bete

           रेखा के जीवन में अब कोई ऐसी इच्छा नहीं थी जिसे अधूरा समझा जाए । मानो  भगवान ने सब पूरी कर दी है। रेखा अपने जीवन से पूरी तरह से संतुष्ट थी । रेखा अपना समय पोते -पोतियों के साथ बिताती थी । \           बच्चो की ख़ुशी भी ज्यादा दिन तक नही रहती । ऐसा ही रेखा के साथ हुआ । तीनो बेटो और बहुओ को लगने लगा रेखा अपना प्यार बराबर नही बाँट रही हे ।उनकी बातो और व्यंग्यो  से प्रकट होने लगा । रेखा इन बातो पर ध्यान नही देती थी । इतने बड़े परिवार को सम्भालना हंसी -खेल नही होता हे दूर से देखने वालो को सब आसान लगता है  ।
          बेटो का गुस्सा शब्दों में मुखर होने लगा । रेखा को भी महसूस होने लगा । कुछ गलत हो रहा हे उसने तीनो बेटो को अपने पास बुला कर उनकी उलझन के बारे में चर्चा की । उनके बेटो के अंदर मकानो को लेकर गुस्सा था । तीनो बेटो को जो घर मिले थे । उन सब की बाजार कीमत अलग -अलग थी उन मकानो की कीमत जगह के हिसाब से दुगनी ,तिगनी थी । तीनो में मकान के कारण कड़वाहट भर्ती जा रही थी । इस तरह से रेखा ने कभी सोचा ही नही था । उसके हिसाब से उसने तीनो बेटो के लिए तीन मकान का इंतजाम अपनी सारी  जमा पूंजी लगा कर किया था । उसके हिसाब से तीनो बेटो का खुश होना चाहिये  था पर मकान ही तीनो की लड़ाई का कारण बन गए थे उसे समझ नही आ  रहा था इस उलझन को कैसे सुलझाए ।
         रेखा अब बेटियो वालो को अच्छा कहने लगी थी । यदि मेरी एक बेटी होती वह मेरे सुख -दुःख की साथी होती । बेटिया कम पढ़े  या ज्यादा पढ़े  उनकी शादी हो जाती हे उनको शादी में सिर्फ एक बार देना पड़ता हे बेटो की पढ़ाई का विशेष ध्यान रखना पडता है । यदि अच्छी तरह से पढ़ाई नही करेंगे तो नौकरी नहीं मिलेगी । नौकरी के बिना शादी होना मुश्किल हो जाता हे । शादी हो जाए तो  उनके लिए  गृहस्थी चलाना  मुश्किल होता है । बेटो  को मकान भी खरीद कर देना पड़ता हे उसके बाद भी उनके लिए उस मकान की कोई अहमियत नही होती । मकान होने के बाद भी वो उसकी कीमत और जगह को लेकर उलझते रहते हे । उनके लिए बड़ो के त्याग और बलिदान की कोई अहमियत नही होती । जबकि  बेटिया अपने घर जाकर अपनी गृहस्थी बसा लेती हे । कभी कभार आती  है  जो दे दो अपने हाथ से ले जाती हे ।  कोई गिला शिकवा नही करती ।   

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