़ो का चुनाव करके बीमारियों को बुलावा दे रहे है। आप जवानी में गलत व्यवहार करके बीमारियों से बचे रह सकते है लेकिन बच्चो और बड़ो के लिए सही कपड़े पहनना जरूरी है वरना बिस्तर पर रहकर त्योहारी सीजन बिताना पड़ेगा।
इस समय ऐसा माहौल है अस्पताल में एक बिस्तर भी नहीं मिल रहा है। इस समय करोना , डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां विकराल रूप ले चुकी है। इसलिए त्यौहार तभी खुशियां लाते है। जब हम स्वस्थ रहते है। वरना आपके साथ पूरा घर दुःख में डूब जायेगा। इसलिए नियमो का ध्यान रखते हुए त्योहार मनाये , स्वस्थ रहेऔर ख़ुशी से भरे रहे।
#Master the art of Durga Puja and woman
दुर्गा पूजा और नारी
आजकल नवरात्रि का समय आ गया है । सारा हिन्दू समाज भक्तिमय दिखाई देने लगा है । हर तरफ मंदिर सजे हुए है । मंदिरों मे दर्शनार्थियों की लंबी पंक्ति लगी हुई है । अनेक जगहों पर पूजा से संबंधित समान बिक रहा है ।उत्तर भारत मे रामलीला ,गुजरात मे डांडिया खेला जा रहा है । वही बंगाल मे दुर्गापूजा की धूम है । दिल्ली जैसी जगहों मे तीनों उत्सव धूम -धाम से मनाते हुए लोग दिखाई दे जाएंगे ।
इन सबके बीच मेलों का आयोजन किया जा रहा है । जो भीड़ मे जाने से बचते है अब वे भी इनकी रौनक देखने के लिए बाहर निकलने लगे है । शाम के समय सड़कों पर भीड़ -भाड़ दिखाई दे रही है ।
इन सबके द्वारा देवी के अनेक रूपों की पूजा देखी जा सकती है । संसार मे संतुलन लाने के लिए नर के साथ नारी की पूजा जरूर की जाती है । जो कार्य नर नहीं कर पाते है । उनके लिए नारी का सहारा लिया जाता है । देवी की कहानियाँ सुनकर प्रतीत होता है । भगवान जब हारने लगते है तब वे भी देवी का सहारा लेने से चूकते नहीं है । अनेक राक्षसों का संहार देवी के द्वारा करते हुए दिखाया गया है जबकि पुरुष नारी से अधिक शक्तिशाली होते है । लेकिन कई जगह ब्रह्मा ,बिष्णु और महेश ने अपनी दिव्य शक्तियां देवी को देकर उन्हे शक्तिसंपन्न बनाया । इस काम को करवाने मे उन्हे महिला को कमतर साबित करने की जगह अपने बराबर का स्थान देते हुए दिखाया गया है ।
इन दिनों मे देवी की पूजा अनेक प्रकार से की जाती है । इसके कारण समाज मे साबित करने की कोशिश की जाती है । नारी को मौका मिले तो वह भी जीवन मे महत्वपूर्ण काम कर सकती है । बलवान और ताकतवर को भी धूल चटाने मे पीछे नहीं रहती है ।
इससे प्रेरणा मिलती है । नारी को कमजोर समझने की जगह उसे शक्तिसंपन्न बनाओ । उसकी शक्ति ,समाज के उत्थान के साथ परिवार के उत्थान मे सहायक होगी । वह किसी पर बोझ साबित नहीं होगी बल्कि वह एक नहीं अनेक परिवारों की तरक्की का कारण बनेगी । यदि एक आदमी पड़ाई करता है तब उसके कारण एक परिवार की उन्नति होगी है जबकि एक औरत की पड़ाई के कारण तीन परिवार सम्मानित महसूस करते है । उसका मायका ,ससुराल और उसका अपना परिवार अवश्य उन्नति करता है ।
युगांधार यानि युग के अंधकार को दूर करने वाले कृष्ण
युगांधार यानि युग के अंधकार को दूर करने वाले कृष्ण
कृष्ण का जन्म जिस दिन हुआ था । उस दिन पर सभी लोग खुश होकर त्योहार के रूप मे मनाते है । कोई भी इंसान का जन्मदिन उसके कार्यों के करने के कारण निर्धारित होता है ।
कृष्ण का जन्म हमसे भी ज्यादा दुखदायी हालत मे हुआ था । सोच के देखो जिसके माता -पिता जेल मे बंद हो । जिसके सात भाई -बहनों को जन्म होते ही मार दिया गया हो । उसके भी बचने के उपाय न हो ।खराब मौसम के होते हुए उसे रातों -रात जेल से निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुचाया गया ।
उसके बाद नन्हे से कृष्ण को मारने के अनेक बार उपाय किए गए । आप सोच कर देखिए एक दुधमुहा बच्चा अपनी रखा करने मे कितना समर्थ हो सकता है । लेकिन उन्हे जींदा रहने के लिए हर पल संघर्ष करना पदा । वह हमेशा अपने संबंधियों के कारण खतरे मे रहे ।
अंत तक उनका जीवन सुरक्षित नहीं था । अंत मे एक शिकारी के द्वारा उनका वध हो गया । कहा जाता है -वह शिकारी भी उनका पुत्र था । जिसका आभास कृष्ण और उस शिकारी को नहीं था ।
हम हमेशा अपने जीवन को दुखदाई समझते है । भगवान और दुनियाँ को कोसते रहते है । लेकिन हम जींदा है । तो हमे बचाने वाले कोई हमारे संबंधी अवश्य रहे है । वरना हम इस काबिल नहीं थे कि अपनी कोशिशों से जींदा रह सके ।
उनका जन्म भी साधारण घर मे हुआ था । लेकिन युग को एक नया रूप देने के कारण उन्हे कई नामों से पुकारा जाता है । उसमे से उनका एक नाम युगांधार था । जिसका मतलब संसार के अंधकार को दूर करने वाला । आप सोच के देखो जिस युग मे कृष्ण का जन्म हुआ था । उसमे रिश्ते नातो का जो रूप उन्होंने देखा था । उसके अनुसार इंसान का दिल टूटना लाजमी था । लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी हमेशा संसार को अच्छे रूप मे चलाने के लिए कोशिश करते रहे ।
भले ही उन्हे महाभारत जेसे युद्ध का सामना करना पदा । अंत मे संसार को अंधकार मे से निकालने मे सफल हो सके । इसलिए उन्हे आज हम भगवान के रूप मे पूजते है ।
भगवान के रूप मे वही इंसान पूजा जाता है जो हालत को बदलने की क्षमता रखता है न कि हालत के सामने टूट जाता है । जो हालात के सामने टूट जाता है समय उनको भूला देता है । युगों तक उन्हे ही याद किया जाता है । जो हमे प्रेरणा दे सकते है । जोश भर सकते है । जिसके कारण हम हारने से नहीं डरते है ।
#panna dhai sacrifices to save udaysingh
उदयसिंह को बचाने के लिए पन्ना धाय का त्याग
पन्ना धाय और उदय की कहानी जिसने सुनी है। उसके लिए राजा उदयसिंह को समझना आसान है। पन्ना धाय ने उदयसिंह का जीवन बचाने के लिए अपने बेटे की क़ुरबानी दे दी थी। एक साधारण बच्चे के लिए जीवन जीना जितना आसान होता है। राजकुमारों के लिए जीवन जीना एक चुनौती होती है। उन्हें बचाने के लिए कितने लोगो को रखा जाता है। तब भी कितनो को जीना नसीब हो पाता है। सोच कर देखिये।
उसी हिसाब से उनका पालन -पोषण करने वाले भी तलवार की नौक पर चलते है। राजा के बदलते ही उनका और उनके परिवार के जीवन पर खतरा मंडराने लगता है। हमने बचपन में पन्ना धाय के बलिदान की कहानी सुनी थी। उसने अपने बेटे को मौत के घाट उतरते हुए देख कर भी उफ़ नहीं की थी। माँ की ममता पर उसने नियंत्रण रखा ताकि बेटे की क़ुरबानी बेकार न जाये। आज इसी कारण पन्ना धाय और उदयसिंह की कहानी याद की जाती है। वरना कितने लोग जीते और मरते है। किसी को याद् नहीं रहते है .जिनका काम असाधारण होता है। उन्हें दुनियां याद रखती है।
उदयसिंह राणा प्रताप के बेटे थे। उनके पिता सारा जीवन अकबर से टककर लेते रहे अंत समय तक हार नहीं मानी . वह उस इंसान के झुझारू बेटे थे। राणा निर्माण उदयसिंह ने 1567 इसबी में उदयपुर का करवाना शुरू किया। उन्ही के नाम पर इस शहर का नाम रखा गया है। यह आज भी अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।
इस शहर का पुराना नाम शिवि था। यह मेवाड़ राजस्थान के दक्षिण मध्य में एक रियासत थी। https://www.blogger.com/blog/post/edit/7394749868577857146/5331213636919215221
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#WHICH CITY IS THE BEST OF THE UDAYPUR AND JAYPUR
उदयपुर और जयपुर मे सबसे अच्छा कौन सा शहर
जयपुर राजस्थानी शहरों जैसा एक शहर है। जहाँ सुबह और रात सुहानी होती है। जबकि दोपहर बहुत गर्म होती है। यदि आप रात को घूमना चाहो तो बहुत अच्छा लगता है। लेकिन भारतीय परम्परा में हम केवल दिन में घूमना पसंद करते है . दिन के समय इतनी अधिक गर्मी महसूस होती है। कि पानी पीने की इच्छा पूरी नहीं हो पाती है। कितना भी पानी ले लो कम पड़ जाता है। इसलिए यहां सर्दियों में जाना सही रहता है। हम जैसे लोग जो भरी गर्मी का सामना कर सकते है। लेकिन प्यास के कारण जान निकलने लगती है।
उदयपुर में जयपुर की अपेक्षा मौसम सुहाना होता है। यहां पर हरियाली के दर्शन अधिक होते है। यहाँ पर ऊँचे पहाड़ उनपर बने हुए महल और मंदिर बहुत अच्छे लगते है। दोनों जगहों पार महल और मंदिर बहुत है।
राजस्थान की जयपुर राजधानी रही है। यहां पार भीड़ बहुत है जबकि उदयपुर में कम भीड़ होती है।
जयपुर गुलाबी नगरी है तो उदयपुर सफेदनगरी है। दोनों की सुंदरता निराली है।
जयपुर की अपेक्षा मुझे उदयपुर ज्यादा अच्छा लगा। यहां के लोग सीधे -सादे है। वैसे सभी की अलग पसंद होती है। जयपुर में पड़ने वाले ज्यादा बच्चे और संसथान है। उसकी अपेक्षा उदयपुर में शिक्षा से संबंधित गतिविधियां कम है।
में दिल्ली जैसी भीड़ -भाड़ के इलाके में रहती हूँ। इसलिए मुझे हमेशा शांति की तलाश रहती है। जहां मन का सुकून मिले हमेशा ऐसी जगह पर जाना अच्छा लगता है। यदि आप को भी ऐसी जगह अच्छी लगती है तो उदयपुर जरूर जाइये। आपको अच्छा लगेगा।
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#ROMANTIC CITY OF THE EAST
पूरब का रोमांटिक शहर
विदेशो में रोमांटिक शहर का नाम आपने बहुत सारे शहरो का सुना होगा। लेकिन भारत में रहते हुए इस तरह की उपमा के बारे में कभी आपने सुना होगा। मुझे नहीं लगता। भारत में प्यार छुपाने में लोग सारी कोशिश करते है। भारत में ऐसा भी कोई शहर होगा जहां प्यार के दीवाने पहुंचते है।
चारो तरफ प्रकृति भी प्यार को बढ़ाने में सहयोग दे रही होगी। जहां हर तरह ख़ुशी महसूस होती है। अनेक छोटे बड़े होटलो में इस तरह के इंतजाम किये जाते है। जहां लोग सहूलियत महसूस कर सके।
यहां के लोग डर से दूर रहते है। उन्हें खतरे का अहसास कम होता है। यहां पर लोगो को घर जैसा अहसास होता है। यहां के महल आदि जगह पर आकर राजसी अहसास होता है।
संसार के अधिकतर देशो से लोग प्यार का अहसास महसूस करने के लिए इस नगरी में आते है। यहां आकर उन्हें प्यार का अहसास की सुगंध फैली नजर आती है। यहां आपको इससे सम्बन्धित अश्लीलता कही नजर नहीं आएगी। बल्कि हर तरफ एक खुशनुमा अहसास फैला नजर आता है।
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# उदयपुर कब घूमने जाए
उदयपुर कब घूमने जाए
राजस्थान एक गरम प्रदेश है । यहाँ का मौसम रात और सुबह सुहाना होता है लेकिन दिन मे बहुत गर्मी पड़ती है । यह राजस्थान के अन्य प्रदेशों की अपेक्षा ठंडा है । लेकिन यहाँ पर भी गर्मी पड़ती है ।
आप अक्टूबर से अप्रेल के महीने तक उदयपुर घूमने जा सकते है । आपको धरती पर स्वर्ग का अहसास होगा । आप वहाँ जाना बहुत पसंद करेंगे । ऊंचे पहाड़ ,बहती हुई नदी और बड़ी -बड़ी झीले हमे अपने पास बुला रही है । सुबह उठकर झीलों को देखना और शाम को ढलते हुए सुरज की किरणों का नदी के पानी के साथ खेलना । कई स्थानों पर शाम के समय विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है । जो मन को पकड़ लेता है । उठने की इच्छा नहीं होती है ..
#NATURE CREATED THE BOUNDARY OF UDAIPUR
उदयपुर की सीमा का निर्माण प्रकृति ने किया
उदयपुर की सीमा प्राकृतिक है जिसे नदी और पहाड़ो ने बनाया है। कोसी नदी इसे पूर्व के सुन्सारी जिले से अलग करती है। कोसी नदी उत्तर दिशा में बहती हुई भोजपुर और कोटंग से अलग करती है सिंधुली डिस्ट्रिक्ट पश्चिम में तवा खोला और दक्षिण मे शिवालिक की छोटी पहाड़ियों से सिरहा और सप्तारी के तराई के इलाको से अलग करती है। उदयपुर के पूर्व में कोशी टप्पू वन्यसंरक्षण हे। जहा अनेक पशु पक्षी रहते है जो सुन्सारी और सप्तारी जिले में पड़ता है।
पुराने समय में ये नेपाल के पूर्वी विकास क्षेत्र सागरमाथा जोन में पड़ता था। लेकिन अब इसे उससे अलग कर दिया गया है।
#why udaypur called white city
क्या उदयपुर सफ़ेद शहर है
आपने पिंक सिटी जयपुर का नाम सुना होगा। नीला शहर जोधपुर को कहते है। जब मे उदयपुर पहुंची तब वहां के अधिकतर घर और महल सफेद रंग से रंगे हुए थे। लोग अपनी हैसियत के अनुसार संगमरमर का इस्तेमाल करते दिखाई दिए।
राज महल भी सफेद रंग से रंगे हुए थे। साथ ही वहां पर संगमरमर का इस्तेमाल भी बहुतायत से हुआ था। नीली झीलों और हरियाली के बीच में सफ़ेद रंग के बने हुए घर दूर से दिखाई देते है।
वहां पर प्रदूषण कम है जिसके कारण उनपर मिटटी और मैल का संगम नहीं है। इतनी अधिक झील राजस्थान जैसे इलाके में देखना हैरान करता है।
इसे राजस्थान का कश्मीर भी कहा जाता है। इसकी छटा निराली है
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#FOUR DAYS REQUIRED TO VISIT UDAIPUR
उदयपुर घूमने के लिए 4 दिन जरूरी
उदयपुर झीलों का शहर है। वहां पर एक दिन केवल नावों की सैर और झीलों के बीच में जगमंदिर को देखने में बीत जाता है। .इन झीलों तरह की नाव चलती है। साधारण नाव और स्पीड बॉट दोनों का मजा जरूर लेना चाहिए।
दूसरा दिन बड़ा तालाब का शांत माहौल , सज्जनगढ़ के किले को देखने , डूबते हुए सूरज को निहारने में बीतता है। डूबता सूरज को देखने के लिए बहुत सारे पर्यटक वहां पहुंचते है। इतनी भीड़ उदयपुर में किसी और स्थल पर डूबते हुए सूरज को देखने के लिए उमड़ती नहीं देखीं। सज्जनगढ़ किले में चिड़ियाघर भी है। वहां के चिड़ियाघर को देखने के लिए समय जरूर रखिये।
बागौर की हवेली ,सहेलियों की बाड़ी , कार संग्रहालय और जगमंदिर देखने के लिए जरूरी है।
चौथे दिन आप जगदीश मंदिर और उदयपुर का सीटीपॅलेस को देखने मे बीत जायेगा। यदि इन्हे नहीं देख पाओगे तो मन में मलाल रहेगा। इसलिए से कम समय लेकर उदयपुर मत जाना
#COURTYARD OF MAIDEN
सहेलियों की बाड़ी
राजस्थान में औरतो पर बहुत बंदिशे रही है। बाकि भारत की अपेक्षा इस समय भी राजस्थान का माहौल औरतो के लिए बाहर निकलने लायक नहीं है लेकिन तब भी उनके लिए घर में ही अनेक सुविधाओं का इंतजाम किया जाता है।
आप को यह बात अजीब लगेगी लेकिन आप सोच कर देखे जितने भी आक्रमणकारियो ने भारत में प्रवेश किया वे अधिकतर पश्चिमी क्षेत्र से आये। इसलिए उनके साथ आक्रमणकारियों ने सबसे ज्यादा गलत व्यवहार किया । इस कारण औरतो को चारदीवारी में सुरक्षित रखा जाने लगा। आगे चलकर उन्हें इसी की आदत पड़ गयी।
सहेलियों की बाड़ी एक लोकप्रिय और दर्शनीय स्थल है इसका निर्माण राणा सांगा ने करवाया था। उद्यान के पास एक संग्रहालय है। सहेलियों की बाड़ी एक राजकुमारी और उसकी अड़तालिस सहेलियो के लिए बनवाया गया था। राजस्थान के गर्म माहौल में बाग -बगीचों और फब्बारों के बीच में यह जन्नत का अहसास देता है. उसके लिए अद्भुत वास्तुकला का इस्तेमाल किया गया है।
बाग के ताल में खिले हुए कमल के फूल और अनेक जानवरो के आकार के फव्वारों में से निकलता हुआ पानी अलग अहसास देता है
#udaypur palace 2
उदयपुर पैलेस 2
वहां पर विशेषतौर पर राजा रानियों से सम्बंधित कपडे और जेवरात रखे हुए है। इसके आलावा उनकी उन कपड़ो को पहने हुए तस्वीरें भी लगी हुई है। उनके जेवर आदि देखकर हैरानी होती है। राजघराने की पुरानी और नयी तस्वीरें रोमांचित कर देती है। हम जैसे साधारण लोग खुद को को राजा -महाराजा के रूप में महसूस करने लगे।
हमारे घरो में चांदी मुश्किल से आधा किलो मिलेगी। लेकिन वहाँ पूरा एक महल चाँदी के सामान से सजा हुआ था। जिसमे प्रत्येक बर्तन कम -से -कम दस किलो का होगा। ऐसे बर्तन बहुत सारे थे। वहां पर चांदी का घोडा, हाथी पर बैठने का हौदा ,बग्गी ,दरवाजा जैसे बड़े -बड़े सामान देखकर आंखे खुली रह गई।
हम अपनी थोड़ी सी चीजों पर घमंड करते फिरते है। वहां पहुंचकर लगा हमारी इनके सामने कोई हैसियत नहीं है। हम जैसे लोग केवल टिकट लेकर उन जगहों पर जाने का लुत्फ़ उठा सकते है।
#udaypur palace 1
उदयपुर का महल
उदय पुर महल देखने का शुल्क (300 /-)लगता है। वरिष्ठ नागरिको को और बच्चो को रियायत दी जाती है इसलिए अपने साथ ID प्रूफ रखना चाहिए लेकिन इस महल के सामने इस शुल्क की ज्यादा अहमियत नहीं है। इस महल में बहुत कुछ देखने के लिए है जिसके सामने इतने पैसे देने ज्यादा नहीं लगते है।
आप इसमें राजस्थानी वास्तुकला का अद्भुत रूप देख सकते है। इसके झरोखे जहां से रानियां बाहर के दृश्य देख पाती थी जिन्हे बाहर के लोग आसानी से नहीं देख सकते थे। इसमें राजाओ और रानियों के इस्तेमाल की वस्तुए भी रखी गई है। कई कमरे तो बिलकुल इस तरह से सजे हुए है जैसे अभी इनमे आकर वो रहने वाले है। इस तरह से सजा हुआ पहला महल हमने देखा है जिसका हर कोना सजा हुआ है।
उस समय की वस्तुए, शीशे के काम की पच्चीकारी का विशेष प्रयोग हुआ है। जिसका बारीक़ काम हैरान कर देता है। यहां के पुरे कमरे पच्चीकारी के काम से सुसज्जित है। जिनके लिए विदेशो से सामान मंगवाया गया है।
इनको अमीर लोग विशेष तौर पर अपने परिवार के विशेष समारोह के लिए इस्तेमाल कर सकते है। पिछले दिनों इसमें चार दिनों के समारोह के लिए 800 करोड़ दिए गए। यहाँ आकर राजसी अहसास महसूस होता है।
#UDAYPUR PALACE
उदयपुर पैलेस
यह भारत के भव्य महलो में से एक है। ये सिर्फ दीवारे ही नहीं बल्कि ऐसा महल है जिसे देखकर लगता है जैसे अभी राजमहल के लोग बाहर गए है। इसमें घुसते ही लगता है हम भी राजमहल में रहने वालो में से एक है। हर चीज बिलकुल साफ -सुथरी और सुसज्जित है।
ये महल इतना अधिक विशाल है। कि इसमें से दो होटल बनाये जा चुके है। एक हिस्सा राजा ने रहने के लिए अलग रखा हुआ है। उसके अतिरिक्त जनता के लिए जितना हिस्सा खोल रखा है। सिर्फ उतने हिस्से को देखने में हम कई बार थक कर बैठ गए।
हमने बहुत जल्दी में यह महल देखा था क्योंकि हमें उसी दिन उदयपुर से निकलना था। हम सही ढंग से पूरा महल नहीं देख सके। यदि आपको यह देखने का मौका मिले तो पूरा एक दिन इसे देखने के लिए रखना यह लाजबाब है।
मैने अब से पहले जितने महल देखे है। उन तक जाने का रास्ता बहुत सूंदर और भव्य होता था। लेकिन इस महल के रस्ते में पूरा बाजार लगा हुआ है। उस महल तक जाने का रास्ता मुझे सही नहीं लगा लेकिन उससे महल की भव्यता कम नहीं होती है। महल तक पहुंचने के दो रास्ते है। दूसरा रास्ता झील से है।
#jagdish temple udaypur
जगदीश मंदिर
उदयपुर का सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर का नाम जगदीश मंदिर है। इसकी नक्काशी लाजबाब है। इसका निर्माण 1651 इसवी में हुआ था। इसे राजा जगत सिंह ने बनवाया था। इसकी निर्माण कला अद्भुत है। इसमें अनेक देवी -देवताओ की मूर्तियां उकेरी गयी है। यह संगमरमर के पत्थर से बना है।
इसमें अनेक देवी देवताओ की प्रतिमाये लगी हुई है। कुछ मूर्तियां सामने बनी हुई है। तो कुछ मूर्तियां बिलकुल पीछे की तरफ लगी हुई है जहां तक जाने का रास्ता अलग है। आप उसे छुपा हुआ मंदिर भी समझ सकते है। हम शायद उस मंदिर तक जाते भी नहीं। उस तरफ हमें एक औरत लेकर गयी तब हमे उस मंदिर का पता चला।
दोनों मंदिरो के बीच में गरीब लोगो को खिलाने के लिए मुफ्त खाना बांटा जाता है। आपकी जितनी श्रद्धा हो आप वहां दान कर सकते है। यह मंदिर सिटी पैलेस के बिलकुल पास है। या ये समझ लो रास्ते में पड़ता है। इस मंदिर के पास बहुत सारी खाने -पीने की दुकाने है। यहां आपको हर तरह का खाना मिल जायेगा।
#sajjangad fort
सज्जनगढ़ किला
यह किला राजा सज्जनसिंह ने बनवाया था। यह पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर बना हुआ है। इसके ऊपर से सारा उदयपुर दिखाई देता है। यहां से उदयपुर झीलों से भरा हुआ और हरा -भरा दिखाई देता है। इसे यहां से देखने पर यह राजस्थान का हिस्सा नहीं लगता बल्कि धरती पर फैला हुआ स्वर्ग लगता है। इसकी सुंदरता आँखों में समाती नहीं है। यहां का रहन -सहन और खान -पान सब कुछ राजस्थानी है। बस प्रकृति राजस्थान से अलग दिखाई देती है।
# VANICE OF INDIA
भारत का वेनिस
उदयपुर जो राजस्थान में है उसकी तुलना वेनिस से की जाती है। आप उदयपुर में अधिकतर स्थानों से झील को देख सकते है। उदयपुर में सात झील है उनमे से मुख्य पांच झील फतह सागर झील ,पिछोला झील,स्वरूप सागर झील,रंगसागर झील ,दूध तलाई झील उदयपुर में है। थोड़ी दूर पर जयसमंद झील,उदयसागर झील और राजसमंद झील है। आप जहां भी जाओगे हर तरफ पानी दिखाई देगा। कहने को राजस्थान का मतलब रेगिस्तान होता है। जहां पानी की कमी होती है।
वहां के अधिकतर होटलो के नाम झील से जुड़े हुए मिलते है। आपने अधिकतर स्थानों पर खाने की व्यवस्था सबसे नीचे होती देखी होगी। लेकिन उदयपुर में अधिकतर होटलो में खाने का इंतजाम छत पर होता है।
हमें अधिकतर नीचे के तल पर होटल देखने की आदत थी। लेकिन जब यहां का पूरा इलाका देखने के बाद किसी होटल में खाने के लिए पहुंचते तब सबसे ऊपर चढ़कर खाने का इंतजाम देखकर हमारी हिम्मत जबाब देने लगती थी। लेकिन वहां ऐसा ही प्रबंध था। इसलिए हिम्मत जुटाकर गिरते -पड़ते छत्त पर पहुंचना पड़ता था।
इतनी ऊंचाई पर खाने की व्यवस्था होने का एक कारण झीलों के दर्शन भी रहा होगा। हम उदयपुर में सर्दियों में गए थे। इसलिए हमें सर्दियों की धूप खाते हुए झील को देखना बहुत अच्छा लग रहा था।
#chintaman gnesh temple of ujjain
चिंतामन गणेश मंदिर
यह मंदिर उज्जैन का प्रसिद्ध मंदिर है। इसके बारे में कहा जाता है-जो इनके दरबार में आ जाता है। उसकी सभी इच्छाये पूरी हो जाती है। ये स्वयंभू है। इनकी उत्पत्ति अपने आप हुई है। इन्हे तराशा नहीं गया है। ये धरती से खुद निकले है। यहाँ पर गणेश जी की तीन मूर्तियां है। सबसे बड़ी चिंतामन गणेश जी है। दूसरी मूर्ति इच्छामण गणेश है। तीसरी मूर्ति सिद्धिविनायक जी है। यह गणेश जी के तीनो रूप है।
हिन्दू संस्कृति में जब भी शुभ काम होता है। उसमे सबसे पहले गणेश जी को निमंत्रण दिया जाता है। ताकि सभी कार्य बिना रुकावट के पूरे हो जाये।
सबसे पहले इसे परमार राजाओ ने बनवाया था। उसके बाद रानी अहिल्याबाई ने इसको बनवाया। इस समय भी इसका निर्माण कार्य चल रहा है। यह बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है।
कहा जाता है राम ,सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए गए थे। तब कुछ समय के लिए इस मंदिर में ठहरे थे। तब लक्ष्मण जी ने यहां बाबड़ी बनवाई थी। जो लक्ष्मण बाबड़ी के नाम से प्रसिद्ध है।इसके कारण पानी की समस्या खत्म हो गयी थी।
# ujjain ka kalbhairav mandir
उज्जैन का कालभैरव मंदिर
महाकालमंदिर के दर्शन तब तक पूर्ण नहीं माने जाते जब तक आप कालभैरव मंदिर के दर्शन नहीं करते। इसलिए महाकालेश्वर मंदिर के बाहर से कालभैरव मंदिर तक जाने के लिए गाड़ियां मिल जाती है। आप चाहे तो आने -जाने का किराया तय कर सकते है। वरना एक तरफ के हिसाब से भी जा सकते है। जैसी आपको सुविधा लगे।
कहा जाता है। कालभैरव मंदिर प्राचीन मंदिरो में से एक है। यहाँ प्राचीन समय में शराब और और बलि दोनों भेंट की जाती थी। लेकिन कुछ समय से बलि देने की मनाही कर दी गई है। अब केवल शराब का भोग लगाया जा सकता है। पूजा का समान मंदिर के बाहर मिल जाता है।
जिनकी मनोकामना पूरी हो जाती है। वे प्रसाद में अवश्य शराब चढ़ाते है। यहां पर बहुत अधिक मात्रा में शराब मूर्ति को चढाई जाती है सबको समझ नहीं आता ये जाती कहाँ है। बाहर निकलने के लिए किसी नाली आदि की सुविधा भी नहीं है। अंग्रेजो ने इस मूर्ति के आस -पास खुदाई करवा कर देखने की कोशिश की। लेकिन किसी को समझ नहीं आया।
इस मंदिर के पास एक गुफा है। जिसके अंदर एक बार में केवल एक इंसान ही जा सकता है।
इस मंदिर के बाहर दीपस्तम्भ भी बना हुआ है। जिसकी शाम के समय विशेष रूप से तैयार करके जलाया जाता है। इस मंदिर में मनोकामना पूर्ति के लिए आज भी अनेक लोग आते है।
# जिस देवी को अपने राज्य में आने से मना किया
जिस देवी को अपने राज्य में आने से मना किया
जब मैंने भूखी माता के बारे में सुना तब में हैरान हो गई। ऐसी भी कोई माता होती है। मुझे इनका महत्व समझ नहीं आया। इनका मंदिर शिप्रा नदी के पार बना हुआ है। कहा जाता है। एक समय में भूखी माता हर घर से एक इंसान खाने के लिए मांगती थी। दुखी मन से सब उनकी इच्छा पूरी करते थे।
एक समय विक्रमादित्य एक कुम्हारिन के घर के पास से गुजर रहे थे। उन्हें उस घर से रोने की आवाज आ रही थी। वह उस घर के अंदर गए। उसका कारण पूछने पर उन्हें बहुत दुःख हुआ। उस घर के इकलौते बेटे की आज बलि दी जाएगी।
राजा ने उनका दुःख दूर करते हुए कहा-' आज आपका बेटा नहीं उसकी जगह मै जाऊंगा। '
राजा ने भूखी माता के मंदिर से लेकर राजमहल तक अनेक पकवान बनवा कर रखवा दिए। उसके बाद उन्हे राजा की तरह तैयार किया गया। वह सही जगह पर जाकर लेट गए। उनके ऊपर चादर डाल दी गई। उसके ऊपर तख्त बिछा कर अनेक पकवान रख दिए गए।
माता उनकी आवभगत से खुश हो गई। उन्होंने पूछा ये सब जिसने किया है वह सामने आये। तब राजा बाहर निकले तब माता ने वरदान मांगने के लिए कहा। तब राजा ने कहा - 'आप कभी उज्जैन मत आना।'
आपको हैरानी हुई। मुझे भी हुई थी। एक माता को गुजरात से बुला कर लाये। दूसरी माता को राज्य में आने से मना कर रहे थे।
ये माता मृत्यु देने वाली थी दूसरी वर देने वाली थी। मृत्यु को कौन बुलाना चाहेगा।
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विक्रमादित्य का मंदिर
मैने उज्जैन में घूमते समय विक्रमादित्य का मंदिर देखा तो हैरान हो गई। तब मुझे उनके उज्जैन के राजा होने का ध्यान नहीं था।जबकि वेताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी पढ़ चुकी थी। उनमे अनेक बार राजा शब्द का प्रयोग अवश्य हुआ है। लेकिन उन्हें विक्रमादित्य कहकर बहुत कम सम्बोधित किया गया है।
पहली बार बहुत बड़े आकार की मूर्ति मुझे हैरान कर रही थी। वह मूर्ति बहुत बड़े कमरे में रखी हुई थी। सड़क से चलते हुए ही उस बड़ी मूर्ति के दर्शन हो रहे थे। उसके आकार को देखकर लग रहा था। उसे अंदर ले जाकर कैसे स्थापित किया गया होगा।
उज्जैन में उन्हें केवल राजा नहीं बल्कि देवता माना जाता है। सबसे पहले लगा उनके अंदर श्रद्धा है भी या नहीं बल्कि लोगो से पैसे लेने के बहाने उन्होंने ऐसी मूर्ति की स्थापना की है।
बाद में गहराई में जाने पर पता चला। यह वहां के जनमानस में रहने वाले है। उनके बाद के राजाओ का किसी को नाम याद नहीं है। राजा का महल समय ने ढहा दिया है। उसके अवशेष भी कहीं नहीं मिलते। उसके बाबजूद केवल एक राजा सबको आज तक याद है। किसी से पूछा जाये तो वहां के वर्तमान राजा का नाम भी कितने लोगो को याद होगा सोच कर देखिये।
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हरसिद्धि माता का भव्य मंदिर
हरसिद्धि देवी का नाम दिल्ली में रहते हुए मैंने कभी नहीं सुना था। उज्जैन में पहली बार सुना तब बहुत अजीव लगा था। लेकिन थोड़ी देर में सब अच्छा लगने लगा। इससे पहले मैंने किसी देवी की केवल गले से ऊपर की मूर्ति नहीं देखी थी। उनका ये रूप अलग लगा। उस मंदिर में कई अन्य छोटे -छोटे मंदिर बने हुए है। लेकिन यह 51 शक्तिपीठ में से एक है। इसकी महत्ता बहुत है।
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हरसिद्धि माता
हरसिद्धि माता ने कहा - 'ठीक है। मै तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हूँ। यदि तुमने मुझे मुड़कर देखा तब मै उसी जगह रुक जाउंगी।।
राजा माता के पायल की आवाज सुनता हुआ। आगे -आगे चलने लगा। बहुत समय बाद आवाज आनी बंद हो गई तब राजा ने मुड़कर देखा। माता कहाँ है। उनकी आवाज क्यों नहीं आ रही लेकिन वह पीछे थी।
तब माता ने कहा - 'तुमने मुड़कर देखा अब मै यही रुक जाउंगी। तुझे यदि मंदिर बनाना है तो यही बना लो अब मै आगे नहीं जाउंगी। '
उज्जैन अब पास ही था। तब राजा ने उसी जगह मंदिर बना दिया। यह मंदिर महाकालेश्वर मंदिर के बाद भव्य मंदिर है। वह महाकालेश्वर मंदिर से ज्यादा दूर नहीं है। उसे देखकर मन खुश हो जाता है।
इससे पहले मेने कभी विक्रमादित्य का मंदिर नहीं देखा था। पहली बार सिंहासन पर विराजमान विक्रमादित्य का मंदिर देखा मुझे बहुत अच्छा लगा। कहा जाता है- विक्रमादित्य का महल भी पास में बना हुआ था। लेकिन अब उसके नामो -निशान नहीं है। लेकिन मुझे विश्वास है। कभी ये सच में रहा होगा।
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परदुःखहर्ता विक्रमादित्य
विक्रमादित्य हरसिद्धि माता को गुजरात के कोयला गढ़ के बियानी से उज्जैन लाये थे। वियानी के राजा प्रताप सिंह हरसिद्धि माता को अपनी पत्नी बनाना चाहते थे। लेकिन माता तैयार नहीं हुई। उन्होंने कहा -'तेरी पत्नी मेरी परम् भक्त है। इसलिए मै तुझे मार नहीं सकती हूँ। लेकिन तुझे दंड देती हूँ। तू रोज मेरे मंदिर में आएगा और खौलते कड़ाहे में अपनी आहुति देगा। मै तभी तेरी जान बख्शूंगी। '
राजा इसके लिए तैयार हो गया। रोज -रोज ऐसा करने से उसकी हालत ख़राब होती चली गई। इसके बाद वह धीरे -धीरे कमजोर होने लगा। उसके लिए ये सब सहना बहुत मुश्किल था।
जब विक्रमादित्य प्रताप सिंह से मिले तब उनकी दुर्दशा देखकर बहुत दुखी हुए । उन्होंने मन में सोचा अब इसे मुक्ति मिलनी चाहिए। वह अगले दिन प्रताप सिंह के उठने से पहले मंदिर पहुंच गए। उससे पहले उन्होंने अपने शरीर पर चाकू से अनेक घाव बना लिए। उनमे सुगंधित पदार्थ भर लिए थे। जब वह खौलते कड़ाहे में कूदे तब बदबू की जगह हर तरफ खुशबु फ़ैल गयी।
माता उनसे खुश हो गई। उन्होंने वरदान मांगने के लिए कहा - 'तब उन्होंने प्रताप सिंह को श्राप से मुक्त करने के लिए कहा। 'माता ने तथास्तु कहा। माता ने कहा -'अब तुम अपने लिए मांगो। ' तब राजा ने कहा -मै आपकी पूजा करना चाहता हूँ। आप मेरे साथ उज्जैन चलो। ' माता इसके लिए तैयार हो गई। आज भी हरसिद्धि माता का मंदिर गुजरात और उज्जैन दोनों जगह है।
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विक्रमादित्य और राजा भोज
विक्रमादित्य इतने पराक्रमी थे कि उन्होंने 64 योगिनियो में से 32 योगिनियो को अपने नियंत्रण में कर लिया था। 64 योगिनियां साधारण औरते नहीं थी बल्कि सब में विशेष गुण थे। उन्होंने बेताल को भी अपने इशारो पर चलाने का हुनर हासिल कर लिया था। कहा जाता है ये योगिनियां और बेताल उन्हें राज -काज संभालने में मदद किया करते थे। तभी उनके कार्यो में गलतिया नहीं होती थी।
विक्रमादित्य के सिंहासन में ये 32 योगिनियां पुतलियां बनकर विराजमान थी। जो भी उस सिंहासन पर बैठता था। उसमे भी अच्छे गुणों का उदय हो जाता था।
आपने एक टीले पर बैठकर एक गड़रिये के न्याय करने के बारे में सुना होगा। उसकी महिमा जब दूर तक फैली तब राजा भोजराज ने उस गड़रिये को बुलाकर देखा। वह बिलकुल साधारण लगा। लेकिन उस टीले पर बैठते ही उसके काम करने का तरीका बिलकुल बदल जाता था। राजा ने उस टीले को खुदवाकर देखा तब उसके नीचे से सिंहासन निकला।
जब भी राजा भोजराज ने उसपर बैठने की कोशिश की तब वह नाकाम रहा। उसने उसपर बैठने का निश्चय छोड़ दिया। आप सोचकर देखिये विक्रमादित्य कितने गुणी और पराक्रमी रहे होंगे जिन्होंने 32 योगिनियो और बेताल को अपने दास बनने के लिए मजबूर कर दिया। जबकि राजा भोजराज भी प्रसिद्ध राजा रहे है। लेकिन विक्रमादित्य के सामने वे नगण्य थे।
विक्रमादित्य की महानता का कारण
विक्रमादित्य बहुत बहादुर थे। उनके अंदर किसी चीज का डर नहीं था। जब उनके दरबार में एक साधु ने उन्हें शमशान घाट में जाकर एक शब को पेड़ से उतारकर उस तक पहुंचाने के लिए कहा तब वे इस काम को करने के लिए ख़ुशी से तैयार हो गए। उन्हें किसी अन्य को ऐसा करने का आदेश नहीं दिया। यदि वह चाहते तो उनकी आज्ञा का पालन करना पड़ता।
अकेले शमशान में जाकर पेड़ से शब उतारकर , उसे अपने कंधे पर लाद कर , उसकी सारी बाते सुनने की सामर्थ्य कितने लोगो में होती है। सोच कर देखिये। अंत में बेताल ने राज खोला-' वह साधु सही मायने में साधु नहीं है। बल्किढोंगी है। वह मुझे यानि अपने सगे भाई को मार चुका है। उसके कारण में बेताल बना हूँ /. अब तुम्हारे द्वारा मुझे अपने सामने पाकर मेरे टुकड़े करके मुझे हवनकुंड में डालेगा। उसके बाद वह तुम्हारी बलि देगा। उससे कैसे बचोगे।'
विक्रमादित्य मौत को इतने पास देखकर भी नहीं घबराया। जब साधु ने उसे सिर झुकाने के लिए कहा तब राजा ने कहा -'मेरी परवरिश इस तरह से हुई है। मुझे किसी के सामने झुकने की आदत नहीं है। पहले जैसा आप चाहते हो मुझे करके दिखाओ उसके बाद में आपके अनुसार करूंगा। '
साधु को उसकी बात ठीक लगी वह जैसे ही झुका राजा ने अपनी तलवार निकाल कर उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी। उसकी बलि से देवी प्रसन्न हो गई। उसे सारी सिद्धियां देकर अंतर्ध्यान हो गई। जिसके कारण राजा में इतने अधिक गुण आ गए जिसके कारण आज भी हजारो बर्षो बाद लोग उन्हें याद करते है।
betal pachhisi
बेताल पच्चीसी
उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की न्यायप्रियता साबित करने के लिए बेताल पच्चीसी की रचना की गई। जब में बचपन में ये कहानियां पड़ती थी तब मुझे इसका अंत समझ नहीं आता था। लेकिन अब मुझे इसका सही मतलब समझ आने लगा।
#SINHASAN BATTISI
सिंहासन बत्तीसी
महान सम्राट विक्रमादित्य आज के कलेंडर से भी पहले हुए थे। लेकिन उस समय का इतिहास किवदंती के रूप में बिखरा हुआ है। लेकिन 11 सदी के राजा भोज के युग में सिंहासन बत्तीसी के माध्यम से विक्रमादित्य के बारे में जानकारी हासिल होती है। उनका पराक्रम, दानवीरता, शूरवीरता और न्यायप्रियता की बराबरी कोई अन्य इंसान कभी नहीं कर सका।
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महान विक्रमादित्य
उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का नाम आप सबने सुना होगा। वह बहुत न्यायप्रिय थे। उनके राज्य में जनता खुशहाल थी। लेकिन ये आज के ग्रिगेरिएन कैलेंडर से पहले हुए है। उन्होंने विक्रम संबत नाम से एक कैलेंडर चलाया था। जिसे हम हिन्दू कलेंडर के नाम से जानते है विक्रम कैलेंडर अंग्रेजी कलेंडर से 57 साल पहले से लागु हो गया था। यानि आज का कैलेंडर सं 2022 दिखा रहा है तो विक्रम संबत में 2079 का समय होगा।
विक्रमादित्य का समय जीजस से पहले का था। ये केवल कहानी नहीं है। बल्कि इसके सबूत इतिहास में दिखाई देते है। विक्रमादित्य इतने प्रसिद्ध राजा थे कि बाद के 14 राजाओ ने इसे पदवी की तरह इस्तेमाल किया। चन्द्रगुप्त द्वितीय और आखिरी राजा हेमचन्द्र ने अपने नाम के साथ विक्रमादित्य जोड़ा था। आज कुछ लोग इसे सच्चाई के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते। लेकिन इनकी न्यायप्रियता के सभी कायल है।
विक्रमादित्य के पिता का नाम गंधर्वसेन था। जिनकी शक राजाओ ने हत्या कर दी। बाद में विक्रमादित्य ने अपने पिता की हत्या का बदला लिया था। उनके भाई का नाम भतृहरि था। वह एक प्रसिद्ध राजा हुए है। भतृहरि के वैराग्य लेने के बाद विक्रमादित्य ने उनके राज्य की शासन व्यवस्था भी अच्छे तरीके से संभाली थी।
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उज्जैन में घूमने के साधन
उज्जैन छोटा शहर है। उसमे घूमने की जगह ज्यादा नहीं है। लेकिन अपने मंदिरो के कारण विशेषकर महाकालेश्वर मंदिर के कारण लोग उज्जैन आते है। उज्जैन के लिए गाड़ियां सभी स्थानों से आती है। बसे भी हर स्थान से उज्जैन आने के लिए मिल जाएँगी। इसलिए आपको वहां पहुंचने में दिक्क्त का सामना नहीं करना पड़ेगा।
यदि आप हवाईजहाज से आना चाहते है तब आपको इंदौर के एयरपोर्ट पर उतरना होगा। वहां से केवल डेढ़ घंटे में आप किसी भी वाहन से उज्जैन पहुंच सकते है। आपको उज्जैन में घूमने के लिए कार ,बस और दोपहिया वाहन हर तरह की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। आपको बस अपनी हैसियत के हिसाब से जेब खाली करनी पड़ेगी।
उज्जैन में किराये के दोपहिया वाहन मिल जाते है। कुछ रुपया देकर आप उसे 24 घंटे के लिए ले सकते है। उसपर दो लोग आराम से अपनी जरूरत मुताबिक पेट्रोल डलवाकर कही भी घूमने का कार्यक्रम बना सकते है। यह मुझे सस्ता और समय बचाने का साधन लगता है।
उस स्थान पर जाने के लिए ऑटोरिक्शा भी आसानी से मिल जाते है। उनका किराया भी ज्यादा नहीं होता है। बस थोड़ा ज्यादा बोलते है। उनसे भावताव करने की जरूरत पड़ती है। वहां आने -जाने में आपको दिक्क्त का सामना नहीं करना पड़ेगा।
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उज्जैन का स्वादिष्ट खाना
उज्जैन में पोहा बहुत स्वाद से खाया जाता है। वैसे पोहा अधिकतर भारत का प्रिय भोजन है। उज्जैन में सुबह के समय अधिकतर स्थानों पर पोहा और जलेबी बिकती दिखाई दे जाएगी। आपको सोचकर हैरानी होगी एक तरफ गरिष्ठ जलेबी तो दूसरी तरफ हल्का फुल्का पोहा।
उज्जैन में सुबह के समय लोग कचौरी का नाश्ता करना भी पसंद करते है। कचौरी के साथ आलू की सब्जी की सुगंध हमे दुकान तक खींचे ले जा रही थी। वहां गुलाब जामन भी मुँह में रस भर देते है। मसालेदार कचौरी और सब्जी साथ में मिठास घोलता गुलाब -जामुन क्या बात है।
मध्य प्रदेश में खास -तौर पर वाफ्ले भी मिलते है। यह आटे की गोल लोई होती है। जिसे पहले गर्म पानी में उबाला जाता है। उसके बाद उसे तला जाता है। इसका स्वाद भी निराला होता है साथ में सब्जी खाकर लगता है जैसे दावत का खाना खा लिया है। पेट बहुत समय तक भरा रहता है।
हर प्रदेश में पकोड़ो का नाम और तरीका बदल जाता है। कही बेहद बारीक़ सब्जियां काट कर पकोड़े बनाये जाते है तो कही बिलकुल गोल बड़े -बड़े पकोड़े बनाये जाते है। यहाँ इसे आलू बड़ा कहा जाता है जो मुश्किल से दो खाने पर पेट भर जाता है। इन सब चीजों का स्वाद मन को भाने बाला था।
उत्तर भारत में मिलने वाले सभी तरह के खाने आपको यहां मिल जायेंगे। जिसका स्वाद आपके मन मुताबिक होगा। यहां आपको खाने से सम्बन्धित कोई परेशानी नहीं होगी।
UJJAIN SAFE CITY
उज्जैन का माहौल सुरक्षित
जब भी आप उज्जैन जायेंगे तब आपको भस्म आरती देखने की इच्छा जरूर होगी। बिना भस्म आरती देखे आपको उज्जैन में मजा नहीं आएगा। भस्म आरती के लिए पंक्तियाँ रात एक बजे से लगनी शुरू हो जाती है। जब रात एक बजे से पंक्तियाँ लगती है। तब यात्रियों को रात में रुकना जरूरी हो जाता है। आप रात एक बजे मंदिर में जाने के लिए तभी निकलना पसंद करोगे जब आप सुरक्षित होगे । असुरक्षा के कारण कोई भी रात को बाहर नहीं निकलना चाहेगा। इसलिए रात को निकलने से नहीं डरना चाहिए। आप खुद को सुरक्षित महसूस करेगे।
वहां महाकालेश्वर मंदिर के कारण आसपास रौनक होती है। इस समय अधिकतर भक्त और श्रद्धालु दिखाई देंगे। यहाँ की आबादी ज्यादा नहीं है। आसपास का माहौल ठीक है।
रात में ठहरने से राजनीतिज्ञो को डरना चाहिए। कहा जाता है- जो भी शासक रात के समय उज्जैन में रुकता है। उसकी सत्ता चली जाती है. भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और कर्नाटक के मुख्यमंत्री Y S येदियुरप्पा एक बार रात में उज्जैन में रुके थे। उनकी उसके बाद सत्ता चली गई। उसके बाद कोई भी इस मिथक को तोड़ने की हिम्मत नहीं करता। क्योंकि सत्ता में आना बहुत मुश्किल होता है। इसे छोड़ने का मोह बहुत दुखदाई होता है।
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उज्जैन में बड़े गणेश जी का मंदिर
बड़े गणेश जी का मंदिर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के बहुत पास है। यह अपने बड़े आकर के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इसे देखकर आंखे चकाचौंध हो जाती है। मैंने इतने बड़े आकर के गणेश जी इससे पहले नहीं देखे है। यह सबसे बड़े है। इसको देखकर मन में सपने साकार होने लगते है कि अब हमारी सारी मनोकामना इनकी कृपा से पूरी हो जाएगी
इनके निर्माण के बारे में सुनकर और भी हैरानी होती है कि इन्हे मसालों से बनाया गया है। आपको समझ आया यानि रसोई में इस्तेमाल होने वाले खाने की चीजे । आपने सुना था कभी चावल का माड़ ,चुना ,गुड़ और मेथी जैसे मसालो से मूर्तियां बनाई जाती है। इसे बनाये हुए काफी साल बीत चुके है। तब भी इसमें कोई कमी दिखाई नहीं देती है। इसे देखकर लगता है जैसे अभी इसे बनाया गया है। इसमें निर्माण कला से सम्बन्धित चीजे भी मिलाई गई है। इन्हे मजबूत बनाने के लिए इसमें मसाले डाले गए है। आजके समय में हमे मसाले सुनकर हैरानी होती है हमारे पुराने घर , महल, यहां तक की चीन की दीवार के बनाने में भी चावल के पानी और चूने का इस्तेमाल हुआ है।
इसे बनाने के लिए अधिकतर तीर्थ स्थलों से जल और मिटटी लाई गई है। इस मूर्ति को बनाने में ढाई बर्ष लगा था। यह मूर्ति 18 फीट ऊँची और 10 फ़ीट चौड़ी है मूर्ति में गणेश की सूंड दक्षिण की तरफ है। मूर्ति के माथे पर त्रिशूल और स्वस्तिक बने हुए है
जब महाकालेश्वर मंदिर से बाहर निकलते है तब बाये तरफ यह मंदिर है। अधिकतर लोग इसमें जाकर आत्मिक शांति का अहसास करते है। महाकालेश्वर मंदिर में घूमने के कारण थके हुए शरीर को आराम भी देते दिखाई दे जायेंगे।
इस मंदिर के अंदर जाने पर अन्य देवी -देवताओ की मूर्तियां भी है। श्रद्धालु लोग उनके सामने भी सिर झुकाते है।
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देशांतर और कर्क रेखा का संगम उज्जैन में
भारत में विक्रमादित्य के शासन काल में सम्पूर्ण भारत का समय उज्जैन से तय होता था। ग्रीक ,फ़ारसी ,अरबी और रोमन लोगो ने भारतीय कालगणना से प्रेरणा लेकर ही अपने अपने यहाँ के समय को जानने के लिए अपने तरीके की वेधशालाएं बनाई थी। कैलेंडर निर्धारित किये थे।
प्राचीन भारत की ग्रीनविच यह नगरी देश के मानचित्र में 23. 9 अंश उत्तर अक्षांश एवं 74. 75 अंश पूर्व रेखांश पर समुद्र सतह से लगभग १६५८ फीट ऊंचाई पर बसी है। वर्तमान में ग्रीनविच मान से उज्जैन 23. 11 अंश पर स्थित है। भौगोलिक गणना के अनुसार प्राचीन आचार्यो ने उज्जैन को शून्य रेखांश पर माना जाता है कर्क रेखा भी यही से गुजरती है। देशांतर रेखा और कर्क रेखा यही एक -दूसरे को काटती है।
प्राचीन भारतीय मान्यता के अनुसार जब उत्तरी ध्रुव की स्थति पर 21 मार्च से प्राय 6 मास का दिन होने लगता है प्रथम 3 माह पूरे होते ही सूर्य दक्षिण क्षितिज से बहुत दूर हो जाता है। यह वह समय होता है जब सूर्य उज्जैन के ठीक ऊपर होता है। उज्जैन का अक्षांश व् सूर्य की परम् क्रांति दोनों ही २४ अक्षांश पर मानी गई है सूर्य के ठीक सामने होने की यह स्थिति संसार के किसी और नगर की नहीं है।
स्कंदपुराण के अनुसार महाकालेशवर को कालगणना का प्रव्रतक भी माना गया है प्राचीन भारत की समय गणना का केंद्रबिंदु होने के कारण ही काल के देवता महाकाल है
#Navel of the world
विश्व की नाभिस्थली उज्जैन
भारतीय समय के अनुसार एक दिन और रात सूर्योदय से लेकर अगले दिन तक में पूरा होता है जबकि अंग्रेजी समय अनुसार रात के 12 बजे जबरन दिन बदल दिया जाता है जबकि उस वक़्त उस दिन की रात ही चल रही होती है। समय की यह धारणा अवैज्ञानिक है।
टाइम जॉन को सामान समय क्षेत्र कहते है। दुनिया की घडियो के समय का केंद्र इस समय में ब्रिटेन का ग्रीनविच शहर है। यही से दुनिया की घडियो का समय तय होता है। इंडियन स्टेंडर्ड टाइम भी यही से तय होता है। आज के जमाने में घड़ियाँ स्थानीय स्टेंडर्ड टाइम के अनुसार चलती है। उसी हिसाब से सारे काम होते है। क्या यह जरूरी है कि हर देश में एक ही टाइम जॉन हो ?
19 शताब्दी से पहले भारत में विक्रमादित्य के समय से चले आ रहे समय को सूर्य के मुताबिक तय किया जाता था लेकिन अंग्रेजो ने भारत में सब कुछ बदल दिया। विक्रमादित्य के समय में पूरे भारत का समय उज्जैन से तय होता था। .रोमन कैलेंडर भी भारत के विक्रमादित्य कैलेंडर से ही प्रेरित थे ।
उज्जैन स्थित ज्योतिर्लिंग को महाकाल भी इसीलिए कहा जाता था ,क्योंकि वही से दुनियाभर का समय तय होता था। खगोलशास्त्रियो के अनुसार उज्जैन की भौगोलिक स्थिति विशेष है। यह नगरी पृथ्वी और आकाश की सापेक्षता में ठीक मध्य में स्थित है इसलिए इसे पूर्व के ग्रीनविच के रूप में भी जाना जाता है। इसलिए स्वय जयसिंह ने उज्जैन में कालगणना के लिए जंतर -मंतर का निर्माण करवाया।
वराहपुराण में उज्जैन को शरीर का नाभि देश और महाकालेश्वर को अधिष्ठाता कहा गया है महाकाल की यह नगरी विश्व की नाभिस्थली है।
#ANOTHER NAME FOR UJJAIN IS KUMUDVATI
कुमुद्वती उज्जैन का अन्य नाम
लोमश ऋषि एक बार तीर्थ यात्रा करते हुए उज्जैन पहुंचे तब उन्होंने यहां के तालाब, नदी और पोखरों को कुमुदिनी तथा कमलो से भरे हुए देखा .उन जगहों को देखकर उन्हें लगा मानो धरती अनेक चंद्रो से सजी हुई है। कमल के पत्ते अर्ध चंद्र के सामान लग रहे थे। शिव के माथे पर स्थित चंद्र की शोभा तथा उनसे निकले प्रकाश से यह कुमुदिनी वन सदा खिला रहता था। इसलिए लोमश ऋषि ने इसका नाम कुमुदवती रख दिया। इस नामकरण का कारण यहाँ की आकर्षक प्राकृतिक शोभा रही है।
यहां की जनसंख्या ज्यादा नहीं है। खुले हुए प्राकृतिक स्थान आज भी मन को लुभाने में समर्थ है।
#avantika ya avanti nagari
अवंतिका या अवन्ति नगरी
`अव `-में रक्षणे धातु ,रक्षा करने के अर्थ में प्रयोग होती है। अत: अवंतिका का अर्थ है -`रक्षा करने में समर्थ। `उज्जैनी के सारे नामो में `अवन्ती ` नाम ने अधिक प्रसिद्धि पाई है। संस्कृत ,पाली और प्राकृत साहित्यिक ग्रंथो में उज्जैनी के साथ ही इस नाम का प्रयोग मिलता है। पौराणिक इतिहास के अनुसार हैहय वंश के शासको ने इस राज्य की स्थापना की।
स्कंदपुराण के अवन्ती खंड के 43 अध्याय में अवंतिका नाम पड़ने की कथा नीचे है। पूर्व समय में दैत्यों और देवताओ में युद्ध हुआ। इस युद्ध में देवता हार गए.तब हारे हुए देवो ने मेरु पर्वत पर स्थित विष्णु के पास आश्रय लिया। विष्णु ने उन्हें शक्ति एवं अक्षय पुण्य प्राप्त करने के लिए कुशस्थली नगरी में जाकर रहने को कहा। यहां आने के बाद देवताओ ने अपनी शक्ति दुबारा से प्राप्त की। उसके बाद दैत्यों से युद्ध करके अपना स्वर्ग लोक वापस पाया। उनकी मनोकामना पूरी हुई। तब से प्रसिद्ध हो गया। जो यहाँ आकर रहेगा उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती है।
महाकाल वन में स्थित यह नगरी समस्त कामनाओ को पूरा करने वाली है। यहां प्रत्येक युग में देवता,तीर्थ,औषधि ,बीज तथा सारे जीवो का पालन होता है। यह पूरी सबकी रक्षा करने में सक्षम है। यह पापो से रक्षा करती है।अत : इस काल में इसका नाम अवंतिका या अवन्ति नगरी हो गया।
#ujjain banam kushsthali
उज्जैन बनाम कुशस्थली
स्कंदपुराण के अवन्तिखंड के 42 अध्याय के अनुसार -ब्रह्मा ने सम्पूर्ण संसार को बना दिया। तब संसार की रक्षा का काम विष्णु को सौंप दिया क्योंकि विष्णु जगत के पालनकर्ता है। इस पुरे संसार में विष्णु को रहने के लिए उज्जैन ही सही लगा। तब ब्रह्मा ने इस स्थान को आरामदायक बनाने के लिए कुशो से ढक दिया और विष्णु से यहां रहने की प्रार्थना की.
# ujjain urf kanakshringa
उज्जैनी उर्फ़ कनकश्रृंगा
उज्जैन का एक अन्य नाम कनकश्रृंगा है। इसका मतलब सोने के शिखरों वाली . . कल मेने आपको बताया था। समुद्र मंथन के बाद देवताओ और दैत्यों के बीच 14 रत्नो का बंटवारा इसी नगरी में हुआ था। यहां के लोगो ने सम्पन्न जीवन जिया था। यहां बड़े -बड़े महल बने हुए थे। उन महलो के शिखरों पर सोने के कलश बने हुए थे। उस पर पड़ती सोने की किरणों के कारण पूरी नगरी सोने जैसी जगमगा उठती थी। जिसके कारण इसका नाम कनकश्रृंगा पड़ गया था।
शादी के समय दोनों अलग माहौल से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...
