रेखा के तीनो बेटो की गृहस्थी बस गयी थी । उनके पास नौकरी और घर दोनों की व्यवस्था हो गयी थी । अब रेखा को लगने लगा वो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर चुकी हे बच्चो को जिंदगी जीने के साधन मिल गए है । उनके बेटे सुरेश को गुडगांव का मकान अच्छा लगने लगा उनके जीवन में सारी सुविधाये आ चुकी थी । गुड़गांव जैसी जगह में सुरेश के लिए मकान खरीदना आसान ना था । अभिभावकों की कृपा से उसे मकान भी मिल गया था ।
हमेशा दिन एक से नही रहते ऐसा सुरेश के साथ हुआ ।एक साल तक सुरेश उस घर में राजी -ख़ुशी से रहा । पड़ोसियों से उसके अच्छे सम्बन्ध हो गए वे एक दूसरे के घर आने-जाने लगे । उसे मकान आसानी से मिल गया था उसके पड़ोसियों ने उसके मकान की क़ीमत जब उसे दुगनी बतायी तो उसे मकान से ज्यादा वो पैसे अच्छे लगने लगे । सुरेश चाहने लगा मकान बेचकर उसे उसके पैसे दे दिए जाए ।सुरेश ने माँ से कहा -" माँ उस मकान को बेच दो उसके दुगने पैसे मिल रहे है । हम किराये के मकान में रह लेंगे ।" रेखा ने दुनिया देखी थी उसे पता था ऐसा कभी भी हो सकता है । इसलिए रेखा ने गुड़गांव का मकान अपने नाम से लिया था । बेटे को सिर्फ उसमे रहने का अधिकार था । बेचने का अधिकार उसे नही दिया था । बेटा जब भी रेखा से मिलता - मकान बेचने की बात करता । रेखा का मन टूट जाता । वो उसको समझाने की बहुत कोशिश करती पर बेटा अपनी बात पर अड़ा रहता । रेखा उसके व्यवहार से दुखी रहने लगी ।
जवानी के जोश में सुरेश नहीं समझ पा रहा था । मकान की कीमत जिस तरह से बड़ रही हे ।यदि अब मकान बेच दिया तो आने वाले समय में मकानो की कीमत उसी हिसाब से बढ़ती जाएगी । पैसे उतनी जल्दी नही बढ़ेंगे । रेखा की सोच और बेटे की सोच में यही अंतर था । ये बात रेखा के लिए बेटे को समझाना बहुत मुश्किल हो गया था बेटे ने गुस्से में आकर माँ से बात करना बंद कर दिया था । रेखा अपने पति से अक्सर पूछती - "आप ही बताओ मेने ऐसी क्या गलती कर दी जो सुरेश बात नही करता । में उसका भला सोच रही हूँ ना की इसमें मेरा भला हे ।" यही जवानी और बुढ़ापे में अंतर होता है । सुरेश जवानी के जोश में भविष्य नही देख पा रहा था । बड़ो को स्वार्थी समझने लगा था । बड़े बच्चो को सबकुछ देने के बाद भी उनके प्यार को तरसते रह जाते है ।
रेखा से मिलने सुरेश गुस्से के कारण नही आता था । सुरेश नही समझ पा रहा था उसे माँ की जरूरत कदम-कदम पर पड़ेगी । अभी उसकी जिंदगी की शुरुरात हे । जिंदगी मै बहुत काम ऐसे आएंगे जब उसे बड़ो की जरूरत पड़ेगी यदि उस वक्त माँ ने गुस्सा दिखाया और आने से मना कर दिया तब उसे केसा लगेगा । उनकी माँ आत्मनिर्भर हे उनके ऊपर आश्रित नही हे । काफी समय बाद सुरेश का गुस्सा शांत हो गया । वह पहले की तरह माँ से मिलने आने लगा । अब रेखा भी खुश रहने लगी । माँ का मन बच्चो के बिना अशांत रहता है । बच्चे चाहे कितने भी बड़े हो जाए ।
हमेशा दिन एक से नही रहते ऐसा सुरेश के साथ हुआ ।एक साल तक सुरेश उस घर में राजी -ख़ुशी से रहा । पड़ोसियों से उसके अच्छे सम्बन्ध हो गए वे एक दूसरे के घर आने-जाने लगे । उसे मकान आसानी से मिल गया था उसके पड़ोसियों ने उसके मकान की क़ीमत जब उसे दुगनी बतायी तो उसे मकान से ज्यादा वो पैसे अच्छे लगने लगे । सुरेश चाहने लगा मकान बेचकर उसे उसके पैसे दे दिए जाए ।सुरेश ने माँ से कहा -" माँ उस मकान को बेच दो उसके दुगने पैसे मिल रहे है । हम किराये के मकान में रह लेंगे ।" रेखा ने दुनिया देखी थी उसे पता था ऐसा कभी भी हो सकता है । इसलिए रेखा ने गुड़गांव का मकान अपने नाम से लिया था । बेटे को सिर्फ उसमे रहने का अधिकार था । बेचने का अधिकार उसे नही दिया था । बेटा जब भी रेखा से मिलता - मकान बेचने की बात करता । रेखा का मन टूट जाता । वो उसको समझाने की बहुत कोशिश करती पर बेटा अपनी बात पर अड़ा रहता । रेखा उसके व्यवहार से दुखी रहने लगी ।
जवानी के जोश में सुरेश नहीं समझ पा रहा था । मकान की कीमत जिस तरह से बड़ रही हे ।यदि अब मकान बेच दिया तो आने वाले समय में मकानो की कीमत उसी हिसाब से बढ़ती जाएगी । पैसे उतनी जल्दी नही बढ़ेंगे । रेखा की सोच और बेटे की सोच में यही अंतर था । ये बात रेखा के लिए बेटे को समझाना बहुत मुश्किल हो गया था बेटे ने गुस्से में आकर माँ से बात करना बंद कर दिया था । रेखा अपने पति से अक्सर पूछती - "आप ही बताओ मेने ऐसी क्या गलती कर दी जो सुरेश बात नही करता । में उसका भला सोच रही हूँ ना की इसमें मेरा भला हे ।" यही जवानी और बुढ़ापे में अंतर होता है । सुरेश जवानी के जोश में भविष्य नही देख पा रहा था । बड़ो को स्वार्थी समझने लगा था । बड़े बच्चो को सबकुछ देने के बाद भी उनके प्यार को तरसते रह जाते है ।
रेखा से मिलने सुरेश गुस्से के कारण नही आता था । सुरेश नही समझ पा रहा था उसे माँ की जरूरत कदम-कदम पर पड़ेगी । अभी उसकी जिंदगी की शुरुरात हे । जिंदगी मै बहुत काम ऐसे आएंगे जब उसे बड़ो की जरूरत पड़ेगी यदि उस वक्त माँ ने गुस्सा दिखाया और आने से मना कर दिया तब उसे केसा लगेगा । उनकी माँ आत्मनिर्भर हे उनके ऊपर आश्रित नही हे । काफी समय बाद सुरेश का गुस्सा शांत हो गया । वह पहले की तरह माँ से मिलने आने लगा । अब रेखा भी खुश रहने लगी । माँ का मन बच्चो के बिना अशांत रहता है । बच्चे चाहे कितने भी बड़े हो जाए ।
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