आखिर में सविता को घर पसंद आया। सविता ने मनोहर को घर दिखाकर उसकी राय पूछी।
मनोहर बोला -मकान अच्छा है। इसकी कीमत हमारी हैसियत से ज्यादा है। पैसो का इंतजाम कैसे होगा। सविता ने मनोहर का हौंसला बढ़ाते हुए कहा -इसके लिए में ऋण की कोशिश कर रही हूँ। मै सरकारी कर्मचारी हूँ। मुझे ऋण मिलने की उम्मीद है। प्रॉपर्टी डीलर इसका इंतजाम करवाएगा। हमें केवल 20 परसेंट जमा करवाना है। आप इसके बारे में सोचो।
ये सुनकर मनोहर की हिम्मत बढ़ गयी। वह बोला -इसका इंतजाम करने की कोशिश करता हूँ। मुझे उम्मीद है इसका इंतजाम हो जायेगा।
सविता और प्रॉपर्टी डीलर मिलकर ऋण की कोशिश करने लगे। उसे ऋण मिलने में बहुत परेशानी हो रही थी। उसका घर प्राइवेट कॉलोनी में था। उसके लिए बैंक ऋण देने के लिए तैयार नही हो रहे थे। वो एक से दूसरे बैंक के चककर काट रही थी। उसकी नौकरी को भी ज्यादा दिन नही हुए थे। व्ह ससोपंज में थी कि क्या किया जाये . उसने सलाह लेने की कोशिश की। उसको किसी की सलाह उचित नही लग रही थी।
अंतत एक आदमी ने कहा -में तुम्हारा ऋण दिलवा सकता हूँ। इसके बदले तुम्हे कुछ देना पड़ेगा।
मरता क्या ना करता। सविता की हालत भी वैसी हो गयी थी यदि 80 परसेंट रुपयो का इंतजाम ना होता तो उसकी सारी मेहनत बेकार चली जाती। अभी उसकी जिम्मेदारी कम थी समय उपरांत खर्चे बढ़ने के कारण मकान बनबाना बहुत कठिन हो जाता।
सविता उसे रिश्वत देने के लिए तैयार हो गयी। रुपयो का इंतजाम होते ही मकान मिलने की सारी कार्यवाही पूरी हो गयी। सविता को तीन बेड रूम का घर मिल गया। अब उसके बच्चो को वह घर बहुत पसंद आया। बच्चे बड़े घर में रहने के आदी थे। किराये का मकान उस हिसाब से बहुत छोटा था। उसमे उन्हें बंधा हुआ लगता था। सविता के पास सामान बहुत कम था। उसके घर में केवल जरूरत का सामान था।
उसका घर देखकर स्नेहा ने कहा -घर बहुत खाली -खाली लग रहा है
उसने कहा -मकान खरीदना मुश्किल होता है। वह खरीद लिया। समान धीरे -धीरे आता रहेगा।
उसकी बात भी उचित थी मकान दिल्ली जैसे शहर में खरीदना सच में बहुत हिम्मत का काम होता है। उस हिसाब से सारी मेहनत सविता की थी। उसके होंसले के कारण ही चार सालो के बीच में उसने अपना मकान खरीद लिया।
मनोहर बोला -मकान अच्छा है। इसकी कीमत हमारी हैसियत से ज्यादा है। पैसो का इंतजाम कैसे होगा। सविता ने मनोहर का हौंसला बढ़ाते हुए कहा -इसके लिए में ऋण की कोशिश कर रही हूँ। मै सरकारी कर्मचारी हूँ। मुझे ऋण मिलने की उम्मीद है। प्रॉपर्टी डीलर इसका इंतजाम करवाएगा। हमें केवल 20 परसेंट जमा करवाना है। आप इसके बारे में सोचो।
ये सुनकर मनोहर की हिम्मत बढ़ गयी। वह बोला -इसका इंतजाम करने की कोशिश करता हूँ। मुझे उम्मीद है इसका इंतजाम हो जायेगा।
सविता और प्रॉपर्टी डीलर मिलकर ऋण की कोशिश करने लगे। उसे ऋण मिलने में बहुत परेशानी हो रही थी। उसका घर प्राइवेट कॉलोनी में था। उसके लिए बैंक ऋण देने के लिए तैयार नही हो रहे थे। वो एक से दूसरे बैंक के चककर काट रही थी। उसकी नौकरी को भी ज्यादा दिन नही हुए थे। व्ह ससोपंज में थी कि क्या किया जाये . उसने सलाह लेने की कोशिश की। उसको किसी की सलाह उचित नही लग रही थी।
अंतत एक आदमी ने कहा -में तुम्हारा ऋण दिलवा सकता हूँ। इसके बदले तुम्हे कुछ देना पड़ेगा।
मरता क्या ना करता। सविता की हालत भी वैसी हो गयी थी यदि 80 परसेंट रुपयो का इंतजाम ना होता तो उसकी सारी मेहनत बेकार चली जाती। अभी उसकी जिम्मेदारी कम थी समय उपरांत खर्चे बढ़ने के कारण मकान बनबाना बहुत कठिन हो जाता।
सविता उसे रिश्वत देने के लिए तैयार हो गयी। रुपयो का इंतजाम होते ही मकान मिलने की सारी कार्यवाही पूरी हो गयी। सविता को तीन बेड रूम का घर मिल गया। अब उसके बच्चो को वह घर बहुत पसंद आया। बच्चे बड़े घर में रहने के आदी थे। किराये का मकान उस हिसाब से बहुत छोटा था। उसमे उन्हें बंधा हुआ लगता था। सविता के पास सामान बहुत कम था। उसके घर में केवल जरूरत का सामान था।
उसका घर देखकर स्नेहा ने कहा -घर बहुत खाली -खाली लग रहा है
उसने कहा -मकान खरीदना मुश्किल होता है। वह खरीद लिया। समान धीरे -धीरे आता रहेगा।
उसकी बात भी उचित थी मकान दिल्ली जैसे शहर में खरीदना सच में बहुत हिम्मत का काम होता है। उस हिसाब से सारी मेहनत सविता की थी। उसके होंसले के कारण ही चार सालो के बीच में उसने अपना मकान खरीद लिया।
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