# chhuttiya

       सविता को नौकरी करते हुए एक साल हो चूका था। अब उसकी बेटी शगुन 12 वी  कलास  में आ  चुकी थी। उसकी पढ़ाई की जिम्मेदारी मनोहर पर नही छोड़ी जा सकती थी।  उसने प्रधानाचार्या  से छुट्टी के लिए कहा। उन्होंने उसे छुट्टी देने से साफ मना कर दिया। उसे बहुत दुःख हुआ। लेकिन सविता जिंदगी से हार मानने बालो में से नही थी। उसने सभी से सलाह लेनी शुरू की। उसकी हालत को सभी समझते थे। पर किसी को उसकी दिक्क़त  को हल करने का तरीका समझ नही आ  रहा था।
    सविता ने प्रधानाचार्या  के सामने अपनी परेशानी रखी पर उनके ऊपर कोई असर नही हुआ। तब हार  कर उसने उनसे बड़े अफसर को अपनी परेशानी बताते हुए छुट्टी का अनुरोध किया।  उससे पहले वे प्रधानाचार्या किसी को कोई भी छुट्टी आसानी से नही देती थी।  अधिकतर लोग रुआंसे हो जाते थे।कुछ गुस्सैल लोगो से उनका झगड़ा हो जाता था। छोटे -मोटे झगड़ो का प्रधानाचार्या  पर कोई असर नही होता था। यदि कोई बहुत झगड़ालू इंसान होता उसी को   छुट्टी मिल पति थी बाकि लोग  छुट्टी मांगने के बारे में सोचते ही नही थे।  उन्ही दिनों सरकार ने बच्चो की परवरिश के  लिए     सी,सी एल शुरू की थी। इसे शुरू हुए दो साल बीत चुके थे। अभी तक किसी की हिम्मत इन छुट्टियों को लेने की नही हुई थी। जिस जगह साल की 8  सी ,एल , लेना मुश्किल था।  वहाँ  सी. सी ,एल, मांगना बहुत टेडा काम था।  सभी हेड से डरकर छुट्टियों के बारे में सोचते ही नही थे।
      सविता की कोशिश का परिणाम ये रहा कि  उसको अफसर ने अपने दफ़्तर में बुलाया जहाँ  उसने स्पष्ट रूप से अपनी परेशानी उनके सामने रखी।
    उनसे कहा -आप ही बताओ ऐसे   में मै  करू।
  अफसर उनकी परेशानी समझ गए। उन्होंने लिखित में उसकी छुट्टियों के आवेदन पर हस्ताक्षर कर दिए।          दूसरे पत्र के माध्यम से प्रधानाचार्या को कहा-ऐसे मामले में आपको 15  दिन की छुट्टी देने का अधिकार  है। आप उनकी परेशानी समझ कर उन्हें छुट्टी दे दिया करें। किसी भी अद्यापिका को मुझ तक आने की जरूरत ना  महसूस हो।  हमारे पास और भी काम होते है। ये काम आपके अधिकार में है। आगे से किसी को परेशान करने की जरूरत नही है।
    सविता के जुझारू पन  ने ओरो के लिए रास्ता खोल दिया।  वह शगुन की पढ़ाई  के लिए एक महीने की छुट्टी लेकर सहारनपुर चली गयी।
         प्रधानाचार्या ने उससे लिखित में लिया -यदि तुम्हारी छुट्टियों के करण कोई दिक्क़त होगी तो तुम्हे आकर काम करना पड़ेगा।
      उसे सहयोग करने से कोई एतराज नही था। सविता ने लिख कर दिया -मेरे कारण विद्यालय का कोई भी काम नही रुकेगा जब भी जरूरत होगी मै सहायता के लिए तैयार हूँ।
      पेपरों के दिनों में उसे पेपर के लिए बुलाया। वह आकर पेपर ले गयी। उचित समय पर चेक करके वापस भी कर गयी। उसके कारण विद्यालय के किसी काम में परेशानी नही हुइ। वह समयानुसार सबका सहयोग करती रही। उसके कारण विद्यालय के परिणाम पर कोई गलत असर नही हुआ बल्कि दिनों -दिन प्रगति करता चला गया।
     शगुन के पेपर होने के बाद उसने सुचारू रूप से विद्यालय का काम संभाला। जब शगुन का परिणाम आया। शगुन 88 पर्सेंट नंबर लेकर पास हुई  थी सभी शगुन की कामयाबी से बहुत खुश हुए। 

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