मेरे सह्कर्मी जयपाल जी अलग तरह के इंसान थे । उन्हें देखकर समझ ही नहीं आता था । कि गुस्सेल हे या शांत हे जितना उनके बारे में जानने की कौशिश करती उतनी ही उलझती जाती थी । जितना मुझे उनके बारे में पता चलता पुराना ज्ञान उससे विपरीत होता था । वो देखने में बहुत बूढ़े लगते थे । उनके सारे बाल सफ़ेद हो चुके थे । वो मुँह में बत्तीसी लगाते थे । उनके दो बच्चो की शादी हो चुकी थी । इस हिसाब से मुझे उनकी उम्र ५० के आसपास लगती थी । एक दिन उनकी जन्मतिथि मेरे सामने आई उसे देखकर में हैरान रह गयी उसके हिसाब से वे मुश्किल से ३५ साल के थे । मुझे बहुत हैरानी हुई । मेने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा-" मेरे दांतो में पायरिया हो गया था इसलिए सारे दांत ख़राब हो गए । इससे पहले मैने किसी के दांतो पर पायरिया का असर नहीं देखा था । मेरी छोटी उम्र में शादी हो गयी थी इसलिए बच्चे भी जल्दी हो गए । "
उनका परिवार गाँव में था । वे छूट्टी में गाव जाते थे । बाकि समय शहर में रहते थे । इस बीच उनके दो बच्चो की शादी भी हो चुकी थी । वो बहुत ही हंसमुख थे उन्हें देखकर नहीं लगता था कि वो हमसे ज्यादा बड़े हे बड़ो की तरह कभी गंभीर नहीं दिखते थे । हम उनसे समवयस्क की तरह मजाक करते थे वे कभी बुरा नहीं मानते थे । इसी कारण हम उंन्हे गंभीरता से नहीं लेते थे । हमें वहाँ काम करते हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे । अभी वहाँ सभी का स्वभाव समझने के कौशिश कर रहे थे ।
उन्ही दिनों मेरी बेटी होने वाली थी । उसका सही ढंग से विकास नहीं हो रहा था । डॉक्टर के अनुसार मुझे पूरा आराम करना चाहिए था । ये सब सम्भव नहीं हो पा रहा था । मेने सहकर्मियों से इस विषय पर बात की । उन दिनों परीक्षा चल रही थी । वे मुझसे सहयोग करने के लिए तैयार हो गए । मेने अपने पेपर जब मेरे नाम से इशू किये जा रहे थे । मेने उन अद्यापिकाओ के नाम लिखवा दिए जो मेरी सहायता करने के लिए तैयार थी । उनकी भलमनसाहत देखकर खुशी हो रही थी । ऐसा नहीं था कि में काम से बचने का बहाना बना रही थी बल्कि डॉक्टरों के अनुसार अगर मैने अब भी आराम नहीं किया तो माँ या बच्चे में से कोई एक ही बचेगा । ये सोचकर मुझे डर लगता रहता था । "यदि में मर गयी तो मेरी बड़ी बेटी को कौन देखेगा ,उसका क्या होगा । "उन दिनों प्रसब के लिए तीन महीने की छुट्टी मिलती थी । मेरे बच्चो की देखभाल के लिए कोई नहीं था । इसलिए में पुरे समय तक विद्यालय जा रही थी । ताकि बच्चे की देखभाल तीन महीनो तक तो कर सकू । मुझे पांच बण्डल मिलने थे । पर मेने अपने नाम से सिर्फ तीन बण्डल ही इशू करबाए । मुझे लग रहा था यदि सारे बण्डल मेरे नाम से इशू हुए तो और लोग सहयोग नहीं करेंगे ।
हर इंसान एक जैसा नहीं होता वही महेश नामक अद्यापक अड़ गये -" जितने बण्डल रेखा चेक करेगी उतने ही मै चेक करूंगा ।" प्रधानाचार्या ने उन्हें मेरी तबियत का हवाला दिया पर वो अड़े रहे । मेडम के लिए उन्हें सम्भालना मुश्किल हो गया था । महेश जी उन लोगो में से थे जो अपना आधा काम मुझसे करवा लेते थे मुझे काम करने की आदत थी चलते -फिरते काम कर देती थी मुझे काम करने में कोई परेशानी नहीं होती थी अब में मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से कमजोर हो गयी थी । महेश जी अपने तीन बण्डल मैडम के सामने रख कर चले गए । में उन बंडलों को उठा कर स्टाफ रूम में आ गयी । जो आंसू मेडम के सामने नहीं बहे थे । वे आंसू अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे ।
इतने में जयपाल जी वहाँ आये उन्होंने कहा -" चिंता मत करो में तुम्हारे बण्डल चैक कर दूंगा । "में आज भी उनका अहसान नहीं भूल पाँति हूँ । मेरे बुरे वक्त मै उनका काम आना मुझे आज भी उनकी याद दिला जाता है ।
उस वाकये के बाद में स्वस्थ होकर वापस आ गयी उसके बाद में महेश जी का सामना नहीं करती थी क्योंकि वे काम को लेकर मुझे ढूंढ़ते थे । पर मेने भी कसम खा ली थी कि में इनका काम कभी नहीं करूंगी । ऐसे ही वक्त बीतता जा रहा था । महेश जी मुझसे बहुत बड़े थे । उन्हें मै पलट कर जबाब तो नहीं दे सकती थी । इसलिए उनके सामने नहीं आती थी ।
जब महेश जी की सेवानिवृति की पार्टी हो रही थी उन्होंने कहा - "रेखा आज भी कही छिप कर बैठी होगी । मेरे सामने नहीं आएगी ।" दूसरे लोगो को मेरी हंसी सुनाई दी में उस दिन भी कुछ नहीं बोली । में ऐसे ख़ुशी के मौके पर गलत शब्द बोलकर उनका अपमान करना नहीं चाहती थी पर बुरे वक्त का उनका व्यवहार में आज भी भुला नहीं पाती हूँ । पर महेश जी के बारे में सोचकर लगता हे कि कोई इंसान इतना आलसी और स्वार्थी क्यों होता है । कि कोई इंसान उसके सामने आना ही ना चाहे । जयपाल जी का सद्व्यवहार मुझे आज भी लोगो की मदद करने के लिए उत्साह से भर देता हे । में उनका उपकार आज भी नहीं भुला पाती हूँ ।
उनका परिवार गाँव में था । वे छूट्टी में गाव जाते थे । बाकि समय शहर में रहते थे । इस बीच उनके दो बच्चो की शादी भी हो चुकी थी । वो बहुत ही हंसमुख थे उन्हें देखकर नहीं लगता था कि वो हमसे ज्यादा बड़े हे बड़ो की तरह कभी गंभीर नहीं दिखते थे । हम उनसे समवयस्क की तरह मजाक करते थे वे कभी बुरा नहीं मानते थे । इसी कारण हम उंन्हे गंभीरता से नहीं लेते थे । हमें वहाँ काम करते हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे । अभी वहाँ सभी का स्वभाव समझने के कौशिश कर रहे थे ।
उन्ही दिनों मेरी बेटी होने वाली थी । उसका सही ढंग से विकास नहीं हो रहा था । डॉक्टर के अनुसार मुझे पूरा आराम करना चाहिए था । ये सब सम्भव नहीं हो पा रहा था । मेने सहकर्मियों से इस विषय पर बात की । उन दिनों परीक्षा चल रही थी । वे मुझसे सहयोग करने के लिए तैयार हो गए । मेने अपने पेपर जब मेरे नाम से इशू किये जा रहे थे । मेने उन अद्यापिकाओ के नाम लिखवा दिए जो मेरी सहायता करने के लिए तैयार थी । उनकी भलमनसाहत देखकर खुशी हो रही थी । ऐसा नहीं था कि में काम से बचने का बहाना बना रही थी बल्कि डॉक्टरों के अनुसार अगर मैने अब भी आराम नहीं किया तो माँ या बच्चे में से कोई एक ही बचेगा । ये सोचकर मुझे डर लगता रहता था । "यदि में मर गयी तो मेरी बड़ी बेटी को कौन देखेगा ,उसका क्या होगा । "उन दिनों प्रसब के लिए तीन महीने की छुट्टी मिलती थी । मेरे बच्चो की देखभाल के लिए कोई नहीं था । इसलिए में पुरे समय तक विद्यालय जा रही थी । ताकि बच्चे की देखभाल तीन महीनो तक तो कर सकू । मुझे पांच बण्डल मिलने थे । पर मेने अपने नाम से सिर्फ तीन बण्डल ही इशू करबाए । मुझे लग रहा था यदि सारे बण्डल मेरे नाम से इशू हुए तो और लोग सहयोग नहीं करेंगे ।
हर इंसान एक जैसा नहीं होता वही महेश नामक अद्यापक अड़ गये -" जितने बण्डल रेखा चेक करेगी उतने ही मै चेक करूंगा ।" प्रधानाचार्या ने उन्हें मेरी तबियत का हवाला दिया पर वो अड़े रहे । मेडम के लिए उन्हें सम्भालना मुश्किल हो गया था । महेश जी उन लोगो में से थे जो अपना आधा काम मुझसे करवा लेते थे मुझे काम करने की आदत थी चलते -फिरते काम कर देती थी मुझे काम करने में कोई परेशानी नहीं होती थी अब में मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से कमजोर हो गयी थी । महेश जी अपने तीन बण्डल मैडम के सामने रख कर चले गए । में उन बंडलों को उठा कर स्टाफ रूम में आ गयी । जो आंसू मेडम के सामने नहीं बहे थे । वे आंसू अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे ।
इतने में जयपाल जी वहाँ आये उन्होंने कहा -" चिंता मत करो में तुम्हारे बण्डल चैक कर दूंगा । "में आज भी उनका अहसान नहीं भूल पाँति हूँ । मेरे बुरे वक्त मै उनका काम आना मुझे आज भी उनकी याद दिला जाता है ।
उस वाकये के बाद में स्वस्थ होकर वापस आ गयी उसके बाद में महेश जी का सामना नहीं करती थी क्योंकि वे काम को लेकर मुझे ढूंढ़ते थे । पर मेने भी कसम खा ली थी कि में इनका काम कभी नहीं करूंगी । ऐसे ही वक्त बीतता जा रहा था । महेश जी मुझसे बहुत बड़े थे । उन्हें मै पलट कर जबाब तो नहीं दे सकती थी । इसलिए उनके सामने नहीं आती थी ।
जब महेश जी की सेवानिवृति की पार्टी हो रही थी उन्होंने कहा - "रेखा आज भी कही छिप कर बैठी होगी । मेरे सामने नहीं आएगी ।" दूसरे लोगो को मेरी हंसी सुनाई दी में उस दिन भी कुछ नहीं बोली । में ऐसे ख़ुशी के मौके पर गलत शब्द बोलकर उनका अपमान करना नहीं चाहती थी पर बुरे वक्त का उनका व्यवहार में आज भी भुला नहीं पाती हूँ । पर महेश जी के बारे में सोचकर लगता हे कि कोई इंसान इतना आलसी और स्वार्थी क्यों होता है । कि कोई इंसान उसके सामने आना ही ना चाहे । जयपाल जी का सद्व्यवहार मुझे आज भी लोगो की मदद करने के लिए उत्साह से भर देता हे । में उनका उपकार आज भी नहीं भुला पाती हूँ ।
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