महाकालेश्वर मंदिर में तिलक
जब हम इंदौर से उज्जैन पहुंचे तब हमें वहां पर सफाई की कमी दिखाई दी। मैंने लोगो को सड़क पर थूकते देखा तब चालक से पूछा इंदौर और उज्जैन में इतना फर्क क्यों है। तब उसने बताया यहां जुर्माना इतनी सख्ती से वसूल नहीं किया जाता है। जितनी सख्ती से इंदौर में वसूलते है।
महाकालेश्वर मंदिर से काफी दूर हमारे चालक ने उतार दिया। उसने बताया यहाँ से आगे आपको पैदल जाना पड़ेगा। हम जैसे दिल्ली वालो के लिए भरी गर्मी में इतनी दूर चलना बहुत भारी लग रहा था। जबकि रेलवे स्टेशन से 50 Rs में ऑटो वाला वहां तक छोड़ गया था। लेकिन वह दूरी पैदल चलने और ऑटो में जाने के बराबर ही थी। कुछ लोग स्टेशन से महाकालेश्वर पैदल ही जा रहे थे। उन्हें देखकर हमें अपनी जवानी के दिन याद आ गये जब हम भी मौसम की परवाह किये बिना चलते रहते थे।
हमें मंदिर के लगाए बेरिकेड पार करते ही प्रसाद बेचने वाले और तिलक लगाने वाले मिलने लगे। उन्हें देखकर हैरानी हो रही थी। ये इतनी संख्या में क्यों है। बाद में इसका रहस्य पता चला। यहाँ पर जितने लोग मंदिर देखने आते है। वे सब दूसरो के देखादेखी तिलक जरूर लगवाते है। मै इन बातो पर विश्वास नहीं करती। क्योंकि हिन्दू होने के कारण एक बिंदी हमेशा मेरे माथे पर होती है। इसलिए दूसरी बिंदी लगवाने की कभी इच्छा नहीं होती है।
सबके देखादेखी मेरे साथी ने भी तिलक लगवाया। मुझे लगा इन 10 रूपये में यह मुझे भी तिलक लगा देगा लेकिन मेरे बोलने पर उसने अनिच्छा से तिलक लगाया वह कोई खास सुंदर नहीं था। वह मुख्य मंदिर के पास तिलक लगा रहे थे।
उन्हें देखकर जब हम तिलक लगवाने लगे तब मुझे उसके थाल में पड़े पैसे देखने का मौका मिला। उसके थाल में जैसे ही ज्यादा नोट इकठे हो जाते वह उन्हें नीचे के बर्तन में डाल देता। मुझे उस बड़े बर्तन में इतने अधिक नोट देखकर हैरानी हुई। बहुत सारे लोगो को एक महीने में इतना वेतन नहीं मिल पाता। जितना उसने ख़राब सा तिलक लगा कर कुछ घंटो में कमा लिया था।
उससे ज्यादा मुझे वे लोग अच्छे लग रहे थे जो पैसा लेकर सही और सुदर तिलक लगा रहे थे। आपको भी यही सलाह दूंगी। जो रस्ते में तिलक लगाने के लिए मिलते है उनसे ही तिलक लगवा लीजिये वो मन से काम करेंगे। आपको उनके काम के पैसे देकर ख़ुशी भी होगी
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