#ekakipan

   वेदप्रकाश बहुत छोटा था। उसके काम करने में मुंशीराम को बहुत दिक्क़त  आती  थी। उसके घर को  सँभालने के लिए किसी का होना बहुत जरूरी था। उनके लिए  नौकरी और घर दोनों को सम्भालना और वेद की बातो का जबाब देना बहुत मुश्किल हो रहा था। बड़ो से उनका दुःख देखा नही जा रहा था।  वे उससे दूसरी शादी के लिए जोर दे रहे थे। पर मुंशीराम उन बातो को अब तक टालते आ  रहे थे।
    एक दिन वेद ने पिता से कहा -पिताजी माँ क्यों नही आती। माँ के बिना मुझे घर अच्छा नही लगता।
   पत्नी के अभाव में मुंशीराम बहुत एकाकी हो गए थे वे अपने मन की बात किसी से साझा नही कर पाते थे। वेद के दर्द को अच्छी तरह से समझ रहे थे। उसकी काट उनके पास नही थी। उन्होंने अपने बारह  बच्चे और पत्नी को खो दिया था।  उनके मन में मृत्यु का डर  बैठ गया था। उन्हें हर तरफ मृत्यु नाचती दिखाई देती थी। उन्हें वेद की जिंदगी का भी कोई भरोसा नही था।
    अपनी एकाकी जिंदगी से उन्हें डर लगने लगा था। उनकी छोटी उम्र में शादी हो गयी थी इस कारण इतना दुःख भोगने के बाद भी उनकी उम्र ज्यादा नही थी उस पर एक छोटे और नासमझ बच्चे की जिम्मेदारी उन्हें परेशान कर रही थी। उस ज़माने में मृत्यु दर ज्यादा होने के कारण आदमियो की दूसरी शादी आसानी से हो जाती थी। उन्हें इस उम्र में भी क्वारी,  छोटी उम्र की लड़की आसानी से मिल सकती थी। उनके मन में वेद को लेकर डर  बैठा था। दूसरी माँ उसका ध्यान कैसे रख पायेगी। उनका लाडला बेटा विमाता के साथ कैसे निभा पायेगा। उनकी मनस्थिति डावाडोल थी। एक तरफ उनकी जरूरत तो दूसरी तरफ विमाता का व्यवहार उनके मन को दूसरी शादी से मना कर रहा था।
     अंतत मन पर जरुरतो ने कब्जा कर लिया। वे दूसरी शादी के लिए तैयार हो गए। उनके घर में एक दिन दुल्हन के रूप में श्यामा  आ  गयी। श्यामा की उम्र ज्यादा नही थी। वह बेहद गरीब घर की लड़की थी। उस हिसाब से उसे अच्छा और खाता-पिता घर मिल गया था। उस समय के हिसाब से उसकी सारी जरूरत का सामान उस घर में मौजूद था।  मुंशीराम पत्नी की जुदाई का गम भोग चुके थे। वे श्यामा का खूब ध्यान रखते थे।उसकी एक आवाज पर मुंशीराम उसकी जरूरत पूरी करने के लिए  तैयार रहते थे। श्यामा के दिन रात  सुख से बीत रहे थे। श्यामा और वेद की उम्र में केवल पंद्रह साल का अंतर था। उस समय के हिसाब से श्यामा की उम्र ज्यादा हो चुकी थी। पर अभी वह नासमझ ही थी।  वह वेद का ज्यादा ध्यान नही रख पाती थी।
        वेद को नई माँ के आने से घर भरा -भरा लगता। उसको श्यामा से प्यार तो नही मिल सका लेकिन घर का सूनापन ख़त्म हो गया। अब वो चहकता हुआ माँ के आस -पास घूमता रहता।उसे अपनी माँ और सौतेली माँ का अंतर भी पता नही था। उस घर में उसका पिताजी के अलावा अपना कहने के लिए कोई और आ  गया था उसके लिए यही पर्याप्त था। बच्चो की खुशियाँ भी बहुत छोटी होती है। वह हर समय माँ के साथ रहना चाहता। उस समय औरते  घर से बाहर नही निकलती थी। इस कारण श्यामा का मन भी वेद के कारण लगा रहता।अपनी तरफ से वेद भी माँ का पूरा ध्यान रखता। कहते है "-हालात इंसान को समय से पहले समझदार बना देते है" वेद को लगता यदि माँ का कहना नही माना तो ये माँ भी उन्हें छोड़ कर चली जाएगी। वेद और मुंशीराम दोनों के लिए श्यामा ऐसी चीज थी जिसे वे खोना नही चाहते थे।
      श्यामा मनमौजी थी। उसका जब काम करने का मन होता वह काम करती जब काम करने का नही होता तब काम नही करती। लेकिन मुंशीराम उन्हें काम करने के लिए जोर नही देते बल्कि वेद और  मुंशीराम मिलजुलकर काम पूरा कर लेते थे। वैसे भी बाहर की जिम्मेदारी श्यामा की नही थी देर सवेर काम निवट  ही जाता था। उनकी गृहस्थी धीरे -धीरे राह  पर आने लगी थी। उन्हें श्यामा का मनमौजी पन भी खलता नही था।         

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