विक्रमादित्य और राजा भोज
विक्रमादित्य इतने पराक्रमी थे कि उन्होंने 64 योगिनियो में से 32 योगिनियो को अपने नियंत्रण में कर लिया था। 64 योगिनियां साधारण औरते नहीं थी बल्कि सब में विशेष गुण थे। उन्होंने बेताल को भी अपने इशारो पर चलाने का हुनर हासिल कर लिया था। कहा जाता है ये योगिनियां और बेताल उन्हें राज -काज संभालने में मदद किया करते थे। तभी उनके कार्यो में गलतिया नहीं होती थी।
विक्रमादित्य के सिंहासन में ये 32 योगिनियां पुतलियां बनकर विराजमान थी। जो भी उस सिंहासन पर बैठता था। उसमे भी अच्छे गुणों का उदय हो जाता था।
आपने एक टीले पर बैठकर एक गड़रिये के न्याय करने के बारे में सुना होगा। उसकी महिमा जब दूर तक फैली तब राजा भोजराज ने उस गड़रिये को बुलाकर देखा। वह बिलकुल साधारण लगा। लेकिन उस टीले पर बैठते ही उसके काम करने का तरीका बिलकुल बदल जाता था। राजा ने उस टीले को खुदवाकर देखा तब उसके नीचे से सिंहासन निकला।
जब भी राजा भोजराज ने उसपर बैठने की कोशिश की तब वह नाकाम रहा। उसने उसपर बैठने का निश्चय छोड़ दिया। आप सोचकर देखिये विक्रमादित्य कितने गुणी और पराक्रमी रहे होंगे जिन्होंने 32 योगिनियो और बेताल को अपने दास बनने के लिए मजबूर कर दिया। जबकि राजा भोजराज भी प्रसिद्ध राजा रहे है। लेकिन विक्रमादित्य के सामने वे नगण्य थे।
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