नेहा दुःख से बेजार हुई जा रही थी उसे सम्भालना मुश्किल हो रहा था हर समय उसके मुँह पर ये ही शव्द होते थे । " भगवान क्या सारे दुःख मेरे लिए ही रख रखे हे । कब आपका पेट भरेगा मुझे दुःख दे देकर ।" उसके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे । बच्चे अभी बहुत छोटे थे । उन्हें मॉ को सम्भालना नहीं आता था । वो भी माँ के पास बैठ कर रोते रहते । ऐसे ही दिन बीत रहे थे ।
समय हर जख्म को भर देता हे समय के साथ नेहा ने भी समझोता कर लिया । जाने वाले कभी वापस नहीं आते । बच्चे माँ से पूछते -" पापा कहाँ गए । " नेहा के लिए उन्हें समझाना मुश्किल हो जाता । नेहा उन्हें कैसे समझाए कि पापा के दिल की धरकन थे तुम दोनों , तुम्हारे लिए उन्होंने कितनी मनोतिया मांगी थी तब जाकर तुम्हारा मुँह देख पाए थे । जब बच्चे समझदार हुए पापा के प्यार का मतलब समझने के काबिल हुए तब उनसे पापा ही छीन लिए गए । ऐसे ही समय के लिए कहा जाता है -"जब दांत थे तब चने नहीं थे अब चने हे तो दांत नहीं हे ।
समय अपनी रफ़्तार से चला जा रहा था । अब बच्चो की पढ़ाई पूरी हो गयी थी नम्रता शादी लायक हो गयी थी पर नेहा को उसकी शादी से डर लगता था । जैसे "दूध का जला छाछ को भी फूंक -फूंक कर पीता हे ।"नेहा का भी वही हाल था । इस कारण उसने बेटी की शादी ३० साल की उम्र में की । कुछ दिन तो सुख से जीवन गुजार ले । बहुत मेहनत से उसने राकेश का चयन किया । राकेश बहुत सुंदर व्यवसायी हे । उसकी तरफ हर कोई आकर्षित हो जाता था । उसकी उम्र नम्रता से एक साल कम थी पर राकेश गुणों की खान था । राकेश छोटी उम्र में ही बहुत अच्छा व्यवसाय चला रहा था । उन्होंने फ़रवरी में शादी पक्की की पर राकेश ने कहा -" में नम्रता को नए मकान में ले जाना चाहता हूँ । वह अप्रैल तक पूरा हो जाएगा । मेँ तभी शादी करना चाहता हूँ । "नेहा को कोई एतराज नहीं था उन्होंने अप्रैल की शादी तय कर दी ।
शादी के सारे इंतजाम बहुत अच्छे थे । नेहा ने अपनी जिंदगी की सारी पूंजी नम्रता की खुशियो पर कुर्बान कर दी थी । नेहा नम्रता में ही अपनी खुशिया ढूंढ रही थी । शादी भलीभांति निवट गयी । हर कोई खुश था । नेहा जब भी किसी से मिलती उसकी जबान पर ये ही शब्द होते - "मेरे दामाद को देखा, केसा लगा । लाखो में एक हे । उसके जितना सुंदर लड़का नही मिलेगा । " सच में राकेश लाखो में क्या सुंदरता में तो करोड़ो में एक था नेहा का अपने दामाद पर गर्व करना उचित ही था । नेहा की बेटी की जिम्मेदारी पूरी हो गयी थी अब उसने राहत की साँस ली । इस तरह नेहा अब बेटे की पढ़ाई की तरफ ध्यान देने लगी ।
समय हर जख्म को भर देता हे समय के साथ नेहा ने भी समझोता कर लिया । जाने वाले कभी वापस नहीं आते । बच्चे माँ से पूछते -" पापा कहाँ गए । " नेहा के लिए उन्हें समझाना मुश्किल हो जाता । नेहा उन्हें कैसे समझाए कि पापा के दिल की धरकन थे तुम दोनों , तुम्हारे लिए उन्होंने कितनी मनोतिया मांगी थी तब जाकर तुम्हारा मुँह देख पाए थे । जब बच्चे समझदार हुए पापा के प्यार का मतलब समझने के काबिल हुए तब उनसे पापा ही छीन लिए गए । ऐसे ही समय के लिए कहा जाता है -"जब दांत थे तब चने नहीं थे अब चने हे तो दांत नहीं हे ।
समय अपनी रफ़्तार से चला जा रहा था । अब बच्चो की पढ़ाई पूरी हो गयी थी नम्रता शादी लायक हो गयी थी पर नेहा को उसकी शादी से डर लगता था । जैसे "दूध का जला छाछ को भी फूंक -फूंक कर पीता हे ।"नेहा का भी वही हाल था । इस कारण उसने बेटी की शादी ३० साल की उम्र में की । कुछ दिन तो सुख से जीवन गुजार ले । बहुत मेहनत से उसने राकेश का चयन किया । राकेश बहुत सुंदर व्यवसायी हे । उसकी तरफ हर कोई आकर्षित हो जाता था । उसकी उम्र नम्रता से एक साल कम थी पर राकेश गुणों की खान था । राकेश छोटी उम्र में ही बहुत अच्छा व्यवसाय चला रहा था । उन्होंने फ़रवरी में शादी पक्की की पर राकेश ने कहा -" में नम्रता को नए मकान में ले जाना चाहता हूँ । वह अप्रैल तक पूरा हो जाएगा । मेँ तभी शादी करना चाहता हूँ । "नेहा को कोई एतराज नहीं था उन्होंने अप्रैल की शादी तय कर दी ।
शादी के सारे इंतजाम बहुत अच्छे थे । नेहा ने अपनी जिंदगी की सारी पूंजी नम्रता की खुशियो पर कुर्बान कर दी थी । नेहा नम्रता में ही अपनी खुशिया ढूंढ रही थी । शादी भलीभांति निवट गयी । हर कोई खुश था । नेहा जब भी किसी से मिलती उसकी जबान पर ये ही शब्द होते - "मेरे दामाद को देखा, केसा लगा । लाखो में एक हे । उसके जितना सुंदर लड़का नही मिलेगा । " सच में राकेश लाखो में क्या सुंदरता में तो करोड़ो में एक था नेहा का अपने दामाद पर गर्व करना उचित ही था । नेहा की बेटी की जिम्मेदारी पूरी हो गयी थी अब उसने राहत की साँस ली । इस तरह नेहा अब बेटे की पढ़ाई की तरफ ध्यान देने लगी ।
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