सविता ने ६ बार पेपर दिए हर बार फेल हो गयी अब उसे लगने लगा t.g..t के पेपर में पास होना असंभव हे। वह कभी भी इस पेपर में पास नही हो पायेगी पर अब उसमे हर हालत में अच्छी नौकरी की इच्छा पैदा हो गयी थी। जब मेहनत करके पढ़ाई पूरी की है। तो उसे उसकी काबिलियत के मुताबिक नौकरी भी मिलनी चाहिए। उसने मनोहर के सामने अपनी इच्छा जाहिर की। तो मनोहर को गुस्सा आ गया।
वह बोला -तुझे नौकरी करने से मना कौन कर रहा है। जो चाहे कर मुझे क्या।
सविता समझ गयी मनोहर को उसकी इन बातो से चिढ़ होने लगी है। इसलिए उस दिन उसने अपनी बात को आगे नही बढ़ाया। काफी दिनों बाद मनोहर अच्छे मूड में था।
तब सविता ने मनोहर से कहा -में डाइट की पढ़ाई करना चाहती हूँ। यदि आप आज्ञा दे दो।
मनोहर बोला -तुझे ये क्या सूझी तू तो उससे ऊँची पढ़ाई कर चुकी है।
सविता बोली -इस पढ़ाई की नौकरी हमेशा एक या दो निकलती है। जबकि डाइट करने के बाद बहुत सारी नौकरी के मौके मिलेंगे।
मनोहर बोला -छोटे विद्यालय में तू अब भी नौकरी कर रही है। उसमे और इसमें क्या अंतर होगा।
सविता बोली-वह सरकारी नौकरी होगी। उसमे पैसे भी इससे कही ज्यादा मिलेंगे। उसको पा कर मुझे संतुष्टि मिलेगी। जब मुझमे काबिलियत है तो वहाँ तक पहुँचने की कोशिश क्यों न करू।
मनोहर चुप हो गया। वह समझ चूका था। सविता के मन में जो इच्छा पैदा हो जाती है उसे पूरा करने में लग जाती हे कितनी भी मुश्किल हालत आ जाये वह अपने निश्च्य से हटती नही है। उसे मेहनत करनी है। उसके लिए वह किसी काम से जी भी नही चुराती,परिवार के किसी सदस्य को उसके पढ़ाई करने से कोई दिक्क़त भी नही होती। वह अपने आराम के समय को ही पढ़ाई में लगाती है। इस कारण मनोहर ने उसका डायट में दाखिला दिलवा दिया।
अब सविता नए सिरे से पढ़ाई में लग गयी। उसके तीनो बच्चे भी विद्यालय की पढ़ाई करने लगे थे। अब सविता का घर एक छोटा सा विद्यालय ही लगने लगा था। कभी बच्चो को पढाती ,कभी विद्यालय के बच्चो को पढाती और कुछ समय निकाल कर खुद पढ़ने बैठ जाती।
पडोसी कहते -सविता तो पढ़ाई के पीछे पागल हो गयी है। इतना भी क्या पढ़ना। जब देखो पढ़ती रहती है। ना दुआ - सलाम, न किसी से बात -चीत करती हे। इन किताबो में ऐसा क्या धरा है जो जिंदगी जीना ही भूल गयी है। जब देखो किताबो में ही घुसी रहती है। हमने ऐसा किताबी कीड़ा इससे पहले कभी नही देखा।
सविता उन औरतो में से थी जिनको किताबो की दुनिया में ख़ुशी मिलती थी। अड़ोस -पड़ोस की औरतो से बात करके वह ऊब जाती थी। उसे लगता हर समय सिर्फ घर -गृहस्थी की बातो के आलावा भी दुनिया है। जो इन्हे समझ ही नही आती । सविता पड़ोस की औरतो को समझ न पाती। पड़ोसिन सविता को समझ पाने में असमर्थ थी। कोई उसे घमंडी कहती,तो कोई उसे घुन्नी। लेकिन कोई भी उसकी पढ़ाई के जूनून को नही समझ पा रहा था। वो जिस माहौल में रह रही थी वहाँ की औरतो के लिए पढ़ाई करना केवल समय की बर्बादी थी । उसके आलावा कुछ नही। वे समूह में बैठ कर उसका मजाक उड़ाती रहती थी। उनके लिए सविता एक अजूबा थी। क्योंकि वह उनसे बिलकुल अलग थी।
वह बोला -तुझे नौकरी करने से मना कौन कर रहा है। जो चाहे कर मुझे क्या।
सविता समझ गयी मनोहर को उसकी इन बातो से चिढ़ होने लगी है। इसलिए उस दिन उसने अपनी बात को आगे नही बढ़ाया। काफी दिनों बाद मनोहर अच्छे मूड में था।
तब सविता ने मनोहर से कहा -में डाइट की पढ़ाई करना चाहती हूँ। यदि आप आज्ञा दे दो।
मनोहर बोला -तुझे ये क्या सूझी तू तो उससे ऊँची पढ़ाई कर चुकी है।
सविता बोली -इस पढ़ाई की नौकरी हमेशा एक या दो निकलती है। जबकि डाइट करने के बाद बहुत सारी नौकरी के मौके मिलेंगे।
मनोहर बोला -छोटे विद्यालय में तू अब भी नौकरी कर रही है। उसमे और इसमें क्या अंतर होगा।
सविता बोली-वह सरकारी नौकरी होगी। उसमे पैसे भी इससे कही ज्यादा मिलेंगे। उसको पा कर मुझे संतुष्टि मिलेगी। जब मुझमे काबिलियत है तो वहाँ तक पहुँचने की कोशिश क्यों न करू।
मनोहर चुप हो गया। वह समझ चूका था। सविता के मन में जो इच्छा पैदा हो जाती है उसे पूरा करने में लग जाती हे कितनी भी मुश्किल हालत आ जाये वह अपने निश्च्य से हटती नही है। उसे मेहनत करनी है। उसके लिए वह किसी काम से जी भी नही चुराती,परिवार के किसी सदस्य को उसके पढ़ाई करने से कोई दिक्क़त भी नही होती। वह अपने आराम के समय को ही पढ़ाई में लगाती है। इस कारण मनोहर ने उसका डायट में दाखिला दिलवा दिया।
अब सविता नए सिरे से पढ़ाई में लग गयी। उसके तीनो बच्चे भी विद्यालय की पढ़ाई करने लगे थे। अब सविता का घर एक छोटा सा विद्यालय ही लगने लगा था। कभी बच्चो को पढाती ,कभी विद्यालय के बच्चो को पढाती और कुछ समय निकाल कर खुद पढ़ने बैठ जाती।
पडोसी कहते -सविता तो पढ़ाई के पीछे पागल हो गयी है। इतना भी क्या पढ़ना। जब देखो पढ़ती रहती है। ना दुआ - सलाम, न किसी से बात -चीत करती हे। इन किताबो में ऐसा क्या धरा है जो जिंदगी जीना ही भूल गयी है। जब देखो किताबो में ही घुसी रहती है। हमने ऐसा किताबी कीड़ा इससे पहले कभी नही देखा।
सविता उन औरतो में से थी जिनको किताबो की दुनिया में ख़ुशी मिलती थी। अड़ोस -पड़ोस की औरतो से बात करके वह ऊब जाती थी। उसे लगता हर समय सिर्फ घर -गृहस्थी की बातो के आलावा भी दुनिया है। जो इन्हे समझ ही नही आती । सविता पड़ोस की औरतो को समझ न पाती। पड़ोसिन सविता को समझ पाने में असमर्थ थी। कोई उसे घमंडी कहती,तो कोई उसे घुन्नी। लेकिन कोई भी उसकी पढ़ाई के जूनून को नही समझ पा रहा था। वो जिस माहौल में रह रही थी वहाँ की औरतो के लिए पढ़ाई करना केवल समय की बर्बादी थी । उसके आलावा कुछ नही। वे समूह में बैठ कर उसका मजाक उड़ाती रहती थी। उनके लिए सविता एक अजूबा थी। क्योंकि वह उनसे बिलकुल अलग थी।
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