sidhapan

      रैना अपने घर में राजी ख़ुशी से रहने लगी । वहाँ उसकी एक बेटी ने जन्म लिया । वह उसके लाड़ -प्यार में सब कुछ भूल गयी । अब उसके जीवन में सिर्फ खुशिया ही खुशियाँ  थी । रैना ने B.A  B.ed  तक पढ़ाई कर रखी थी । इन्ही दिनों अद्यापक की नौकरी के फार्म निकले । रेना ने भी आवेदन कर दिया उसका चयन हो गया । अब उसके जीवन में दोहरी ख़ुशी आ गयी थी ।
          रैना विद्यालय में जब आई वहाँ हर तरफ पुरुषो को देखकर घबरा गयी । उसने वहाँ रुकने से मना  कर दिया .। उसे समझाया गया  यहाँ महिलाये भी नौकरी करती है । लेकिन उसने साफ मना कर दिया । तब एक महिला अद्यापिका  को बुलाया गया  । उसे देखकर उसकी घबराहट कम हुइ । तब वह वहाँ नौकरी करने के लिए तैयार हुई । वरना उसने नौकरी ना करने तथा  घर वापिस जाने का मन बना लिया था ।
          रैना बहुत खुशमिजाज औरत थी । हमेशा खुद भी हंसने की कोशिश करती  रहती थी । दुसरो को भी खुश देखना चाहती थी । उसे किसी का मन दुखाना अच्छा नहीं लगता था । रेना बहुत पतली थी पतली होने का उसे एहसास था पर पतली होने के कारण अपने पतले पने पर भी अनेक चुटकले सुना देती थी । हम हैरान रह जाते कोई अपने ऊपर भी इस तरह हंस सकता है ।
      कुछ लोगो के अच्छे दिन अधिक नही होते । उसके  जीवन में एक महिला ने प्रवेश किया वह उस विद्यालय में प्रधानाचार्या बन कर आई  थी ।   वह  उसके सीधे पन  को समझ नही पाई । रेना की  उम्र कम थी नई नौकरी के कारण अनुभव भी कम  था । जब कोई काम करती उसमे कमी रह जाती । गलती होने पर डांट पड़ जाती । हमेशा सही करने की कोशिश करने पर भी गलती रह जाती । दिनों -दिन उसका आत्मविश्वास कम होता जा रहा था । उसकी हंसी भी गायब होती जा रही थी । किस्मत की बात ही कहेँगे जिस गलती पर दुसरो को कुछ नही कहा जाता था वह गलती भी उसकी पकड़ में आ  जाती थी  उस गलती पर उसे अच्छी तरह डांट पड़ जाती । उसका हर काम मेडम अच्छी तरह देखती थी । वो इतनी सीधी थी जब उसे डांट  पड़ती।  तब जिस अद्यापिका की तरह उसने काम किया होता या जिसकी सहायता ली होती डांट पड़ने पर उसका भी नाम ले लेती, किस्मत देखिये उस पर भी दुसरी अद्यापिका को डांटने की जगह उसे दुगनी डांट पड  जाती कई बार उसके सीधे पन  पर हमें हंसी भी बहुत आती  थी ।
       रैना के अंदर निराशा भर्ती जा रही थी । प्रधानाचार्या  के सामने जितना उसके बारे में कहने की कोशिश करते उतना ही उसका मन रैना के खिलाफ होता जाता था । समझ ही नही आता था इस उलझन को कैसे सुलझाया जाए । सभी को रेना से हमदर्दी थी  जितना मेडम के सामने उसका पक्ष रखते वह उतना ही चिढ़  जाती थी । कई बार जिंदगी में विपरीत लोग मिल जाते हे जिन्हे कुछ भी समझाना मुश्किल होता हे । रैना  निराशा में डूबती जा रही थी । अब वह थोड़ी समझदार होती जा रही थी इतना होने पर भी डटकर तनाव का सामना कर रही थी । मन को कौन समझाए उसका मन उसके नियंत्रण में नही था । रस्ते में चलते -चलते विचारो में इस तरह खो जाती की बीच सड़क पर चलने लगती किसी दूसरे के टोकने पर उसे होश आता । तब आस -पास  चलती हुई गाड़ियों को देखकर डर  जाती । उसे देखकर लगता भगवान हर किसी को मानसिक रूप से सक्षम नही बनाता । उनका ध्यान दुसरो को रखना पड़ता हे तभी वे जिन्दा रह पाते  है ।
























ब.









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