#gav ka gorav

     मनोहर शगुन को लेकर मद्रास चला गया।  अब सविता को खालीपन  अच्छा नही लग रहा था। सविता को शगुन की बहुत याद आ  रही थी। शगुन उसके  जिगर का टुकड़ा थी।  उससे दुरी उसकी याद दिलाये जा रही थी।  वह उसकी उन्नति में रोड़ा नही बनना चाहती थी।  माँ का दिल तो माँ का दिल होता है। समझाने से भी नही समझ रहा था।
    सविता उसका बचपन याद करते हुए पुरानी यादो में खो गयी।  उसने किस मुश्किल  से  अपनी  पढ़ाई  पूरी की।  नौकरी के लिए उसकी कितनी नाकामयाब कोशिशे  जिससे उसका मनोबल टूटने लगा था। उसकी जब  दिल्ली में नौकरी लगी। उसी समय उसकी उत्तर प्रदेश की नौकरी के भी आर्डर आ  गए थे। उसके लिए मन को समझाना मुश्किल हो रहा था। उसके लिए कहाँ  की नौकरी  सही रहेगी। उत्तर  प्रदेश की नौकरी प्रायमरी की थी जबकि दिल्ली की नौकरी सेकेंडरी स्कूल की थी। इसलिए उसने दिल्ली की नौकरी को ही उचित समझा। क्योंकि प्रायमरी की नौकरी में वेतन  और रुतवा दोनों ही कम थे। वहाँ गाँव के आस -पास नौकरी नही मिलती कही दूर की नौकरी करनी पड़ती। उस हिसाब से उसको उन्नति करके सेकंडरी अद्यापिका ही बनना  था इस पद तक पहुँचने  में उसे दस या बीस साल भी लग सकते थे। दोनों नोकरियो में परेशानी उठानी पड़ती इसलिए  उसने मन को पक्का करके दिल्ली की नौकरी कर ली।
    सविता की दिल्ली की नौकरी लगते ही वह  सभी की आँख का तारा बन गयी थी। अब सब अपनी बहुओ और बेटियो को सविता का उदाहरण देकर पढ़ने पर जोर देने लगे  थे । यही सविता एक समय लोगो के मनोरंजन का साधन थी। वही सवके लिए प्रेरणा का सबब बन गयी थी।  उसके गाँव  की ओरतो के लिए उसने पढ़ने का रास्ता खोल दिया था।
        अब सविता की पढ़ाई  अपने पति से ज्यादा हो गयी थी। उसकी कमाई भी पति से ज्यादा हो गयी थी। दिल्ली जैसे शहर में आकर चार साल के अंदर उसने अपने बल पर एक मकान ले लिया था। इतना आत्मविश्वास बिना पढ़ाई या नौकरी के क्या आ  सकता था। जो काम करते हुए आदमी भी झिझकते है वह काम उसने अपने दम  पर कर दिखाया था। उसके बच्चे भी माँ को गौरव की निगाह से देखते है। सविता का जज्बा है तभी तो उसके बच्चे पढ़ाई  में तरक्की कर पा  रहे है। अन्यथा उसके बच्चे भी गाँव के बच्चो की तरह जीवन गुजार रहे होते।
    कहाबत है -एक आदमी की पढ़ाई  से सिर्फ एक इंसान की पढ़ाई होती है जबकि एक औरत की पढ़ाई से तीन परिवार रोशन होते है।  सविता की पढ़ाई का फायदा उसके मायके ,ससुराल और उसके परिवार को ही नही मिला बल्कि  उसने दो गावो की औरतो की किस्मत ही बदल दी। अब दोनों गाँवो की औरतो को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा है। जिस मनोहर को "-जोरू का गुलाम लोग कहते थे।  " सभी उसकी हिम्मत और किस्मत की  दाद  देने लगे है।
     इसलिए कहा जाता है - औरतो के लिए आगे बढ़ना बहुत मुश्किल होता है। उसकी मेहनत बहुत सारी औरतो को आगे बढ़ने का रास्ता दिखा जाती है।  पढ़ी लिखी और नौकरी करने बाली  औरते किसी पर बोझ नही बनती बल्कि उनका सहारा बन जाती है। इसलिए सभी को अपनी बेटी की पढ़ाई  में कभी बाधा नहीं पहुचानी  चाहिए बल्कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। वह पढ़लिख कर आपका सहारा बन जाएगी और आपको गौरवान्वित करेगी। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...