#SINHASAN BATTISI

                         सिंहासन बत्तीसी

 

     महान  सम्राट विक्रमादित्य आज के कलेंडर से भी पहले हुए थे। लेकिन उस समय का इतिहास किवदंती के रूप में बिखरा हुआ है। लेकिन 11  सदी के राजा भोज के युग में सिंहासन बत्तीसी के माध्यम से विक्रमादित्य के बारे में जानकारी हासिल होती है। उनका पराक्रम, दानवीरता, शूरवीरता और न्यायप्रियता की बराबरी कोई अन्य इंसान कभी नहीं कर सका। 
     यह सिंहासन एक कुम्हार के बेटे को मिला था। जिसने इसे राजा भोज तक पहुंचा दिया। राजा भोज ने जब भी पूजापाठ करके विधिपूर्वक  इस सिंहासन पर बैठने की कोशिश की तभी एक पुतली राजा विक्रमादित्य के गुणों से जुडी हुई एक कहानी सुना देती थी। जिसके कारण राजा भोज  को विक्रमादित्य से अपनी तुलना करनी  पड़ती  थी ।                राजा भोज कभी भी विक्रमादित्य के सामान गुणों की खान साबित नहीं हो पाते  थे। उनके सारे  उपाय वही  ढेर हो जाते थे। हर पुतली राजा से सम्बन्धित  एक कहानी सुनाती  थी। इस तरह उनके गुणों का बखान करते हुए उन बत्तीस पुतलियों ने बत्तीस कहानी सुनाई। 
      जब राजा भोज ने स्वयं को उस सिंहासन के काबिल नहीं समझा तब उसने जिस स्थान से उसे  निकाला गया  था। वही दफन करने करने के बारे में  सोचा । तब सारी  पुतलियां उस सिंहासन से निकल कर अंतर्ध्यान हो गई। उसके बाद वह सिंहासन कान्तिविहीन हो गया। उसका महत्व भी खत्म हो गया। आज केवल सिंसासन बत्तीसी की कहानी मिलती है। वह कही नहीं मिलता 



 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...