# adig

        सविता अब दिल्ली और दिल्लीवालों को समझने लगी थी। उसका  दिल्ली में मन रम गया था। अब उसे किसी से कोई परेशानी नही थी।  मनोहर को लगने लगा। वह बच्चो को अपने साथ रखने के काबिल हो गयी है। मनोहर बच्चो को उसके साथ भेजने के लिए राजी हो गया।  सविता ने विद्यालय के पास एक घर ले लिया। वह अपने तीनो बच्चो को दिल्ली ले आई।  उसके बच्चो पर अभी  सहारनपुर का प्रभाव था। वे चुप रहते थे। उनकी भाषा दिल्ली वालो से थोड़ी अलग थी। उन्हें बोलने में झिझक होती थी। सविता उनकी झिझक खोलने के सारे प्रयत्न  करती थी। सविता दिल्ली में कई सालो से रह रही थी। उसे दिल्ली अच्छी लगने लगी थी। उसके मन का डर निकल चूका था।
     नए सत्र में उसने बच्चो का दाखिला करवा दिया।  उसके छोटे दोनों बच्चे 5 बी कक्षा में आ  गए। शगुन का दाखिला अच्छे कॉलेज में करवा दिया। अब उसका जीवन सुचारू रूप से चलने लगा। उसके बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे थे। उनके लिए किसी सहायता की उसे जरूरत महसूस नही हुई। वे आपस में परस्पर मदद करते रहते थे। उसके घर की व्यवस्था देखकर हैरानी होती थी। बच्चे विद्यालय से आकर अपने काम में लग जाते। उन्हें सविता के आने -जाने से कोई फर्क नही पड़ता था।
     सविता को अपना किराये का घर छोटा लगने लगा। उसने मनोहर से इस बारे में विचार -विमर्श किया।
   मनोहर ने कहा-अब तुम्हे दिल्ली में रहना है। दिल्लीं में घरो की समस्या बहुत बड़ी है। यदि तुम दिल्ली में अपना घर लेना चाहती हो तो कोशिश करके देख लो। मुझे दिल्ली का कुछ भी पता नही है। हफ्ते में एक दिन आकर में तुम्हारी क्या मदद कर पाऊँगा।
  सविता को मनोहर का सुझाव पसंद आया। उसने आस -पास मकान को लेकर बात करनी शुरू कर दी। उसे कोई घर पसंद नही आ रहा था। कोई उसके बजट के बाहर था ,कोई इलाका अच्छा नही। वह पशोपेश में पड  गयी। उसे समझ नही आ  रहा था। उसके मतलब का मकान उसकी किस्मत में है कि नही। सविता हिम्मत हारने वालो में से नही थी। उसने मकान के लिए कोई कसर नही उठा रखी।  हर रविवार मकान देखने जाती। और निराशा उसके हाथ लगती। कुछ लोग उससे पूछते आज कहाँ  घर देखने गयी। उसके चेहरे पर मुर्दनी छा जाती।
          उस इलाके का नाम बताने के बाद निराशा के स्वर में कहती -मेरे हिसाब से घर पता नही बना है भी या नहीं। जहाँ जाती हूँ वही कोई न कोई परेशानी दिखाई दे जाती है। मुझे अकेले तीनो बच्चो के साथ रहना है। इनकी सहायता तो बहुत सालो तक मुझे नही मिल पायेगी ऐसे में सुरक्षित घर वह भी कम बजट का मिलना असम्भव लग रहा है।
     सविता की बातो में सच्चाई थी। उसकी कोशिश जारी थी। वो निराश होती और फिर से मकान देखने के लिए उठ  खड़ी  होती। बिना नागा वह हर छुट्टी के दिन मकान देखने जाती। उसने थक कर प्रॉपर्टी डीलर  से बात करने का विचार किया।  प्रॉपर्टी डॉलर के साथ भी मकान देखने जाने में उसे कोई परेशानी नही थी।  दिनिदिन उसका होंसला बढ़ता जा रहा था।
       एक दिन नेहा ने उससे पूछा -तू अनजान जगहों पर प्रॉपर्टी डीलर के साथ मकान देखने जाती है। तुझे उनसे डर नही लगता।
   सविता बोली -शुरू में बहुत डर लगता था। मुझ अकेली का साथ आये दिन कौन  देगा। एक -दो दिन की बात हो तो लोगो ने साथ दिया पर मकान जैसी चीज इतनी जल्दी पसंद नही आती। मकान सस्ता और सुरक्षित मिलना बहुत मुश्किल होता है। अब मुझे ओरो से मदद मांगते हुए शर्म आने लगी है । कुछ लोग कहने लगे थे। जैसा मकान दिल्ली में चाहिए वैसा मकान दिल्ली में मिलना मुश्किल है। उन्होंने हिम्मत छोड़ दी लेकिन मै हिम्मत नही छोड़ सकती। मेरा और बच्चो का पूरा भविष्य उसी पर टिका है। इसलिए अपने डर पर काबू करके प्रॉपर्टी डीलर के साथ अकेले जाने लगी हु। अब उनके साथ इतनी बार जा चुकी हूँ की     अब डर नही लगता।
     उसकी बातो में सचाई थी। उससे हमदर्दी के साथ सहानुभूति भी हुई। उसकी जिजीविषा उसका कायल बना देती थी। छोटे से गाँव की छोटी सी औरत ने अपनी मेहनत के बल पर अपना मुक़ददर बदलने की सोची। अभी सविता की उम्र केवल ३५ साल थी। उसने अपने बेस पर हालात को पूरी तरह बदल डाला था। वो हर पल  अपनी किस्मत और हालात का सामना करके उसके सामने अडिग खड़ी  रही। उसने अपने मुश्किल हालात का कभी रोना नही रोया। वह लगातार संघर्ष कर रही है। 

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