svasthy

                   राकेश उस की हर ख़ुशी और जरूरत का ध्यान रखता था । उसकी इच्छा पैदा होते ही पूरी करने की कौशिश करता था । उसकी दुनिया नम्रता तक सिमित हो गयी थी । कई बार राकेश का मजाक भी बन जाता । उसके दोस्त और मिलने बाले उसे "जोरू का गुलाम  कहने लगे थे।"  पर उसे किसी की परवाह नही थी । नम्रता उसे दुनियादारी समझाने की कौशिश करती तब राकेश कहता -"लोग जलते हे इसलिए ऐसे कह रहे हे ।" नेहा भी राकेश पर ज्यादा दबाब नही बना पाती थी ।  नेहा के जीवन में खुशियो ने नए रंग दिखाने शुरू कर दिए थे । नेहा के घर में नए जीव आने के लक्षण दिखाई देने लगे । राकेश मानो ख़ुशी से पागल  हो गया  था । अब वह नम्रता को हाथो पर ही रखता उसे हर काम करने  से रोकने की कौशिश करता । राकेश हमेशा कहता -  "कुछ काम करने की जरूरत नही हे  । मै सारे काम कर लूंगा तुम आराम करो । " अब राकेश बाहर और घर दोनों जिम्मेदारी ख़ुशी से पूरी करता । उसके चेहरे पर रौनक दिखाई देने लगी थी । नम्रता के जीवन में चारो तरफ खुशिया थी । नेहा को लगता इसी ख़ुशी की तलाश उसे हमेशा से थी । नेहा नम्रता को देखकर अपने सारे गम भूल गयी थी ।
           नेहा की बेटी के जीवन में सुख अधिक दिन तक नहीं रहा ।राकेश की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी । कार बुरी तरह क्षति ग्रस्त हो गयी थी । उसमे से राकेश को मुश्किल से निकाल सके । अस्पताल में राकेश को १० दिन तक होश ही नही आया । डॉक्टरों ने भी उम्मीद छोड़ दी थी । 11 दिन बाद राकेश ने अपनी आँखे खोली । सभी के चेहरे पर ख़ुशी आ गयी । सभी को अचम्भा लग रहा था । धीरे -धीरे राकेश का स्वास्थ्य सम्भलने लगा । लेकिन ज्यादा अंतर नही आ  रहा था । लेकिन राकेश को जीवित देखना ही उनके लिए सौगात से कम नही था । अब तक परिवार ने बहुत दुखो का सामना किया था । एक महीने बाद राकेश को घर ला  सके । पर उसके स्वास्थ्य में ज्यादा अंतर नही आया था । नम्रता राकेश की दिन रात सेवा करती रहती वह बिलकुल भूल गयी थी कि उसे भी आराम की जरूरत हे । राकेश एक साल तक बिस्तर पर रहा । नम्रता अपने सब दुःख भूल कर दिन रात राकेश  के पास ही रहती कही उसे किसी चीज की जरूरत पड  जाए तो कौन पूरी करेगा ।
              इसी बीच नम्रता के घर एक नन्ही परिधि  ने जन्म लिया । नम्रता अब दो हिस्सों में बट  गयी थी कभी परिधि तो कभी राकेश की जिम्मेदारी पूरी करते -करते उसे पता ही नही चलता था कब रात हो गई । अब राकेश सहारे से चलने लगा था । पर पूरी तरह से आत्मनिर्भर नही था । । नम्रता को काफी सारे काम राकेश के करने पड़ते थे । राकेश जैसे कर्मठ इंसान को हालात   ने बिस्तर का  कैदी बना दिया था । वह बाहर निकल कर काम करने के लिये कसमसाता रहता था । डॉक्टर के अनुसार -"अब वह जिम्मेदारी वाले काम करने में समर्थ नहीं था । थोड़ा कम मेहनत वाला काम ही कर सकता था ।
         नम्रता को ही परिवार के काम और पैसे कमाने दोनों जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी । पहले नम्रता को यकीं -न नही आ  रहा था ऐसा उसी के साथ हुआ हे । धीरे -धीरे उसने अपने मन को मजबूत किया क्योंकि राकेश की लम्बी बीमारी में सारी जमा पूंजी खर्च हो गयी थी । अच्छे वक्त में सभी साथ देते हे बुरे वक्त में सब साथ छोड़ देते हे जैसे ही रिश्तेदारो को पता चला राकेश अब कमाने लायक नही रहा तो उन्होंने उनके घर आना ही छोड़ दिया  । नम्रता को केवल नेहा का सहारा था । नेहा भी दुःख सहते -सहते टूटने लगी थी । उसने कभी कल्पना नहीं की थी वह अब तक अपने दुखो से जूझ रही थी अब उसे बेटी के जख्मो पर भी  मरहम लगाना पड़ेगा । नेहा सोचती उसने पिछले जन्म में कितने पाप किये हे जिनका निबटारा नही हो रहा । कब तक वो इन तकलीफो से जूझती रहेगी । अब नेहा 60 साल की हो गयी थी । सुनी आँखों से अँधेरे में देखती रहती और सोचती इसी को जिंदगी कहते है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...