हमारे घर काफी रिश्तेदार आये हुए थे। सारा घर मेहमानो से भरा हुआ था। हर तरफ चहल -पहल थी। घर का कोई कोना ऐसा नहीं था जहाँ एकान्त मिल सके या अपना शौक पूरा किया जा सके। जिन्हे शोर शराबे की आदत हो उसके लिए ये माहौल अच्छा था। लेकिन जिन्हे कोई शौक हो जिसे अकेले पूरा किया जा सके उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा ही मै अपना एक अनुभव साझा करना चाहती हूँ।
मेरे मामा जी सोमेश को सिगरेट पीने की आदत थी उन दिनों इस आदत को ख़राब माना जाता था। इसलिए शर्म -लिहाज के कारण सबके सामने सिगरेट नही पी जाती थी. जिन्हे इसकी आदत होती है। वे अपनी इच्छा पर ज्यादा देर तक नियंत्रण नही रख पाते है। वे अपने से छोटो के सामने सिगरेट नही पी सकते थे। ना वे अपने से बड़ो के सामने पी सकते थे। उन्होंने सिगरेट पीने के लिए उठकर बाहर जाना सही समझा। उन्हें समझ नही आया की जाये तो कहाँ जाये। उन्होंने टॉयलेट जाने का बहाना बनाया और बाहर निकल आये।
टॉयलेट के बाहर खड़े होकर सिगरेट के कश लेने लगे। उनके हाथ में जलती हुई सिगरेट थी। बड़े आराम से तसल्ली से कश पे कश लिए जा रहे थे। उन्हें बहुत आराम मिल रहा था। सिगरेट का नशा भी इंसान की मजबूर कर देता है। इतने में मेरे दादा जी वहाँ आते हुए दिखाई दिये। सोमेश के पास सिगरेट को बुझाने का समय भी नही था। वे अपने मुँह में भरा हुआ धुँआ भी निकाल नही सकते थे। उनकी हालत देखने लायक थी। दादाजी बोले - सोमेश यहाँ कैसे खड़े हो।
सोमेश जबाब देने की हालत में नही थे उन्होंने जल्दी से हाथ की जलती हुई सिगरेट जेब में रख ली और दरवाजा खोल के अंदर चले गए। उन्हें टॉयलेट जाना नही था केवल इस हालत से बचने के लिए वे अंदर गए थे। दादाजी सब समझ गए थे। पर उन्होंने बाद में सोमेश से इस बात का जिक्र करना ठीक नही समझा।
एक दिन दादीजी को वे हँसते हुए ये बात बता रहे थे तब ये बात मेने चुपके से सुन ली। आज भी बीती बाते होठो पे मुस्कुराहट ला देती है। उस ज़माने की शर्म-लिहाज ,मान -मर्यादा अब देखने को कहाँ मिलती है।
मेरे मामा जी सोमेश को सिगरेट पीने की आदत थी उन दिनों इस आदत को ख़राब माना जाता था। इसलिए शर्म -लिहाज के कारण सबके सामने सिगरेट नही पी जाती थी. जिन्हे इसकी आदत होती है। वे अपनी इच्छा पर ज्यादा देर तक नियंत्रण नही रख पाते है। वे अपने से छोटो के सामने सिगरेट नही पी सकते थे। ना वे अपने से बड़ो के सामने पी सकते थे। उन्होंने सिगरेट पीने के लिए उठकर बाहर जाना सही समझा। उन्हें समझ नही आया की जाये तो कहाँ जाये। उन्होंने टॉयलेट जाने का बहाना बनाया और बाहर निकल आये।
टॉयलेट के बाहर खड़े होकर सिगरेट के कश लेने लगे। उनके हाथ में जलती हुई सिगरेट थी। बड़े आराम से तसल्ली से कश पे कश लिए जा रहे थे। उन्हें बहुत आराम मिल रहा था। सिगरेट का नशा भी इंसान की मजबूर कर देता है। इतने में मेरे दादा जी वहाँ आते हुए दिखाई दिये। सोमेश के पास सिगरेट को बुझाने का समय भी नही था। वे अपने मुँह में भरा हुआ धुँआ भी निकाल नही सकते थे। उनकी हालत देखने लायक थी। दादाजी बोले - सोमेश यहाँ कैसे खड़े हो।
सोमेश जबाब देने की हालत में नही थे उन्होंने जल्दी से हाथ की जलती हुई सिगरेट जेब में रख ली और दरवाजा खोल के अंदर चले गए। उन्हें टॉयलेट जाना नही था केवल इस हालत से बचने के लिए वे अंदर गए थे। दादाजी सब समझ गए थे। पर उन्होंने बाद में सोमेश से इस बात का जिक्र करना ठीक नही समझा।
एक दिन दादीजी को वे हँसते हुए ये बात बता रहे थे तब ये बात मेने चुपके से सुन ली। आज भी बीती बाते होठो पे मुस्कुराहट ला देती है। उस ज़माने की शर्म-लिहाज ,मान -मर्यादा अब देखने को कहाँ मिलती है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें