#queen of indore ahilyabai

                    इंदौर की रानी अहिल्याबाई 

                             


   भारत के इतिहास में कुछ औरतो के नाम ही स्वर्णाक्षरो में लिखे दिखाई देते है। जिन्होंने समाज और देश की भलाई के लिए जीवन  लगा दिया। उस कुल के अन्य लोगो का इतना नाम नहीं सुना जाता है। जितना इन औरतो का. 
        भारत में   बहुत कम औरते है जिन्होंने हालात  को बदलने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया। अंतत वह हालत को बदलने में समर्थ हुई। लोगो ने उनके बलिदान को अमर  बनाने में देर नहीं लगाई। 
        अहिल्याबाई जिस दौर में दुनियां में आयी थी। उस समय पुरुष  के होने से औरत का जीना और मरना  निश्चित होता था। लेकिन उस समय युद्ध के हालात  थे। जिस कारण युद्ध में अधिकतर लोग मर जाते थे। बाकि बचे हुए लोग बीमारी के कारण समय से पहले दुनियां छोड़ जाते थे। औरतो के हाथ में केवल उनकी जिंदगी के लिए भगवान  के सामने हाथ जोड़ना और मन्नते मांगना ही  था। 
           ऐसे समय में अहिल्याबाई पति की छोटी उम्र में मृत्यु के मुँह में चले जाने पर खुद भी मर जाना चाहती थी। लेकिन ससुर मल्हारराव के कहने पर उन्होंने देश की बागडोर सँभालने का बीड़ा उठाया। शुरू में ससुर के साथ बैठकर राजकाज  करना समझा और संभाला। उनके जाने के  बाद बेटे मालेराव के नाम पर राज्य की बागडोर संभाली। जबकि उस समय में किसी भी राज्य में शासिका, रानी नहीं थी। वे ऐसे समय में अपने राज्य को उजड़ते नहीं देख सकती थी। उन्होंने अपने आंसुओ को पोंछा और राज-काज में लग गई।
         पति  और बेटे की छोटी  उम्र में मृत्यु किसे नहीं दहला देगी। जबकि उसे लाढ -प्यार से पाला  गया था।बचपन से कभी उसे बहादुर नहीं समझा गया था। जो औरत पर्दो में रहने वाली थी। वह एक समय पुरुषो के क्षेत्र में आकर कूटनीति की  कुटिल चालो  का सामना करने लगी। उस समय उसका दिल कितना रोया होगा। जो कोमलांगी थी उसे युद्ध का सामना करना पड़ा। जिंदगी में हार -जीत अलग है। मानसिक रूप से युद्ध के लिए तैयार होना बहुत बड़ी बात है। जिसका उन्हें सामना करना पड़ा।
      लोग ऐसे समय में दीन -दुनियां भूल जाते है। लेकिन  उनपर एक परिवार का नहीं बल्कि अनेको परिवार का भार  था। यदि वह  हिम्मत हार  जाती तब उनकी जनता का क्या हाल  होता। एक रानी एक बार नहीं बल्कि अनेको बार मरती और जीती है। उसकी सांसो पर उसका अपना अधिकार नहीं होता बल्कि जनता के लिए उसे जीना पड़ता है। कहा  जाता है -सिंहासन कभी खाली  नहीं रहता बल्कि राजा की मौत की घोषणा करने से पहले दूसरा राजा बना दिया जाता है। वरना  देश में अराजकता फ़ैल जाती है। जिसके कारण जान और माल की हानि होती है। 
       उन्होंने एक परिवार के आलावा पूरे  राज्य की जिम्मेदारी अपने कमजोर कंधो पर उठाई और जीते जी उनकी रक्षा की  .जो लोग केवल   अपने लिए जीते है। उन्हें जमाना जल्दी भुला देता है। जबकि जो जमाने के लिए जीते है वे हमेशा के लिए अमर  हो जाते है। इसलिए अब तीन सौ साल बाद भी आपको रानी  अहिल्याबाई याद  है। मुझे आज  उनके कार्यो को नमन करने का मन करता है। 

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