#virana

     कुछ लोगो का जीवन बहुत ही ज्यादा परेशानियों से भरा होता है। उन्हें देखकर लगता है। उनका जीवन परेशानियों का पर्याय बन गया है। उनके जीवन में इतने अधिक हादसे होते है। कोई साधारण इंसान टूट के बिखर जाये। लेकिन वे जीवट वाले लोग उन परेशानियों से हर बार उबर जाते है। उनके लिए मुशीबत रोकती नही बल्कि दुगने जोश से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। ऐसे ही वेदप्रकाश का जीवन था।
     ये काफी समय पहले की बात है उन दिनों भारत में मृत्यु दर   बहुत ज्यादा थी. हर घर में आठ या दस बच्चे  होना आम बात थी। उसपर बड़े होने तक एक या दो बच्चे जीवित रह जाये ऐसे परिवारो को खुशनसीब समझा जाता था। मैने  ऐसे कई परिवार सुने है। जिनमे बाइस  बच्चे हुए लेकिन जीवित एक ही बच्चा रह पाया। उन माओ का क्या हाल   होता है। इसकी कल्पना से भी दिल मसोसने लगता है।
       उन दिनों का समाज बहुत ही दकियानूसी था। एक औरत  एक बच्चे को जन्म देते हुए दूसरा जन्म लेती है। नो महीने की दिक्क़ते उस पर बच्चे के जन्म की पीड़ा सहते हुए नए  जीव को धरती पर लाना। औरत के लिए दूसरी जिंदगी होती थी। उस समय में औरतो की मृत्यु दर भी बहुत अधिक होती थी।
        मै  आपको ऐसे परिवार के बारे में बताना चाहती हूँ जिसमे एक औरत  हरप्यारी  के बारह  बच्चे हुए पर उसकी आँखों के सामने नो बच्चे ख़त्म हो गए। उसकी  हालत बहुत बुरी हो गयी थी।  उसके मन से जीने की इच्छा ख़त्म हो गयी थी। वह हरदम चुप रहती थी। उसका खाना पीना सब कम  हो गया था।उसके मन में डर  बैठ  गया था भगवान  उसके बाकी  तीनो बच्चो को कभी भी अपने पास बुला लेंगे।
     उन दिनों टायफायड की बीमारी का कोई इलाज नही था। हरप्यारी के तीनो बच्चो को टायफायड हो गया  उनकी देखभाल में वो दिन रात लगी रहती। यथासंभव उनका इलाज करवाती रहती।
     वह अपने पति मुंशीराम से दुःख भरे शव्दो में कहती -कोई अच्छा डॉ लाओ जो मेरे बच्चो को ठीक कर सके।
   उन्होंने कई डॉ बदल दिए पर उन्हें रोग का इलाज नही मिल सका। उनका जीवन से विश्वास उठता जा रहा था। आये  दिन अलग -अलग जगहों से दवाइयाँ मंगवायी  गई। पर रोग को कोई डॉ पकड़ नही पाया। हरप्यारी की एक बेटी बारह  साल की। दूसरी बेटी आठ साल की थी बेटा वेदप्रकाश केवल चार साल का था। तीनो अलग -अलग बिस्तर पर पड़े हुए थे हरप्यारी उनकी सेवा करते हुए अपनी भूख प्यास सब भूल गयी थी। गहरी  नीद क्या होती है इसका उसे ध्यान ही नही था। बच्चे की कराह के साथ ही वह सजग हो जाती थी।
        साधनो की कमी के  कारण उसके सामने उसकी  एक के बाद दोनों बेटियाँ भी चली गयी। वह निराशा के गर्त में डूब गयी। उसका मन वेदप्रकाश से भी विमुख हो गया। उसके मन में बैठ गया जब उसके ग्यारह बच्चे उसकी आँखों के सामने चल बसे यह भी चल बसेगा।
        अब वह हर समय भगवान  से प्रार्थना करती रहती -भगवान  वेद को जीवन दे दे उसके बदले मुझे उठा ले। में बच्चो के बिना कैसे जी पाऊँगी।
       वह हर समय भगवान के ध्यान में लगी रहती।भगवान ने जैसे उसकी सुन ली उसकी तबियत दिनों -दिन गिरती चली गयी वेद धीरे -धीरे उठ खड़ा हुआ। जिस दिन वेद पूरी तरह स्वस्थ हुआ। हरप्यारी उसको देख कर खुश हुई। उसके कुछ दिनों बाद हरप्यारी ने आँखे मूंद  ली।  इसे कहते है जीवन की विडंबना। हरप्यारी अपना जीवन देकर इस चार साल के बच्चे को छोड़ के हमेशा के लिए अनंत में समां गयी।
         वेद सही मायने में माँ की मौत को समझने के काबिल नही था। माँ की चिता को अग्नि देने के लिए जब उसे लकड़ी पकड़ाई गयी। उसके लिए यह भी एक खेल था। अभी वह  जिंदगी और मौत का अंतर समझ सके इतनी उम्र नही थी।
      अब खाली घर को देखता तब  वेद  पिताजी से पूछता- माँ कहाँ  है। दीदी कहाँ  चली गयी। मेरे साथ खेलने वाला कोई क्यों नही है।
     वेद की नासमझी पर मुंशीराम अपने आंसू मुश्किल से रोक पाते। वेद तो उनके आंसुओ का मतलब और दुःख को समझने के काबिल नही था।  मुंशीराम रात  को सुनी -सुनी आँखों से आसमान को देखते। उनको घर का सूनापन काटने को आता। तब अकेले में उन्हें मृत बच्चे और पत्नी बहुत याद आती। उनके आंसू रात  के वीराने में रुक नही पाते।  दिन के समय बेटे की ख़ुशी के लिए अपने आंसू छुपाये रहते पर इतना अधिक दुःख रात के समय फुट पड़ता।      
  

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