#SOTELI MA

        श्यामा के विवाह को कई साल बीत  गए वह उम्मीद से थी। उनके घर में रौनक आ  गयी। उनके घर में बेटी ने जन्म लिया। सब बहुत खुश थे। अब घर में उम्मीदों के चिराग रोशन होने लगे वेद को खेलने के लिए खिलौना मिल गया था। लेकिन अब उसका काम पहले से ज्यादा बड  गया था। पर उसके लिए उसकी छोटी बहन मन बहलाव का साधन थी। जब भी वेद अकेला या खाली  होता बहन का भोलापन उसे खुशियो से भर देता। घर का काम,विद्यालय की पढ़ाई  और बहन के साथ समय पंख लगा कर उड़ने लगा। अब वेद पर बड़े होने की जिम्मेदारी आ  गयी थी क्योंकि उससे भी छोटी बहन उसके घर में आ  गयी थी। उसके बाद हर दो साल बाद उसके भाई -बहन आने लगे इस तरह नई  माँ से उसके पांच भाई बहन हो गए। अब घर में  हर समय चहल -पहल रहती। जो वेद कभी सबसे छोटा था। अब सबका बड़ा भाई बनके जिम्मेदार इंसान की तरह उसका व्यवहार हो गया। 
     श्यामा हर समय बच्चो से घिरी रहती। उसके लिए घर और बच्चो के साथ वेद का ध्यान रखना दुश्वार था। बल्कि उसे माँ के प्यार की जगह भाई बहनो की देखभाल की जिम्मेदारियों ने घेर लिया था। वेद इतना समझदार हो गया था। वह कब अपने विद्यालय का काम कर लेता था। कब खाना खा लिया। कब उसकी थकान उतरी ये सब कोई पूछने वाला नही था। अब मुंशीराम अपने पांचो बच्चो और श्यामा की जरूरत पूरी करने में इस तरह जुटे रहते की उनका एक और बेटा वेद भी है। इसकी तरफ उनका ध्यान ही नही जाता। दूसरा अपनी पत्नी श्यामा से भी थोड़ा डरते थे क्योंकि उन्हें उसकी जवानी और अपने बुढ़ापे से डर लगता था।
      कहाबत है - दूसरी माँ  के आते ही बाप तीसरा हो जाता है। अब मुंशीराम श्यामा के सामने वेद से बात करने की हिम्मत भी नही जूटा  पाते  थे। उम्र बढ़ने के साथ ही वेद को अपने अकेले होने का अहसास गहराता जा रहा था। वह चुपचाप हर समय काम में लगा रहता था। उसे देखकर लगता था वेद पैदा ही बड़ा बनने के लिये  हुआ था।
      वह अकेले में सोचता- काश उसकी अपनी माँ होती  उसे कितना प्यार करती। उसकी माँ कितनी प्यारी थी। उसने मुझे जीवित रखने के लिए अपने प्राण न्योछोवर कर दिए। कभी उसने सोचा होगा उसका बेटा  अपने घर में हर समय काम के बोझ से दब जायेगा। उसे प्यार के दो शव्द कहने बाला भी कोई नही होगा। उसका लाडला कभी प्यार के लिए इस तरह तड़पेगा।
        हरप्यारी को  मुंशीराम से भी इस तरह की उम्मीद नही होगी। कि  दूसरी पत्नी के प्यार में पड़कर अपने लाडले की सुध भी लेना भूल जायेंगे।ऐसे समय में वेद अपनी बड़ी बहनो और भाइयो के ख्यालो में खो जाता। उसके सपने ही उसे प्यार के सागर में डुबो देते असलियत में प्यार तो उससे कोसो दूर था। उसके सपनो में माँ आकर  उसके थके शरीर पर हाथ फेरती। उसके मन को संभालती और दिलासा देती। यथार्थ में तो कोई भी इंसान उसे प्यार करने वाला नही था। वेद इतना समझदार हो चूका था। वह अपने पिता से भी कभी जिद नही करता था। उसने गिला -शिकवा करना क्या होता है। यह तो जाना ही नही था। अपनी जरूरत के लिए मांगना उसे आता ही नही था। इसी तरह धीरे - धीरे  समय उड़ता जा रहा था।
        वेद ने इसी माहौल  के बीच दसवी पास कर ली। उस ज़माने में दसवी पास भी बहुत कम लोग कर पाते  थे। उस जगह उंगलियो पर गिनने लायक लोग पढ़े लिखे होते थे। सबको हैरानी होती थी वेद के हाथ में कभी किताब देखी नही। इतने बड़े परिवार के काम में ही उसका सारा समय निकल जाता था। इसने कब पढ़ाई  की। और इतने अच्छे नंबरों  से [पास हो गया।    

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