परदुःखहर्ता विक्रमादित्य
विक्रमादित्य हरसिद्धि माता को गुजरात के कोयला गढ़ के बियानी से उज्जैन लाये थे। वियानी के राजा प्रताप सिंह हरसिद्धि माता को अपनी पत्नी बनाना चाहते थे। लेकिन माता तैयार नहीं हुई। उन्होंने कहा -'तेरी पत्नी मेरी परम् भक्त है। इसलिए मै तुझे मार नहीं सकती हूँ। लेकिन तुझे दंड देती हूँ। तू रोज मेरे मंदिर में आएगा और खौलते कड़ाहे में अपनी आहुति देगा। मै तभी तेरी जान बख्शूंगी। '
राजा इसके लिए तैयार हो गया। रोज -रोज ऐसा करने से उसकी हालत ख़राब होती चली गई। इसके बाद वह धीरे -धीरे कमजोर होने लगा। उसके लिए ये सब सहना बहुत मुश्किल था।
जब विक्रमादित्य प्रताप सिंह से मिले तब उनकी दुर्दशा देखकर बहुत दुखी हुए । उन्होंने मन में सोचा अब इसे मुक्ति मिलनी चाहिए। वह अगले दिन प्रताप सिंह के उठने से पहले मंदिर पहुंच गए। उससे पहले उन्होंने अपने शरीर पर चाकू से अनेक घाव बना लिए। उनमे सुगंधित पदार्थ भर लिए थे। जब वह खौलते कड़ाहे में कूदे तब बदबू की जगह हर तरफ खुशबु फ़ैल गयी।
माता उनसे खुश हो गई। उन्होंने वरदान मांगने के लिए कहा - 'तब उन्होंने प्रताप सिंह को श्राप से मुक्त करने के लिए कहा। 'माता ने तथास्तु कहा। माता ने कहा -'अब तुम अपने लिए मांगो। ' तब राजा ने कहा -मै आपकी पूजा करना चाहता हूँ। आप मेरे साथ उज्जैन चलो। ' माता इसके लिए तैयार हो गई। आज भी हरसिद्धि माता का मंदिर गुजरात और उज्जैन दोनों जगह है।
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