मनोहर के घर में प्रवेश करते ही सविता और शगुन उनका बेताबी से इंतजार करती हुइ मिली। मनोहर उनकी बेताबी देखकर हैरान हो गया। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी।
मनोहर ने पूछा -क्या बात है। आज सबकूछ अलग लग रहा है।
सविता ने अपनी बेचैनी का कारण बताया। जिसे सुनकर मनोहर भी सोच में डूब गया। उसकी समझ में नही आया। क्या जबाब दे। उसने दोनों से कुछ समय सोचने के लिए माँगा। वह परिवार के बीच में आकर ख़ुशी जाहिर कर रहा था। उसके मन के अंदर बबंडर चल रहा था। उसका मन भी शगुन को इतनी दूर भेजने से डर रहा था। जो शंका सविता के मन में उठ रही थी। उन्होंने ही मनोहर को विचलित कर दिया था। सारी रात मनोहर को सही से नीद नही आयी। सुबह के समय उसकी आँख लगी जब सविता ने उसे जगाया। तब उसे लगा अभी तो सोया था। इतनी जल्दी सुबह हो गयी।
सविता और शगुन मनोहर के पास चाय लेकर आई। दोनों जिज्ञासा से मनोहर की तरफ देख रही थी मनोहर क्या निर्णय लेते है। ये निर्णय एक के पक्ष में तो दूसरे के विपक्ष में होता। अब मनोहर के लिए परीक्षा की घडी थी। वह शगुन को बहूत प्यार करता था। शगुन उसकी आँख का तारा थी। उससे उसका दुःख देखा ना जा रहा था । पर पिता का दिल उसे इतनी दूर भेजने के लिए तैयार नही हो रहा था।
मनोहर ने भी शगुन के सामने दूसरा विकल्प तलाशने के लिए कहा। शगुन इसके लिए तैयार नही हो रही थी। तब हार कर मनोहर शगुन को मद्रास में पढ़ाई के लिए भेजने को तैयार हो गया। शगुन की ख़ुशी संभाले ना संभल रही थी। मगर मनोहर और सविता चिंता में डूब गये थे।
मनोहर ने पूछा -कब मद्रास जाना है।
शगुन बोली -दस दिन के अंदर पहुँचना है।
मनोहर ने पूछा -फ़ीस के कितने पैसे लगेंगे। उनका भी इंतजाम करना है। वहाँ किसी से तेरी बातचीत हुई है। .
शगुन बोली -जो भी वहाँ के बारे में बात कर रहा है। सब कुछ अच्छा बता रहे है। हमें किसी तरह की परेशानी नही होने देंगे। सब कुछ इंतजाम कर दिया जायेगा। वे तो सब तरह से अस्वासन दे रहे है। एक बार आप चल कर देख लोगे। तब सही से पता चल जायेगा।
मनोहर ने सविता से पैसे का इंतजाम करने के लिए कहा. फिर सविता से बोला -में वहाँ जाकर छुट्टी के लिए दरख्वास्त देता हूँ। मुझे कम से कम दस दिन की जरूरत पड़ेगी। इससे कम में तो काम नही चलेगा।
तुम शगुन के जाने का इंतजाम करना। मै आते ही इसे मद्रास के लिए चल दूँगा। शगुन तुम टिकट का रिजर्वेशन करवाने की कोशिश करो। जितनी जल्दी निकल सके उतना ही अच्छा रहेगा।
एक परिवार तीन हिस्सों में बटने लगा था। आज की जिंदगी के मायने बदल गये है। लोग अपनी उन्नति के लिए कही भी जाने के लिए तैयार हो जाते है। उन्हें सुविधा से ज्यादा तरक्की मायने रखती है। पुराने ज़माने की मान्यताये अब टूटने लगी है।
मनोहर ने पूछा -क्या बात है। आज सबकूछ अलग लग रहा है।
सविता ने अपनी बेचैनी का कारण बताया। जिसे सुनकर मनोहर भी सोच में डूब गया। उसकी समझ में नही आया। क्या जबाब दे। उसने दोनों से कुछ समय सोचने के लिए माँगा। वह परिवार के बीच में आकर ख़ुशी जाहिर कर रहा था। उसके मन के अंदर बबंडर चल रहा था। उसका मन भी शगुन को इतनी दूर भेजने से डर रहा था। जो शंका सविता के मन में उठ रही थी। उन्होंने ही मनोहर को विचलित कर दिया था। सारी रात मनोहर को सही से नीद नही आयी। सुबह के समय उसकी आँख लगी जब सविता ने उसे जगाया। तब उसे लगा अभी तो सोया था। इतनी जल्दी सुबह हो गयी।
सविता और शगुन मनोहर के पास चाय लेकर आई। दोनों जिज्ञासा से मनोहर की तरफ देख रही थी मनोहर क्या निर्णय लेते है। ये निर्णय एक के पक्ष में तो दूसरे के विपक्ष में होता। अब मनोहर के लिए परीक्षा की घडी थी। वह शगुन को बहूत प्यार करता था। शगुन उसकी आँख का तारा थी। उससे उसका दुःख देखा ना जा रहा था । पर पिता का दिल उसे इतनी दूर भेजने के लिए तैयार नही हो रहा था।
मनोहर ने भी शगुन के सामने दूसरा विकल्प तलाशने के लिए कहा। शगुन इसके लिए तैयार नही हो रही थी। तब हार कर मनोहर शगुन को मद्रास में पढ़ाई के लिए भेजने को तैयार हो गया। शगुन की ख़ुशी संभाले ना संभल रही थी। मगर मनोहर और सविता चिंता में डूब गये थे।
मनोहर ने पूछा -कब मद्रास जाना है।
शगुन बोली -दस दिन के अंदर पहुँचना है।
मनोहर ने पूछा -फ़ीस के कितने पैसे लगेंगे। उनका भी इंतजाम करना है। वहाँ किसी से तेरी बातचीत हुई है। .
शगुन बोली -जो भी वहाँ के बारे में बात कर रहा है। सब कुछ अच्छा बता रहे है। हमें किसी तरह की परेशानी नही होने देंगे। सब कुछ इंतजाम कर दिया जायेगा। वे तो सब तरह से अस्वासन दे रहे है। एक बार आप चल कर देख लोगे। तब सही से पता चल जायेगा।
मनोहर ने सविता से पैसे का इंतजाम करने के लिए कहा. फिर सविता से बोला -में वहाँ जाकर छुट्टी के लिए दरख्वास्त देता हूँ। मुझे कम से कम दस दिन की जरूरत पड़ेगी। इससे कम में तो काम नही चलेगा।
तुम शगुन के जाने का इंतजाम करना। मै आते ही इसे मद्रास के लिए चल दूँगा। शगुन तुम टिकट का रिजर्वेशन करवाने की कोशिश करो। जितनी जल्दी निकल सके उतना ही अच्छा रहेगा।
एक परिवार तीन हिस्सों में बटने लगा था। आज की जिंदगी के मायने बदल गये है। लोग अपनी उन्नति के लिए कही भी जाने के लिए तैयार हो जाते है। उन्हें सुविधा से ज्यादा तरक्की मायने रखती है। पुराने ज़माने की मान्यताये अब टूटने लगी है।
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