बेताल पच्चीसी
उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की न्यायप्रियता साबित करने के लिए बेताल पच्चीसी की रचना की गई। जब में बचपन में ये कहानियां पड़ती थी तब मुझे इसका अंत समझ नहीं आता था। लेकिन अब मुझे इसका सही मतलब समझ आने लगा।
एक राजा और एक न्यायधीश की भूमिका का कितना अधिक महत्व होता है। ये अब अच्छी तरह समझ आने लगा है। किसी की जिंदगी और मौत इनके हाथो में होती है। इसलिए इनका समझदार और जागरूक होना बहुत जरूरी है। विक्रमादित्य की बुद्दिमता का गुणगान करती हुई बेताल पच्चीसी बहुत प्रसिद्ध हुई है। यह प्रिंट मिडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मिडिया हर तरफ छाई हुई है।
एक राजा ढोंगी साधु के शब्दों पर यकीं करके शमशान घाट से मुर्दे को कंधे पर लेकर चलता है। वह हर बार उसे एक नई कहानी सुनाता है। राजा से कहता है-' तू बोला तो मै चला जाऊंगा।' कहानी सुनाने के बाद राजा से कहता है-' इसका जबाब पता होने पर और न देने पर तेरे सर के टुकड़े हो जायेंगे। 'इसकी धमकी देकर उसे अनेक बार परेशान करता है।
राजा के जबाब देने पर बेताल के बार -बार गायब हो जाने के बाबजूद वह अपना धैर्य नहीं खोता। वह लगातार शमशान में जाकर पेड़ से उसका शब् उतारता रहता है । अंत में बेताल उसके धैर्य के सामने झुक जाता है।
पच्चीस कहनियो के बाद बेताल विक्रमादित्य के साथ उस साधु के पास चला जाता है। जहां उसे पता होता है वह साधु उसके शरीर के दुकड़े करके हवन कुंड में डाल देगा।
वह राजा को पहले से बता देता है। वह साधु उसकी बलि देकर बहुत सारी उपलब्धियां पाना चाहता है। अत : सावधान रहकर काम करना। वह साधु धोखेबाज है। उसने पहले अपने धोखे से उसे मार दिया जबकि वह उसका भाई था। अब वह तुम्हारे माध्यम से सीद्धि प्राप्त करना चाहता है। इसके आगे राजा ने अपनी जान कैसे बचाई यह अगली बार बताएँगे। क्योंकि यह कहानी अब बहुत लम्बी होने लगी है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें