हरसिद्धि माता का भव्य मंदिर
हरसिद्धि देवी का नाम दिल्ली में रहते हुए मैंने कभी नहीं सुना था। उज्जैन में पहली बार सुना तब बहुत अजीव लगा था। लेकिन थोड़ी देर में सब अच्छा लगने लगा। इससे पहले मैंने किसी देवी की केवल गले से ऊपर की मूर्ति नहीं देखी थी। उनका ये रूप अलग लगा। उस मंदिर में कई अन्य छोटे -छोटे मंदिर बने हुए है। लेकिन यह 51 शक्तिपीठ में से एक है। इसकी महत्ता बहुत है।
इन्हे कृष्ण भगवान की कुलदेवी माना जाता है। इस मंदिर में दो दीप स्तम्भ बने हुए। उसे देखकर मुझे शुरू में समझ नहीं आया।ये क्यों बने है। इनका क्या महत्व है। जब शाम चार बजे पहुंची थी। तब कई लोग उस स्तम्भ पर काम कर रहे थे। उस समय उनकी साफ -सफाई का काम चल रहा था। उसे देखकर समझ नहीं आ रहा था ये क्या कर रहे है। आप सोच कर देखिये इस स्तम्भ का कार्य आरती शुरू होने से तीन घंटे पहले शुरू हो जाता है। जबकि आरती शाम 7 बजे शुरू हुई थी। इस मंदिर के 1111 दीपको में तेल डालने के लिए कनस्तर लाये गए थे। सोच कर देखिये इनमे कितना तेल इस्तेमाल होता है
शाम को आरती के समय बहुत सारे लोग इकट्ठे हो गए थे। उस समय माता के दर्शनों के लिए लम्बी पंक्ति लगी हुई थी। वहां पर बहुत सारे गायक भक्तिपूर्वक गायन और वादन कर रहे थे। मैंने पहली वार वाद्य -यंत्रो के साथ डमरू का उपयोग होते सुना था। उसने बहुत अच्छा समा बांध दिया था। मै उसकी मधुरता में खो गई थी।
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