# badlav

   सविता के घर से विद्यालय की दुरी ज्यादा हो गयी थी।  अब उसे लगभग 25  मिनट पैदल चलना पड़ता था।  सर्दियों में तो पैदल चलना मुश्किल नही था।  पर गर्मियों में सजा लगती थी।  उसके बारे में हमने पूछा कैसे आना होता है।
     उसने जबाब दिया -सुबह के समय रिक्शा कर लेती हूँ। दोपहर को पैदल या रिक्शा से चली जाती हूँ।  अच्छे मौसम में पैदल चलने में कोई परेशानी नही होती।
    रेखा ने पूछा-आगे क्या विचार है।
   सविता बोली -में नए सत्र में स्थानांतरण के फार्म भर दूंगी।  घर के बहुत पास विद्यालय है। मुझे उम्मीद है  उस विद्यालय में जगह मिल जाएगी।
    सविता ने मकान  खरीदने के सात महीने बाद तक नौकरी की। उसी समय में उसकी मेहनत देखकर हम दंग  रह गए।  वह कभी थकती नही थी। कभी निराशा भरे शब्द उसके मुँह  से निकलते नही  थे। एक दिन हमें उसके घर जाने का मौका मिला। वह हमारे साथ सेमिनार में थी वही से हमारा अचानक उसके घर जाने का कार्यक्रम बन गया। हम उसके घर अचानक गए थे उसे या उसके परिवार को हमारे आने की कोई उम्मीद नही थी।  उसका घर पूरी तरह व्यवस्थित था।  उसके तीनो बच्चे पड़  रहे थे। कोई भी उधम नही मचा रहा था।  उनको चुपचाप पढ़ते  देखकर हम हैरान हो गए। हमने इतने व्यवस्थित और अनुशासन में रहने वाले बच्चे इससे पहले नही देखे थे।  उनके ऊपर  माँ -पिताजी का नियंत्रण ना  था वे अपना काम सुचारू रूप से स्वयं करते रहते थे। उन बच्चो को देखकर लगता था। भगवान ऐसे बच्चे सभी को दे।
      जब हम सविता के घर में थे। उसी समय मनोहर भी गाँव  से  आ  गए। वे अपने साथ गाँव का शुद्ध सामान बच्चो के लिए लाये  थे। उनका अपने बच्चो के प्रति प्यार देखकर हम गदगद हो गए। मनोहर को देखकर ऐसा लगा जैसे कोई गाँव का किसान हमारे सामने आ गया हो। उसमे बिलकुल शहरीपन की झलक नही थी। मनोहर की अपेक्षा सविता एक अप्सरा के समान लग रही थी।  भगवान की दी हुई सुंदरता की मालकिन तो वह थी। अब पैसे की रौनक के साथ शहरीपन उसमे साफ झलक रहा था।  उसमे और मनोहर में जमीन -आसमान का अंतर दिखाई दे रहा था।
     एक दिन हमने सविता से कहा-तेरी शादी बहुत जल्दी नही हो गयी।  तुझे अजीब नही लगता। .
  सविता बोली -हमारे  गाँव  के हिसाब से तो जल्दी नही थी। पर अच्छा है  मेरी जल्दी शादी हो गयी।  मेरा बाप तो किसी हालत में मुझे पढ़ने  नही देता।  इन्होने मुझे पढ़ने  दिया मै इनकी बहुत एहसानमंद हूँ। वरना किसी और घर में शादी होती तो में घुटघुट के जी रही होती। अब तक  तो मेरी बेटी की भी शादी हो चुकी होती।  हमारे यहाँ  लड़कियों की   पढ़ाई  के बारे में कोई सोचता ही नही है। लड़कियों की पढ़ाई तो वहाँ के लोगो के लिए पैसे की बर्बादी लगता है।
   आप लोगो को पढ़कर  अजीब लग रहा होगा। पर ये एक सच्ची कहानी है।         . 

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