#bachho ki khatir

      सविता जिस माहौल  से बाहर आयी  थी उस माहौल  की लड़की इतना पड  जाएगी किसीने सपने में भी नही सोचा था। वहाँ आदमी भी इतनी पढ़ाई करने वाले नही मिलेंगे।अब सविता ने दूसरी बार माँ बनने के बारे में सोचा। उसका पढ़ाई का सपना पूरा हो चुका था। उसकी बड़ी बेटी शगुन भी आठ साल की हो चुकी थी।
        पडोसी उसे याद दिलाते रहते थे- शगुन के साथ खेलने बाला  भी कोई होना चाहिए। कब तक पड़ती रहेगी। क्या बुढ़ापे में दूसरा बच्चा बुलाएगी।  वैसे अभी सविता की उम्र सिर्फ २६ साल हुई थी। शहरो में तो इतनी उम्र में शादी होती हे पर सविता अब आठ साल की बच्ची की जिम्मेदार माँ थी।
 सविता की पढ़ाई  पूरी हो चुकी थी।  उसका सपना भी पूरा हो चूका था। अब उसने दूसरी बार माँ बनने का निर्णय लिया।  भगवान ने उसकी सुन ली।  अब वह दूसरी बार गर्भवती हो गयी।
       समय उपरांत उसके घर दोहरी ख़ुशी ने पदार्पण किया। उसके घर एक लड़का और लड़की ने जन्म लिया। कुछ लोगो को एक बच्चा मुश्किल से मिलता है। उसके घर भगवान ने भर-भर हाथ खुशिया लुटाई थी।  मनोहर भी दोनों की सूरत देखता ही रह जाता था।  सविता ने अपने बच्चो के नाम रमन और मीता  रखा।  अब फिर सविता दिन रात  काम में लगी रहती थी।  दो छोटे -छोटे बच्चो की जिम्मेदारी और घर का सारा काम उसे अकेले करना पड़ता था।  मनोहर उस महोल   से निकला था जहाँ आदमी घर का काम नही करते थे। सविता के लिए छोटे -छोटे दो बच्चो को सम्भालना मुश्किल हो रहा था। उसने कई बार मनोहर से अपनी परेशानी बताने की कोशिश की पर उसे समझ ही नही आया। सविता क्या कहना चाहती हे।  उसने मनोहर से साफ शव्दो  में कहा - मै रमन को संभालती हूँ तो मीता रोने लगती है। मीता को संभालती हूँ तो रमन रोता है। में दोनों के साथ न्याय नही कर पा  रही हूँ। आप ही बताओ मै क्या करू।
   मनोहर ने कहा -तुम कहना क्या चाहती हो।
 सविता बोली -में चाहती हूँ मेरी मदद करने के लिए कोई हो।
 मनोहर बोला -अब तक और ओरते भी तो अपने बच्चे अकेले पालती  रही है।  तेरे आलावा किसी ने मददगार नही मांगे  तू अनोखी  नही है जो बच्चे पाल रही है।
    सविता बोली - उनके अलग -अलग बच्चे हुए है। दोनों जुड़वाँ बच्चो को पालना बहुत मुश्किल हो रहा है।  आप भी बच्चो की देखभाल करने में मेरी मदद नही करते।  मुझसे दोनों बच्चो को संभाला नही जाता।  शगुन भी इतनी बड़ी नही है कि  मेरी मदद कर सके।  आप ही सोचो में इंसान हु मशीन नही। में सब को खुश देखना चाहती हूँ। पर मेरे लिए ये संभव नही हो रहा। रमन और मीता की देखभाल में ही सारा समय निकल जाता है शगुन तो दूर से आस लिए मुझे देखती रह जाती है। कुछ कहना भी चाहे तो मेरी मज़बूरी समझ कर मन मसोस कर रह जाती है। आखिर वो भी मेरी बेटी है। आप ही बताओ ऐसे में मै क्या करू।
     मनोहर को सविता के शव्दो ने झकझोर दिया -अब उसे सविता की हालत समझ आई वह बोला -अब तू ही बता ऐसे में क्या किया जाये।
सविता बोली -आप घर सँभालने में मेरी मदद कर दो तो कुछ काम आसान हो जाये। मेने पहले आपसे कुछ मदद नही मांगी। अब तीनो  छोटे -छोटे  बच्चो के साथ अकेले घर की  जिम्मेदारी निभाना बहुत मुश्किल हो रहा हे।
    मनोहर बोला -आदमी कोई घर के काम करते है। ये झंझट मुझसे नही होगा। लोग मुझे जोरू का गुलाम कहेंगे। हमारे यहाँ कोई आदमी औरत के काम में मदद नही करता है। तुझसे होता है तो कर मुझसे कोई उम्मीद मत करना ये मेरे बस का नही है।
    सविता अपना सा मुँह लेकर रह गयी वह ऐसी जगह से ताल्लुक रखती थी जहाँ औरतो के दर्द को समझने वाले आदमी नही होते थे। उनकी अपेक्षा मनोहर ने उसे काफी आजादी दी थी।  जिसके लिए वह मनोहर की एहसानमंद थी।
    एक दिन मनोहर से सविता बोली -मेरी मदद करने के लिए घर के कामो के लिए एक काम वाली लगा दो।
  मनोहर बोल उठा -ये क्या कह रही है। तूने किसी के घर में कामवाली लगी देखी  है। जो कामवाली की बात कर रही है। सविता अपना सा मुँह लेकर रह गयी।
   सविता अब समझ गयी उसकी मदद सहारनपुर  में  रहते हुए कोई नही कर सकता। उसने मनोहर से कहा -आप माँ जी से कहो वो यहाँ आकर रहे।
   मनोहर बोला -में उनसे पूछ कर देखता हूँ। वे हमारे पास आकर रहने के लिए तैयार होती भी हे या नही।
     मनोहर परिवार के साथ गाँव गया और मौका देखकर माँ से बोला -आप हमारे साथ शहर चलो। आप कभी गाँव से बाहर नही गयी हो।  अब की बार तो में तुम्हे शहर लेके चलूँगा।
  माँ बोली -सारी जिंदगी मेरी गाँव में बीत गयी अब बुढ़ापे में क्या शहर देखूंगी।  मेरी कोई इच्छा नही है शहर जाने की।
   जब माँ का मन नही बदला तब मनोहर ने सच्ची बात माँ के सामने रखी।  ये सुनकर माँ बोली-तेरे बच्चो को पालने के लिए में शहर जाऊ ये मेरे बस का नही। यदि तुझे बच्चे पलवाने है। तो बच्चो और सविता को यही छोड़ जा। यहाँ बच्चे हाथो -हाथ पल जायेंगे।  यहाँ इतने सारे काम को छोड़कर शहर में रहना मेरे बस का नही। शहर रहूंगी तो यहाँ का  सारा काम बिगड़ जायेगा।  खेत खलिहान ,डोर डांगर कौन देखेगा।  तेरा शहर में हे ही क्या नौकरी तो तू वहाँ पहले भी कर रहा था। अब भी कर लेगा। तुझे इतनी परेशानी है तो  तू बच्चो और सविता को यहाँ छोड़ जा तेरे बच्चे में पाल दूंगी।
     ये सुनकर मनोहर माँ से बहस नही कर पाया।  उसने सविता के पास जाकर सारे हालत पर विचार -विमर्श किया। तो उन्हें भी माँ की सलाह ही ठीक लगी।  सविता बच्चो को लेकर गाँव में रहने के लिए तैयार हो गयी।
   जिस गाँव को छोड़कर सविता शहर गयी थी। वही  सविता बच्चो की खातिर गाँव में वापिस आ गयी। उसे तसल्ली थी जितने समय वह शहर में रही उसने समय का सदुपयोग किया। अब उसके मन में कोई कुंठा नही थी।


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