dard

पिछले दिनों मेरे शरीर में बहुत दर्द था । में अधिकतर अपनी परवाह नही करती हूँ  मै  उस दर्द के साथ सभी काम कर रही  थी । पर मुझे समझ नही आ रहा था । शरीर के हर हिस्से में इतना दर्द क्यों हो रहा है । किसी डॉक्टर के कहने पर मैने  अपना खून चेक करवाया । जिनसे ब्लड टेस्ट करवाया वो हमारी जानपहचान के है । मैने उनसे रिपोर्ट का मतलव पूछा । मेने कई टेस्ट करवाये थे । मुझे उन टेस्टो का मतलव समझ नही आ  रहा था । सभी टेस्टो का मतलव समझाने के बाद उन्होंने कहा -"तुम्हारी ये चीज बड़ी हुई  है । इसके कारण तुम्हारे शरीर में बहुत दर्द हो रहा होगा ।"  मुझे  खुद पता नही था । मै सुनकर हैरान रह गयी ।
           मैने सोचा क्या खाया था जिसके कारण मुझे इतना दर्द हो रहा है । मेने दो दिन पहले कड़ी -चावल खाये थे । जिसका खामियाजा इस  रूप में  मुझे  उठाना पड़ रहा  है । इसके बाद जब भी मुझे इतना भयंकर दर्द होता तब उसका कारण ढूंढने की कोशिश करती तब पता चलता इसमें मेरी ही गलती है । कुछ चीजे मेरे शरीर के मुताबिक नही है जिनको खाते ही में भयंकर दर्द से परेशान हो जाती थी । ऐसी ही कुछ चीजो की सूची  में आपको बता रही हूँ जो शायद आपकी भी  परेशानी का कारण बनती है आप भी यदि ध्यान रखेंगे तो  आप भी परेशानी से बच जाएंगे ।
        मूली ,खट्टी चीजे , दही यदि दिन में खाए तो परेशान नही करता यदि वही खट्टा  दही शाम के समय खाओगे तब मेरी तरह तकलीफ उठाओगे ।  ऐसे ही बहुत ठंडी चीजे नहीं खानी चाहिए । जितना प्राकृतिक चीजे सामान्य तापमान पर प्रयोग करोगे उतना ही तकलीफो से बचे रहोगे । ज्यादा ठन्डे वातावरण में रहने से भी शरीर में बहुत ज्यादा दर्द सहना पड़ता हे  आजकल कूलर और a.c अधिकतर घरो में प्रयोग होता हे उनसे बचना मुश्किल है । उनसे बचने के लिए शरीर के जिस हिस्से में आपको अधिक दर्द महसूस होता है । उस हिस्से को  ढक कर सोये   वरना तकलीफ सहनी पड़ेगी । हम कुछ लोगो को बिलकुल दुरुस्त पाते  है । आप उनका खान -पान  और जीवन जीने के तरीको पर गौर  फरमाये आप खुद देखोगे वो प्रकृति के हिसाब से जीवन जीते  है । बहुत सारी परेशानियों से   बचे रहते है । हमारे आयुर्वेद में खान -पान  का बहुत महत्व है । में उनकी परवाह नही करती थी । यदि आपकी सोच भी ऐसी है । तब आप जब भी बीमार पड़े तब एक या दो दिन पहले क्या खाया था उस पर गौर जरूर करें । उस को बिना खाए आप की तबियत केसी रहती  है इस पर जरूर गौर करे आपकी आधी बीमारी अपने आप ठीक हो जाएंगी ।  

dhamki

          शारदा की शादी माँ ने उससे पूछे बिना तय कर दी थी । शारदा शहर में रहने बाली  लड़की थी उसके सपने आम लड़कियों जैसे थे । सुंदर सा मकान ,पढ़ा -लिखा लड़का जो शहर में रहता हो, उसकी अच्छी आमदनी हो । उसके माँ -बाप ने छोटे शहर अलीगढ़ का लड़का उसके लिए पसंद किया । वह लड़का शारदा को बिलकुल पसंद नही आ रहा था । उसने अपनी माँ से कई बार शादी का विरोध किया । उसके अभिभावक उसकी बात सुनने के लिए तैयार नही होते थे । उसके बड़ो ने उससे कहा -" एक बार तुम श्याम से मिल लो । उसके बाद कहना । तुम्हे वह केसा लगा । बिना देखे उसमे नुक्स मत निकालो ।"उन्होंने दोनों को आपस में मिल सके ऐसा इंतजाम करवा दिया ।
       शारदा को पहले तो श्याम का नाम पसंद नही था । उसपर अलीगढ़ जैसी जगह के बारे में सुनकर उसके होश उड़ गए थे उसे लगता था छोटी जगह पर रहने वालो की सोच भी छोटी होती है । उसे परम्पराओ में बंधा हुआ डरा -सहमा जीवन जीना पड़ेगा वह छोटे परिवार में रहने वाली सबकी लाड़ली थी । उसके दिल में अपने परिवार से बिछड़ने का भी डर  था । उसे लग रहा था । इतनी दूर जाकर उसे अपनी परेशानियों का साथी कहा मिलेगा । सारे बंधू उससे दूर हो जाएगें अभी उसकी शादी की उम्र ज्यादा नही थी । उसके परिवार में जल्दी शादी हो जाती थी । इसलिए उसके अभिभावकों को उसकी शादी की जल्दी हो रही थी ।
       श्याम और शारदा परस्पर मिले तो शारदा को श्याम के विचार अच्छे नही लगे । शारदा ने श्याम से पूछा -" आप काम क्या करते हो । " श्याम ने जबाब दिया -" अभी मैने  काम करने के बारे में सोचा नही है ।" शारदा को बहुत हैरानी हुई । उसने ऐसे इंसान की कल्पना नही की थी जो शादी करने जा रहा है । पर नौकरी के बारे में सोच भी नही रहा ।  अभी ऐसी बहुत जगह है जहाँ बेटे की शादी बाप की हैसियत के हिसाब से हो जाती है । शारदा शहर की लड़की थी ।  उसे ये जबाब बड़ा अटपटा लगा । बाकी का वार्तालाप से वह और भी दुखी हो गयी । जब वह घर वापस आई उसने शादी से साफ मना कर दिया । उसने माँ से कहा -"ऐसे लड़के से तुम मेरी शादी करना चाहती हो जो नौकरी करने के बारे में सोचता ही नही है । शादी के बाद मेरा खर्चा कौन उठाएगा । में ऐसे लापरवाह लड़के से शादी नही करूंगी ।" दिल्ली में रहने वाली लड़कियों के लिए ये अचम्भे  की बात है । उसकी माँ उसे रोज मनाती  -"उसके पिता अच्छी नौकरी में है । उनका मकान बहुत बड़ा है । छोटा परिवार है । समाज में उनकी बहुत इज्जत है । परिवार देखा भाला  है । सभी अच्छे लोग हे ऐसा रिश्ता किस्मत वालो को मिलता है ।" इन सब बातो का शारदा पर कोई प्रभाव नही पड  रहा था । शारदा की माँ को ये रिश्ता बहुत पसंद था । वे अनेक तरह से उसे मनाने की कोशिश करती रहती । किसी तरह शारदा इस रिश्ते के लिए राजी हो जाए ।                      शारदा ज्योतिष के हिसाब से मंगली थी । मंगली होने के कारण उसकी कुंडली किसी  लड़के से मिल नही पा  रही थी । वे शारदा के ग्रहो के ऐसे प्रभाव के कारण निराश होते जा रहे थे । शारदा की माँ ने उसकी शादी के लिए पूजा करनी शुरू कर दी ,मनौती मांगी । किसी तरह उनकी बेटी श्याम से शादी के लिए राजी हो जाए । लेकिन शारदा पर उनकी मिन्नत और मनोतियो का कोई असर नही हो रहा था । इस तरह दो साल बीत गए । हर तरह से उसकी माँ ने उसकी खुशामद की । शारदा किसी तरह शादी के लिए तैयार नही हो रही थी । एक दिन उसकी माँ को शारदा पर गुस्सा आ गया उन्होंने कहा -"तू अपने को समझती क्या है । तू बहुत सुंदर है । तेरा बाप बहुत अमीर है । जिससे चाहेगी उससे तेरी शादी हो जाएगी । " शारदा बोली -"में श्याम से शादी नही करूंगी ।" उसकी माँ बोली - "तेरी रिपोर्ट कार्ड उसे दिखा दूंगी तो वो भी शादी करने से मना कर देगा । तू  इतने कम नंबरों से पास हुई  है ।"शारदा की माँ की धमकी काम आ गयी । इसके बाद शारदा ने शादी का विरोध नही किया । 

STHANANTARN

       रैना के प्रति प्रधानाचार्य का अच्छा व्यवहार नही था । इस कारण रैना का मन उदास रहता था । वह मन लगाकर काम नही कर पाती थी । उसका काम गलत हो जाता था । सभी को उसका अनमना पन  खलता था । रैना की उदासी देखी  नही जाती थी । कुछ लोगो का अपने मन पर नियंत्रण नही होता ।
       हमारे समझाने पर कुछ समय के लिए हंसने लगती थी । पर उसपर जल्दी ही असर खत्म हो जाता था । वह फिर उदास हो जाती । उसकी उदासी हमसे देखी नही जाती थी । स्थानांतरण के लिए उसने और राधा ने फार्म भर दिए । रैना गाजियाबाद में रहती थी । उसने बॉर्डर के पास के विद्यालय के  स्थानांतरण के लिए आवेदन किया । उन दिनों विद्यालय में अद्यापको की कमी थी । इस कारण प्रधानाचार्य नही चाहती थी । कोई अद्यापिका कही और जाये उन्होंने उन दोनों का स्थानांतरण रुकवा दिया । राधा तो अपनी किस्मत पर सब्र करके बैठ गयी । लेकिन रैना के पति को उसका रुकना पसंद नही था । उन्होंने पूरा जोर लगा दिया । जिससे उसका विद्यालय बदल जाए । प्रधानाचार्या उसके कामो से दुखी भी थी ,उसे पसंद भी नही करती थी उसका जाना भी उन्हें गवारा नही था । वे रैना  का दुःख समझ नही पा  रही थी ।
       रैना के पति  राकेश  बहुत संवेदनशील थे । वे प्रधानाचार्य से मिलने आये । उन्होंने उनसे बहुत बहस की पर वो बहुत धाकड़ थी उनपर राकेश के अनुनय विनय का कोई असर नही हुआ । ज्यादा जोर देने पर उन्होंने कहा -"जो तुम्हारे मन में आये करो में उसे यहाँ से नही जाने दूँगी । "राकेश दृढ़ निश्चयी थे । उन्होंने सोच रखा था । "इतनी मुश्किल से रैना का स्थानांतरण करवाने  हुआ  । अब यदि ठहर गया तो सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा । "वे अधिकारियो से मिले उनसे अपनी विपदा  सुनाई । पहले तो अधिकारी तैयार नही हुए । उनका जबाब था -"हम जो कर सकते थे हमने किया । अब आप प्रधानाचार्या से कहो । वे  ही  उसे जाने की इजाजत देगी । " राकेश ने कहा -"यदि वह हमारी बात सुन रही होती तो हम आपके पास क्यों आते । "
        कई दिन तक राकेश अधिकारियो के दफ्तर के चककर लगाते रहे । उन्होंने अपने दफ़्तर से कई छुट्टिया ली । वे अधिकारियो के पास जाने से उकताए नही । अंतत उन्हें रैना की मुश्किल समझ आयी । उन्होंने राकेश को बुलाया और कहा -" तुम्हे देखकर लगता है तुम सच में परेशानी झेल  रहे हो नही तो इतने दिनों तक कोई बारबार नही आता । ये लिखित में आदेश दे रहा हूँ । इसको नकारना मुश्किल है । " इस आदेश को लेकर जब राकेश विद्यालय गये । प्रधानाचार्या ने उन्हें अंदर आने नही दिया । वे बाहर बैठे रहे । जब काफी समय तक राकेश वापस नही गए तब उन्हें अंदर बुलाया गया । राकेश ने अधिकारियो का लिखित आदेश उनके सामने रख दिया । उसे नकारना मुश्किल था । तब प्रधानाचार्या बोली -"तुम जैसा हठी इंसान नही देखा । "उन्होंने रैना  के   स्थानांतरण को मंजूरी दे दी । यदि राकेश जैसा दृढ़ निश्चयी इंसान नही होता तो रैना का स्थानांतरण होना बहुत मुश्किल था । कहते है -" सीधो का भला राम करते है । "इसलिए रैना को कर्मठ राकेश जैसा पति मिल गया । जो उसकी हर मुश्किल को आसान कर देता है । 

bhai -bahan

      रैना बहुत संवेदनशील थी । अब उसे भी दूसरे बच्चे के जरूरत महसूस होने लगी । रैना की  बेटी अब 4  साल की हो गयी थी रेना की बेटी श्वेता दुसरो के भाई -बहन देखकर माँ से जिद करती -"मेरा भाई कहाँ  है । मै किसके साथ खेलू । सभी अपने भाई के साथ खेलते हे । मेरा भाई लाओ । " रैना को भी बेटे की इच्छा होने लगी । उसने अपनी इच्छा के बारे में पति को बताया ।   पति राकेश दूसरे बच्चे के लिए राजी हो गए । रैना और पति  राकेश दूसरे बच्चे के सपने देखने लगे । ।
          कुछ समय बाद रैना के सपनो को सुनहरे पंख मिल गए उसके घर एक सुन्दर से शिशु ने जन्म लिया । अब रैना का घर खुशियो से भर गया था । उसकी बेटी श्वेता अपने भाई रमन से बहुत प्यार करती थी वह उसके सारे काम ख़ुशी -ख़ुशी कर देती थी । उसमे ऊर्जा का संचार हो गया था । अब श्वेता रैना से किसी भी बात के लिए जिद नही करती थी । उसको रमन के रूप में जीता -जागता खिलौना जो मिल गया था | रैना श्वेता के सामने रमन को कभी भी ज्यादा प्यार करने की कोशिश नही करती थी । वह श्वेता को हमेशा कहती -" तेरा भाई रो रहा हे देख क्या हुआ ।"
श्वेता उसका कारण ढूंढने की कोशिश करती और माँ को जाकर बता देती । इस तरह श्वेता समझदार और जिम्मेदार लड़की बनती जा रही थी । उसके मन में भाई के प्रति जलन की भावना पैदा नही हो रही थी । उसके मन में हमेशा रैना ये भावना पैदा करने की कोशिश करती -"तेरा भाई मुझे बहुत तंग करता है मुझे कुछ भी नही करने देता । जब से तेरा भाई हुआ है । मै तेरा सही ढंग  से काम भी नही कर पाती  हूँ । "
      श्वेता जबाब देती -"माँ अब मै बड़ी हो गयी हूँ । में अपने सब काम खुद कर लूँगी । आप बस भाई का ध्यान रखो ।" श्वेता बड़ी और समझदार बहन के सामान रमन का ध्यान रखती थी । जब उसे भाई के रोने का कारण समझ नही आता था । सारे प्रयत्न करने पर भी वह  चुप नही होता था । तब खुद रुआँसी होकर माँ के पास जाकर कहती -" माँ रमन तो चुप ही नही हो रहा ।"तब रैना हाथ का काम छोड़कर आती । और रमन की जरूरत पूरी करती ।रमन चुप हो जाता । ऐसे में श्वेता को बहुत हैरानी होती ये चुप कैसे हो गया ।  कई बार रैना को श्वेता की हालत देखकर हंसी भी आती थी । उसने रमन की जिम्मेदारी श्वेता को सिर्फ इसलिए सौंपी थी की दोनों में जलन पैदा न हो । श्वेता ने उसे दिल से लगा लिया । लेकिन इस कोशिश का परिणाम भी सुखद रहा । दोनों भाई -बहन सदा प्यार और दुलार से रहे । दोनों वक्त आने पर एक दूसरे की ढाल बन जाते थे । बड़े होने पर भी दोनों का परस्पर प्यार बना रहा । कई बार श्वेता माँ से भाई के लिए झगड़ने के लिए भी तैयार हो जाती थी ।
        

dusri beti

           रैना  मन की बहुत अच्छी थी । उससे किसी का दुःख नही देखा जाता था  । वह सभी को खुश देखना चाहती थी । हमारे यहाँ एक नैना नामक औरत  को उसके ससुराल वाले बच्चो के लिए बहुत सुनाते थे । उसकी एक बेटी हो चुकी थी । बेटा नही हुआ था । उन्हें इस बात का संतोष नही था कि जिसकी बेटी शादी के एक साल के बाद हो सकती है । उसका बेटा भी हो सकता है । ससुराल वालो को इस बात का सब्र नही था । उसे अनेक  तरह से प्रताड़ित किया जाता था । जिसके बारे में वह नैना के सामने अपना दर्द व्यान करती थी । रैना को उससे हमदर्दी थी । नैना  की बेटी पालने में उसकी कोई मदद भी नही करता था । उसके लिए बेटी की परवरिश करना ,अपनी पढ़ाई  पूरी करना ,और नौकरी करना बहुत कठिन था । इसलिए वह  अपने सपनो को पूरा करने के लिए दूसरे बच्चे को बुलाने से झिझक रही थी । सारी जिम्मेदारी उसके अकेले के बस की नही थी । उसके सुझाब पर उसने दूसरी बार माँ बनने का विचार किया । किस्मत ने  कुछ और ही सोच रखा था ।
         नैना के घर दूसरी  बार  फिर बेटी ने जन्म लिया । बेटी के पैदा होने पर माँ को दुःख हुआ लेकिन किस्मत को कौन बदल सकता है । नैना ने अपनी किस्मत से समझोता कर लिया । भगवान से कौन लड़ सकता है । इसमें भी भगवान की मर्जी है । जो भी नैना के पास आता दुःख भरे शब्द बोल के चला जाता । नैना को बेटी पैदा होने पर जो दुखभरे  शब्द सुनने को मिलते वह   उसे अच्छे नही लगते थे बेटी पैदा हो गयी है ।अपनी बेटी को पालना है उसे हंस के पाले या दुखी होकर पाले । ये सोचकर नैना तटस्थ होकर उसका पालन पोषण करने लगी  नैना तीन महीने बच्ची की परवरिश के लिए घर रही।  वह अच्छे शब्द सुनने के लिए तरस  गयी   थी उसे बेटी के पैदा होने का जितना दुःख था उससे ज्यादा लोग उसे सुना जाते । नैना समझ नही पाती थी जब इस लड़की को पालना हमे है सारी जिम्मेदारी हमे निभानी है । तो सारे लोग इतने दुखदायी शब्द क्यों बोल रहे है । पर हमारे समाज में बेटी पैदा करने वाली औरत से सारे अधिकार छीन लिए जाते है । उसे सिर्फ सुनने का ही अधिकार होता है प्रतिवाद करने का अधिकार नही होता है   । ऐसा ही नैना  के साथ हुआ समाज के शब्द सुनकर वो भी हँसना भूल गयी । अब उसे अच्छे और सामान्य शब्दों की जरूरत थी किसी की दिलासा की भी जरूरत नही थी । नैना का पालन -पोषण ऐसे माहौल  में नही हुआ था । जहाँ औरतो को दुत्कारा जाता था । या उनको इज्जत नही दी जाती थी । उसने औरतो  को अपमानित होते हुए शादी के बाद ही  देखा था । नैना  एक साहसी औरत थी ।  दूसरी बेटी की माँ बनना उसके लिए  जीवन का एक हिस्सा था । उसके लिए नैना  ने अपने आपको तैयार कर लिया था ।
         तीन महीने की छूटी के बाद नैना  दुबारा से नौकरी में आयी । विद्यालय का माहौल एक दम  बदला हुआ था । जो भी नैना से मिलता हंस के बात करता और बेटी की मुबारक बाद देता । तीन महीने में घर  में रहते हुए  नैना हंसना  भूल चुकी थी । वह  लोगो का  हंसी में साथ देने के लिए   नकली  हंसी हँसते -हँसते कब अपना दुःख भूल गयी उसे पता ही नही चला ।  वो दुवारा खुश रहने लगी ।  नेना  सामान्य जीवन जीने की और अग्रसर होने लगी । नेना फिर से खिलखिलाकर हंसने लगी । उसे देखकर लगता था बेटी की माँ बेटी के पैदा होने पर इतनी दुखी नही होती । जितना उसे समाज के सामने दुखी होने का दिखावा करना पड़ता है ।
       जब नैना छुट्टियों पर चल रही थी । उस समय में रैना ने सभी से वादा लिया था । नैना  के सामने कोई भी दुखभरे शब्द नही बोलेगा ,सभी उसे मुबारक बाद देंगे । उसे भी सामान्य जिंदगी जीने का अधिकर है । उसकी ये बात सबके मन को छू गयी  इसलिए हर इंसान नैना  से हंस के मिल रहा था ।
       हमारा सामाजिक ढांचा ऐसा है कि  दूसरी बेटी की माँ अगर हंसना भी चाहे उसे माँ का घमंड समझा जाता है । ऐसे में रैना जैसी ओरते ही समाज को बदल सकती है । जब माँ समाज को बदलने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही है । वह अपनी किस्मत बदल सकती है । तो ऐसी औरत की बेटी क्या मुश्किलो का सामना नहीं कर पायेगी । कहते हे _"  पड़ी लिखी माँ का परिवार भी पड़ा लिखा होता हे । ऐसी माँ की बेटी भी अपनी भाग्य विधाता बन सकती है । उसे नकारो मत । " 

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                रैना का मन बहुत अच्छा था वह सभी की भलाई के बारे में सोचती थी पर हमेशा सभी का भला  करना  आसान नहीं होता । ऐसे ही एक साथी ने उससे एक १० की गड्डी  पति के द्वारा मंगवाने  लिए कहा । रैना  के पति ने 2 गड्डी 10 के  नोटों की घर  में लाकर  रख दी । उन दिनों शादी के दिन चल रहे थे । उसी दिन पडोसी को गद्दी की जरूरत पड़ी । रैना के पति ने एक गद्दी पडोसी की जरूरत समझते हुए उस पडोसी को दे दी । दूसरी गड्डी  अभी घर में बची हुई थी । रैना को संतोष था एक गड्डी की उसे जरूरत हे वो तो अभी घर में है । उसकी जरूरत पूरी हो जाएगी । ये सोचकर वो संतुष्ट थी ।
          अगले दिन जब रैना विद्यालय पहुंची एक सहेली सीमा ने अपने रिश्तेदार के घर भात  ले जाने की बात उसे बताई । उसे लोगो को देने के लिए साथ में10 की गद्दी की जरूरत  थी उन दिनों 10 की गड्डी बाजार में आसानी से नही मिलती थी ।शादी आदि समारोह में सगन के रूप में देने  के लिए 10 की गद्दी की   जरूरत पड़ती थी । ऐसे में सभी ऐसे लोगो से अपनी परेशानी के बारे में बताते थे ।जिनके जानने वाले बैंक में काम करते थे  उनके द्वारा ही सभी की समस्या का  हल निकल सकता था ।उसने   भी रैना के सामने यही सोच  कर अपनी समस्या रखी थी । उसने उससे प्रार्थना की किसी तरह मेरे लिए एक गड्डी का इंतजाम करवा दो । रैना पर वो दबाब बनाये जा रही थी । रैना उसके शब्दों के जाल  में फंस गयी उसके मुह से निकल गया -"एक गड्डी मेरे पास अभी है । पर वह गड्डी  मीना  के लिए लाई हूँ । वह कई दिनों से मुझ से मांग रही थी ।  तुम्हारे  लिए इनसे कहकर मंगा दूंगी ।" ये सुनते ही सीमा ने उससे जबरदस्ती  गड्डी ले ली उसके हाथ में  एक हजार रूपये रख दिए । रैना ने इस बात की कल्पना भी नही की थी । वह हक्की-बक्की रह गयी उसे समझ ही नही आ रहा था । इस हालत को कैसे बदले । सीमा ने रैना के सामने अपनी मज़बूरी इस तरह बयान की रैना को चुप होना पड़ा ।
         उस  दिन दोनों का सामना एक दूसरे से अभी नहीं हुआ था । मीना को किसी और के दवारा पता चला की रैना उसके लिए गड्डी  लाई थी पर सीमा ने उससे गड्डी  ले ली है । ये सुनते ही मीना आपे से बाहर हो गयी जोर -जोर से रोने लगी-" उसे कल ही शादी में जाना हे । उसने पति को पूरा भरोसा दिलाया था की आज में गड्डी जरूर ला  दूंगी । अब उन्हें कैसे यकींन  दिलाऊ मेने गड्डी लाने की पूरी कोशिश की थी । वो मेरे ऊपर कभी भरोसा नही करेंगे । "मीना  के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे । कोई  भी उसकी मुसीबत का हल नही निकाल सकती थी ।
          दूसरी तरफ रैना घबरा रही थी।  मीना का सामना करने की रैना में हिम्मत नही हो रही थी । मीना कई दिनों से उसकी खुशामद कर रही थी रैना ने उसे पूरा भरोसा दिलाया था । एन मौके  पर सब उल्टा हो गया दोनों ही दुखी थी । दोनों को इस समस्या का हल सुझाई नही दे रहा था। रैना  के अंदर मीना  का सामना करने की हिम्मत नही थी । वो घबरा कर आधे दिन की छुट्टी लेकर घर चली गयी । इस समस्या का हल उसने छुट्टी लेकर किया । जो हमें आज तक समझ नही  आया  । 
      

sidhapan

      रैना अपने घर में राजी ख़ुशी से रहने लगी । वहाँ उसकी एक बेटी ने जन्म लिया । वह उसके लाड़ -प्यार में सब कुछ भूल गयी । अब उसके जीवन में सिर्फ खुशिया ही खुशियाँ  थी । रैना ने B.A  B.ed  तक पढ़ाई कर रखी थी । इन्ही दिनों अद्यापक की नौकरी के फार्म निकले । रेना ने भी आवेदन कर दिया उसका चयन हो गया । अब उसके जीवन में दोहरी ख़ुशी आ गयी थी ।
          रैना विद्यालय में जब आई वहाँ हर तरफ पुरुषो को देखकर घबरा गयी । उसने वहाँ रुकने से मना  कर दिया .। उसे समझाया गया  यहाँ महिलाये भी नौकरी करती है । लेकिन उसने साफ मना कर दिया । तब एक महिला अद्यापिका  को बुलाया गया  । उसे देखकर उसकी घबराहट कम हुइ । तब वह वहाँ नौकरी करने के लिए तैयार हुई । वरना उसने नौकरी ना करने तथा  घर वापिस जाने का मन बना लिया था ।
          रैना बहुत खुशमिजाज औरत थी । हमेशा खुद भी हंसने की कोशिश करती  रहती थी । दुसरो को भी खुश देखना चाहती थी । उसे किसी का मन दुखाना अच्छा नहीं लगता था । रेना बहुत पतली थी पतली होने का उसे एहसास था पर पतली होने के कारण अपने पतले पने पर भी अनेक चुटकले सुना देती थी । हम हैरान रह जाते कोई अपने ऊपर भी इस तरह हंस सकता है ।
      कुछ लोगो के अच्छे दिन अधिक नही होते । उसके  जीवन में एक महिला ने प्रवेश किया वह उस विद्यालय में प्रधानाचार्या बन कर आई  थी ।   वह  उसके सीधे पन  को समझ नही पाई । रेना की  उम्र कम थी नई नौकरी के कारण अनुभव भी कम  था । जब कोई काम करती उसमे कमी रह जाती । गलती होने पर डांट पड़ जाती । हमेशा सही करने की कोशिश करने पर भी गलती रह जाती । दिनों -दिन उसका आत्मविश्वास कम होता जा रहा था । उसकी हंसी भी गायब होती जा रही थी । किस्मत की बात ही कहेँगे जिस गलती पर दुसरो को कुछ नही कहा जाता था वह गलती भी उसकी पकड़ में आ  जाती थी  उस गलती पर उसे अच्छी तरह डांट पड़ जाती । उसका हर काम मेडम अच्छी तरह देखती थी । वो इतनी सीधी थी जब उसे डांट  पड़ती।  तब जिस अद्यापिका की तरह उसने काम किया होता या जिसकी सहायता ली होती डांट पड़ने पर उसका भी नाम ले लेती, किस्मत देखिये उस पर भी दुसरी अद्यापिका को डांटने की जगह उसे दुगनी डांट पड  जाती कई बार उसके सीधे पन  पर हमें हंसी भी बहुत आती  थी ।
       रैना के अंदर निराशा भर्ती जा रही थी । प्रधानाचार्या  के सामने जितना उसके बारे में कहने की कोशिश करते उतना ही उसका मन रैना के खिलाफ होता जाता था । समझ ही नही आता था इस उलझन को कैसे सुलझाया जाए । सभी को रेना से हमदर्दी थी  जितना मेडम के सामने उसका पक्ष रखते वह उतना ही चिढ़  जाती थी । कई बार जिंदगी में विपरीत लोग मिल जाते हे जिन्हे कुछ भी समझाना मुश्किल होता हे । रैना  निराशा में डूबती जा रही थी । अब वह थोड़ी समझदार होती जा रही थी इतना होने पर भी डटकर तनाव का सामना कर रही थी । मन को कौन समझाए उसका मन उसके नियंत्रण में नही था । रस्ते में चलते -चलते विचारो में इस तरह खो जाती की बीच सड़क पर चलने लगती किसी दूसरे के टोकने पर उसे होश आता । तब आस -पास  चलती हुई गाड़ियों को देखकर डर  जाती । उसे देखकर लगता भगवान हर किसी को मानसिक रूप से सक्षम नही बनाता । उनका ध्यान दुसरो को रखना पड़ता हे तभी वे जिन्दा रह पाते  है ।
























ब.









svbhav

       रैना  बेहद सीधी -सादी लड़की थी उसके जितनी सीधी लड़की बहुत कम दिखाई देती है ।  उसको समझना बहुत मुश्किल होता है । इतनी तेज रफ़्तार जिंदगी में इतनी सीधी लड़कियाँ मिलती नही है । इसलिए उस पर यकींन  करना और भी मुश्किल होता है।  लोग अधिकतर कहते थे ये नाटक कर रही  है । उस समय उसकी जिंदगी उलझनों से भरी हुई थी  । रैना  की शादी को अधिक समय नहीं हुआ था । उस परिवार में उसके सास -ससुर , और  पति रहते थे । उसके परिवार में  सभी  उससे अच्छा  व्यवहार करते थे । पर सास थोड़ी तेज स्वभाब की थी वो उसको सुना देती थी । ये बाते  उसके मन को चुभ जाती थी । रैना सास को पलट कर जबाब नही देती थी । लेकिन अंदर ही अंदर सोचती रहती थी जिसके कारण  वह बीमार पड़  जाती थी । उसके ससुर और पति बहुत संवेदनशील थे । वे रैना का दर्द समझते थे । उसको संभालने की बहुत कोशिश करते थे  रैना का अपने विचारो पर बस नही चलता था ।
       इसी कारण से रैना का  दो बार   गर्भपात हो चूका था  । डॉक्टरों के अनुसार उसकी बीमारी की जड़ उसकी सोच है ।उसे   अच्छे माहौल  में रखा जाए तभी सब कुछ ठीक होगा वरना ये मानसिक रोगी बन जाएगी । तब उसकी हालत सास के सामने रखी गयी सास ऐसी बीमारी मानने को  तैयार नहीं हुई । उसने इसे रैना  का नाटक करार दिया । और ज्यादा उस पर गुस्सा करने  लगी।    दिनो दिन रैना की तबियत बिगड़ती जा रही थी । उसके  ससुर और पति ने आपस में सलाह करके इस मुसीबत में से निकलने के बारे में विचार किया पर  उसका हल नही निकाल सके ।  उनके अनुसार सास और बहु दोनों को समझाना मुश्किल है । सास अपने स्वभाव को बदलने के लिए बिलकुल तैयार नहीं    थी । उसे रैना की बीमारी ढकोसला लगती थी । रैना  मानसिक रूप से मजबूत नहीं  थी । उसका बचपन बड़े प्यार  बिता था उसे पता ही नही था जिंदगी में कभी कड़वा भी सुनना  पड़ेगा । घर की  सबसे बड़ी बेटी होने के कारण उसने कभी ऐसे माहौल का सामना ही  नहीं किया था ।  सब कुछ समझते हुए भी वो अपने विचारो पर नियंत्रण नही रख पाती  थी । उसकी भूख प्यास सब मिट गयी थी । वह हड्डियों का  ढांचा मात्र लगती थी । तब भी उसकी सास का मन नही पसीजता था । सास अपना व्यव्हार बदलने के लिए तैयार नही थी ।   परिवार वालो की सभी बाते सास को मनगड़ंत लगती थी ।
                बहुत विचार विमर्श के बाद उसके ससुर ने रैना को अलग मकान में रखने के बारे में सोचा । ऐसे माहौल  में तो रैना  मर जाएगी । उसके पति बैंक में नौकरी करते थे । कुछ ससुर ने मकान के लिए पैसे दिए कुछ पति ने  बैंक से ऋण लिया । उन्होंने छोटा सा रैना  को मकान खरीद कर दे दिया । वह दूसरे मकान  में आकर रहने लगी ।  रैना को अब कोई सुनाने वाला नहीं था । पति  उसका ध्यान रखते थे । धीरे -धीरे रैना  की तबियत में सुधार  होने लगा । सास को अब भी ये सब उसका अलग रहने का बहाना लगता था।  उसे अभी भी वो बहुत चालवाज और बहानेबाज कहने से ना चुकती थी

       

SANST

        बच्चे खेल-खेल मै ऐसी हरकते कर देते हे कि उनकी जान के लेने के देने पड़  जाए । ऐसी एक हरकत के बारे में अपना अनुभव में आपसे साझा कर रही हूँ । रेशमा जब 8 साल की थी तब उसने अपनी सहेली शिखा से शर्त लगाई कोन अपनी दोनों नाक में सबसे ज्यादा कागज फंसाता है  । दोनों ने कागज के छोटे -छोटे टुकड़े  किये । दोनों अपनी नाक में उन कागजो को फंसाने  लगी । दोनों प्रथम आने की उम्मीद में ज्यादा से ज्यादा कागज फंसाने लगी । एक समय ऐसा आया जब उन्हें साँस लेने में भी दिक्क़त आने लगी । इसपर भी उन्हे रुकना गवारा ना था । दिमाग में सिर्फ प्रथम आने का ख्याल उन्हें ऐसा दुस्साहस करने के लिए प्रेरित कर रहा था । दोनों की हिम्मत जबाब देने लगी दोनों एक दूसरे का मुँह  देख रही थी । दूसरी हार माने । इसी जद्दोजहद में दोनों मौत की तरफ आगे बढ़ने से नही रुक रही थी । एक समय ऐसा आया जब दोनों की हिम्मत जबाब दे गयी तब उन्होंने समझोता कर लिया ।
            उन्होंने अपनी नाक में से कागज निकालने  शुरू किये । धीरे - धीरे कागज निकलने लगे । काफी कागज उन्होंने नाक में से निकाल लिए पर कुछ कागज नाक में उन्होंने जबरदस्ती बहुत अंदर कर दिए थे वे अब निकलने  का नाम नही ले रहे थे । अब दोनों को समझ नही आ  रहा था क्या करे । उन्हें डर  लगने लगा क्या करें ,किसको अपनी मदद के लिए बुलाये जिसे भी मदद के लिए बुलाएँगे वो पहले गुस्सा होगा । डांट भी पड़ेगी । हो सकता है थप्पड़ भी मार दे । उनकी स्थिति सांप -छछूंदर वाली हो गयी थी । उनकी हालत बहुत बुरी हो गयी थी पर डर  के कारण रो भी नहीं पा  रही थी । हिम्मत करके कागजो को निकालने  में लगी रही । काफी सारे कागज निकल गए  । पर रेशमा की नाक में एक कागज रह गया था बाकि कागज निकलने के कारण अब वे दोनों बेहतर तरीके से साँस ले रही थी । अब उनकी साँस में साँस आयी  ।
      एक कागज जो नाक के अंदर फंसा रह गया था । उसके कारण रेशमा की जान सांसत में फंसी हुई  थी वह डर के मारे इस मुसीबत को अकेले ही सहन कर रही थी । दो दिन बाद रेशमा को जोर से छींक आई तब वो कागज बाहर  आया । अब रेशमा की जान में जान आई । बरसो तक उसने ये बात किसी को नही बताइ । बहुत दिनों बाद उसने अपनी इस बेबकूफी का राज खोला । 

ATMSAMMAN

        रेखा का दूसरे बेटे  महेश की शादी एक सुन्दर और गुनी लड़की ममता से हो गयी हे । ममता दूतावास में काम करती हे उसका एक पैर भारत तो दूसरा पैर विदेश में रहता हे । परिवार बड़ा हो गया हे इसलिए रेखा ने महेश को दूसरा मकान रहने के लिए दे दिया है । दोनों दूसरे मकान में नोकरो के साथ मजे से रहने लगे । ममता को घर की कमी ज्यादा नही खली क्योंकि अभी ससुराल में रहते हुए ज्यादा दिन नही हुए थे ।
         समय उपरांत ममता के पैर भारी हो गए । अब ममता को   सास की जरूरत महसूस होने लगी । ममता ने सास को अपने साथ रहने के लिए कहा । रेखा की मजबूरी थी उसने मना  कर दिया । ममता फ़ोन द्वारा सास से सहायता लेती रहती थी । रेखा छुट्टी के दिन ममता के पास चली जाती थी पर ममता उन्हें रुकने पर जोर देने लगी । ये संभव नही था । कुछ दिन रुक कर रेखा बड़ी बहु के पास वापस आ  जाती थी ।
             ममता के घर एक बेटे का जन्म हुआ । घर खुशियो से भर गया । रेखा ममता के घर रहने आ  गयी । उसने ममता की अच्छी तरह एक महीने तक देखभाल की । एक महीने बाद रेखा ने ममता के घर से ही नौकरी पर आना शुरू कर दिया । विद्यालय से उसका घर बहुत दूर पड़ता था । उसे बहुत थकान हो जाती थी घर जाकर उसमे काम करने की हिम्मत शेष नही रहती थी । उसका कर्तव्य उसे इतना काम करने के लिए प्रेरित करता था । ममता का बच्चा अब सबा महीने का हो गया । रेखा ने कहा -"अब तुम मेरे साथ चलो । मेरे लिए दोनों जगह की जिम्मेदारी सम्भालना मुश्किल हो रहा है । " ममता के लिए दूसरे घर में जाकर रहना मुश्किल लग रहा था । पर वो सास के साथ उनकी मजबूरी समझ कर रहने आ गयी । वहाँ  रहते हुए ममता को तीन महीने हो गए । अब वह अपने घर आ गयी । जब कोई मजबूरी होती वह फ़ोन पर सास से पूछ लेती । इस तरह 6  महीने बीत  गए । ममता को अपनी नौकरी पर जाने का समय आ गया । उसका मन बच्चे को नोकरो के भरोसे छोड़ने का नही हो रहा था । उसकी नौकरी पुरे समय की थी । अब उसकी ममता बच्चे से अलग होने के लिए तैयार नही थी । ममता चाहती थी कोई अपना बच्चे के साथ रहे । ममता ने रेखा से साथ रहने के लिए मिन्नत की ।  पर रेखा अपनी मजबूरी के कारण उसके साथ रहने के लिए तैयार नही हो सकी ।
         ससुराल में कोई भी उसके घर नहीं रह सकता था । उसका झुकब मायके की तरफ हुआ । मायके में भी उसके घर आकर रहने की स्थिति किसी की भी नही थी । लेकिन उसकी माँ ने कहा _ "बच्चे को हमारे पास छोड़ दो हम संभाल लेंगे ।"ममता अपने बच्चे को  सुबह रोज मायके छोड़ कर  नौकरी पर जाने लगी  शाम को वापस आते जुए बच्चे को साथ ले आती  । उसने अपने बच्चे की देखभाल के लिए एक कामवाली लगा दी ताकि किसे को परेशानी न हो । अब ममता संतुष्ट थी उसका बच्चा सही हाथो में पल रहा हे । ममता कामवाली के पैसे खुद देती थी जब रेखा को पता चला उसे बुरा लगा । उसने ममता से कहा "आया पुरे दिन बच्चे की देखभाल के साथ उन लोगो का भी तो काम करती है । तुम उसका वेतन क्यों देती हो उनको देने दो ।" पर ममता इसके लिए तैयार नही हुई । ममता के मायके वालो की हैसियत भी अच्छी थी वे भी ममता को आया का वेतन देने से  मना करते थे । वे कहते हम दे देंगे पर ममता इसके लिए तैयार नही हुई । वो हमेशा कहती - "अपने मुझे पढ़ालिखा के इतना समर्थ बना दिया हे में अपना और बच्चे का खर्च उठा सकती हुँ तब आपका खर्च क्यों करवाऊ ।" वह आया का खर्चा उन्हें नही करने देती थी पर रेखा को आया का वेतन देना बहुत अखरता था । वह ममता के सामने कई बार ये बात ले कर आई पर ममता एक कान  से सुनकर दूसरे कान से उसकी बात निकाल देती । रेखा ममता के इस व्यव्हार से मन ही मन किलसती रहती । ममता को वेतन देने से रोक नही पाती ।
       ममता का आत्मसम्मान उसे पिता का पैसा खर्च करवाने से रोकता था । ये बात  रेखा समझ नहीं पा रही थी । ममता अपने बच्चे को मायके छोड़कर उनकी एहसान मंद थी । वह उनपर पैसो का खर्चा करवाकर अपनी निगाहो में ही गिर जाती । ये बात रेखा समझ नहीं पा रही थी । 

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yatra: bete:            रेखा के जीवन में अब कोई ऐसी इच्छा नहीं थी जिसे अधूरा समझा जाए । मानो  भगवान ने सब पूरी कर दी है। रेखा अपने जीवन से पूरी तरह से स...

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           रेखा के जीवन में अब कोई ऐसी इच्छा नहीं थी जिसे अधूरा समझा जाए । मानो  भगवान ने सब पूरी कर दी है। रेखा अपने जीवन से पूरी तरह से संतुष्ट थी । रेखा अपना समय पोते -पोतियों के साथ बिताती थी । \           बच्चो की ख़ुशी भी ज्यादा दिन तक नही रहती । ऐसा ही रेखा के साथ हुआ । तीनो बेटो और बहुओ को लगने लगा रेखा अपना प्यार बराबर नही बाँट रही हे ।उनकी बातो और व्यंग्यो  से प्रकट होने लगा । रेखा इन बातो पर ध्यान नही देती थी । इतने बड़े परिवार को सम्भालना हंसी -खेल नही होता हे दूर से देखने वालो को सब आसान लगता है  ।
          बेटो का गुस्सा शब्दों में मुखर होने लगा । रेखा को भी महसूस होने लगा । कुछ गलत हो रहा हे उसने तीनो बेटो को अपने पास बुला कर उनकी उलझन के बारे में चर्चा की । उनके बेटो के अंदर मकानो को लेकर गुस्सा था । तीनो बेटो को जो घर मिले थे । उन सब की बाजार कीमत अलग -अलग थी उन मकानो की कीमत जगह के हिसाब से दुगनी ,तिगनी थी । तीनो में मकान के कारण कड़वाहट भर्ती जा रही थी । इस तरह से रेखा ने कभी सोचा ही नही था । उसके हिसाब से उसने तीनो बेटो के लिए तीन मकान का इंतजाम अपनी सारी  जमा पूंजी लगा कर किया था । उसके हिसाब से तीनो बेटो का खुश होना चाहिये  था पर मकान ही तीनो की लड़ाई का कारण बन गए थे उसे समझ नही आ  रहा था इस उलझन को कैसे सुलझाए ।
         रेखा अब बेटियो वालो को अच्छा कहने लगी थी । यदि मेरी एक बेटी होती वह मेरे सुख -दुःख की साथी होती । बेटिया कम पढ़े  या ज्यादा पढ़े  उनकी शादी हो जाती हे उनको शादी में सिर्फ एक बार देना पड़ता हे बेटो की पढ़ाई का विशेष ध्यान रखना पडता है । यदि अच्छी तरह से पढ़ाई नही करेंगे तो नौकरी नहीं मिलेगी । नौकरी के बिना शादी होना मुश्किल हो जाता हे । शादी हो जाए तो  उनके लिए  गृहस्थी चलाना  मुश्किल होता है । बेटो  को मकान भी खरीद कर देना पड़ता हे उसके बाद भी उनके लिए उस मकान की कोई अहमियत नही होती । मकान होने के बाद भी वो उसकी कीमत और जगह को लेकर उलझते रहते हे । उनके लिए बड़ो के त्याग और बलिदान की कोई अहमियत नही होती । जबकि  बेटिया अपने घर जाकर अपनी गृहस्थी बसा लेती हे । कभी कभार आती  है  जो दे दो अपने हाथ से ले जाती हे ।  कोई गिला शिकवा नही करती ।   

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        रेखा बहुत खुश रहने लगी थी उसके तीनो बेटे व्यवस्थित हो गए थे । उसके तीसरे बेटे सुरेश के घर में नई रौशनी की किरण दिखाई देने लगी थी । रेखा अपने परिवार के विस्तार को देखकर खुश थी । समय के साथ खुशिया बढ़ती जा रही थी । बहु का पूरा समय चल रहा था । उन्ही दिनों सुरेश अपनी बाइक से घर आ रहा था । उसकी  बाइक की कार से टककर हो गयी । बाइक को काफी नुकसान पहुंचा । सुरेश की टांग टूट गयी उसे तीन महीनो के लिए प्लास्टर चढ़ गया ।
          सुनीता का पूरा समय चल रहा था । सुनीता ने दफ़्तर से छूट्टी ले ली थी । रेखा अपने बेटे के पास चली गयी । उन दोनों को रेखा की बहुत ज्यादा जरूरत महसूस हो रही थी । उनकी बहु सुनीता के घर बेटी ने जन्म लिया । रेखा  को एक बेटी की चाहत थी । उसके घर बेटी ने दर्शन नही दिए ।सारे जीवन उसे लड़कियों के कपड़े खरीदने की बहुत इच्छा होती थी उसके तीन बेटे थे । उसकी बहन के घर एक बेटा था ।दोनों बहनो को बेटी की बहुत इच्छा थी उनकी बेटी के रूप में तो इच्छा पूरी नहीं हुई ।  अब वह पोती के रूप में अपने सपनो को पूरा करने के बारे में सोचती थी । किसी एक बेटे के घर तो बेटी होगी वो सुहाना दिन आज आया था ।   चार पोतो के बाद उनके घर नन्ही सी परी ने जन्म लिया । सबके चेहरे पर रौनक  आ  गयी । छोटे -छोटे परिवारो में बेटा - बेटी दोनों मुश्किल से मिल पाते  हे । यदि दो या तीन परिवारो में भी इच्छा पूरी हो जाए ये भी बहुत बड़ी बात है ।
        आमतौर पर जितनी ख़ुशी बेटे के पैदा होने पर मनाई जाती हे । उससे ज्यादा ख़ुशी उनके घर बेटी होने पर मनाई जा रही थी । दादा -दादी के लिए पोती अलग महत्ब रखती थी । उन्होंने बेटी का बरसो इंतजार किया था । आप कहोगे लडकिया तो आस - पास बहुत होती हे पर अपनी बेटी को लेकर जो हम सपने देखते हे वह बिलकुल अलग होते हे उनका साकार होना अलग मायने रखता हे वो खुशदिन आज आया था ।  चाचा -चाची उसे देखकर नही थकते थे । ताऊजी -ताईजी उस छुटकी के लिए उसके पैदा होने के साथ ही नए सपने सजाने लगे थे । उसका नाम सौम्या रखा गया । उसके चारो भाई सौम्या  को गॉद  में उठाने के लिए खुशामत करते रहते थे ।" बस एक बार हमे गोद में लेने दो हम उसे तंग नही करेंगे प्यार से उठाएंगे ।" सब अपनी बारी का इंतजार सब्र  से  करते रहते । उनकी सारी शरारत खत्म हो जाती वे सब आज्ञाकारी बच्चे बन जाते । सौम्या बच्चा कम खिलौना ज्यादा बन गयी थी । जैसे प्रसाद भले ही थोड़ा मिले सबको उसकी चाहत होती हे वैसे ही सौम्या सबको प्रसाद की तरह मिलती थी ।
         ऐसी किस्मत कितनी लड़कियों की होती हे । जिसे हर कोई प्यार करना चाहे । सौम्या  के लिए कपड़ो और खिलोनो के ढेर लग गए । जब से सौम्या दुनिया में आई सबने उसके लिए सामान खरीदने शुरू कर दिये । बाजार में लड़को के कपड़ो में इतना अंतर नही होता । लड़कियों के कपड़े अलग-अलग रंग ,अलग-अलग मनमोहक डिजायनों के मिलते हे यदि खरीदने की जरूरत  ना हो तब भी देखना बहुत अच्छा लगता हे । रेखा के मन  में बेटी की बहुत इच्छा थी इसलिए उसने बचपन में सुरेश के लिए दो फ्राक खरीद रखी थी । वह बचपन में सुरेश को ही फ्राक पहना कर अपना शोक पूरा करती थी । अब बरसो बाद उसकी बलबती इच्छा पूरी हुई । सुरेश का प्लास्टर भी उत्तर चूका था । उसकी दुर्घटना का दुःख  सब सौम्या  को देखकर भूल गए थे । सुरेश अब नौकरी  पर जाने लगा था । सबने सोचा सौम्या के पैदा होने का जशन उसके सवा महीने की होने पर मनाया जाएगा । तब तक सुनीता भी काम करने लायक हो जाएगी ।  सब अपने -अपने सपने को पूरा करने में लगे हुए थे । 

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       रेखा के तीनो बेटो की गृहस्थी बस गयी थी । उनके पास नौकरी और घर दोनों की व्यवस्था हो गयी थी । अब रेखा को लगने लगा वो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर चुकी हे बच्चो को जिंदगी जीने के  साधन मिल गए है । उनके बेटे सुरेश को गुडगांव का मकान अच्छा लगने लगा उनके जीवन में सारी सुविधाये आ  चुकी थी । गुड़गांव जैसी जगह में सुरेश के लिए मकान खरीदना आसान ना  था । अभिभावकों की कृपा से उसे मकान भी मिल गया था ।
        हमेशा दिन एक से नही रहते ऐसा सुरेश के साथ हुआ ।एक साल तक सुरेश उस घर में राजी -ख़ुशी से रहा । पड़ोसियों से उसके अच्छे सम्बन्ध हो गए वे एक दूसरे के घर आने-जाने लगे । उसे मकान आसानी से मिल गया था उसके पड़ोसियों ने उसके मकान की क़ीमत  जब उसे दुगनी बतायी तो उसे  मकान से ज्यादा वो पैसे अच्छे लगने लगे । सुरेश चाहने लगा मकान बेचकर उसे उसके पैसे दे दिए जाए ।सुरेश ने माँ से कहा -" माँ उस मकान को बेच दो उसके दुगने पैसे मिल रहे है । हम किराये  के मकान में रह लेंगे ।"  रेखा ने दुनिया देखी थी उसे पता था ऐसा कभी भी हो सकता है । इसलिए  रेखा ने गुड़गांव का मकान अपने नाम से लिया था । बेटे को सिर्फ उसमे रहने का अधिकार था । बेचने का अधिकार उसे नही दिया था । बेटा जब भी रेखा से मिलता - मकान बेचने की बात करता । रेखा का मन टूट जाता । वो उसको समझाने की बहुत कोशिश करती पर बेटा अपनी बात पर अड़ा रहता । रेखा उसके व्यवहार से दुखी रहने लगी ।
           जवानी के जोश में सुरेश नहीं समझ पा  रहा  था । मकान की कीमत जिस तरह से बड़ रही हे ।यदि अब मकान बेच दिया तो  आने वाले समय में मकानो की कीमत उसी हिसाब से बढ़ती जाएगी ।  पैसे उतनी जल्दी नही बढ़ेंगे । रेखा की सोच और बेटे की सोच में यही अंतर था । ये बात रेखा के लिए बेटे को समझाना बहुत मुश्किल हो गया था बेटे ने गुस्से में आकर माँ से बात करना बंद कर दिया था । रेखा अपने पति से अक्सर पूछती - "आप ही बताओ मेने ऐसी क्या गलती कर दी जो सुरेश  बात नही करता । में उसका  भला  सोच रही हूँ ना की इसमें मेरा भला हे ।" यही जवानी और  बुढ़ापे में अंतर होता है । सुरेश जवानी के जोश में भविष्य नही   देख पा रहा था । बड़ो को स्वार्थी समझने लगा था । बड़े बच्चो को सबकुछ देने के बाद भी उनके प्यार को तरसते रह जाते है ।
           रेखा से मिलने सुरेश गुस्से के कारण नही आता था । सुरेश नही समझ पा रहा था उसे माँ की जरूरत कदम-कदम पर पड़ेगी । अभी उसकी जिंदगी की शुरुरात  हे । जिंदगी मै बहुत काम ऐसे आएंगे जब उसे बड़ो की जरूरत पड़ेगी यदि उस वक्त माँ ने गुस्सा दिखाया और आने से मना कर दिया तब उसे केसा लगेगा ।    उनकी माँ आत्मनिर्भर हे उनके ऊपर आश्रित नही हे । काफी समय बाद सुरेश का गुस्सा शांत हो गया । वह पहले की तरह माँ से मिलने आने लगा । अब रेखा भी खुश रहने लगी । माँ का मन बच्चो के बिना अशांत रहता है । बच्चे चाहे कितने भी बड़े हो जाए । 

GUN YA SUNDRTA

            रेखा का तीसरा बेटा सुरेश अच्छी नौकरी करने लगा है । उसके लिए रिश्ते आने लगे है । अब उसे नौकरी करने वाली बहु चाहिये । उन्होंने एक लड़की  देखने   का विचार किया।   सारा   परिवार लड़की वालो के घर पहुंचा । लड़की वालो के द्वारा की गयी आवभगत और उनका घर रेखा को पसंद नही आया । उन्होंने अपनी लड़की जव सामने लाये रेखा का मन और भी ख़राब हो गया क्योंकि रेखा के परिवार  मै सब   गोरे हे है । वह लड़की काली थी । सब रेखा के मन मुताबिक नही था । रेखा को पहले ही ये रिश्ता पसंद नही आ रहा था । लड़की तीन बहने और सबसे छोटा एक भाई हे । उसके पिता की आमदनी भी बहुत कम है । लड़की के परिवार की हेंसियत रेखा के परिवार से नीची थी । रेखा पहले ही उस रिश्ते को देखने के लिए तैयार नही थी । पर परिवार के जोर देने के  कारण उन्हें यहाँ आना पड़ा हे  ।
            रेखा ने लड़की वालो के घर कुछ कहना ठीक नहीं समझा । अपने घर में आकर  सबके सामने रेखा ने मना कर दिया । मुझे लड़की बिलकुल पसंद नही हे । बाकि परिवार को भी पसंद नही थी । सारा परिवार एक मत से राजी था । यहाँ शादी नही करनी । लेकिन  बेटा  सुरेश उनके फैसले से असहमत था । उसे सुनीता में कोई कमी नजर नही  आ रही थी । रेखा और उसके परिवार ने उसके काले रंग की दुहाई दी पर सुरेश को उसके काले रंग से कोई एतराज नही था । जितने असहमति के कारण बताये सुरेश को कोई भी कारण वाजिव नही लगा । सुरेश ने कहा - " इतना कमाने वाली लड़की आज के जमाने में कहाँ  मिलती है । " सुनीता की सारी  कमियों पर उसकी नौकरी ने पर्दा डाल दिया । ऐसे वक़्त के लिए कहा  गया है -"मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी ।"
         सुरेश और सुनीता की शादी रेखा की सोच से काफी हलकी थी । लेकिन वहाँ  रेखा की कौन सुनता । इसलिए रेखा मन मसोस कर चुप रह गयी । रेखा के बेटे और बहु की नौकरी गुड़गांव में थी । उन्हें दिल्ली से गुड़गांव जाने में काफी समय लग जाता था । रेखा को इतनी देर से बहु -बेटे का घर आना पसंद नही आ  रहा था । रेखा की परेशानी को दूर करने के लिये  सुरेश ने दफ्तर बाइक से जाना शुरू कर दिया । अब रेखा को उनके इतनी दूर से बाइक पर आने के कारण डर लगने लगा।  नौकरी की  थकान के कारण अनहोनी की चिंता सताने लगी । उन्होंने पति से इस बारे में सलाह मांगी । उनके पति भी दुरी को लेकर चिंतित थे । रेखा ने सुरेश के लिए गुड़गांव में मकान ढूंढ़ना शुरू कर दिया । उन्हें एक अच्छा मकान पसंद आ  गया । उन्होंने सुरेश को गुड़गांव में मकान खरीद कर दे दिया । अब उनके दिमाग से सुरेश और सुनीता की चिंता खत्म हो गयी थी । सुरेश की गृहस्थी भी सही तरह से चलने लगी । सुनीता नौकरी के साथ घर के कामो में भी सुघड़ थी । उसके काले रंग को सुनीता के गुणों ने छुपा दिया । अब किसी को उसका का ला रंग बुरा नही लगता था । सभी उसके गुणों से अभिभूत थे । 

yatra: ATMSMMAN

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ATMSMMAN

         रेखा  के दूसरे बेटे का नाम महेश हे वह अच्छी जगह नौकरी में लगा  हुआ हे । उसकी पत्नी भी  अच्छी जगह नौकरी कर रही है । उसकी नौकरी दूतावास में है । उसका एक पैर भारत तो दूसरा विदेश में रहता हे। वे दोनो  आर्थिक रूप से समृद्ध है । पैसे को लेकर कोई परेशानी नही है । उनका एक बेटा हो गया हे वे चाहते है कि सास उनके साथ रहे । उनका दूसरा मकान और है  उन्होंने दोनों बेटो को एक ही जगह   रहकर परेशानी   ना हो इसलिए दूसरे बेटे को दूसरे मकान  में रहने के लिए  भेज दिया । पहले उन्हें उस मकान में रहना बहुत अच्छा लगा । उनकी बहु ममता के एक बेटा हो गया तब उन्हें अपनी सास की बहुत याद आने लगी । नौकरी के साथ बच्चे को पालना बहुत मुश्किल हो रहा था । उन्हें भरोसेमंद इंसान की जरूरत महसूस  होने   लगी । सास के आलावा उन्हें किसी और पर भरोसा नही हो पा  रहा था । सास की मज़बूरी थी क्योंकि उनकी नौकरी जारी थी । वे नौकरी छोड़कर दूसरी बहु की  देखभाल के   लिए  उसके पास नही रह सकती थी । कुछ समय ममता के घर जाकर रही पर उसके घर से से नौकरी के लिये आना बहुत मुश्किल था । ममता का घर काफी दूर था । उन्होंने  अपने घर आकर रहने के लिए कहा पर ममता तैयार नही हुई । उसे अकेले घर में रहने की आदत पड़ चुकी थी ।
           उनके चार  पोते हो गए थे उनको चारो  पोते जान से प्यारे थे । उनके लिए चारो  पोतो  की जिम्मेदारी अलग अलग जगह पर जा कर निभाना बहुत मुश्किल हो रहा था । उन्होंने दोनों बहुओ को एक साथ रहने के लिये कहा  । दोनों साथ रहने के लिये तैयार नहीं थी । इस कारण रेखा फैसला नही कर पा रही थी ऐसे में उचित क्या हे । बड़ी बहु के लिए अकेले तीनो बच्चो को पालना कठिन था । वे भी उसी घर में बरसो से रह रही थी उनका उस घर में मन लगता था दूसरा नौकरी की जिम्मेदारी भी इसी घर से निभाना आसान था ।
              ममता ने अपनी माँ के पास बच्चा रखना पसंद किया अब वह दफ्तर जाते हुए बच्चे को मायके में छोड़ती हुई चली जाती थी । आते हुए बेटे को साथ ले आती थी । । ममता ने एक नौकरानी अपने घर में लगा रखी थी जिसके कारण घर के कामो में उसकी मदद हो जाती थी । दूसरी नौकरानी ममता ने मायके में अपने बेटे की देखभाल के लिए लगवा दी । उस नौकरानी की पगार ममता देती थी लेकिन रेखा को उसका दूसरी नौकरानी की पगार देना बिलकुल पसंद नही था उन्हें लगता ये नौकरानी बच्चे के साथ उस परिवार का भी बहुत सारा काम करती हे इसलिए उसके मायके वालो को नौकरानी की पगार देनी चाहिए पर ममता का आत्मसम्मान उसे इस के लिए राजी नही कर पाता  था । ममता के माता पिता भी अच्छी हैसियत के हे वे नौकरानी का खर्चा देने के लिए तैयार हे । पर ममता को गवारा नही उसके बच्चे की नौकरानी का खर्चा कोई और दे । रेखा को ये बात गवारा नही होती । वे बहु को कई बार समझाने की  कोशिश  कर चुकी है । कि वह दूसरी नौकरानी की पगार ना दे पर ममता उनकी इस बात को मानने के लिए तैयार नही होती । रेखा मन ही मन किलसती रहती है छोटी बहु पेसो की फिजूल खर्ची कर रही हे उन्हें कोन समझाये जो बच्चे कमाते हे उनके लिए आत्मसम्मान पैसे से ज्यादा कीमती होता है । 

SAHARA

               रेखा के तीन बेटे है । रेखा लम्बी ,सुन्दर और गोरी ओरतो में आती है । उन्हें देखकर लगता है । भगवान ने उन्हें फुर्सत से बनाया है । उनके तीन बेटे है । तीनो बेटे  भी उनकी  तरह बहुत सुन्दर है । उन्होंने अपने बड़े बेटे की शादी भी एक रूपवती और पडिलिखी युवती से की । उनका एक पोता हुआ पोते का नाम शैलेश रखा । वह सबकी आँख का तारा था ।
               उनकी बहु नौकरी नहीं करती थी उनकी बहुत इच्छा थी कि बहु अच्छी जगह पर नौकरी करने लगे । कुछ गुणों की कमी या लापरवाही उसको सही जगह नौकरी नही मिल सकी ।रेखा खुद सरकारी नौकरी में है । मेने कुछ समय बाद सुना वह अपनी बहु साधना की नौकरी पर इतना जोर इसलिए दे रही है क्योंकि उनका बेटा नरेश लापरवाह है बचपन में उसके सर में चोट लग गयी थी । इस कारण वह जिम्मेदारी वाले काम नही कर सकता । वह छोटी नौकरी करता हे उस नौकरी में आज के समय में घर चलाना बहुत मुश्किल है । इसलिए वे चाहती है कि उनकी बहु की स्थाई नौकरी लग जाए । इसके लिए उन्होंने बहु की नौकरी के लिए हर तरह से कौशिश करती रहती है । बहु ने कई बार सरकारी नौकरी के पेपरों  में बैठी पर पास नहीं हुई । इसके आलावा उन्होंने पैसे के बेस पर नौकरी लगवाने की कौशिश की उसमे भी असफल हो गयी । वे आज भी इस प्रयास में लगी रहती है कि किसी तरह उनकी बहु की अच्छी जगह नौकरी लग जाए । इसे किस्मत ही कह लो अभी तक उसे अच्छी नौकरी नही मिली ।
         रेखा  के पति भी सरकारी नौकरी में रहे है वे अपना जीवन अपने हिसाब से जीते है  । उन्होंने रिटायरमेंट से दो साल पहले ही नौकरी छोड़ दी । उनके पास काफी छुटिया बची हुई थी यदि वे चाहते तो    बिना परेशानी के  भी समय बीता सकते थे  । उन्हें नौकरी छोड़ने की जरूरत नही थी । रेखा ने उन्हें काफी समझाने की कौशिश की पर वे नहीं माने । रेखा को उनका नौकरी छोड़ना पसंद नही आया वे अपने पति को नौकरी जारी रखने के लिए राजी नही कर पाई  । इस बात का उन्हें बहुत दुःख था ।  पति की इच्छा के सामने उन्हें सिर झुकाना पड़ा ।
           रेखा पर उम्र ने रंग दिखाना शुरू कर दिया था वे अब बीमार रहने लगी थी । उन्हें चलने में भी परेशानी होती थी । इसी बीच उनकी बहु के घर जुड़वाँ बच्चो ने जन्म लिया । इनके घर में दुगनी खुशिया आ गयी । खुशियो के साथ   जिम्मेदारी भी दुगनी हो गयी अब उनका शरीर भी उनका साथ नही देता था पर नई जिम्मेदारियों से पीछे हटना मुमकिन नहीं था ।
             पति ने जहाँ समय से पहले नौकरी छोड़ दी वही रेखा  ने रिटायरमेंट के बाद भी दो साल का एक्सटेनेंशन ले लिया ताकि बेटे के साथ उसके परिवार की जिम्मेदारी उठाने में बेटे की सहायता हो सकेगी । जबकि उनका शरीर अब उनका साथ नही दे रहा था । ये होता है । माँ  का त्याग ।  

chori

        मै  बैंक में थी वहाँ शोर मच रहा था एक आदमी बहुत दुखी था । लोग उसे तसल्ली दे रहे थे समझा रहे थे पास जाने पर पता चला उसकी नई बाइक गायब हो गयी हे । उसे बहुत दुःख हो रहा था । अभी उस बाइक का लोन पूरा हुआ है । वह आदमी ज्यादा अमीर  नही लग रहा था । मुझे भी उससे सहानुभूति हो रही थी लोग कितनी मुश्किल से अपनी खुशियो को पूरा करने में लगे रहते है । चोर एक दिन में ही उनकी सालो की मेहनत और खुशियो पर विराम लगा देते है । चोर को एक दिन या एक महीने की ख़ुशी नसीब होती है । पर सामान का मालिक सारी  जिंदगी उ स दुःख को भुला नही पाता हे । वहाँ पुलिस आयी थी पर पुलिस  रिपोर्ट लिखने केआलावा कुछ नहीं कर पाती ।     
           ये दुःख भरी बात मेने आपको बताई एक अजीव सी या चोरो की हिम्मत की दास्ताँ में आपको बताना चाहती हूँ  । कुछ दिन पहले हमारे पड़ोसी 15 दिन के लिए शहर से बाहर गए थे । हमारे यहाँ गाड़ी सड़क पर खड़ी रहती हे । गाड़ी सुरक्षित खड़ी करने की जगह हमारे आस -पास नहीं होती थी । इसलिए सभी गाड़िया सड़क पर ही खड़ी रहती है । 
         एक दिन मेने उस गाड़ी की मुख्य चीजे गायब देखी।   चोर रात को अपना काम कर गए थे । कुछ समय बाद उसका एक टायर चुरा कर ले गए । टायर की जगह उन्होंने इंटे संतुलन बनाने के लिए लगा दी थी । उस गाड़ी के  मालिक की अनुपस्थिति में ज्यादा शोर शराबा नहीं हुआ । 4 दिन बात उसका दूसरा टायर भी गायब हो गया । उसकी जगह फिर से इंटे दिखाई  दे रही थी । इस तरह एक हफ्ते में ही चोर चारो टायर को ले गए । वह कार ईंटो के ऊपर टीकी हुई थी ।उसे देख कर समझ नहीं आ रहा था कि ये कार ही चोर क्यों छोड़ गए इस कार की मुख्य चीजे जब गायब कर दी तब इसका ढांचा ही क्यों छोड़ गए । इतने दिनों में वह कार ,कार  कम कबाड़ ज्यादा दिखाई दे रही थी ।  जब कार मालिक वापस आया उसकी हालत देखकर हमें बहुत दुःख हो रहा था । इसके बाद लोग जब भी ज्यादा दिन के लिए शहर से बाहर जाते हे अपनी कार सुरक्षित स्थान पर रखने पर जोर देने लगे है । 
                                                                                                                 

rivaj

              कई परिवारो और जातियों में अजीव से रीति -रिवाज हे जिनपर आज के   समय में यकीन करना बहुत मुश्किल हो जाता हे । ये बाते मै दिल्ली शहर में रहने वाले सम्भान्त लोगो की बता रही हु पहले पहल तो मुझे भी यकीन नही आया था । हमारे सहकर्मी रघुवीर सिंह के परिवार को मेने किसी पार्टी वगेरह में आते नहीं देखा था । मै उन्हें कई वर्षो से जानती हूँ ।मुझे लगता था कि उनके परिवार के लोग कम पढ़े -लिखे या समाज में उठने -बैठने लायक नहीं होंगे इसलिए अपने साथ नहीं लेकर आते । 
               एक बार उनके घनिष्ठ मित्र की पार्टी में उनकी पत्नी और बच्चो को देखा में हैरान हो गयी उनकी पत्नी बहुत सुन्दर हे । कोई भी पति इतनी सुन्दर पत्नी के साथ चलने पर गौरवान्वित महसूस करेगा । उनकी दोनों बेटिया भी सुंदरता में कम नही थी पूरा परिवार समाज में इज्जत दिलाने लायक हे पर रघुवीर जी अपने परिवार को कही भी लेकर नही जाते थे । हमें ये बात समझ नही आती थी । हमारे जोर  देने पर हमेशा  बात को हंसी में उडा देते थे । इसी बीच उनकी बेटी की सरकारी नौकरी लग गयी । 6 महीने के अंदर ही उन्होंने अपनी बेटी की शादी एक सुन्दर, सुयोग्य , सरकारी कर्मचारी से कर   दी । कुछ समय बाद रघुबीर जी की बेटी के घर एक सुन्दर सी ;बेटी का जन्म हुआ । सभी लोग उसके आने से बहुत खुश थे ।
           पिछले दिनों रघुबीर सिंह जी की रिटायरमेंट पार्टी थी । हम सबने उनपर बहुत जोर दिया । ये पार्टी आपके लिए  हे । आपका पूरा परिवार आना जरूरी है । उन्होंने कहा -" ठीक हे । " पार्टी वाले दिन उनकी पत्नी हमें दिखाई नहीं दी  ।  हमारे यहाँ दो पार्टी दी जाती है । पहली पार्टी रिटायर होने वाले देते है । इस पार्टी का  खर्च रघुवीर जी की तरफ से था । इसलिए हमे पूरी उम्मीद थी उनकी पत्नी आएगी ।  जब  उनकी पत्नी को नहीं देखा  हम सबने उन्हें  घेर लिया  तब उन्होंने कहा -"-"अभी परिवार के   ओर लोग आये हे अगली बार   पत्नी को लेकर जरूर आऊंगा ।" मुझे बहुत हैरानी हुई । हम  पीछे पड़  गए ।" ये कोई बात नहीं हे जब इतने लोग आये है  आप उन्हें अभी बुलबाओ ।" उनका जबाब सुनकर हम हैरान रह गए । उन्होंने कहा _ " मेरी पत्नी दामाद के सामने नही आएगी । हमारे समाज में सास और दामाद एक जगह ,एक दूसरे के सामने नही आते ।"मुझे समझ; नही आ  रहा था आज के समय में लोगो की कमी के कारण   ससुर-बहु  आपस  में बात करने लगे हे ऐसे मै सास और दामाद का एक दूसरे के सामने ना आना मेरी बुद्धि से परे की बात थी ।
            हमने पूछा -    " आपके घर में दामाद के  सामने   समान   कौन लाकर रखता है ।" उन्होंने कहा -" मै रखता हूँ ।" मैने कहा -"अगर आप घर में न हो और दामाद आ जाए । तब क्या होगा ।" उन्होंने कहा -" ऐसा कभी नही हुआ ।" मुझे लगा  3 लोगो के परिवार में ऐसा हुआ जब दामाद और सास अकेले घर  होंगे तब वे आपस में कैसे बात करेंगे । जबकि दामाद और सास के बीच में माँ -बेटे जैसा रिश्ता होता हे । तब भी आज के युग में सास और दामाद एक दूसरे के सामने ना  आये मेरे लिए अचंभित करने जैसी बात हे आज के समय में ऐसी रुढिया  तोड़ने  के लिए लोग तैयार नही हे । ऐसे निभाना कितना मुश्किल हो जाता हे ।



purani jamane ki orte

          कुछ साल पहले तक ओरते सहन शक्ति की मूर्त होती थी उनके सामने पति गलत भी बोल देते थे वो उन शब्दों को कभी गलत नहीं कहती थी । उनके पति सपने की बात भी पत्नी को बताते वो उनको सच मान लेती थी ।वे साथियो को बताने में  गर्व महसूस करती थी   ।  ऐसा ही एक वाकया मेरे सामने उपस्थित हुआ । में एक रिश्तेदार के घर में  थी उन्होंने जब सपने की बात बताई मेंने हंसी में उडा  दी ये सपना हे सपने पर क्या यकींन  करना  उनको मेरा हँसाना नागवार गुजरा और कहने लगी -" सच्ची जीजी ये जो बोलते हे वो  बिलकुल सच हो जाता हे " मेने काफी बहस की पर वे पति भक्ति पर अडिग रही मुझे ही उनके सामने चुप हो जाना पड़ा ।
              मै ऐसे परिवार से ताल्लुक नही रखती थी ।जहॉ पति के हर शब्द पर हा कहने या चुप रह जाने का रिवाज था । मेरा दिल ऐसे लोगो को देखकर कसमसाता था  उनका पति की गलत बात पर हाँ कहना  नागवार लगता  था मुझे बहुत अजीब लगता था । एक बार मेने एक घर में पति को प्रेस ठीक करते देखा । पति काफी देर से प्रेस ठीक करने में लगे थे पर प्रेस ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही थी । मै भी चुपचाप देख रही थी । मुझे प्रेस के बारे में कोई जानकारी नही थी इसलिए  मै चुपचाप देखती रही काफी मशक्क़त के बाद प्रेस गर्म हो गयी । पति ने कहा " -ये फिलामेंट बार -बार गलत लग जाता था इसलिए प्रेस ठीक नहीं हो रही थी । " उस वक्त उनकी पत्नी बोली -"मुझे काफी देर से पता था कि आप उल्टा लगा रहे हे पर मे   नही बोली मेरे बोलने पर  आपको गुस्सा आ जाता । " इस बात पर उनके पति को संतुष्टि नहीं हुई बल्कि वो और भी जोर से अपनी पत्नी को डाटने लगे । ये सब देखकर मुझे बहुत हैरानी होती थी । पुरानी औरते सारे दिन   घर का काम करके भी पति का एक अच्छा शब्द  सुनने के लिए तरस जाती थी । उनके नसीब में प्यार भरे शब्द नही होते थे ।           

bahane

            नेहा जैसी ओरते मेरे जीवन को साहस से भर देती हे । कोई भी हेड आते वो नेहा से सलाह लिए बिना काम नही करते मोहल्ले के हर काम में पड़ोसी उनसे सलाह लेते थे । इसिलए समाज और स्कूल से जुड़े कामो में कभी भी दिक्क़त  आती उनके सहयोग से सभी मुश्किले सुलझ जाती । वे कभी  बीमार होने या थकने का का नाम नही लेती थी ।   उनके जैसी कर्मठ ओरते समाज में दिखाई नही देती ।
       मेने जीवन में ऐसी ओरते देखी  हे जो हर दिक्क़त के लिए दुसरो को दोष देने में गुरेज नही करती । उनका जीवन यदि मुश्किलो से भरा हे उसके लिए भी वे दुसरो को कारण बना देती हे । मेरे जीवन में  गीता का आगमन कुछ समय पहले हुआ वो अपनी दो बेटियो का प्रवेश मेरे विद्यालय में करवाना चाहती थी मैने रिपोर्ट कार्ड देखी मै हैरान रह गयी दोनों बेटिया   पांच में से ३ विषय में फ़ैल थी । उन दिनों सरकारी नियम हर बच्चे को अगली क्लास में पहुचाने का बन गया था लेकिन ऐसे बच्चे सिर्फ अपने विद्यालय में ही अपग्रेड हो सकते थे किसी और विद्यालय वाले ऐसे बच्चो को अपने यहाँ दाखिला नहीं देते थे।  मेने उन्हें कहाँ।  -"आप ही बताओ मै किस तरह अपने अधिकारियो से इन बच्चो की सिफारिश करु  इनके कारण मुझे भी डॉँट पड़ जाएगी ।"कुछ लोग ये भी सोचते मेंने पैसे खाए है मै उसका भला कम अपना बुरा ज्यादा करवा बैठती । मुझे गुस्सा आ गया । मेने साफ मना कर दिया ।वे जोर से रोने लगी ।  उनके बताये बहाने सुनकर मै हैरान रह गयी -"वे संयुक्त परिवार में रहती थी उस परिवार में लगभग २० लोग रहते थे । उन्होंने कहा ।-"यदि मेरी सास सही होती ,उसे परिवार को सम्भालना आता तो मेरे बच्चे भी पढ़ने में अच्छे होते । " में उस परिवार से अच्छी तरह से वाकिफ थी । उनकी सास से मेरी बातचीत होती रहती थी ।
        उनकी सास साधारण,अनपढ़, घरेलू  औरतो जैसी थी । उनमे कोई खास याद रखने लायक बात मुझे नजर नही आती  थी  । गीता का परिवार भले ही संयुक्त था । पर खाना -पीना सबका अलग था सब अपने घर के निर्णय खुद लेते थे । उनको बड़ो से सलाह लेने की जरूरत नहीं होती थी ।
          उसके आलावा गीता बच्चो की पढ़ाई  के लिए पति को जिम्मेदार बताने लगी । मेने पुछा ।-"वो केसे।" गीता बोली -"मेरे पति बच्चो की तरफ ध्यान नही देते । " मुझे पता था गीता के पति दिल्ली से बाहर नौकरी करते है । वो केवल सप्ताहांत में ही घर आते हे जो इंसान केवल एक  दिन के लिए घर आता हे वह कक्षा १०  के बच्चो पर  किस तरह ध्यान दे सकता हे इतने बड़े बच्चो को पडाना हर किसी के बस का नही होता । जो इंसान कुछ दिनों के लिए घर आता  हे उसके अपने भी बहुत से काम होते है ।
         उसके हर बहाने के साथ में सहमति नहीं जता पाई मैने उसे साफ मना कर दिया । वे तीनो जार-जार रोती रही पर मेरा दिल नही पिघला । में चाहते हुए भी उनके लिए कुछ नहीं कर सकती थी ।इस घटना के बाद  वो मुझे रास्ते में दिखाई देती तो मुझे अनदेखा कर देती । मेने भी उनके बारे में ध्यान नही दिया । कुछ सालो बाद मुझे गीता दिखाई दी । उसे रोककर उनका हालचाल पुछा जबाब सुनकर मुझे अचम्भा हुआ जब उसने बताया -" दोनों बेटिया 75 प्रतिशत नंबर लेकर पास हुई हे ।" आज उनके अच्छे नंबर लाने के लिए उसने  किसी को श्रेय नही दिया ।
        मुझे गीता के चले जाने पर हंसी आई कि  बुरा होेता हे तो दुसरो के कारण, पर अच्छे के लिए भी तो दूसरो को श्रेय देना क्यों भूल जाते हे । पर इस बात का श्रेय मै अपने आप को देना चाहूंगी । यदि में उस दिन उसके सामने सच्चाई नहीं लाती तो वह अपने बच्चो पर इतनी मेहनत नहीं करती । आज उसकी दोनों बेटिया अच्छे कॉलेज में पड रही हे । उस वक्त की  मेरी कड़वी बात ने उन्हें जिंदगी की सच्चाई का सामना करवाने में समर्थ बना दिया । मुझे उम्मीद हे वे अपनी मेहनत के बल पर तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ती जाएँगी । 

haonsla

           नेहा की दास्ताँ सिर्फ कल्पना नहीं हे ये मेरी सहकर्मी रह चुकी है । 25 वर्ष पूर्व वो मेरे जीवन में आई थी । उन्हें देखकर नही लगता था  उन्होंने इतने दुःख अपने जीवन में सहन किये है । वे हंसमुख ,जिंदादिल, तेजतर्रार और व्यवहारिक प्राणी हे । उनके सामने हम बेहद कमजोर साबित होते थे । तब वो मजाक में कहती थी " -इतने से दुखो से डर  जाओगे तो जी ली जिंदगी तुमने ।"जिंदगी हर कदम पर इम्तिहान लेती हे । सुख और दुःख साथ -साथ चलते है । जिंदगी में हमेशा न सुख रहते ना ही दुःख हमेशा रहते । यदि दुःख न हो तो  सुख कैसे पता चलेँगे ।"  
       मेने जब उनके बारे में लिखने का सोचा मै खुद भावुक होती चली गयी ये सोचकर यदि इतना दुःख किसी और के जीवन में आया होता तो उसे कैसा महसूस होता । ऐसे बहुत लोग होते हे जिनका जीवन दुखो की अमित दास्ताँ होती है ।   वे उसमे से भी खुशियो के पल चुरा लेते हे । वे कभी भी थकती नही थी । उन्हें हर मुश्किल का तोड़ मालूम होता था । उन्होंने मेरे भी बहुत से काम करवाये यदि वो मेरे जीवन में न आई होती तो में कभी इतनी सफल ना  होती । मै उनसे काफी छोटी हु वो मुझे छोटी बहन की तरह मानती थी यदि मेरे चेहरे पर चिंता की रेखाएं देखती एकदम कारण पूछकर उसका हल निकाल देती । उन्हें दुःख में डूबा मेने कभी नहीं देखा । उनका दुःख उनकी तन्हाइयो का साथी था । महफ़िल की तो हमेशा रौनक बनी रही । ऐसी कोई जगह नही होती जहाँ उनकी जरूरत महसूस नहीं लोग करते । उनके पास हर परेशानी का हल होता था । उनके शब्द हमेशा मेरे कानो में गूंजते रहते हे -"मुझे कोई इंसान हरा नही सकता लेकिन भगवान का में सामना नही कर सकती ।" उनके जैसे जीवट वाली औरत इसके आलावा मेने कोई और नही देखी । । 
          मेने भगवान को कोसते हुए बहुत से लोगो को देखा है पर उनके ऊपर जितने दुःख आये वो उन्हें तोड़ नही सके बल्कि उनमे नया जोश भर गए । उन्हें देखकर कोई उनकी उम्र का अंदाजा नही लगा सकता ।वो हमेशा जोश से भरपूर रहती हे  । मुझे  कई कामो को करने से डर लगता तो एकदम कहती -"डर मत मै तेरे साथ हु । " उनके ये शब्द मेरे डर को गायब कर देते थे । मेरे जीवन में ऐसे बहुत से लोग आये जिनके जीवन को दुःख की अग्नि जला नही पायी वे और भी निखर कर जमाने के सामने आये । दुखो की तपिश उन्हें जला  नहीं पाई । ऐसे लोग ही वक्त को बदलने की ताकत रखते हे । वे आज भी मेरी मार्गदर्शिका हे आज उनके गुन मेरे अंदर देखे जा सकते हे । उन्हें कोई दुःख तोड़ नही पायेगा । नेहा सभी का संबल बनी हे और बनेगी । आज भी जिस जगह खड़ी हो जाती है लोग उनके मुरीद हो जाते हे । दुःख लोगो को तोड़ता ही नही हे उन्हें लोगो से जोड़ता भी हे उन्हें देखकर लगता हे सारे दुःख उनसे टकरा कर अपने को छोटा महसूस करते हे फिर से दुगने जोश और उससे भी बड़ा दुःख लेकर उनके सामने खड़े हो जाते हे । वो फिर भी हारती नहीं नए जोश से उसका सामना करती है ।
         एक बार मेने उनसे कहा _"आप दुखी और उदास क्यों नहीं रहती । आपका जीवन दुखो से भरा हुआ हे ।" उन्होंने कहा -" भगवान का काम तो हे मुझे दुःख देना ।वो अपनी आदत नहीं बदल रहे । उन्हें तो सारे जहाँ को संभालना हे । मुझे सिर्फ अपने अंदर ताकत पैदा करके खुश रहना हे । यदि में हमेशा मुह लटकाये और उदास रहूंगी तो कौन मेरे पास आयेगा और मुझसे बात करेगा ।"उनकी हंसी का राज जान कर मेने भी अपने दुःख का दिखावा करना बंद कर दिया । सुख हो या दुःख मेँ हर हाल में मस्त रहती हु क्योंकि मेरे दुखी होने से दुःख चले तो नहीं जाएगे। बल्कि बीते हुए दुःख कभी कम नही होंगे । हर इंसान के ऊपर दुःख अलग -अलग असर करता हे । कुछ लोगो के सामने बडे  से बड़ा दुःख भी बेअसर हो जाता हे । नेहा जी वैसी  ही औरत हे जिन्हे दुःख झुका नहीं पाया।  नेहा कहती हे -"भगवान का काम हे मुझे दुःख देना । मै भगवान से सिर्फ हिम्मत मांगती हु की उन दुखो का सामना करने का हौंसला मुझमे पैदा कर दे । उसी हौंसले के कारण ही मै जीवित हु ये भी भगवान का ही आशीर्वाद हे । " में पूरी शक्ति बटोर कर जीवन की मुश्किलो का सामना कर रही हूँ । 

dastak

नम्रता को नेहा ने इसी बीच बी,एड करवा  दी जबकि शादी से पहले नम्रता ने बी, लिब की पढ़ाई पूरी कर रखी थी । काफी समय से लाब्रेरियन की नौकरी नही निकली थी नेहा को लगने लगा था अब नम्रता के लिए नौकरी करना जरूरी हे इसलिए एक डिग्री और दिलवा दी जिसमे भी पहले नौकरी निकलेगी  वह आवेदन कर देगी । सरकारी नौकरी नही निकल रही थी इसी बीच गेस्ट टीचर की नौकरी निकली । नम्रता  ने  विद्यालय में आवेदन कर दिया उसकी नौकरी लग गयी । अब वह घर और नौकरी दोनों जिम्मेदारी भलीभांति निभाने लगी । उसकी बेटी समझदार होती जा रही है । शायद भगवान  भी ऐसे हालत में बच्चो को समझदार बनाने में सहयोग करता हे ।
             नम्रता अपने पति को एक दुकान करवाने की सोचने लगी हे जहाँ राकेश नौकरो की मदद से काम संभाल सके । राकेश में विश्वास पैदा कर रही है । एक साल की बीमारी में राकेश अपने ऊपर विश्वास खो चूका है । वह हर दम बेटी के साथ रह कर निया की जिम्मेदारी तक अपने को सीमित समझने लगा है । अब नम्रता राकेश को याद दिलाने की कौशिश करती हे उसने कभी एक व्यापर खड़ा किया था तब उसकी उम्र कम थी अब उसको जिंदगी का अनुभव भी हे इसलिए वह पहले से अच्छा काम कर पायेगा । नम्रता राकेश को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाने की कौशिश में दिन रात लगी रहती है । राकेश में दुकान खोलने का हौसला पैदा हो गया हे ।
            नेहा का बेटा  राहुल जर्मनी से ऑटोमोबाइल इंजीनिरिंग की डिग्री ले कर आ गया  हे उसकी अच्छी जगह नौकरी लग गयी हे अब नेहा राहुल  के लिए रिश्ते देखने लगी हे । पर साथ ही उसे किस्मत से भी डर लगता हे कव खुशियो पर ग्रहण लग जायेगा उसे पता नहीं हे नए की उम्मीद कभी नही छोड़नी चाहिए । नेहा ने राहुल की शादी कामिनी से तय कर दी हे । कामिनी सुंदर ,सुशील और खूब पड़ी हुई  हे । नेहा दिन रात शादी की तैयारी में मग्न हे । उसे उम्मीद हे आने वाला कल सुंदर होगा । हमे भी लगता हे नेहा का बक्त अब बदल जायेगा । खुशियाँ उसके दरवाजे दस्तक देने अ गयी हे । 

svasthy

                   राकेश उस की हर ख़ुशी और जरूरत का ध्यान रखता था । उसकी इच्छा पैदा होते ही पूरी करने की कौशिश करता था । उसकी दुनिया नम्रता तक सिमित हो गयी थी । कई बार राकेश का मजाक भी बन जाता । उसके दोस्त और मिलने बाले उसे "जोरू का गुलाम  कहने लगे थे।"  पर उसे किसी की परवाह नही थी । नम्रता उसे दुनियादारी समझाने की कौशिश करती तब राकेश कहता -"लोग जलते हे इसलिए ऐसे कह रहे हे ।" नेहा भी राकेश पर ज्यादा दबाब नही बना पाती थी ।  नेहा के जीवन में खुशियो ने नए रंग दिखाने शुरू कर दिए थे । नेहा के घर में नए जीव आने के लक्षण दिखाई देने लगे । राकेश मानो ख़ुशी से पागल  हो गया  था । अब वह नम्रता को हाथो पर ही रखता उसे हर काम करने  से रोकने की कौशिश करता । राकेश हमेशा कहता -  "कुछ काम करने की जरूरत नही हे  । मै सारे काम कर लूंगा तुम आराम करो । " अब राकेश बाहर और घर दोनों जिम्मेदारी ख़ुशी से पूरी करता । उसके चेहरे पर रौनक दिखाई देने लगी थी । नम्रता के जीवन में चारो तरफ खुशिया थी । नेहा को लगता इसी ख़ुशी की तलाश उसे हमेशा से थी । नेहा नम्रता को देखकर अपने सारे गम भूल गयी थी ।
           नेहा की बेटी के जीवन में सुख अधिक दिन तक नहीं रहा ।राकेश की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी । कार बुरी तरह क्षति ग्रस्त हो गयी थी । उसमे से राकेश को मुश्किल से निकाल सके । अस्पताल में राकेश को १० दिन तक होश ही नही आया । डॉक्टरों ने भी उम्मीद छोड़ दी थी । 11 दिन बाद राकेश ने अपनी आँखे खोली । सभी के चेहरे पर ख़ुशी आ गयी । सभी को अचम्भा लग रहा था । धीरे -धीरे राकेश का स्वास्थ्य सम्भलने लगा । लेकिन ज्यादा अंतर नही आ  रहा था । लेकिन राकेश को जीवित देखना ही उनके लिए सौगात से कम नही था । अब तक परिवार ने बहुत दुखो का सामना किया था । एक महीने बाद राकेश को घर ला  सके । पर उसके स्वास्थ्य में ज्यादा अंतर नही आया था । नम्रता राकेश की दिन रात सेवा करती रहती वह बिलकुल भूल गयी थी कि उसे भी आराम की जरूरत हे । राकेश एक साल तक बिस्तर पर रहा । नम्रता अपने सब दुःख भूल कर दिन रात राकेश  के पास ही रहती कही उसे किसी चीज की जरूरत पड  जाए तो कौन पूरी करेगा ।
              इसी बीच नम्रता के घर एक नन्ही परिधि  ने जन्म लिया । नम्रता अब दो हिस्सों में बट  गयी थी कभी परिधि तो कभी राकेश की जिम्मेदारी पूरी करते -करते उसे पता ही नही चलता था कब रात हो गई । अब राकेश सहारे से चलने लगा था । पर पूरी तरह से आत्मनिर्भर नही था । । नम्रता को काफी सारे काम राकेश के करने पड़ते थे । राकेश जैसे कर्मठ इंसान को हालात   ने बिस्तर का  कैदी बना दिया था । वह बाहर निकल कर काम करने के लिये कसमसाता रहता था । डॉक्टर के अनुसार -"अब वह जिम्मेदारी वाले काम करने में समर्थ नहीं था । थोड़ा कम मेहनत वाला काम ही कर सकता था ।
         नम्रता को ही परिवार के काम और पैसे कमाने दोनों जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी । पहले नम्रता को यकीं -न नही आ  रहा था ऐसा उसी के साथ हुआ हे । धीरे -धीरे उसने अपने मन को मजबूत किया क्योंकि राकेश की लम्बी बीमारी में सारी जमा पूंजी खर्च हो गयी थी । अच्छे वक्त में सभी साथ देते हे बुरे वक्त में सब साथ छोड़ देते हे जैसे ही रिश्तेदारो को पता चला राकेश अब कमाने लायक नही रहा तो उन्होंने उनके घर आना ही छोड़ दिया  । नम्रता को केवल नेहा का सहारा था । नेहा भी दुःख सहते -सहते टूटने लगी थी । उसने कभी कल्पना नहीं की थी वह अब तक अपने दुखो से जूझ रही थी अब उसे बेटी के जख्मो पर भी  मरहम लगाना पड़ेगा । नेहा सोचती उसने पिछले जन्म में कितने पाप किये हे जिनका निबटारा नही हो रहा । कब तक वो इन तकलीफो से जूझती रहेगी । अब नेहा 60 साल की हो गयी थी । सुनी आँखों से अँधेरे में देखती रहती और सोचती इसी को जिंदगी कहते है । 

jimmedari

नेहा दुःख से बेजार हुई  जा रही थी उसे सम्भालना मुश्किल  हो रहा था हर समय उसके मुँह  पर ये ही शव्द होते थे । " भगवान क्या सारे  दुःख मेरे लिए ही रख रखे हे । कब आपका पेट भरेगा मुझे दुःख दे देकर ।" उसके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे । बच्चे अभी बहुत छोटे थे । उन्हें मॉ को सम्भालना नहीं आता  था । वो भी माँ के पास बैठ कर रोते  रहते । ऐसे ही दिन बीत  रहे थे ।
         समय हर जख्म को भर देता हे समय के साथ नेहा ने भी समझोता कर लिया । जाने वाले कभी वापस नहीं आते । बच्चे माँ से पूछते -" पापा कहाँ गए । " नेहा के लिए उन्हें समझाना मुश्किल  हो जाता । नेहा उन्हें कैसे समझाए कि पापा के दिल की धरकन थे तुम दोनों , तुम्हारे लिए उन्होंने कितनी मनोतिया मांगी थी तब जाकर तुम्हारा मुँह देख पाए  थे । जब बच्चे समझदार हुए पापा के प्यार का मतलब समझने के काबिल हुए तब उनसे पापा ही छीन लिए गए । ऐसे ही समय के लिए कहा जाता है -"जब दांत थे तब चने नहीं थे अब चने हे तो दांत नहीं हे ।
          समय अपनी रफ़्तार से चला जा रहा था । अब बच्चो की पढ़ाई पूरी हो गयी थी नम्रता शादी लायक हो गयी थी पर नेहा को उसकी शादी से डर लगता था । जैसे "दूध का जला  छाछ को भी फूंक -फूंक कर पीता हे ।"नेहा का भी वही हाल था । इस कारण उसने बेटी की शादी ३० साल की उम्र में की । कुछ दिन तो सुख से जीवन गुजार ले । बहुत मेहनत  से उसने राकेश का चयन किया । राकेश बहुत सुंदर व्यवसायी हे । उसकी तरफ हर कोई आकर्षित हो जाता था । उसकी उम्र नम्रता से एक साल कम थी पर राकेश गुणों की खान था । राकेश छोटी उम्र में ही बहुत अच्छा व्यवसाय चला रहा था । उन्होंने फ़रवरी में शादी पक्की की पर राकेश ने कहा -" में नम्रता को नए मकान में ले जाना चाहता हूँ । वह अप्रैल तक पूरा हो जाएगा । मेँ तभी शादी करना चाहता हूँ । "नेहा को कोई एतराज नहीं था उन्होंने अप्रैल की शादी तय कर दी ।
       शादी के सारे इंतजाम बहुत अच्छे थे । नेहा ने अपनी जिंदगी की सारी पूंजी नम्रता की खुशियो पर कुर्बान कर दी थी । नेहा नम्रता में ही अपनी खुशिया ढूंढ  रही थी । शादी भलीभांति निवट गयी । हर कोई खुश था । नेहा जब भी किसी से मिलती उसकी जबान पर ये ही शब्द होते - "मेरे दामाद को देखा, केसा लगा । लाखो में एक हे । उसके जितना सुंदर लड़का नही मिलेगा । " सच में राकेश लाखो में क्या सुंदरता में तो करोड़ो में एक था नेहा का अपने दामाद पर गर्व करना उचित ही था । नेहा की बेटी की जिम्मेदारी पूरी हो गयी थी अब उसने राहत की साँस ली । इस तरह नेहा अब बेटे की पढ़ाई की तरफ ध्यान देने लगी । 

neha ki sithiti

नेहा और श्याम धीरे -धीरे करुणा के दुःख को भूलने लगे थे । उनकी जिंदगी आराम से कट रही थी । उन्ही दिनों अद्यापको की नौकरी निकली । नेहा बी.ए , बी. एड थी । उसने भाग्य आजमाने के तौर पर नौकरी के लिए आवेदन कर दिया । उसे  घर के पास के विद्यालय में नौकरी मिल गयी इतनी पास  नौकरी की उसे भी उम्मीद नहीं थी । आधे दिन की नौकरी के साथ घर अच्छी तरह से संभल जाता हे । ये सोच कर श्याम ने भी नौकरी करने की इजाजत दे दी थी ।
            पिछले गमो को भूलकर वे अपनी खुशियो से भरी जिंदगी का तहे दिल से स्वागत करने लगे । उन्होंने ऐसी जिंदगी बहुत दिन बाद देखी  थी । अब पड़ोस के लोगो को उनकी खुशियो से जलन होने लगी थी । सभी को लगता दोनों पति -पत्नी दोनों हाथो से धन बटोर रहे है । या चोरो को उनकी सम्पन्नता का पता चल गया था । एक रात  उनके घर में चोर आ गए सभी कीमती चीजे चुरा के ले गए । दिल्ली में आने के बाद सब कुछ उन्होंने अपने प्रयासों से बनाया था । एक ही दिन में सब खत्म हो गया । थोड़े पैसे में उन्होंने घर भी ख़रीदा था वे अब उसमे रहने से भी डरने लगे । उनको लगता ये सब पड़ोसियों के कारण ही  हुआ   हे । आगे भी पड़ोसी चोरी करवा सकते हे । उन्होंने उस मकान को बेचकर   दूसरे इलाके में नया मकान खरीद लिया । अब ये अपनी खुशियो का जिक्र किसी से नहीं करते थे ।
         अब वे अपने गम से उबरने लगे थे । नेहा और श्याम कभी -कभी भगवान का धन्यवाद करते आखिर उन्हें खुशियो का  मुँह दिखा दिया । बेटी नमिता अब कक्षा ८ में और बेटा राहुल कक्षा 2  में आ  गया था । अब नेहा और श्याम आपस में कहते _ " अब हमें भगवान ने सब दे दिया हे ।जिसकी हमे जरूरत थी ।" श्याम को नेहा के स्वास्थ्य को लेकर परेशानी थी । वह पूरी तरह से स्वस्थ नही थी । उसके इलाज के लिए हर तरह के डॉक्टर से मिलते रहते थे । एलोपेथी ,होमेओपेथी ,आयुर्वेदिक सभी से वे इलाज करवा चुके थे पर नेहा की तबियत में सुधार नहीं   आ रहा था श्याम हर समय तनाव में रहते थे कि किसी भी तरह या उपाय से नेहा ठीक हो जाये । जो भी कहता उस उपाय को करने के लिए वे तैयार हो जाते । उन्हें नेहा के स्वास्थ्य के सामने अपना आत्मसम्मान और पोस्ट कोई मायने नहीं लगती थी । वे नेहा से इतना प्यार करते थे  कि  एक बार पड़ोसी ने कहा -"नेहा के ऊपर भूतो का साया हे । " उन्होंने कहा - नेहा को इससे मुक्ति कैसे मिलेगी । पडोसी ने कहा -"मेहँदी पुर बालाजी जाओगे तब नेहा ऊपरी बलाओ से मुक्त हो जाएगी ।" वो इस काम के लिए भी तैयार हो गए । नेहा का मन नहीं मान रहा था । नेहा उन्हें मना करती रह गयी पर श्याम नही माने । वे बालाजी चले गए ।
              नेहा उनका इंतजार करने लगी । उनकी किसी भी तरह खबर नहीं मिल पा रही थी । चौथे दिन उन्हें श्याम के दर्शन हुए । श्याम को रस्सियों से बांध कर लोग ला  रहे थे ।उनके कपड़े फटे हुए थे ' उन्हें देखकर राधा बेहोश हो गयी उसे समझ नहीं आ रहा था । एक स्वस्थ इंसान के साथ ऐसा क्या हो गया जो लोगो को ऐसा करना पड़ गया । लोगो के अनुसार -"इनकी हालत पागलो जैसी हो गयी हे । इन्हे सुध नही हे अपने कपड़े फाड़ देते हे । कही भी भागने लगते हे कुछ भी बोलने लगते हे जो किसी को समझ नहीं आता ।"मेहंदीपुर से किस तरह अपने भाई के घर पहुंचे हे ये अजूबा हे । एक अकेले  इंसान के  वस में नहीं आ  रहे थे चार लोग उन्हें संभाल पा  रहे थे ।
          नेहा की हालत और भी खराब हो गयी सभी लोग श्याम की तीमारदारी में लग गए पर श्याम दो दिन में सभी को रोता विलखता छोड़कर चला गया । नेहा एकदम बूत बन गयी थी उसे कुछ भी समझ नहीं आ  रहा था बालाजी जाकर उन्हें क्या हो गया , या उस पर आयी सारी बलाए अपने उपपर  ले कर चले गए । उसके बाद नेहा का स्वास्थ्य ठीक होता चला गया । श्याम हमेशा कहते थे-" मै तेरी सारी बलाए  अपने उपपर ले लूंगा । मुझसे तेरी तकलीफ देखी नही जाती ।" आज भी नेहा श्यामऔर उसके प्यार को भूल नही पाती  । 

asmanjas

नेहा और श्याम  एक और बच्चे के बारे में सोचने लगे । उन्हें बेटे की चाह सत्ता रही थी । उनके जीवन में फिर से बाहर आ गयी । उनके घर एक नन्हा सा बेटा  आ गया । अब बे दोनों फुले नही समां रहे थे । उनका घर बच्चो से गुलजार था । हर तरफ बच्चो की किलकारियाँ गूंज रही थी । दोनों आनंद में डूबे रहते थे । इतने बरसो की चाहत अब पूरी हुई थी ।
             कुछ ही समय गुजरा था कि विपदा ने उन्हें फिर से घेर लिया । श्याम के पेट में बहुत दर्द रहने लगा । वो दर्द को बर्दास्त नहीं कर पाते थे नेहा से उनकी पीड़ा देखी  नही जाती थी । उन्होंने डॉक्टर को दिखाया उनके अनुसार श्याम को अपेंडिक्स का दर्द था । उसका इलाज सिर्फ़ ऑपरेशन था । ऑपरेशन करवाने की हिम्मत जुटाना बहुत मुश्किल हो रहा था क्योंकि नेहा की उम्र भी अभी बहुत कम थी । तीन छोटे -छोटे बच्चो की जिम्मेदारी के  साथ अस्पताल के चककर लगाना नेहा के बस की बात नहीं थी । उन्होंने एक दूसरे से विचार-विमर्श किया तब श्याम ने कहा थोड़े और बच्चे बड़े हो जाये तब देखा जायेगा । धीरे -धीरे समय गुजरने लगा पर श्याम का दर्द कम होने की जगह बढ़ता ही जा रहा था । जब दर्द सहने की ताकत खत्म होने लगी तब उन्होंने ऑपरेशन करवाने का  सोचा । उन्होंने श्याम के घरवालो को बुलाया । वे सब उनके घर आकर रहने लगे तब श्याम ने डॉक्टर के पास जाकर ऑपरेशन करवा लिया। 
             नेहा  दिन -रात श्याम के साथ अस्पताल में ही रहती थी उसे श्याम के सिवा कुछ सूझ नहीं रहा था । उसके दिमाग में सिर्फ श्याम की बीमारी के आलावा कुछ नहीं था ।  नेहा चाहती थी श्याम जल्दी से जल्दी ठीक होकर घर आ जाए । पर उन्हें १० दिन तक डॉक्टर ने अपनी देखभाल में रखा । इस बीच उनकी दूसरी बेटी करुणा बीमार पड़  गयी । उन्होंने उसकी बीमारी पर ज्यादा ध्यान नही दिया । नेहा को लग रहा था कि  बड़े करुणा को संभाल लेंगे । करुणा को बुखार हो गया था । बुखार का इलाज ४ दिन चला । पांचवे दिन करुणा उन्हें छोड़कर जा चुकी थी । एक तरफ पति की देखभाल दूसरी तरफ करुणा की मौत का गम , इसी बीच श्याम उनसे   बेटी करुणा के बारे में पूछते नेहा झूठ बोल देती" सब ठीक हे ।" एक तरफ बीमार पति दूसरी तरफ करुणा का दुःख नेहा के लिए स्वयं को सम्भालना कठिन हो रहा था । 
          करुणा उनके सब बच्चो में सबसे सुन्दर थी । वो श्याम की लाड़ली थी दोनों करुणा को सबसे ज्यादा प्यार करते थे । श्याम जब भी नेहा से पूछते करुणा के बारे में ही पूछते । नेहा की आखो में आंसू आने को होते वो मुश्किल से अपनी भावनाओ पर नियंत्रण रख पाती और  कहती -"चिंता मत करो सब ठीक है ।" इस तरह १० दिन बीत  गए । 
          श्याम से बच्चो की जुदाई बर्दाश्त नहीं हो रही थी । उन्होंने घर  आते हे सबसे पहले बच्चो को अपने पास बुलाया । बच्चो के बीच करुणा को ना  पाकर  बोले - " करुणा को मेरे पास लाओ । "नेहा की आँखों में रुका सैलाव वह निकला । श्याम को कुछ भी समझ नही आ रहा था नेहा इतनी जोर से क्यों रो रही है । उन्होंने व्यग्र होकर पूछा -" क्या हुआ । तुम क्यों रो रही हो । " कुछ देर में नेहा की भावनाओ का तूफान रुका तब नेहा ने बताया -"करुणा भी उन्हें छोड़कर चली गयी । 'यह सुनकर श्याम भी असहज हो गए वो आदमी होकर रो नहीं सकते थे । लेकिन उनकी पीड़ा उनको देखकर समझी जा सकती थी । 
            उन दोनों को बच्चो को लेकर सोचा हुआ डर हमेशा सच हो जाता था । वो डर के कारण अपने बच्चो के लिए कोई नई चीज नही लाते  थे । उन्होंने ५ साल की उम्र तक बच्चो को दुसरो के दिए हुए   कपड़े  ही पहनाये । शायद इस टोटके से ही उनके बच्चे जीवित रह सके । भगवान  उनकी बार -बार परीक्षा ले रहा था । नामालूम वो अपनी इस तरह की परीक्षा से कब तक जूझते रहेंगे । 

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नेहा अपने शहर में दुबारा से जीवन की जद्दोजहद में लग गयी । नेहा के पति डॉक्टर होने के कारण उसे भी नर्सिंग की पढ़ाई करने के लिए जोर देने लगे । उनके अनुसार दोनों एक व्यवसाय में रहेंगे तो साथ रहने का मौका ज्यादा मिलेगा । नेहा ने पति स्याम की इच्छा को पूरा करने के लिए नर्सिंग की पढ़ाई  शुरू कर दी कुछ समय में नेहा की पढ़ाई  पूरी हो गयी । उन दोनों ने मिलकर एक क्लिनिक खोला उसमे दोनों काम करने लगे । उनका जीवन सुचारू रूप से चलने लगा ।
           अब नेहा ने अपना परिवार बढ़ाने के बारे में सोचा । उनके परिवार में पहले  बच्चे के  समय कुछ दिक्क़ते पैदा हो गयी।  डॉक्टर  के अनुसार - " हम माँ या बच्चे में से किसी एक को ही बचा पाएंगे ।" उनके पति को जब कागजो पर दस्तखत करने पडे  तो उनके  मन की आप कल्पना कर सकते हो । उन्हें कितनी तकलीफ हो रही होती थी । उनका पहला बच्चा संसार में आ गया उन्हें उसके जीवित बचने की बहुत ख़ुशी हो रही थी । उनका घर खुशियो से भर गया । वो पुराने सारे गम भूल कर उसका पालन पोषण करने लगे लेकिन भगवान से उनकी खुशिया देखी  नही गयी वह बच्चा केवल दो महीने ही जीवित रहा । कुछ ही समय में सारे  सुख देकर दुनिया से चला गया । उनकी दुनिया वीरानी ओर बेरौनक हो गयी ।इस बच्चे के कारण नेहा के शरीर में परेशानिया पैदा हो गयी थी । जिनका इलाज नहीं हो पा रहा था । एक तरफ बच्चे का दुःख ,दूसरी और अपने शरीर की परेशानिया उसके दुखो को बढ़ाती  जा रही थी ।
           धीरे-धीरे नेहा और उसके पति दुःख से बाहर आये । उन्होंने दूसरे बच्चे के बारे में सोचा फिर उनके जीवन में खुशियो की झलक दिखाई दी ।फिर वही विडंबना डॉक्टर ने फिर कागजो  पर दस्तखत करवाये -"माँ बचेगी या बच्चा "। उनके घर एक बेटे ने जन्म लिया ।  अब वे दोनों बच्चे की परवरिश के प्रति काफी सतर्क थे उन्होंने अपनी माँ को बुलवा लिया था अब कोई लापरवाही नहीं होने देंगे । उनकी आँखों का तारा  उनकी आँखों के सामने बड़ा होने लगा । भगवान से फिर उनकी खुशिया ना  देखी  गयी ये बच्चा ६ मास का हो कर चला गया । उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि  भगवान उन्हें किस गलती की सजा इस रूप में दे रहा हे हर बार  बच्चा जीवित पैदा होता हेफिर  कुछ समय में उनके जीवन से चला जाता हे । अब वे लोग अपने दुःख को भूलने के लिए पूजा -पाठ में लगे रहने लगे । साधारण इंसान के बच्चे की परवरिश में गलती हो सकती हे पर माँ-पिता दोनों डॉक्टरी की पढ़ाई  कर चुके है । बड़ो का साथ भी रहा पर बच्चा अब भी जीवित नहीं रहा । उन्हें कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा हे ।
                   भगवान जितना उनसे बच्चे छीनते  जा रहे थे उतनी ही उनके जीवन में बच्चे की इच्छा बड़ती  जा रही थी । उनके जीवन में उम्मीदों की रोशनी दिखायी दी । अब उनके जीवन में उत्साह नहीं था बल्कि डर लग रहा था कि अब क्या होगा उनकी उम्मीदे पूरी होंगी या फिर रौशनी की किरण धुंधला जाएगी । फिर वही डॉक्टर की लिखापड़त के बाद एक बच्ची ने जन्म लिया । ये लड़की ठीक-ठाक  रही इसके बाद एक और बच्ची ने जन्म लिया ।  अब वे दोनों बेटियो के साथ खुश थे उनके जीवन की खुशिया जैसे वापस लोट आयी थी अब वे दोनों बेटियो के साथ जिंदगी के मजे ले रहे थे ।
                      

pyar

नेहा बड़ी ही गंभीर और तेज तरार ओरतो में आती  थी । उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली था ।  हर इंसान को अपने बस में करने का हुनर उनमे था । बचपन से ही हर कोई उससे प्रभावित हो जाता था । वो बोलने में बहुत चतुर थी । सामने वाले के मन में उत्तर कर उसकी बात जान लेना उनके लिए मुशकिल  नहीं था । वो जिससे भी जो करने के लिए कहती वो बिना ना -नुकुर किये काम कर देता था में उनसे समझने की कौशिश करती।  वो हमेशा  कहती -"इंसानो से काम करवाना मेरे लिए कोई मुश्किल नहीं हे में जव भी हारी  हु भगवान  से हारी हूँ । उनके बारे में जितना जानती उतना ही भगवान पर भरोसा बढ़ता जाता ।
                 कॉलेज के समय की बात हे एक लड़का राज उन्हें बहुत पसंद करता था । वो हर हाल में उनसे शादी करना चाहता था । नेहा उसे इतना पसंद भी नहीं करती थी सिर्फ बात तक ही सब कुछ सीमित था । पर उसे इसके आलावा भी बहुत उम्मीदे थी । ये बात नेहा समझ नहीं पाई थी । उसने उसकी दोस्ती को सिर्फ दोस्ती ही समझा था । राज उसके घर के पास ही रहता था । उसका उनके घर में आना -जाना था । नेहा उसको इतनी गहराई तक समझने की कौशिश भी नहीं करती थी ।
          एक बार नेहा के अभिभावक शहर से बाहर एक शादी में चले गए ।नेहा के पेपर के कारण वह शादी में ना  जा सकी । उसके पास एक बूढ़ी औरत को उसकी देखभाल के लिए छोड़ वे चले गए थे ।  वह अकेली घर में रह गई । इतने में राज उसके घर आ गया । राज नेहा से बात करने लगा वो भी उससे बाते करती रही कुछ समय बाद राज अपने घर चला गया । उस दिन नेहा के घर में एक बुड़ी औरत भी थी उसने इतना ध्यान नहीं दिया । कुछ समय बाद नेहा के घरवाले वापस आ  गए ।
           राज उसे गहराई   से  चाहने लगा था वो इस रिश्ते को  अंजाम तक पहुचाना चाहता था उसने उसके पिता से शादी के बारे में बात चलाई पर उन्होंने साफ मना  कर दिया । उसे बहुत गुस्सा आ  रहा था । उसने गुस्से में काफी कुछ  गलत बोल दिया । जिसे सुनकर नेहा के पिता जी भी भड़क गए उन्होंने कह दिया -" जा तुझसे में अपनी  बेटी की शादी नहीं करता जो तेरे मन में आये कर ले ।" राज हर हालत में नेहा से शादी करना चाहता था । उसने नेहा के बारे में गलत बाते  फैलानी शुरू कर दी ।
         उन्हें सुनकर नेहा के पिताजी को लगने लगा दोनों एक दूसरे को पसंद करते होंगे शायद में ही गलत हु उन्होंने नेहा से पूछा -"क्या तुम राज से शादी करना चाहती हो । " पर राज ने उसके बारे में इतना कुछ गलत अफवाह फैला दी थी कि जो उसके मन में प्यार की नन्ही सी चिंगारी जल रही थी वो भी बुझ गयी थी । नेहा ने उन्हें साफ मना  कर दिया । " मुझे राज से शादी नहीं करनी ।"
        राज और नेहा एक दूसरे को पसंद करते थे । पर राज की जल्दबाजी ने सब कुछ बिगाड़ दिया । यदि राज उसकी पढ़ाई पूरी होने का इंतजार कर लेता तो शायद दोनों साथ होते । आज भी नेहा के मन में राज की यादे  बसी हुए है । राज के कारण नेहा अपने शहर में इतनी बदनाम हो गयी उसकी शादी होना मुश्किल हो गया । उससे कोई भी लड़का शादी नहीं करना चाहता था । शादी के नाम से रिश्ते बाले बिदक जाते । राज भी यही चाहता था कि  जब उसकी शादी के लिए कोई तैयार नहीं होगा तब हार कर उसके पिताजी राज से ही अपनी बेटी की शादी कर देंगे । जब नेहा की शादी के लिए हर तरफ से ना  होने लगी । एक दिन हार कर नेहा के पिताजी बोले -" तेरी शादी राज से ही कर देते है । तू शहर में इतनी बदनाम हो गयी हे कि तुझसे कोई भी लड़का अब शादी नहीं करेगा । " अब राज से नेहा को इतनी नफरत हो गयी थी । उसने अपने पिताजी से साफ मनाकर दिया "-में बिना शादी के रह लुंगी पर राज से शादी नहीं करुँगी । उसने मेरी जिंदगी का  खिलवाड़ बना डाला हे ।" उसके पिताजी भी अब चुप हो गए ।
      नेहा की शादी के लिए उसके पिताजी जो प्रयास कर रहे थे रंग लाये । उसका एक गाँव  में डॉक्टर से रिश्ता  तय हो गया । कुछ समय नेहा पति के साथ गाँव  में रही । बाद में उनकी नौकरी शहर में लग गयी वह वापस अपने शहर आ  गयी । आज भी जब नेहा राज को देखती हे उसके मन में हूक  सी उठती हे । इसने ऐसा क्यों किया ।
         

vyavhar

मेरे  सह्कर्मी जयपाल जी  अलग तरह के इंसान थे  । उन्हें देखकर समझ ही नहीं आता था । कि  गुस्सेल हे या शांत हे जितना उनके बारे में जानने की कौशिश करती उतनी ही उलझती जाती थी । जितना मुझे उनके बारे में पता चलता पुराना ज्ञान उससे विपरीत होता था । वो देखने में बहुत बूढ़े लगते थे । उनके सारे  बाल सफ़ेद हो चुके थे । वो मुँह  में बत्तीसी लगाते थे । उनके दो बच्चो की शादी हो चुकी थी । इस हिसाब से मुझे उनकी उम्र ५० के आसपास लगती थी । एक दिन उनकी जन्मतिथि मेरे सामने आई उसे देखकर में हैरान रह गयी उसके हिसाब से वे मुश्किल  से ३५ साल के थे । मुझे बहुत हैरानी हुई ।  मेने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा-" मेरे दांतो में पायरिया हो गया था इसलिए सारे दांत ख़राब हो गए । इससे पहले मैने किसी के दांतो पर पायरिया का असर नहीं देखा था । मेरी छोटी उम्र में शादी हो गयी थी इसलिए बच्चे भी जल्दी हो गए । "
         उनका परिवार गाँव में था । वे छूट्टी  में गाव जाते थे । बाकि समय शहर में रहते थे । इस बीच उनके दो बच्चो की शादी भी हो चुकी थी । वो बहुत ही हंसमुख थे  उन्हें देखकर नहीं लगता था कि  वो हमसे ज्यादा बड़े हे बड़ो की तरह कभी गंभीर नहीं दिखते  थे । हम उनसे समवयस्क की तरह मजाक करते थे वे कभी बुरा नहीं मानते थे । इसी कारण हम उंन्हे  गंभीरता से नहीं लेते थे । हमें  वहाँ काम करते हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे । अभी वहाँ सभी का स्वभाव समझने के कौशिश कर रहे थे ।
        उन्ही दिनों मेरी बेटी होने वाली थी । उसका सही ढंग से विकास नहीं हो रहा था । डॉक्टर के अनुसार मुझे पूरा आराम करना चाहिए था । ये सब सम्भव नहीं हो पा रहा   था । मेने सहकर्मियों से इस विषय पर बात की । उन दिनों परीक्षा चल रही थी । वे मुझसे  सहयोग करने के लिए तैयार हो गए । मेने अपने पेपर जब मेरे नाम से इशू किये जा रहे थे । मेने उन अद्यापिकाओ के नाम लिखवा दिए जो मेरी सहायता करने के लिए तैयार थी । उनकी भलमनसाहत देखकर खुशी  हो रही थी । ऐसा नहीं था कि में काम से बचने का बहाना  बना रही थी बल्कि डॉक्टरों के अनुसार अगर मैने अब भी आराम नहीं किया तो माँ या बच्चे में से कोई एक ही बचेगा ।  ये सोचकर मुझे डर लगता रहता था ।  "यदि में मर गयी तो मेरी बड़ी बेटी को कौन देखेगा ,उसका क्या होगा । "उन दिनों प्रसब के लिए तीन महीने की छुट्टी मिलती थी । मेरे बच्चो की देखभाल के लिए कोई नहीं था । इसलिए में पुरे समय तक विद्यालय जा रही थी । ताकि बच्चे की देखभाल तीन महीनो तक तो कर सकू । मुझे पांच बण्डल मिलने थे । पर मेने अपने नाम से सिर्फ तीन  बण्डल ही इशू करबाए । मुझे लग रहा था यदि सारे  बण्डल मेरे नाम से इशू हुए तो और लोग सहयोग नहीं करेंगे ।
           हर इंसान एक जैसा नहीं होता वही महेश नामक अद्यापक अड़ गये -" जितने बण्डल रेखा चेक करेगी उतने ही मै चेक  करूंगा ।" प्रधानाचार्या ने उन्हें मेरी तबियत का हवाला दिया पर वो अड़े रहे । मेडम के लिए उन्हें सम्भालना मुश्किल  हो गया  था । महेश जी उन लोगो में से थे जो अपना आधा काम मुझसे करवा लेते थे मुझे काम करने की आदत थी चलते -फिरते काम कर देती  थी मुझे काम करने में कोई परेशानी नहीं होती थी अब में मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से कमजोर हो गयी थी । महेश जी अपने तीन बण्डल मैडम  के सामने रख  कर चले गए । में उन बंडलों को उठा कर स्टाफ  रूम में आ गयी । जो आंसू मेडम के सामने नहीं बहे थे । वे आंसू अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे ।
            इतने में जयपाल जी वहाँ आये उन्होंने कहा -" चिंता मत करो में तुम्हारे बण्डल चैक  कर दूंगा । "में आज भी उनका अहसान नहीं भूल पाँति हूँ । मेरे बुरे वक्त मै उनका काम आना मुझे आज भी उनकी याद दिला जाता है ।
           उस वाकये के बाद में स्वस्थ होकर वापस आ गयी उसके बाद में महेश जी का सामना नहीं करती थी क्योंकि वे काम को लेकर मुझे ढूंढ़ते थे । पर मेने भी कसम खा ली थी कि  में इनका काम कभी नहीं करूंगी । ऐसे ही वक्त बीतता  जा रहा था । महेश जी मुझसे बहुत बड़े थे । उन्हें मै  पलट कर जबाब तो नहीं दे सकती थी । इसलिए उनके सामने नहीं आती  थी ।
           जब महेश जी  की सेवानिवृति की पार्टी हो रही थी उन्होंने कहा - "रेखा आज भी कही  छिप कर बैठी होगी । मेरे सामने नहीं आएगी ।"  दूसरे  लोगो को मेरी हंसी  सुनाई दी में उस दिन भी कुछ नहीं बोली । में ऐसे ख़ुशी के मौके पर गलत शब्द  बोलकर उनका अपमान करना नहीं चाहती थी पर बुरे वक्त का  उनका व्यवहार में आज भी भुला नहीं पाती  हूँ । पर महेश जी के बारे में सोचकर  लगता हे कि  कोई इंसान इतना आलसी और स्वार्थी क्यों होता है । कि कोई   इंसान उसके सामने आना ही ना चाहे । जयपाल जी का सद्व्यवहार मुझे आज भी लोगो की मदद करने के लिए उत्साह से भर देता हे । में उनका उपकार आज भी नहीं भुला पाती हूँ ।

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...