शगुन की स्नातक की डिग्री अच्छे नंबर से है। अब वह पोस्ट ग्रेजुएशन करना चाहती है। उसका मनपसंद विषय गणित है। उसकी प्रतियोगिता बहुत मुश्किल हे। उसने कई जगह के फार्म भर दिए हे। पर उसका आस -पास के कॉलेज में स्थान नही मिल पाया । उसका स्थान मद्रास के कॉलेज में मिला। दिल्ली और आस -पास गणित में एम. ए रेगुलर बहुत कम जगह होता है । उनमे उसका दाखिला नही हो पाया। शगुन का मन केवल रेगुलर कॉलेज से पढ़ाई करने का है। किसी और विषय में शगुन पढ़ना नही चाहती। सविता सोच कर परेशान हो रही है। शगुन को इतनी दूर अकेली कैसे भेज दे।
सविता बोली -इतनी दूर जाकर तू परेशान हो जाएगी। वहाँ की भाषा तेरी समझ में नही आएगी। खाना -पीना भी हमारे जैसा नही है। तेरी उम्र ही क्या है। कुछ और सीख ले।
शगुन बोली -माँ गणित में दाखिला मिलना बहुत मुश्किल होता है। इस साल मिल गया ज़रुरी नही अगले साल फिर नंबर आये। एक साल के अंतर पर कई तरह की दिक्क़त पैदा हो जाती है। एक साल घर में रहकर मुझे भी धीरे -धीरे अपने ऊपर से भरोसा कम हो जायेगा। एक साल का अंतर बहुत होता है।
सविता बोली -- एक साल कोई बहुत बड़ा समय नही होता यू ही बीत जायेगा। तुझे पता भी नही चलेगा।
शगुन बोली-माँ आप ऐसी बाते मत करो। आप इतनी पडिलिखी होकर डर रही हो।
सविता बोली -तुझे अभी पता नही माँ का दिल बच्चो को लेकर कितना चिंतित रहता है। तेरी जुदाई का गम मुझे दिन -रात बेचैन कर रहा है।
शगुन बोली -मै अब बालिग हो गयी हूँ। आपके सामने में कब तक बच्ची रहूँगी। आप मुझ पर भरोसा करना सीखो।
सविता बोली -भरोसा कैसे करु तू मुझे समझदार नही लगती। दुनियाँ के लोग सीधे नही है। तुझ जैसी लड़की को यु गड़प जायेंगे। इतनी दूर कोई हमारी जान -पहचान का नही है। तुझे कभी हमारी सहायता की जरूरत पड़ी तो दो दिन हमें पहुँचने में लग जायेंगे। अपनों की जरूरत इंसान को हमेशा रहती है। तूने कभी अकेलापन झेला नही है। अकेलेपन का दर्द तू क्या जाने।
शगुन बोली -माँ आपकी कमजोरी कही मेरी उन्नति को रोक ना दे। आप ही बताये दिल्ली में अच्छे दिन का इंतजार करते हुए वक़्त बिताना कहाँ का इंसाफ है। माँ खुशकिस्मत केवल एक बार दरवाजा खटखटाती है। उसके लिए दरवाजा नही खोले तो दुबारा मौका नही देती।
सविता बोली- तेरे मन में इतनी निराशा कहाँ से भर गयी। भविष्य तुझे इतना डरावना क्यों लग रहा है। हमारे होते तेरे साथ कुछ बुरा नही होगा।
शगुन बोली- माँ आप मेरी हालत समझ नही पा रही हो। मेरी सभी सहेलिया का दाखिला उनके पसंद के विषय में हो गया है। मेरे उनसे ज्यादा नंबर आये है। वे रेगुलर कॉलेज में जाये और मै अच्छे दिनों का इंतजार करू।
सविता बोली -मेरे लिए तेरी पढ़ाई से ज्यादा तेरी सुरक्षा मायने रखती है। मै अपने दिल को कैसे मनाउ।
शगुन बोली -अगर मेरी जगह भाई होता। तब भी तुम उसे मना करती।
सविता बोली -लड़के और लड़की में अंतर होता है। लड़को के बारे में इतनी चिंता नही होती। जितनी लड़कियों को लेकर होती है। मैने पहले ही गाँव के नियम तोड़े है। उसपर तू तो बिलकुल प्रदेश चली जाएगी। मेरा दिल इसकी इजाजत नही दे रहा।
सविता से शगुन बोली -माँ आज तुम गवारो जैसी बाते कर रही हो। मुझे आप से ऐसी उम्मीद नही थी।
सविता बोली -तू शहर की होगी। मै अभी भी गाँव से जुडी हुई हूँ। इस विषय में मेरा दिमाग काम नही कर रहा है। शनिवार को तेरे पापा आएंगे उनसे सलाह मशवरा करेंगे। अब तू मुझे परेशान मत कर। मै तुझसे बहस नही करना चाहती हूँ..
शगुन और सविता दोनों शनिवार का इंतजार करने लगी। दोनों का मन स्थिर नही था।
सविता बोली -इतनी दूर जाकर तू परेशान हो जाएगी। वहाँ की भाषा तेरी समझ में नही आएगी। खाना -पीना भी हमारे जैसा नही है। तेरी उम्र ही क्या है। कुछ और सीख ले।
शगुन बोली -माँ गणित में दाखिला मिलना बहुत मुश्किल होता है। इस साल मिल गया ज़रुरी नही अगले साल फिर नंबर आये। एक साल के अंतर पर कई तरह की दिक्क़त पैदा हो जाती है। एक साल घर में रहकर मुझे भी धीरे -धीरे अपने ऊपर से भरोसा कम हो जायेगा। एक साल का अंतर बहुत होता है।
सविता बोली -- एक साल कोई बहुत बड़ा समय नही होता यू ही बीत जायेगा। तुझे पता भी नही चलेगा।
शगुन बोली-माँ आप ऐसी बाते मत करो। आप इतनी पडिलिखी होकर डर रही हो।
सविता बोली -तुझे अभी पता नही माँ का दिल बच्चो को लेकर कितना चिंतित रहता है। तेरी जुदाई का गम मुझे दिन -रात बेचैन कर रहा है।
शगुन बोली -मै अब बालिग हो गयी हूँ। आपके सामने में कब तक बच्ची रहूँगी। आप मुझ पर भरोसा करना सीखो।
सविता बोली -भरोसा कैसे करु तू मुझे समझदार नही लगती। दुनियाँ के लोग सीधे नही है। तुझ जैसी लड़की को यु गड़प जायेंगे। इतनी दूर कोई हमारी जान -पहचान का नही है। तुझे कभी हमारी सहायता की जरूरत पड़ी तो दो दिन हमें पहुँचने में लग जायेंगे। अपनों की जरूरत इंसान को हमेशा रहती है। तूने कभी अकेलापन झेला नही है। अकेलेपन का दर्द तू क्या जाने।
शगुन बोली -माँ आपकी कमजोरी कही मेरी उन्नति को रोक ना दे। आप ही बताये दिल्ली में अच्छे दिन का इंतजार करते हुए वक़्त बिताना कहाँ का इंसाफ है। माँ खुशकिस्मत केवल एक बार दरवाजा खटखटाती है। उसके लिए दरवाजा नही खोले तो दुबारा मौका नही देती।
सविता बोली- तेरे मन में इतनी निराशा कहाँ से भर गयी। भविष्य तुझे इतना डरावना क्यों लग रहा है। हमारे होते तेरे साथ कुछ बुरा नही होगा।
शगुन बोली- माँ आप मेरी हालत समझ नही पा रही हो। मेरी सभी सहेलिया का दाखिला उनके पसंद के विषय में हो गया है। मेरे उनसे ज्यादा नंबर आये है। वे रेगुलर कॉलेज में जाये और मै अच्छे दिनों का इंतजार करू।
सविता बोली -मेरे लिए तेरी पढ़ाई से ज्यादा तेरी सुरक्षा मायने रखती है। मै अपने दिल को कैसे मनाउ।
शगुन बोली -अगर मेरी जगह भाई होता। तब भी तुम उसे मना करती।
सविता बोली -लड़के और लड़की में अंतर होता है। लड़को के बारे में इतनी चिंता नही होती। जितनी लड़कियों को लेकर होती है। मैने पहले ही गाँव के नियम तोड़े है। उसपर तू तो बिलकुल प्रदेश चली जाएगी। मेरा दिल इसकी इजाजत नही दे रहा।
सविता से शगुन बोली -माँ आज तुम गवारो जैसी बाते कर रही हो। मुझे आप से ऐसी उम्मीद नही थी।
सविता बोली -तू शहर की होगी। मै अभी भी गाँव से जुडी हुई हूँ। इस विषय में मेरा दिमाग काम नही कर रहा है। शनिवार को तेरे पापा आएंगे उनसे सलाह मशवरा करेंगे। अब तू मुझे परेशान मत कर। मै तुझसे बहस नही करना चाहती हूँ..
शगुन और सविता दोनों शनिवार का इंतजार करने लगी। दोनों का मन स्थिर नही था।
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