बच्चे खेल-खेल मै ऐसी हरकते कर देते हे कि उनकी जान के लेने के देने पड़ जाए । ऐसी एक हरकत के बारे में अपना अनुभव में आपसे साझा कर रही हूँ । रेशमा जब 8 साल की थी तब उसने अपनी सहेली शिखा से शर्त लगाई कोन अपनी दोनों नाक में सबसे ज्यादा कागज फंसाता है । दोनों ने कागज के छोटे -छोटे टुकड़े किये । दोनों अपनी नाक में उन कागजो को फंसाने लगी । दोनों प्रथम आने की उम्मीद में ज्यादा से ज्यादा कागज फंसाने लगी । एक समय ऐसा आया जब उन्हें साँस लेने में भी दिक्क़त आने लगी । इसपर भी उन्हे रुकना गवारा ना था । दिमाग में सिर्फ प्रथम आने का ख्याल उन्हें ऐसा दुस्साहस करने के लिए प्रेरित कर रहा था । दोनों की हिम्मत जबाब देने लगी दोनों एक दूसरे का मुँह देख रही थी । दूसरी हार माने । इसी जद्दोजहद में दोनों मौत की तरफ आगे बढ़ने से नही रुक रही थी । एक समय ऐसा आया जब दोनों की हिम्मत जबाब दे गयी तब उन्होंने समझोता कर लिया ।
उन्होंने अपनी नाक में से कागज निकालने शुरू किये । धीरे - धीरे कागज निकलने लगे । काफी कागज उन्होंने नाक में से निकाल लिए पर कुछ कागज नाक में उन्होंने जबरदस्ती बहुत अंदर कर दिए थे वे अब निकलने का नाम नही ले रहे थे । अब दोनों को समझ नही आ रहा था क्या करे । उन्हें डर लगने लगा क्या करें ,किसको अपनी मदद के लिए बुलाये जिसे भी मदद के लिए बुलाएँगे वो पहले गुस्सा होगा । डांट भी पड़ेगी । हो सकता है थप्पड़ भी मार दे । उनकी स्थिति सांप -छछूंदर वाली हो गयी थी । उनकी हालत बहुत बुरी हो गयी थी पर डर के कारण रो भी नहीं पा रही थी । हिम्मत करके कागजो को निकालने में लगी रही । काफी सारे कागज निकल गए । पर रेशमा की नाक में एक कागज रह गया था बाकि कागज निकलने के कारण अब वे दोनों बेहतर तरीके से साँस ले रही थी । अब उनकी साँस में साँस आयी ।
एक कागज जो नाक के अंदर फंसा रह गया था । उसके कारण रेशमा की जान सांसत में फंसी हुई थी वह डर के मारे इस मुसीबत को अकेले ही सहन कर रही थी । दो दिन बाद रेशमा को जोर से छींक आई तब वो कागज बाहर आया । अब रेशमा की जान में जान आई । बरसो तक उसने ये बात किसी को नही बताइ । बहुत दिनों बाद उसने अपनी इस बेबकूफी का राज खोला ।
उन्होंने अपनी नाक में से कागज निकालने शुरू किये । धीरे - धीरे कागज निकलने लगे । काफी कागज उन्होंने नाक में से निकाल लिए पर कुछ कागज नाक में उन्होंने जबरदस्ती बहुत अंदर कर दिए थे वे अब निकलने का नाम नही ले रहे थे । अब दोनों को समझ नही आ रहा था क्या करे । उन्हें डर लगने लगा क्या करें ,किसको अपनी मदद के लिए बुलाये जिसे भी मदद के लिए बुलाएँगे वो पहले गुस्सा होगा । डांट भी पड़ेगी । हो सकता है थप्पड़ भी मार दे । उनकी स्थिति सांप -छछूंदर वाली हो गयी थी । उनकी हालत बहुत बुरी हो गयी थी पर डर के कारण रो भी नहीं पा रही थी । हिम्मत करके कागजो को निकालने में लगी रही । काफी सारे कागज निकल गए । पर रेशमा की नाक में एक कागज रह गया था बाकि कागज निकलने के कारण अब वे दोनों बेहतर तरीके से साँस ले रही थी । अब उनकी साँस में साँस आयी ।
एक कागज जो नाक के अंदर फंसा रह गया था । उसके कारण रेशमा की जान सांसत में फंसी हुई थी वह डर के मारे इस मुसीबत को अकेले ही सहन कर रही थी । दो दिन बाद रेशमा को जोर से छींक आई तब वो कागज बाहर आया । अब रेशमा की जान में जान आई । बरसो तक उसने ये बात किसी को नही बताइ । बहुत दिनों बाद उसने अपनी इस बेबकूफी का राज खोला ।
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