#janm kundli

     वेद ने जैसे ही दसवी का परिणाम पाया। उसके साथ ही  उसे नौकरी के लिए एक पत्र भी प्राप्त हो गया। उन दिनों दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था।  सेना में बिना किसी मापदंड के ही नौकरी मिल जाती थी। उन दिनों अनपढ़ लोगो की संख्या ज्यादा थी। पढ़े -लिखे लोग उंगलियो पर गिने जाते थे। इस हिसाब से दसवी पास बहुत बड़ी पढ़ाई कहलाती  थी।   वेद को सेना की नौकरी का पत्र पाकर बहुत ख़ुशी हो रही थी। उस समय में नौकरियां बहुत मुश्किल से प्राप्त होती थी लेकिन उनके घर में उनके नौकरी के पत्र के कारण ख़ुशी नही मनाई गयी। बल्कि चारो और मातम छा गया।
           घर के बड़े लड़के को सेना में भेजने के लिए कोई तैयार नही था। सेना में जाने का मतलब साक्षात मौत मानी  जाती थी। कोई भी अपने बच्चे की मौत पसंद नही करता। घर के सभी लोगो के विरोध के कारण वेद सेना की नौकरी में न जा सका। इस बात का वेद को सारी  उम्र दुःख रहा। उस समय में बच्चे की इच्छा मायने नही रखती थी बल्कि बड़े लोगो के निर्णय के सामने छोटो को सिर  झुकाना पड़ता था। वेद को सारी उम्र सेना की नौकरी ना कर पाने का दुःख रहा। वक्त निकल जाने के बाद पछतावा ही शेष रहता है। वह ताउम्र इस दर्द से जूझते रहे।
     अठारह साल की उम्र में उनकी शादी के बारे में सोचा जाने लगा। एक सुंदर युबती सुकन्या से वेद की शादी की बात चल रही थी। वेद की शक्ल सुकन्या के बड़े जीजाजी जिनकी मृत्यु हो चुकी थी उनसे मिलती थी इस कारण सुकन्या के पिताजी का झुकाव थोड़ा सा वेद की तरफ था ।
        सुकन्या केवल सोलह साल की थी। उसके विवाह को लेकर उनके पिताजी काफी समय से चिंतित थे। सुकन्या चार बहने थी। सुकन्या की  सबसे बड़ी बहन का विवाह जिससे हुआ था। उनकी मृत्यु हो गयी थी। सुकन्या के पिता उसका विवाह अच्छे परिवार में करना चाहते थे। इस परिवार के देखे सुकन्या समृद्ध परिवार की थी। उस हिसाब से वेद का परिवार उतना अमीर  नही था। उस पर सौतेली सास का दंश। सुकन्या के पिता को डर सता  रहा था। सौतेली सास सुकन्या को बहुत दुःख देगी। वे बेटी की शादी उस घर में नही करना चाहते थे।
       जब घर में उन्होंने अपनी राय जाहिर की तो  सुकन्या की बडी बहन  प्रेमवती ने कहा -आप पैसे की चिंता मत करो। मेरा कोई बेटा नहीं है। उसे में अपना वारिस बना लुंगी। दोनों जब मेरे साथ रहेंगे तो सौतेली सास की परेशानी भी कोई मायने नही रखेगी  मेरा सब कुछ उसे मिल जायेगा।सुकन्या को पैसे के कारण कोई परेशानी नही होगी। सुकन्या के पिताजी को ये सुझाव उचित लगा। उन्होंने रिश्ता तय कर दिया।
        प्रेमवती की शादी एक बहुत अमीर घर में हुई  थी पर उसके पति अपने परिवार की बाइसवीं  संतान थे। उनके परिवार में एक के बाद एक  उनके बीस भाई -बहनो की मौत हो चुकी थी। वे और उनकी एक बहन ही जीवित थी। शादी के कुछ समय के बाद ही प्रेमवती के पति की भी मौत  हो गयी वे उस समय केवल बाइस साल के थे। प्रेमवती केवल सत्रह साल की उम्र में विधवा हो चुकी थी। जब प्रेमवती के पति का स्वर्गवास हुआ तव प्रेमवती गर्भवती थी। उनका बेटा कुछ समय बाद होकर मर गया।  जिसके कारण उसकी जिंदगी वीरान हो गयी।
         वो समय औरतो के हिसाब से बहुत दुखदायी था। विधवा औरतो से सारे सुख छीन लिए जाते थे। उसे जीते जी मृत के सामान समझ लिया जाता था। उसका दुःख उस परिवार के सभी लोगो ने देखा और सहन किया था। होनी को कौन बदल सकता था। उस ज़माने में विधवा की दूसरी शादी भी नही होती थी। प्रेमवती पति की मौत के बाद पंद्रह बरस तक और जीवित रही। पर उसका दुःख सभी को रुलाता रहता था। उसके परिवार की हंसी गायव हो गयी थी। ऐसे में प्रेमवती की इच्छा को सम्मान देते हुए सुकन्या की शादी वेद से तय कर दी गयी।
          इधर रिश्ता तय हुआ उधर वेद को टायफायड हो गया। ये बीमारी उन दिनों जानलेवा थी। सबकी सांसे फिर से ठहर गयी।" देखो अब क्या होता है। ये भी अपने भाई -बहनो के पास तो नही चला जायेगा। सुकन्या के पिताजी को भी वेद की  बीमारी ने हिला के रख दिया था। उनकी बीमारी के बारे में सुनते ही वे सीधे ज्योतिषी के पास गए। उन्होंने सबसे पहले  जन्मकुंडली दिखा के  पूछा -इस लड़के की उम्र कितनी है।
    पंडित ने कहा -इसकी उम्र बहुत लम्बी है। ये बीमारी ज्यादा दिन तक नही रहेगी। यह लड़का जल्दी स्वस्थ हो जायेगा। पंडित की बात सुनकर सुकन्या के पिताजी को तसल्ली हुई। उन्हें उनकी बड़ी बेटी का दुःख ही हर समय सालता रहता था। उस दुःख को वे शव्दो में व्यक्त नही कर पाते  थे। पर अब वे दुबारा उस दुःख का सामना नही करना चाहते थे।
    पंडित के शब्दों पर यकीन करके उन्होंने सुकन्या की शादी की तैयारियाँ शुरू कर दी। धीरे -धीरे वेद की तबियत में भी सुधार आता जा रहा था।  

#SOTELI MA

        श्यामा के विवाह को कई साल बीत  गए वह उम्मीद से थी। उनके घर में रौनक आ  गयी। उनके घर में बेटी ने जन्म लिया। सब बहुत खुश थे। अब घर में उम्मीदों के चिराग रोशन होने लगे वेद को खेलने के लिए खिलौना मिल गया था। लेकिन अब उसका काम पहले से ज्यादा बड  गया था। पर उसके लिए उसकी छोटी बहन मन बहलाव का साधन थी। जब भी वेद अकेला या खाली  होता बहन का भोलापन उसे खुशियो से भर देता। घर का काम,विद्यालय की पढ़ाई  और बहन के साथ समय पंख लगा कर उड़ने लगा। अब वेद पर बड़े होने की जिम्मेदारी आ  गयी थी क्योंकि उससे भी छोटी बहन उसके घर में आ  गयी थी। उसके बाद हर दो साल बाद उसके भाई -बहन आने लगे इस तरह नई  माँ से उसके पांच भाई बहन हो गए। अब घर में  हर समय चहल -पहल रहती। जो वेद कभी सबसे छोटा था। अब सबका बड़ा भाई बनके जिम्मेदार इंसान की तरह उसका व्यवहार हो गया। 
     श्यामा हर समय बच्चो से घिरी रहती। उसके लिए घर और बच्चो के साथ वेद का ध्यान रखना दुश्वार था। बल्कि उसे माँ के प्यार की जगह भाई बहनो की देखभाल की जिम्मेदारियों ने घेर लिया था। वेद इतना समझदार हो गया था। वह कब अपने विद्यालय का काम कर लेता था। कब खाना खा लिया। कब उसकी थकान उतरी ये सब कोई पूछने वाला नही था। अब मुंशीराम अपने पांचो बच्चो और श्यामा की जरूरत पूरी करने में इस तरह जुटे रहते की उनका एक और बेटा वेद भी है। इसकी तरफ उनका ध्यान ही नही जाता। दूसरा अपनी पत्नी श्यामा से भी थोड़ा डरते थे क्योंकि उन्हें उसकी जवानी और अपने बुढ़ापे से डर लगता था।
      कहाबत है - दूसरी माँ  के आते ही बाप तीसरा हो जाता है। अब मुंशीराम श्यामा के सामने वेद से बात करने की हिम्मत भी नही जूटा  पाते  थे। उम्र बढ़ने के साथ ही वेद को अपने अकेले होने का अहसास गहराता जा रहा था। वह चुपचाप हर समय काम में लगा रहता था। उसे देखकर लगता था वेद पैदा ही बड़ा बनने के लिये  हुआ था।
      वह अकेले में सोचता- काश उसकी अपनी माँ होती  उसे कितना प्यार करती। उसकी माँ कितनी प्यारी थी। उसने मुझे जीवित रखने के लिए अपने प्राण न्योछोवर कर दिए। कभी उसने सोचा होगा उसका बेटा  अपने घर में हर समय काम के बोझ से दब जायेगा। उसे प्यार के दो शव्द कहने बाला भी कोई नही होगा। उसका लाडला कभी प्यार के लिए इस तरह तड़पेगा।
        हरप्यारी को  मुंशीराम से भी इस तरह की उम्मीद नही होगी। कि  दूसरी पत्नी के प्यार में पड़कर अपने लाडले की सुध भी लेना भूल जायेंगे।ऐसे समय में वेद अपनी बड़ी बहनो और भाइयो के ख्यालो में खो जाता। उसके सपने ही उसे प्यार के सागर में डुबो देते असलियत में प्यार तो उससे कोसो दूर था। उसके सपनो में माँ आकर  उसके थके शरीर पर हाथ फेरती। उसके मन को संभालती और दिलासा देती। यथार्थ में तो कोई भी इंसान उसे प्यार करने वाला नही था। वेद इतना समझदार हो चूका था। वह अपने पिता से भी कभी जिद नही करता था। उसने गिला -शिकवा करना क्या होता है। यह तो जाना ही नही था। अपनी जरूरत के लिए मांगना उसे आता ही नही था। इसी तरह धीरे - धीरे  समय उड़ता जा रहा था।
        वेद ने इसी माहौल  के बीच दसवी पास कर ली। उस ज़माने में दसवी पास भी बहुत कम लोग कर पाते  थे। उस जगह उंगलियो पर गिनने लायक लोग पढ़े लिखे होते थे। सबको हैरानी होती थी वेद के हाथ में कभी किताब देखी नही। इतने बड़े परिवार के काम में ही उसका सारा समय निकल जाता था। इसने कब पढ़ाई  की। और इतने अच्छे नंबरों  से [पास हो गया।    

#ekakipan

   वेदप्रकाश बहुत छोटा था। उसके काम करने में मुंशीराम को बहुत दिक्क़त  आती  थी। उसके घर को  सँभालने के लिए किसी का होना बहुत जरूरी था। उनके लिए  नौकरी और घर दोनों को सम्भालना और वेद की बातो का जबाब देना बहुत मुश्किल हो रहा था। बड़ो से उनका दुःख देखा नही जा रहा था।  वे उससे दूसरी शादी के लिए जोर दे रहे थे। पर मुंशीराम उन बातो को अब तक टालते आ  रहे थे।
    एक दिन वेद ने पिता से कहा -पिताजी माँ क्यों नही आती। माँ के बिना मुझे घर अच्छा नही लगता।
   पत्नी के अभाव में मुंशीराम बहुत एकाकी हो गए थे वे अपने मन की बात किसी से साझा नही कर पाते थे। वेद के दर्द को अच्छी तरह से समझ रहे थे। उसकी काट उनके पास नही थी। उन्होंने अपने बारह  बच्चे और पत्नी को खो दिया था।  उनके मन में मृत्यु का डर  बैठ गया था। उन्हें हर तरफ मृत्यु नाचती दिखाई देती थी। उन्हें वेद की जिंदगी का भी कोई भरोसा नही था।
    अपनी एकाकी जिंदगी से उन्हें डर लगने लगा था। उनकी छोटी उम्र में शादी हो गयी थी इस कारण इतना दुःख भोगने के बाद भी उनकी उम्र ज्यादा नही थी उस पर एक छोटे और नासमझ बच्चे की जिम्मेदारी उन्हें परेशान कर रही थी। उस ज़माने में मृत्यु दर ज्यादा होने के कारण आदमियो की दूसरी शादी आसानी से हो जाती थी। उन्हें इस उम्र में भी क्वारी,  छोटी उम्र की लड़की आसानी से मिल सकती थी। उनके मन में वेद को लेकर डर  बैठा था। दूसरी माँ उसका ध्यान कैसे रख पायेगी। उनका लाडला बेटा विमाता के साथ कैसे निभा पायेगा। उनकी मनस्थिति डावाडोल थी। एक तरफ उनकी जरूरत तो दूसरी तरफ विमाता का व्यवहार उनके मन को दूसरी शादी से मना कर रहा था।
     अंतत मन पर जरुरतो ने कब्जा कर लिया। वे दूसरी शादी के लिए तैयार हो गए। उनके घर में एक दिन दुल्हन के रूप में श्यामा  आ  गयी। श्यामा की उम्र ज्यादा नही थी। वह बेहद गरीब घर की लड़की थी। उस हिसाब से उसे अच्छा और खाता-पिता घर मिल गया था। उस समय के हिसाब से उसकी सारी जरूरत का सामान उस घर में मौजूद था।  मुंशीराम पत्नी की जुदाई का गम भोग चुके थे। वे श्यामा का खूब ध्यान रखते थे।उसकी एक आवाज पर मुंशीराम उसकी जरूरत पूरी करने के लिए  तैयार रहते थे। श्यामा के दिन रात  सुख से बीत रहे थे। श्यामा और वेद की उम्र में केवल पंद्रह साल का अंतर था। उस समय के हिसाब से श्यामा की उम्र ज्यादा हो चुकी थी। पर अभी वह नासमझ ही थी।  वह वेद का ज्यादा ध्यान नही रख पाती थी।
        वेद को नई माँ के आने से घर भरा -भरा लगता। उसको श्यामा से प्यार तो नही मिल सका लेकिन घर का सूनापन ख़त्म हो गया। अब वो चहकता हुआ माँ के आस -पास घूमता रहता।उसे अपनी माँ और सौतेली माँ का अंतर भी पता नही था। उस घर में उसका पिताजी के अलावा अपना कहने के लिए कोई और आ  गया था उसके लिए यही पर्याप्त था। बच्चो की खुशियाँ भी बहुत छोटी होती है। वह हर समय माँ के साथ रहना चाहता। उस समय औरते  घर से बाहर नही निकलती थी। इस कारण श्यामा का मन भी वेद के कारण लगा रहता।अपनी तरफ से वेद भी माँ का पूरा ध्यान रखता। कहते है "-हालात इंसान को समय से पहले समझदार बना देते है" वेद को लगता यदि माँ का कहना नही माना तो ये माँ भी उन्हें छोड़ कर चली जाएगी। वेद और मुंशीराम दोनों के लिए श्यामा ऐसी चीज थी जिसे वे खोना नही चाहते थे।
      श्यामा मनमौजी थी। उसका जब काम करने का मन होता वह काम करती जब काम करने का नही होता तब काम नही करती। लेकिन मुंशीराम उन्हें काम करने के लिए जोर नही देते बल्कि वेद और  मुंशीराम मिलजुलकर काम पूरा कर लेते थे। वैसे भी बाहर की जिम्मेदारी श्यामा की नही थी देर सवेर काम निवट  ही जाता था। उनकी गृहस्थी धीरे -धीरे राह  पर आने लगी थी। उन्हें श्यामा का मनमौजी पन भी खलता नही था।         

#virana

     कुछ लोगो का जीवन बहुत ही ज्यादा परेशानियों से भरा होता है। उन्हें देखकर लगता है। उनका जीवन परेशानियों का पर्याय बन गया है। उनके जीवन में इतने अधिक हादसे होते है। कोई साधारण इंसान टूट के बिखर जाये। लेकिन वे जीवट वाले लोग उन परेशानियों से हर बार उबर जाते है। उनके लिए मुशीबत रोकती नही बल्कि दुगने जोश से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। ऐसे ही वेदप्रकाश का जीवन था।
     ये काफी समय पहले की बात है उन दिनों भारत में मृत्यु दर   बहुत ज्यादा थी. हर घर में आठ या दस बच्चे  होना आम बात थी। उसपर बड़े होने तक एक या दो बच्चे जीवित रह जाये ऐसे परिवारो को खुशनसीब समझा जाता था। मैने  ऐसे कई परिवार सुने है। जिनमे बाइस  बच्चे हुए लेकिन जीवित एक ही बच्चा रह पाया। उन माओ का क्या हाल   होता है। इसकी कल्पना से भी दिल मसोसने लगता है।
       उन दिनों का समाज बहुत ही दकियानूसी था। एक औरत  एक बच्चे को जन्म देते हुए दूसरा जन्म लेती है। नो महीने की दिक्क़ते उस पर बच्चे के जन्म की पीड़ा सहते हुए नए  जीव को धरती पर लाना। औरत के लिए दूसरी जिंदगी होती थी। उस समय में औरतो की मृत्यु दर भी बहुत अधिक होती थी।
        मै  आपको ऐसे परिवार के बारे में बताना चाहती हूँ जिसमे एक औरत  हरप्यारी  के बारह  बच्चे हुए पर उसकी आँखों के सामने नो बच्चे ख़त्म हो गए। उसकी  हालत बहुत बुरी हो गयी थी।  उसके मन से जीने की इच्छा ख़त्म हो गयी थी। वह हरदम चुप रहती थी। उसका खाना पीना सब कम  हो गया था।उसके मन में डर  बैठ  गया था भगवान  उसके बाकी  तीनो बच्चो को कभी भी अपने पास बुला लेंगे।
     उन दिनों टायफायड की बीमारी का कोई इलाज नही था। हरप्यारी के तीनो बच्चो को टायफायड हो गया  उनकी देखभाल में वो दिन रात लगी रहती। यथासंभव उनका इलाज करवाती रहती।
     वह अपने पति मुंशीराम से दुःख भरे शव्दो में कहती -कोई अच्छा डॉ लाओ जो मेरे बच्चो को ठीक कर सके।
   उन्होंने कई डॉ बदल दिए पर उन्हें रोग का इलाज नही मिल सका। उनका जीवन से विश्वास उठता जा रहा था। आये  दिन अलग -अलग जगहों से दवाइयाँ मंगवायी  गई। पर रोग को कोई डॉ पकड़ नही पाया। हरप्यारी की एक बेटी बारह  साल की। दूसरी बेटी आठ साल की थी बेटा वेदप्रकाश केवल चार साल का था। तीनो अलग -अलग बिस्तर पर पड़े हुए थे हरप्यारी उनकी सेवा करते हुए अपनी भूख प्यास सब भूल गयी थी। गहरी  नीद क्या होती है इसका उसे ध्यान ही नही था। बच्चे की कराह के साथ ही वह सजग हो जाती थी।
        साधनो की कमी के  कारण उसके सामने उसकी  एक के बाद दोनों बेटियाँ भी चली गयी। वह निराशा के गर्त में डूब गयी। उसका मन वेदप्रकाश से भी विमुख हो गया। उसके मन में बैठ गया जब उसके ग्यारह बच्चे उसकी आँखों के सामने चल बसे यह भी चल बसेगा।
        अब वह हर समय भगवान  से प्रार्थना करती रहती -भगवान  वेद को जीवन दे दे उसके बदले मुझे उठा ले। में बच्चो के बिना कैसे जी पाऊँगी।
       वह हर समय भगवान के ध्यान में लगी रहती।भगवान ने जैसे उसकी सुन ली उसकी तबियत दिनों -दिन गिरती चली गयी वेद धीरे -धीरे उठ खड़ा हुआ। जिस दिन वेद पूरी तरह स्वस्थ हुआ। हरप्यारी उसको देख कर खुश हुई। उसके कुछ दिनों बाद हरप्यारी ने आँखे मूंद  ली।  इसे कहते है जीवन की विडंबना। हरप्यारी अपना जीवन देकर इस चार साल के बच्चे को छोड़ के हमेशा के लिए अनंत में समां गयी।
         वेद सही मायने में माँ की मौत को समझने के काबिल नही था। माँ की चिता को अग्नि देने के लिए जब उसे लकड़ी पकड़ाई गयी। उसके लिए यह भी एक खेल था। अभी वह  जिंदगी और मौत का अंतर समझ सके इतनी उम्र नही थी।
      अब खाली घर को देखता तब  वेद  पिताजी से पूछता- माँ कहाँ  है। दीदी कहाँ  चली गयी। मेरे साथ खेलने वाला कोई क्यों नही है।
     वेद की नासमझी पर मुंशीराम अपने आंसू मुश्किल से रोक पाते। वेद तो उनके आंसुओ का मतलब और दुःख को समझने के काबिल नही था।  मुंशीराम रात  को सुनी -सुनी आँखों से आसमान को देखते। उनको घर का सूनापन काटने को आता। तब अकेले में उन्हें मृत बच्चे और पत्नी बहुत याद आती। उनके आंसू रात  के वीराने में रुक नही पाते।  दिन के समय बेटे की ख़ुशी के लिए अपने आंसू छुपाये रहते पर इतना अधिक दुःख रात के समय फुट पड़ता।      
  

#barbadi

     आज हमारे विद्यालय में बिजली और पानी दोनों नही थे। जिसके कारण जल बोर्ड से पानी का टेंकर मंगवाया गया।  पानी का टेंकर देखकर हमें बहुत हैरानी हुई। वह टेंकर एक बार चालू होने के बाद उसका पानी बंद करने का कोई तरीका नही था। गर्मियों में पानी सबकी जरूरत होती है। पानी को देखकर सबकी बांछे  खिल जाती है। पानी के टेंकर के लिए फोन करते ही टेंकर आ  गया। हम उसे देखकर हैरान हो गए। इतनी जल्दी टेंकर पहुँच गया था। .
    पानी बहुत जयादा था। उसको देखकर लग रहा था यदि इसका पानी घर के बड़े टेंक में डलबा  लिया जाये तो उससे  बड़े परिवार का गुजारा  एक महीने तक चल जाये।   टेंकर में नल का आभाव उसे आधे दिन में ही ख़त्म कर देगा।हम भी बहते हुए जल को देख रहे थे। उसको रोकने का हमारे पास कोई उपाय नही था। हम बच्चो को हर चीज का सदुपयोग करना सिखाते  है। ऐसे में हम बच्चो को कुछ नही कह पा  रहे थे।
       वहाँ पानी बहुत ज्यादा गिर गया था। उसके कारण चारो तरफ कीचड़ हो गयी थी। बच्चे संभल कर पानी पीने न आये  तो वही  कीचड़ में गिर रहे थे. मेने कई . बच्चो को कीचड़ के कारण गिरते देखा है। यदि कोई बड़ा इंसान इतनी बुरी तरह से गिर जाये तो उसे बिस्तर से उठने में ही एक हफ्ता लग जाये। पर बच्चे तो बच्चे होते है। उनको पानी में गिरना भी एक मनोरंजन का साधन था। वे कीचड़ से लिपटे हुए फिर से उठ खड़े होते थे। हम भी उनकी प्यास और पानी के बीच में व्यवधान पैदा नही कर सके।
      मैने  कई  बार रास्ते में पानी का टेंकर जाते हुए देखा है उसमे से पानी इतनी अधिक मात्रा  में गिर रहा होता है कि  आस -पास वाले भीग जाये। इसलिए लोग पानी के टेंकर से दूरी बना कर चलते है।   हमने कई जगह लिखा देखा है "पानी ही जीवन है। " इस जीवन के लिये लोगो को परेशान देखा है। जीवन के सारे काम इसके अभाव में रुक जाते है। पानी हमारी सबसे बड़ी जरूरत है। इसकी बर्बादी रोकी जाये। "बिन पानी सब सून "कहाबत आपने  सुनी होगी। यह कहाबत ही नही सच्चाई है। यदि पानी उचित तरीके से पहुंचाया जाये तो सबकी जरूरत पूरी हो सकती है।
     आवश्यकता से अधिक पानी का प्रयोग करना। उसको बहने देना। इसी  कारण पानी की कमी  होती है। 

#gav ka gorav

     मनोहर शगुन को लेकर मद्रास चला गया।  अब सविता को खालीपन  अच्छा नही लग रहा था। सविता को शगुन की बहुत याद आ  रही थी। शगुन उसके  जिगर का टुकड़ा थी।  उससे दुरी उसकी याद दिलाये जा रही थी।  वह उसकी उन्नति में रोड़ा नही बनना चाहती थी।  माँ का दिल तो माँ का दिल होता है। समझाने से भी नही समझ रहा था।
    सविता उसका बचपन याद करते हुए पुरानी यादो में खो गयी।  उसने किस मुश्किल  से  अपनी  पढ़ाई  पूरी की।  नौकरी के लिए उसकी कितनी नाकामयाब कोशिशे  जिससे उसका मनोबल टूटने लगा था। उसकी जब  दिल्ली में नौकरी लगी। उसी समय उसकी उत्तर प्रदेश की नौकरी के भी आर्डर आ  गए थे। उसके लिए मन को समझाना मुश्किल हो रहा था। उसके लिए कहाँ  की नौकरी  सही रहेगी। उत्तर  प्रदेश की नौकरी प्रायमरी की थी जबकि दिल्ली की नौकरी सेकेंडरी स्कूल की थी। इसलिए उसने दिल्ली की नौकरी को ही उचित समझा। क्योंकि प्रायमरी की नौकरी में वेतन  और रुतवा दोनों ही कम थे। वहाँ गाँव के आस -पास नौकरी नही मिलती कही दूर की नौकरी करनी पड़ती। उस हिसाब से उसको उन्नति करके सेकंडरी अद्यापिका ही बनना  था इस पद तक पहुँचने  में उसे दस या बीस साल भी लग सकते थे। दोनों नोकरियो में परेशानी उठानी पड़ती इसलिए  उसने मन को पक्का करके दिल्ली की नौकरी कर ली।
    सविता की दिल्ली की नौकरी लगते ही वह  सभी की आँख का तारा बन गयी थी। अब सब अपनी बहुओ और बेटियो को सविता का उदाहरण देकर पढ़ने पर जोर देने लगे  थे । यही सविता एक समय लोगो के मनोरंजन का साधन थी। वही सवके लिए प्रेरणा का सबब बन गयी थी।  उसके गाँव  की ओरतो के लिए उसने पढ़ने का रास्ता खोल दिया था।
        अब सविता की पढ़ाई  अपने पति से ज्यादा हो गयी थी। उसकी कमाई भी पति से ज्यादा हो गयी थी। दिल्ली जैसे शहर में आकर चार साल के अंदर उसने अपने बल पर एक मकान ले लिया था। इतना आत्मविश्वास बिना पढ़ाई या नौकरी के क्या आ  सकता था। जो काम करते हुए आदमी भी झिझकते है वह काम उसने अपने दम  पर कर दिखाया था। उसके बच्चे भी माँ को गौरव की निगाह से देखते है। सविता का जज्बा है तभी तो उसके बच्चे पढ़ाई  में तरक्की कर पा  रहे है। अन्यथा उसके बच्चे भी गाँव के बच्चो की तरह जीवन गुजार रहे होते।
    कहाबत है -एक आदमी की पढ़ाई  से सिर्फ एक इंसान की पढ़ाई होती है जबकि एक औरत की पढ़ाई से तीन परिवार रोशन होते है।  सविता की पढ़ाई का फायदा उसके मायके ,ससुराल और उसके परिवार को ही नही मिला बल्कि  उसने दो गावो की औरतो की किस्मत ही बदल दी। अब दोनों गाँवो की औरतो को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा है। जिस मनोहर को "-जोरू का गुलाम लोग कहते थे।  " सभी उसकी हिम्मत और किस्मत की  दाद  देने लगे है।
     इसलिए कहा जाता है - औरतो के लिए आगे बढ़ना बहुत मुश्किल होता है। उसकी मेहनत बहुत सारी औरतो को आगे बढ़ने का रास्ता दिखा जाती है।  पढ़ी लिखी और नौकरी करने बाली  औरते किसी पर बोझ नही बनती बल्कि उनका सहारा बन जाती है। इसलिए सभी को अपनी बेटी की पढ़ाई  में कभी बाधा नहीं पहुचानी  चाहिए बल्कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। वह पढ़लिख कर आपका सहारा बन जाएगी और आपको गौरवान्वित करेगी। 

# manssthti

  मनोहर के घर में प्रवेश करते ही सविता और शगुन उनका बेताबी से इंतजार करती हुइ मिली। मनोहर उनकी बेताबी देखकर हैरान हो गया।  उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ  गयी।
    मनोहर ने पूछा -क्या बात है। आज सबकूछ अलग लग रहा है।
    सविता ने अपनी बेचैनी का कारण बताया। जिसे सुनकर मनोहर भी सोच में डूब गया।  उसकी समझ में नही आया। क्या जबाब दे।  उसने दोनों से कुछ समय सोचने के लिए माँगा। वह परिवार के बीच में आकर ख़ुशी जाहिर कर रहा था। उसके मन के अंदर बबंडर चल रहा था। उसका मन भी शगुन को इतनी दूर भेजने से डर  रहा था।  जो शंका सविता के मन में उठ रही थी। उन्होंने ही मनोहर को विचलित कर दिया था। सारी  रात मनोहर को सही से नीद नही आयी। सुबह के समय उसकी आँख लगी जब सविता ने उसे जगाया। तब उसे लगा अभी तो सोया था। इतनी जल्दी सुबह हो गयी।
    सविता और शगुन मनोहर के पास चाय लेकर आई। दोनों जिज्ञासा से मनोहर की तरफ देख रही थी मनोहर क्या निर्णय लेते है। ये निर्णय एक के पक्ष में तो दूसरे के विपक्ष में होता। अब मनोहर के लिए परीक्षा की घडी थी। वह शगुन को बहूत  प्यार करता था। शगुन उसकी आँख का तारा थी। उससे उसका दुःख देखा ना जा रहा था । पर पिता का दिल उसे इतनी दूर भेजने के लिए तैयार नही हो रहा था।
     मनोहर ने भी शगुन के सामने दूसरा विकल्प तलाशने के लिए कहा। शगुन इसके लिए तैयार नही  हो रही थी। तब हार कर मनोहर शगुन को मद्रास में पढ़ाई के लिए भेजने को  तैयार हो गया।  शगुन की ख़ुशी संभाले ना संभल रही थी। मगर मनोहर और सविता चिंता में डूब गये  थे।
    मनोहर ने पूछा -कब मद्रास जाना है।
   शगुन बोली -दस दिन के अंदर पहुँचना  है।
  मनोहर ने पूछा -फ़ीस के कितने पैसे लगेंगे। उनका भी इंतजाम करना  है।  वहाँ किसी से तेरी बातचीत हुई  है। .
शगुन बोली -जो भी वहाँ  के बारे में बात कर रहा है। सब कुछ अच्छा बता रहे है। हमें किसी तरह की परेशानी नही होने देंगे। सब कुछ इंतजाम कर दिया जायेगा।  वे तो सब तरह से अस्वासन दे रहे है।  एक बार आप चल कर देख लोगे। तब सही से पता चल जायेगा।
    मनोहर ने सविता से पैसे का इंतजाम करने के लिए कहा. फिर सविता से बोला -में वहाँ जाकर छुट्टी के लिए दरख्वास्त देता हूँ। मुझे कम  से कम दस दिन की जरूरत पड़ेगी। इससे कम  में तो काम नही चलेगा।
 तुम शगुन के जाने का इंतजाम करना। मै  आते ही  इसे मद्रास के लिए चल दूँगा।  शगुन तुम टिकट का रिजर्वेशन करवाने की कोशिश करो। जितनी जल्दी निकल सके उतना ही अच्छा रहेगा।
    एक परिवार तीन हिस्सों में बटने  लगा था।  आज की जिंदगी के मायने बदल गये  है।  लोग अपनी उन्नति के लिए कही भी जाने के लिए तैयार हो जाते है। उन्हें सुविधा से ज्यादा तरक्की मायने रखती है। पुराने ज़माने की मान्यताये अब टूटने लगी है। 

# siksha

      शगुन की  स्नातक की डिग्री अच्छे नंबर से  है। अब वह पोस्ट ग्रेजुएशन करना चाहती है। उसका मनपसंद विषय गणित है। उसकी प्रतियोगिता बहुत मुश्किल हे।  उसने कई  जगह के फार्म भर दिए हे। पर उसका आस -पास के कॉलेज में स्थान नही मिल पाया । उसका स्थान मद्रास के कॉलेज में मिला। दिल्ली और आस -पास गणित में एम. ए रेगुलर  बहुत कम  जगह होता है । उनमे उसका दाखिला नही हो पाया।  शगुन का मन केवल रेगुलर कॉलेज से पढ़ाई करने का है। किसी और विषय में शगुन पढ़ना  नही चाहती। सविता सोच कर परेशान हो रही है। शगुन को इतनी दूर अकेली कैसे भेज दे।
               सविता बोली -इतनी दूर जाकर तू परेशान हो जाएगी। वहाँ की भाषा तेरी समझ में नही आएगी। खाना -पीना भी हमारे जैसा नही है। तेरी उम्र ही क्या है। कुछ और सीख ले।
    शगुन बोली -माँ गणित में दाखिला मिलना बहुत मुश्किल होता है। इस साल मिल गया  ज़रुरी नही अगले साल फिर नंबर आये। एक साल के अंतर पर कई तरह की दिक्क़त पैदा हो जाती है।  एक साल घर में रहकर  मुझे भी धीरे -धीरे अपने ऊपर  से भरोसा कम  हो जायेगा।  एक साल का अंतर बहुत होता है।
   सविता बोली -- एक साल कोई बहुत बड़ा समय नही होता यू ही बीत जायेगा। तुझे पता भी नही चलेगा।
  शगुन बोली-माँ आप ऐसी बाते  मत करो। आप इतनी पडिलिखी होकर डर  रही हो।
  सविता बोली -तुझे अभी पता नही माँ का दिल बच्चो को लेकर कितना चिंतित रहता है। तेरी जुदाई का गम मुझे दिन -रात  बेचैन कर रहा है।
  शगुन बोली -मै अब बालिग हो गयी हूँ। आपके सामने में कब तक बच्ची रहूँगी। आप मुझ पर भरोसा करना सीखो।
   सविता बोली -भरोसा कैसे करु तू मुझे समझदार नही लगती। दुनियाँ के लोग सीधे नही है। तुझ जैसी लड़की को यु गड़प जायेंगे। इतनी दूर कोई हमारी जान -पहचान का नही है। तुझे कभी हमारी सहायता की जरूरत पड़ी तो दो दिन हमें पहुँचने में लग जायेंगे। अपनों की जरूरत इंसान को हमेशा रहती है। तूने कभी अकेलापन झेला नही है। अकेलेपन का दर्द तू क्या जाने।
   शगुन बोली -माँ आपकी कमजोरी कही  मेरी उन्नति को रोक ना  दे।  आप ही बताये दिल्ली में अच्छे दिन का इंतजार करते हुए वक़्त बिताना कहाँ  का इंसाफ है।  माँ खुशकिस्मत केवल एक बार दरवाजा खटखटाती है। उसके लिए दरवाजा नही खोले तो दुबारा मौका नही देती।
   सविता बोली- तेरे मन में इतनी निराशा कहाँ  से भर गयी। भविष्य तुझे इतना डरावना क्यों लग रहा है। हमारे होते तेरे साथ कुछ बुरा नही होगा।
   शगुन बोली- माँ आप मेरी हालत समझ नही पा  रही हो। मेरी सभी सहेलिया का दाखिला उनके पसंद के विषय में हो गया है।  मेरे उनसे ज्यादा नंबर आये  है। वे रेगुलर कॉलेज में जाये और मै अच्छे दिनों का इंतजार करू।
   सविता बोली -मेरे लिए तेरी पढ़ाई  से ज्यादा तेरी सुरक्षा मायने रखती है। मै अपने दिल को कैसे मनाउ।
शगुन बोली -अगर मेरी जगह भाई होता। तब भी तुम उसे मना  करती।
  सविता बोली -लड़के और लड़की में अंतर होता है। लड़को के बारे में इतनी चिंता नही होती। जितनी लड़कियों को लेकर होती है। मैने पहले ही गाँव के नियम तोड़े है। उसपर तू तो बिलकुल प्रदेश चली जाएगी। मेरा दिल इसकी इजाजत नही दे रहा।
    सविता से शगुन बोली -माँ  आज तुम गवारो  जैसी बाते  कर रही हो। मुझे आप से ऐसी उम्मीद नही थी।
    सविता बोली -तू शहर की होगी। मै अभी भी गाँव  से जुडी हुई हूँ। इस विषय में मेरा दिमाग काम नही कर रहा है।  शनिवार को तेरे पापा आएंगे उनसे सलाह मशवरा करेंगे। अब तू मुझे परेशान मत कर। मै  तुझसे बहस नही करना चाहती हूँ..
   शगुन और सविता दोनों शनिवार का इंतजार करने लगी। दोनों का मन स्थिर नही था। 

# sjaye -maut

      सविता ने एक दिन बताया- उसके गाँव  में एक लड़के और एक लड़की को उसके घर वालो ने जान से मार दिया है।
   हमें बहुत हैरानी हुई। हम समझ नही सके कि अभिभावक अपने बच्चो को कैसे मार सकते है। हमारे मुँह  से एकदम निकल गया। " ऐसा कैसे हो सकता है। तुमने कुछ गलत सुन लिया होगा। "
   सविता बोली -मेने कुछ भी गलत नही सुना बल्कि मै  उस लड़की और लड़के को अच्छी तरह जानती हूँ। वे मेरे पडोसी थे। उनके घर मेरा आना -जाना था। उन दोनों की जाति  अलग थी। उसके बाबजूद दोनों में प्यार हो गया। उन्होंने छुप के शादी कर ली। उनके परिवार बालो को जब पता चला। उन्हें ये रिश्ता बर्दास्त नही हुआ।  दोनों पर पावंदी लगा दी गयी। पर उन्होंने अपने प्यार को  भुलाने  के स्थान पर मरना पसंद किया  सभी ने कई  तरह से उन्हें समझाने  की कोशिश की। उन दोनों पर  चाहत  का नशा ऐसा चढ़ा था कि उनपर ज़माने की ज्यादतियों का कोई असर नही हुआ । वे ज़माने के गुस्से के सामने डटकर खड़े हो गए।हमारे गाव के लोग भड़क उठे। उन्होंने उनका मर जाना ही उचित समझा। एक दिन लड़की के परिवार वालो ने उनके खाने में जहर मिला दिया।  वह   मौत की गहरी नीद सो गये  ।
    सब उसकी ये  बात  सुनकर चकित रह गये।   आज के ज़माने  में किसी को उनके परिवार ने मौत  की नींद  सुला दिया। हमें बहुत ताज्जुब हुआ।
  रेशमा बोली -तुम्हारे गाँव में पुलिस  नही आई। उन लोगो को पुलिस पकड़ कर नही ले गयी।
   सविता बोली -पुलिस की क्या विसात जो हमारे गाँव  से किसी को पकड़ के  ले  जाये । सारे गाँव  में एका हो गया है इसलिए  हमारे गाँव  में किसी को नही पकड़ा गया। ना किसी की शिकायत हुई बल्कि लोग इस किस्से को मुछो पर ताब  दे कर सुना रहे है।
   मनोहर ने  मुझसे कहा  है -यदि तेरे बच्चो ने ऐसा कुछ किया तो मै उन्हें जहर दे दुँगा।
    सविता की चिंता का कारण शगुन थी क्योंकि  शगुन कॉलेज जाने लगी थी। अब वह अनेक लोगो से मिलेगी। उसे पवंदियो में रखना बहुत मुश्किल है ऐसे मै उसका प्रत्येक कदम उसे कहाँ  ले जाता है। कुछ    नही कहा जा सकता। जब से सविता ने इस बारे में सुना है। उसके होश गुम हो गए है। इंसान अपना जीवन तो दुसरो के मापदंड के हिसाब से जी सकता है। बच्चो को कैसे उन पवंदियो के बारे  में  समझाए। उसकी पढ़ाई छुड़वाना भी उचित नही है। वह बहुत परेशान हो गयी है।
   एक बार इंसान बेटे की गलती माफ़ कर सकता है। पर बेटियो की गलती माफ़ नही कर सकता  उसकी दो बेटिया है। उनका क्या होगा। शहरो के लोग इस तरह के माहौल में नही रहते। उसकी बेटियाँ भी शहरी जीवन जी रही है। वे गाँव की सख्तियो से अनजान है। उनकी सोच शहर में आकर बदल गयी तो क्या होगा। वो उन्हें अपने गाँव की सोच से अवगत करा पायेगी या  उसके बच्चे उसको गाँव के लोगो के सामने शर्मिंदगी का कारण बनबायेंगे।  कई  दिन से उसे रात  में सही से नीद नही आ  रही।
   हम शहरो में रहने वाले लोग उसकी मनोदशा का सही से अंदाजा नही लगा सके। इतने में रिया के मुँह  से मजाक में निकल गया -तेरे मनोहर को तीन को नही चार जनो को जहर देना पड़ेगा।  सबसे बड़ा कारण वो तुम्हे मानेगे। जिसके कारण बच्चे इस तरह का  कदम  उठा सके। यदि तूम  गाँव में रहती तो तुम दोनों की बराबर बच्चो को पालने की जिम्मेदारी होती। अब तुम अकेले बच्चे पाल  रही हो। वो कभी भी  हाथ झटक के कह  देंगे सब तेरे कारण हुआ है। तब तेरा सारा त्याग मिटटी में मिल जायेगा।
    रिया ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था। सविता इस सच्चाई को सुनकर रुआँसी हो गयी।  

# badlav

   सविता के घर से विद्यालय की दुरी ज्यादा हो गयी थी।  अब उसे लगभग 25  मिनट पैदल चलना पड़ता था।  सर्दियों में तो पैदल चलना मुश्किल नही था।  पर गर्मियों में सजा लगती थी।  उसके बारे में हमने पूछा कैसे आना होता है।
     उसने जबाब दिया -सुबह के समय रिक्शा कर लेती हूँ। दोपहर को पैदल या रिक्शा से चली जाती हूँ।  अच्छे मौसम में पैदल चलने में कोई परेशानी नही होती।
    रेखा ने पूछा-आगे क्या विचार है।
   सविता बोली -में नए सत्र में स्थानांतरण के फार्म भर दूंगी।  घर के बहुत पास विद्यालय है। मुझे उम्मीद है  उस विद्यालय में जगह मिल जाएगी।
    सविता ने मकान  खरीदने के सात महीने बाद तक नौकरी की। उसी समय में उसकी मेहनत देखकर हम दंग  रह गए।  वह कभी थकती नही थी। कभी निराशा भरे शब्द उसके मुँह  से निकलते नही  थे। एक दिन हमें उसके घर जाने का मौका मिला। वह हमारे साथ सेमिनार में थी वही से हमारा अचानक उसके घर जाने का कार्यक्रम बन गया। हम उसके घर अचानक गए थे उसे या उसके परिवार को हमारे आने की कोई उम्मीद नही थी।  उसका घर पूरी तरह व्यवस्थित था।  उसके तीनो बच्चे पड़  रहे थे। कोई भी उधम नही मचा रहा था।  उनको चुपचाप पढ़ते  देखकर हम हैरान हो गए। हमने इतने व्यवस्थित और अनुशासन में रहने वाले बच्चे इससे पहले नही देखे थे।  उनके ऊपर  माँ -पिताजी का नियंत्रण ना  था वे अपना काम सुचारू रूप से स्वयं करते रहते थे। उन बच्चो को देखकर लगता था। भगवान ऐसे बच्चे सभी को दे।
      जब हम सविता के घर में थे। उसी समय मनोहर भी गाँव  से  आ  गए। वे अपने साथ गाँव का शुद्ध सामान बच्चो के लिए लाये  थे। उनका अपने बच्चो के प्रति प्यार देखकर हम गदगद हो गए। मनोहर को देखकर ऐसा लगा जैसे कोई गाँव का किसान हमारे सामने आ गया हो। उसमे बिलकुल शहरीपन की झलक नही थी। मनोहर की अपेक्षा सविता एक अप्सरा के समान लग रही थी।  भगवान की दी हुई सुंदरता की मालकिन तो वह थी। अब पैसे की रौनक के साथ शहरीपन उसमे साफ झलक रहा था।  उसमे और मनोहर में जमीन -आसमान का अंतर दिखाई दे रहा था।
     एक दिन हमने सविता से कहा-तेरी शादी बहुत जल्दी नही हो गयी।  तुझे अजीब नही लगता। .
  सविता बोली -हमारे  गाँव  के हिसाब से तो जल्दी नही थी। पर अच्छा है  मेरी जल्दी शादी हो गयी।  मेरा बाप तो किसी हालत में मुझे पढ़ने  नही देता।  इन्होने मुझे पढ़ने  दिया मै इनकी बहुत एहसानमंद हूँ। वरना किसी और घर में शादी होती तो में घुटघुट के जी रही होती। अब तक  तो मेरी बेटी की भी शादी हो चुकी होती।  हमारे यहाँ  लड़कियों की   पढ़ाई  के बारे में कोई सोचता ही नही है। लड़कियों की पढ़ाई तो वहाँ के लोगो के लिए पैसे की बर्बादी लगता है।
   आप लोगो को पढ़कर  अजीब लग रहा होगा। पर ये एक सच्ची कहानी है।         . 

# jivt

      आखिर में सविता को   घर पसंद आया।  सविता ने मनोहर को घर दिखाकर उसकी राय पूछी।
   मनोहर बोला -मकान अच्छा है। इसकी कीमत हमारी हैसियत से ज्यादा है। पैसो का इंतजाम कैसे होगा।         सविता ने मनोहर का हौंसला बढ़ाते हुए कहा -इसके लिए में ऋण की कोशिश कर रही हूँ। मै सरकारी कर्मचारी हूँ। मुझे ऋण मिलने की उम्मीद है। प्रॉपर्टी डीलर इसका इंतजाम करवाएगा। हमें केवल 20  परसेंट जमा करवाना है। आप इसके बारे में सोचो।
   ये सुनकर मनोहर की हिम्मत बढ़  गयी। वह बोला -इसका इंतजाम करने की कोशिश करता हूँ। मुझे उम्मीद है इसका इंतजाम हो जायेगा।
    सविता और प्रॉपर्टी डीलर मिलकर ऋण की कोशिश करने लगे। उसे ऋण मिलने में बहुत परेशानी हो रही थी। उसका घर प्राइवेट कॉलोनी में था।  उसके लिए बैंक ऋण देने के लिए तैयार नही हो रहे थे। वो एक से दूसरे बैंक के चककर काट रही थी। उसकी नौकरी को भी ज्यादा दिन नही हुए थे। व्ह ससोपंज में थी कि  क्या किया जाये  . उसने सलाह लेने की कोशिश की। उसको किसी की सलाह उचित नही लग रही थी।
      अंतत एक आदमी ने कहा -में तुम्हारा ऋण दिलवा सकता हूँ। इसके बदले तुम्हे कुछ देना पड़ेगा।
  मरता क्या ना करता। सविता की हालत भी वैसी हो गयी थी यदि 80 परसेंट रुपयो का इंतजाम ना  होता तो उसकी सारी  मेहनत बेकार चली जाती। अभी उसकी जिम्मेदारी कम थी समय उपरांत खर्चे बढ़ने के कारण मकान बनबाना बहुत कठिन हो जाता।
    सविता उसे रिश्वत देने के लिए तैयार हो गयी। रुपयो का इंतजाम होते ही मकान  मिलने की सारी कार्यवाही पूरी हो गयी। सविता को तीन बेड  रूम का घर मिल गया। अब उसके बच्चो को वह घर बहुत पसंद आया।  बच्चे बड़े घर में रहने के आदी  थे। किराये का मकान  उस हिसाब से बहुत छोटा था। उसमे उन्हें बंधा हुआ लगता था। सविता के पास सामान बहुत कम  था।  उसके घर में  केवल  जरूरत का सामान था।
    उसका घर देखकर स्नेहा ने कहा -घर बहुत खाली -खाली  लग रहा है
     उसने कहा -मकान खरीदना मुश्किल होता है। वह खरीद लिया। समान धीरे -धीरे आता  रहेगा।
   उसकी बात भी उचित थी मकान  दिल्ली जैसे शहर में खरीदना सच में बहुत हिम्मत का काम होता है। उस हिसाब से सारी  मेहनत सविता की थी। उसके होंसले के कारण ही चार सालो के बीच में उसने अपना मकान खरीद लिया।  

# adig

        सविता अब दिल्ली और दिल्लीवालों को समझने लगी थी। उसका  दिल्ली में मन रम गया था। अब उसे किसी से कोई परेशानी नही थी।  मनोहर को लगने लगा। वह बच्चो को अपने साथ रखने के काबिल हो गयी है। मनोहर बच्चो को उसके साथ भेजने के लिए राजी हो गया।  सविता ने विद्यालय के पास एक घर ले लिया। वह अपने तीनो बच्चो को दिल्ली ले आई।  उसके बच्चो पर अभी  सहारनपुर का प्रभाव था। वे चुप रहते थे। उनकी भाषा दिल्ली वालो से थोड़ी अलग थी। उन्हें बोलने में झिझक होती थी। सविता उनकी झिझक खोलने के सारे प्रयत्न  करती थी। सविता दिल्ली में कई सालो से रह रही थी। उसे दिल्ली अच्छी लगने लगी थी। उसके मन का डर निकल चूका था।
     नए सत्र में उसने बच्चो का दाखिला करवा दिया।  उसके छोटे दोनों बच्चे 5 बी कक्षा में आ  गए। शगुन का दाखिला अच्छे कॉलेज में करवा दिया। अब उसका जीवन सुचारू रूप से चलने लगा। उसके बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे थे। उनके लिए किसी सहायता की उसे जरूरत महसूस नही हुई। वे आपस में परस्पर मदद करते रहते थे। उसके घर की व्यवस्था देखकर हैरानी होती थी। बच्चे विद्यालय से आकर अपने काम में लग जाते। उन्हें सविता के आने -जाने से कोई फर्क नही पड़ता था।
     सविता को अपना किराये का घर छोटा लगने लगा। उसने मनोहर से इस बारे में विचार -विमर्श किया।
   मनोहर ने कहा-अब तुम्हे दिल्ली में रहना है। दिल्लीं में घरो की समस्या बहुत बड़ी है। यदि तुम दिल्ली में अपना घर लेना चाहती हो तो कोशिश करके देख लो। मुझे दिल्ली का कुछ भी पता नही है। हफ्ते में एक दिन आकर में तुम्हारी क्या मदद कर पाऊँगा।
  सविता को मनोहर का सुझाव पसंद आया। उसने आस -पास मकान को लेकर बात करनी शुरू कर दी। उसे कोई घर पसंद नही आ रहा था। कोई उसके बजट के बाहर था ,कोई इलाका अच्छा नही। वह पशोपेश में पड  गयी। उसे समझ नही आ  रहा था। उसके मतलब का मकान उसकी किस्मत में है कि नही। सविता हिम्मत हारने वालो में से नही थी। उसने मकान के लिए कोई कसर नही उठा रखी।  हर रविवार मकान देखने जाती। और निराशा उसके हाथ लगती। कुछ लोग उससे पूछते आज कहाँ  घर देखने गयी। उसके चेहरे पर मुर्दनी छा जाती।
          उस इलाके का नाम बताने के बाद निराशा के स्वर में कहती -मेरे हिसाब से घर पता नही बना है भी या नहीं। जहाँ जाती हूँ वही कोई न कोई परेशानी दिखाई दे जाती है। मुझे अकेले तीनो बच्चो के साथ रहना है। इनकी सहायता तो बहुत सालो तक मुझे नही मिल पायेगी ऐसे में सुरक्षित घर वह भी कम बजट का मिलना असम्भव लग रहा है।
     सविता की बातो में सच्चाई थी। उसकी कोशिश जारी थी। वो निराश होती और फिर से मकान देखने के लिए उठ  खड़ी  होती। बिना नागा वह हर छुट्टी के दिन मकान देखने जाती। उसने थक कर प्रॉपर्टी डीलर  से बात करने का विचार किया।  प्रॉपर्टी डॉलर के साथ भी मकान देखने जाने में उसे कोई परेशानी नही थी।  दिनिदिन उसका होंसला बढ़ता जा रहा था।
       एक दिन नेहा ने उससे पूछा -तू अनजान जगहों पर प्रॉपर्टी डीलर के साथ मकान देखने जाती है। तुझे उनसे डर नही लगता।
   सविता बोली -शुरू में बहुत डर लगता था। मुझ अकेली का साथ आये दिन कौन  देगा। एक -दो दिन की बात हो तो लोगो ने साथ दिया पर मकान जैसी चीज इतनी जल्दी पसंद नही आती। मकान सस्ता और सुरक्षित मिलना बहुत मुश्किल होता है। अब मुझे ओरो से मदद मांगते हुए शर्म आने लगी है । कुछ लोग कहने लगे थे। जैसा मकान दिल्ली में चाहिए वैसा मकान दिल्ली में मिलना मुश्किल है। उन्होंने हिम्मत छोड़ दी लेकिन मै हिम्मत नही छोड़ सकती। मेरा और बच्चो का पूरा भविष्य उसी पर टिका है। इसलिए अपने डर पर काबू करके प्रॉपर्टी डीलर के साथ अकेले जाने लगी हु। अब उनके साथ इतनी बार जा चुकी हूँ की     अब डर नही लगता।
     उसकी बातो में सचाई थी। उससे हमदर्दी के साथ सहानुभूति भी हुई। उसकी जिजीविषा उसका कायल बना देती थी। छोटे से गाँव की छोटी सी औरत ने अपनी मेहनत के बल पर अपना मुक़ददर बदलने की सोची। अभी सविता की उम्र केवल ३५ साल थी। उसने अपने बेस पर हालात को पूरी तरह बदल डाला था। वो हर पल  अपनी किस्मत और हालात का सामना करके उसके सामने अडिग खड़ी  रही। उसने अपने मुश्किल हालात का कभी रोना नही रोया। वह लगातार संघर्ष कर रही है। 

# chhuttiya

       सविता को नौकरी करते हुए एक साल हो चूका था। अब उसकी बेटी शगुन 12 वी  कलास  में आ  चुकी थी। उसकी पढ़ाई की जिम्मेदारी मनोहर पर नही छोड़ी जा सकती थी।  उसने प्रधानाचार्या  से छुट्टी के लिए कहा। उन्होंने उसे छुट्टी देने से साफ मना कर दिया। उसे बहुत दुःख हुआ। लेकिन सविता जिंदगी से हार मानने बालो में से नही थी। उसने सभी से सलाह लेनी शुरू की। उसकी हालत को सभी समझते थे। पर किसी को उसकी दिक्क़त  को हल करने का तरीका समझ नही आ  रहा था।
    सविता ने प्रधानाचार्या  के सामने अपनी परेशानी रखी पर उनके ऊपर कोई असर नही हुआ। तब हार  कर उसने उनसे बड़े अफसर को अपनी परेशानी बताते हुए छुट्टी का अनुरोध किया।  उससे पहले वे प्रधानाचार्या किसी को कोई भी छुट्टी आसानी से नही देती थी।  अधिकतर लोग रुआंसे हो जाते थे।कुछ गुस्सैल लोगो से उनका झगड़ा हो जाता था। छोटे -मोटे झगड़ो का प्रधानाचार्या  पर कोई असर नही होता था। यदि कोई बहुत झगड़ालू इंसान होता उसी को   छुट्टी मिल पति थी बाकि लोग  छुट्टी मांगने के बारे में सोचते ही नही थे।  उन्ही दिनों सरकार ने बच्चो की परवरिश के  लिए     सी,सी एल शुरू की थी। इसे शुरू हुए दो साल बीत चुके थे। अभी तक किसी की हिम्मत इन छुट्टियों को लेने की नही हुई थी। जिस जगह साल की 8  सी ,एल , लेना मुश्किल था।  वहाँ  सी. सी ,एल, मांगना बहुत टेडा काम था।  सभी हेड से डरकर छुट्टियों के बारे में सोचते ही नही थे।
      सविता की कोशिश का परिणाम ये रहा कि  उसको अफसर ने अपने दफ़्तर में बुलाया जहाँ  उसने स्पष्ट रूप से अपनी परेशानी उनके सामने रखी।
    उनसे कहा -आप ही बताओ ऐसे   में मै  करू।
  अफसर उनकी परेशानी समझ गए। उन्होंने लिखित में उसकी छुट्टियों के आवेदन पर हस्ताक्षर कर दिए।          दूसरे पत्र के माध्यम से प्रधानाचार्या को कहा-ऐसे मामले में आपको 15  दिन की छुट्टी देने का अधिकार  है। आप उनकी परेशानी समझ कर उन्हें छुट्टी दे दिया करें। किसी भी अद्यापिका को मुझ तक आने की जरूरत ना  महसूस हो।  हमारे पास और भी काम होते है। ये काम आपके अधिकार में है। आगे से किसी को परेशान करने की जरूरत नही है।
    सविता के जुझारू पन  ने ओरो के लिए रास्ता खोल दिया।  वह शगुन की पढ़ाई  के लिए एक महीने की छुट्टी लेकर सहारनपुर चली गयी।
         प्रधानाचार्या ने उससे लिखित में लिया -यदि तुम्हारी छुट्टियों के करण कोई दिक्क़त होगी तो तुम्हे आकर काम करना पड़ेगा।
      उसे सहयोग करने से कोई एतराज नही था। सविता ने लिख कर दिया -मेरे कारण विद्यालय का कोई भी काम नही रुकेगा जब भी जरूरत होगी मै सहायता के लिए तैयार हूँ।
      पेपरों के दिनों में उसे पेपर के लिए बुलाया। वह आकर पेपर ले गयी। उचित समय पर चेक करके वापस भी कर गयी। उसके कारण विद्यालय के किसी काम में परेशानी नही हुइ। वह समयानुसार सबका सहयोग करती रही। उसके कारण विद्यालय के परिणाम पर कोई गलत असर नही हुआ बल्कि दिनों -दिन प्रगति करता चला गया।
     शगुन के पेपर होने के बाद उसने सुचारू रूप से विद्यालय का काम संभाला। जब शगुन का परिणाम आया। शगुन 88 पर्सेंट नंबर लेकर पास हुई  थी सभी शगुन की कामयाबी से बहुत खुश हुए। 

HIMMAT

     सविता दिल्ली के सुल्तानपुर के इलाके में आकर रहने लगी उसका विद्यालय वही   था। उसे वहाँ का माहौल बिलकुल अच्छा नही लग रहा था। सरकारी नौकरी में आने के दो साल बाद तक स्थानांतरण नही हो सकता। इस कारण वह बहुत परेशान रहती थी। उसे सहारनपुर जाने के लिए दिल्ली पार  करने  में ही एक घंटा लग जाता। उसके बाद उत्तरप्रदेश आता। उसमे भी उसे दो घंटे सफर करना पड़ता तब जाकर वह सहारनपुर पहुंचती।  सहारनपुर के लिए ट्रैन एक बजे की थी। वह  पकड़ना उसके लिए मुश्किल थी। क्योंकि  शनिवार साढ़े  12  बजे छुट्टी के बाद वह उस ट्रैन को नही पकड़ पाती  थी।   वह बहुत परेशान हो जाती थी। दूसरी ट्रेन शाम ५ बजे मिलती उसके चककर में उसका पूरा दिन खराब हो जाता।
     उसे परिवार की याद बहुत सताने लगी थी। उसकी कोशिश होती हर शनिवार को अपने परिवार के पास पहुंच जाये। या उसके पति उसके पास आ  जाये। . हमेशा ऐसा सम्भब नही हो पाता। उसके पास अब काम कम था। उसका विद्यालय के बाद का समय भी काटे नही कटता  था। उसने समय काटने के लिए वही  अपना पुराना तरीका ढूंढ  लिया। वह हिंदी में एम, ए, थी उसने खाली  समय में एम,ए,इतिहास में करने के लिए फार्म भर दिये। अब उसका खाली  समय पढ़ाई के कारण पता ही नही चलता था। उसकी दो साल के अंदर पढ़ाई  भी पूरी हो गयी। दो साल पुरे होने पर उसने स्थानांतरण के लिए आवेदन कर दिया। उसको शाहदरे का विद्यालय मिल गया। अब वह इत्मीनान से नौकरी करने लगी। इस बीच उसकी बड़ी बेटी शगुन 11 वी क्लास में आ  गयी थी।  अब भी  मनोहर ने उसे बच्चो को साथ ले जाने से मना  कर दिया।  "अभी तू नई जगह आयी  है। बच्चो के साथ तेरे लिए मुश्किल हो जायेगा बच्चे मेरे साथ रह ही रहे है।"
     यहाँ  आकर सविता की  नइ  जान -पहचान हुई  धीरे -धीरे सविता का मन लगने लगा। हमें उसे देखकर हैरानी होती शाम के समय के सभी कार्यक्रम में  वह अकेली आती उसकी हिम्मत  देखकर सबको अचम्भा होता। कई  बार शादी के कार्यक्रम में देर होती उसके चेहरे पर कोई शिकन नही होती। बाकि सभी अपने पति या बेटो के साथ आती। या आने से मना  कर देती कि  उन्हें अकेले आते हुए डर लगता है। सविता ने कभी डरने का नाम तक नही लिया। उसे कभी किसी हालत से घबराते हुए भी हमने नही देखा।
      सविता के लिए यहाँ से सहारनपुर जाना भी आसान हो गया। उसे सहरनपुर की १ बजे की ट्रैन भी मिल जाती उसकी हमेशा कोशिश रहती शनिवार को परिवार से मिल आये। अब उसके लिए जिंदगी आसान होती जा रही थी। 

NIRNAY

       सविता ने मनोहर के आने पर अपनी दिल्ली की नौकरी की खबर दी। उस खबर को सुनकर मनोहर चुप हो गया।  उसे समझ नही आया  क्या जबाब दे। सविता को मनोहर की चुप्पी खल रही थी।
       उसने मनोहर पर दबाब डालते  हुए कहा -आप कुछ कहते क्यों नही।  मुझे आपकी चुप्पी खल रही है।
    मनोहर बोला -मुझे समझ नही आ  रहा इतनी दूर जाकर तुम कैसे अकेली रह   पाओगी। हमारी जान -पहचान का कोई रिश्तेदार भी वहाँ  नही रहता। मै  तुम्हारे लिए अपनी नौकरी नही छोड़ना चाहता। तुम परिवार के बिना इतने बड़े शहर में कैसे रह सकोगी। शहर में अच्छे खासे लोग बेबकूफ  बन जाते है। तुम तो घर की चारदीवारी से कभी अकेले बाहर नही निकली हो।  मै  तुम्हारे बारे में सोच कर कई दिन से परेशान हो रहाहूँ। में तुम्हारा दिल नही तोडना चाहता हूँ।  मेरी बेबसी मुझे खुश होने से रोक रही है।
    ये सारी  बाते  सविता को भी कई  दिन से डरा रही थी। लेकिन वह रोज अपने को मजबूत कर रही थी। में इस मौके  को नही छोडूंगी।
      वह सोचती -मेने कई बरसो की मेहनत के बल पर इस नौकरी को पाया हे यदि इस नौकरी को छोड़ दिया तो दुबारा ऐसी नौकरी नही मिलेगी। इतनी अच्छी नौकरी आज के समय में कितने लोगो को मिलती है।  मै  मजबूत औरत  बनूँगी।  में दुसरो का सहारा  बनूँगी। दुसरो की प्रेरणा बनूँगी।  इसके लिए मुझे अपने डर से आगे बढ़ना होगा।  यदि मेने  नौकरी छोड़ दी तो मै  हमेशा ऐसे बंद माहौल में ही रह जाउंगी। मेरी दो बेटिया भी ज्यादा तरक्की नही कर पायेगी। अब सविता ने अपने पति मनोहर को समझाने का मन बना लिया। ताकि उसके मन से उसको लेकर डर निकल जाये।
     मनोहर उसके समझाने  पर बोला -तुम सोचो अभी तक तुमने अकेले कभी कोई निर्णय नही लिया। वहाँ  जब अकेले रहोगी। तुम्हे सब कुछ अकेले करना पड़ेगा। मै हफ्ते में एक दिन आऊँगा। वहाँ आकर में तुम्हारी क्या मदद कर पाऊगा। तुम्हे अपने बेस पर सारे   निर्णय लेने होंगे। तुम किसी को दोष भी नही दे सकोगी।
     सविता बोली -आप परेशान ना हो। इस निर्णय के लिए में किसी को कभी दोष नही दूंगी। आप इसकी चिंता ना करे।
  मनोहर बोला -जैसी तेरी मर्जी तुझे अकेले ही दुनियाँ  से लड़ना होगा। यहाँ का कोई भी इंसान तेरी मदद के लिए वहाँ  नही होगा।
   अब अंतिम निर्णय हो चूका था। सविता दिल्ली के विद्यालय में अकेले ही नौकरी करने जाएगी। तीनो बच्चे उसके साथ अभी नही जायेंगे क्योंकि उनका एक साल बर्बाद हो जायेगा। उसे उस  माहौल में रहने के लिए नया अनुभव होगा। अभी तुम वहाँ  के  माहौल   के अनुसार अपने आप को बनाओ। बाद में बच्चो को लेजाना।सविता को मनोहर का  विचार   उचित लगा।  अब वो देहली आ गयी।  
                        

SAFLATA

      सविता की डाइट  की पढ़ाई पूरी हो गयी।   उत्तर प्रदेश में  असिस्टेंट टीचर की नौकरी निकली तो उसने उसके फार्म भर दिए। उसके पेपर देने के बाद परिणाम निकला तो वह हैरान रह गयी। उसकी पहली कोशिश में सफलता मिल गयी। वह बहुत खुश हुई। सारे लोग हैरान थे। इसने किस तरह से नौकरी प्राप्त कर ली। किसी को उससे अच्छी नौकरी की उम्मीद नही थी। उसकी मेहनत को सभी लोग नजरअंदाज कर रहे थे। कितनी विपरीत परिस्थितियों में उसने सफलता पाई थी।
    उसकी ख़ुशी ज्यादा दिन तक नही रही।  उस नौकरी पर स्टे लगा दिया गया उसकी सारी मेहनत बेकार चली गयी। वह फिर से दुःख में डूब गयी।  उसे सारे काम करने के बाद पड़ने का समय मिलता था। पर विधाता इतना वाम हो गया था। कभी उसे लगता सारी मुश्किलें उसके जीवन में ही आएंगी। उसके जीवन में कभी सफलता भी लिखी है। या कुछ विशेष लोग ही सफलता के भागीदार होते है। 
     उसकी निराशा कुछ ही समय में दूर हो गयी। उसके पास इतने सारे काम थे। उसने अपना मन उनमे लगा दिया। कुछ समय बाद फिर से टी,जी ,टी,की नौकरी निकली उसने  फार्म भर दिया। उसकी तैयारियों में लग गयी। उसने पिछली बार की गलतियों से सबक लिया और सही तरीके से पढ़ाई की। वह हैरान रह गयी। उसका बहुत अच्छा रेंक आया था।  उसकी सफलता पर सभी चकित थे।
     ये कह रहे थे - ये औरत इतना पढ़ने का समय कहाँ  से निकाल लेती है।
     सविता की ये नौकरी दिल्ली में लगी थी। उससे पहले वह कभी दिल्ली जैसी जगह नही आई थी उसकी दुनिया केवल गाँव और सहारनपुर तक सीमित थी। नौकरी की ललक में उसने सोचा ही नही था। उसकी इतनी दूर नौकरी लगेगी। उसने अपने पति से इस बारे में बात करने की सोची। उसका सपना पूरा हो गया था। उसके पुरे होने के साथ कितनी सारी दूसरी दिक्क़ते पैदा हो जाएँगी ये तो वह सोच ही नही सकी।    
      उसके तीन बच्चो की जिम्मेदारी कैसे पूरी होगी। उसके पति उसके साथ दिल्ली चलकर रहेंगे या नहीं। वह दिल्ली में अकेली कैसे रह पायेगी। अकेले बच्चो की जिम्मेदारी कैसे निभाएगी। या बच्चो को पति के पास छोड़ा तो वे उन तीनो को कैसे संभाल  पाएंगे।    उसे पति से बात करते हुए भी डर लग रहा था। उसके पति उस पर गुस्सा उतारेंगे इसी उधेड़बुन में समय निकलता जा रहा था। वह खुद असमंजस में थी। करू  तो क्या करू। 

# junun

        सविता ने ६ बार पेपर दिए हर बार फेल हो गयी अब उसे लगने लगा t.g..t के पेपर में पास होना असंभव हे। वह कभी भी इस पेपर में पास नही हो पायेगी पर अब उसमे हर हालत में अच्छी  नौकरी की इच्छा पैदा हो गयी थी। जब  मेहनत करके पढ़ाई पूरी की है। तो उसे उसकी काबिलियत के मुताबिक नौकरी भी मिलनी चाहिए।  उसने मनोहर के सामने अपनी इच्छा जाहिर की। तो मनोहर को गुस्सा आ गया।
     वह बोला -तुझे नौकरी करने से मना कौन कर रहा है। जो चाहे कर मुझे क्या।
     सविता समझ गयी मनोहर को उसकी इन बातो से चिढ़ होने लगी है। इसलिए उस दिन उसने अपनी बात को आगे नही बढ़ाया। काफी दिनों बाद मनोहर अच्छे मूड में था।
           तब सविता ने मनोहर से कहा -में डाइट की पढ़ाई  करना चाहती हूँ। यदि आप आज्ञा दे दो।
         मनोहर बोला -तुझे ये क्या सूझी तू तो उससे ऊँची पढ़ाई कर चुकी है।
        सविता बोली -इस पढ़ाई की नौकरी हमेशा एक या दो निकलती है। जबकि डाइट करने के बाद बहुत सारी नौकरी के मौके मिलेंगे।
    मनोहर बोला -छोटे विद्यालय में तू अब भी नौकरी कर रही है। उसमे और इसमें क्या अंतर होगा।
    सविता बोली-वह सरकारी नौकरी होगी। उसमे पैसे भी इससे कही ज्यादा मिलेंगे।  उसको पा कर मुझे संतुष्टि मिलेगी। जब  मुझमे काबिलियत है तो वहाँ तक पहुँचने की कोशिश क्यों न करू।
    मनोहर चुप हो गया। वह समझ चूका था। सविता के मन में जो इच्छा पैदा हो जाती है उसे पूरा करने में लग जाती हे कितनी भी मुश्किल हालत आ जाये वह अपने निश्च्य से हटती नही है। उसे मेहनत करनी है। उसके लिए वह किसी काम से जी भी नही चुराती,परिवार के किसी सदस्य को उसके पढ़ाई करने से कोई दिक्क़त भी नही होती। वह अपने आराम के समय को ही पढ़ाई में लगाती है। इस कारण मनोहर ने उसका डायट में दाखिला दिलवा दिया।
     अब सविता नए सिरे से पढ़ाई  में लग गयी। उसके तीनो बच्चे भी विद्यालय की पढ़ाई करने लगे थे। अब सविता का घर एक छोटा सा विद्यालय ही लगने लगा था। कभी बच्चो को पढाती ,कभी विद्यालय के बच्चो को पढाती और कुछ समय निकाल कर खुद पढ़ने बैठ जाती।
         पडोसी कहते -सविता तो पढ़ाई के पीछे पागल हो गयी है। इतना भी क्या पढ़ना। जब देखो पढ़ती रहती है। ना  दुआ - सलाम, न किसी से बात -चीत करती हे। इन किताबो में ऐसा क्या धरा है जो जिंदगी जीना ही भूल गयी है। जब देखो किताबो में ही घुसी रहती है। हमने ऐसा किताबी कीड़ा इससे पहले कभी नही देखा।
      सविता उन औरतो में से थी जिनको किताबो की दुनिया में ख़ुशी मिलती थी। अड़ोस -पड़ोस की औरतो से बात करके वह ऊब जाती थी। उसे लगता हर समय सिर्फ घर -गृहस्थी की बातो के आलावा भी दुनिया है। जो इन्हे समझ ही नही आती ।  सविता पड़ोस की औरतो को समझ न  पाती।  पड़ोसिन सविता को समझ पाने में असमर्थ थी। कोई उसे घमंडी कहती,तो कोई उसे घुन्नी। लेकिन कोई भी उसकी पढ़ाई के जूनून को नही समझ पा रहा था। वो जिस माहौल  में रह रही थी वहाँ की औरतो के लिए पढ़ाई  करना केवल समय की बर्बादी थी । उसके आलावा कुछ नही। वे समूह में बैठ कर उसका मजाक उड़ाती रहती थी। उनके लिए सविता एक अजूबा थी।  क्योंकि वह उनसे बिलकुल अलग थी।

# jaddojahd

        सविता जिस विद्यालय में नौकरी करने   लगी वह गाँव का छोटा सा था। उस विद्यालय में नौकरी करने के बाद उसके सपने अब अच्छे और बड़े विद्यालय में नौकरी करने के लिए मचलने  लगे ।  उसे पता चला बड़े विद्यालय में  नौकरी कैसे  मिलती है। अब वह  बड़े विद्यालय में नौकरी करने की कोशिश करने लगी।  उसे जब पता  चला  बड़े और सरकारी विद्यालय  में  नौकरी के फार्म भरे जाते है। उसके बाद लिखित पेपर होता है। उसके  बाद  interviw होता हे। यदि उसमे चयन हो जाये तभी सरकारी नौकरी लगती है। उसे  सरकारी नौकरी करने की लगन लग गयी।  उसने सरकारी नौकरी के फार्म भरने शुरू कर दिए।
      घर की जिम्मेदारियों और   नौकरी के साथ उसने टी,जी टी,के फार्म भरने  शुरू  कर  दिए। उसने कई  बार नौकरी के फार्म भरकर लिखित परीक्षा दी उसका चयन नही हुआ। उस पर निराशा हावी होने लगी।  उसे लगा ये बड़ी नौकरी है। उस जैसी औरतो का उसमें चयन नही हो सकता।   शहरी लड़कियाँ ही ठीक रहती है।
      इस  बारे में  उसने मनोहर से कहा -में सरकारी नौकरी के योग्य नही हूँ। तभी तो इतने प्रयासों के बाद में मेरा चयन नही हो पा  रहा  है..
     मनोहर बोला -मन छोटा मत करो।  जब तुम इतनी पढ़ाई कर सकती हो। तुम ये नौकरी भी एक दिन जरूर  करोगी।
   सविता बोली -नौकरी करने की नही, मिलने की बात कर रही हूँ।  ४ बार पेपर देने के   बाद भी मेरा चयन नही हुआ।  अब मुझे बिलकुल उम्मीद नही है। कि मेरी सरकारी नौकरी लगेगी।
    मनोहर बोला -यदि सरकारी नौकरी इतनी आसानी से मिलती होती तो हर कोई सरकारी नौकरी कर रहा होता। तुम यदि पुरे मन से  तैयारी करोगी तभी तुम्हे सफलता मिलेगी।
   सविता भड़क उठी -आप कहना क्या चाहते हो। में आधे -अधूरे मन से  पेपर देने जाती हूँ।
    मनोहर बोला -तुम्हारी तैयारी में कही ना  कही कमी है। तभी तो तुम्हे सफलता नही मिली। पढ़ाई करते हुए तुम्हे सिर्फ अपने से प्रतियोगिता करनी होती  है। जितनी मेहनत करोगी उतने नंबर आ जायेंगे।   उसका पाठ्यक्रम भी सिमित होता है। उस में से ही पेपर आता  है लेकिन नौकरी के लिए एक नौकरी के लिए ३०० लोग भाग लेते है। उस नौकरी के लिए तुम्हे उन तीन  सौ लोगो से ज्यादा नंबर लाने  होंगे।  तभी तुम्हे नौकरी मिलेगी।  अब सोच लो दिल छोटा करने से काम नही चलेगा। अगर हिम्मत है तभी तुम्हे सफलता मिलेगी।
     सविता बोली -मै नौकरी करना चाहती हूँ। मेरे मन में सरकारी नौकरी करने की बहुत इच्छा है।
       मनोहर बोला - वैसे तुम्हे नौकरी की इतनी चिंता क्यों हो रही है। मै नौकरी कर तो रहा हूँ। तेरी कोन सी जरूरत पूरी नही करता। जो तू इतना ज्यादा नौकरी के बारे में सोचती है। में यहाँ के लोगो से ज्यादा कमाता हूँ। घर का घी, दूध ,और अनाज है। हम बहुतो से अच्छा खाते -पीते है। फालतू में अपना और मेरा ये कह कर खून मत जलाया कर मुझे और भी काम करने होते है। में दिन -रात तेरे बारे में नही सोच सकता समझी। आगे से ऐसी बाते मेरे सामने मत किया कर मुझे अच्छा नही लगता।
सविता उसका जबाब सुनकर चुप हो गयी।
 
     सविता को नौकरी का सच समझ में आ  गया। वह दिलोजान से नौकरी की तैयारियों में लग गयी। उसके बाद उसने दो बार और पेपर दिए पर उसका इसमें भी चयन नही हुआ। अब सविता को लगने लगा उसे नौकरी नही मिल सकती। ये नौकरियां भाग्यशाली लोगो को ही मिलती है
     

#nokri

    सविता को गाँव  में रहते हुए कई साल हो गए थे। अब उसके बच्चे बड़े हो गए थे। उसकी इच्छा नौकरी करने की होने लगी। अब उसे लगने लगा जब उसने इतनी पढ़ाई की है। उसका सदुपयोग भी होना चाहिए।  इस बारे में उसने मनोहर से बात की। मनोहर बोला-जो तुम्हारे मन में आये  करो।  मेने तुम्हे पहले भी कभी नही रोका है। जो अब तुम्हे रोकूंगा।
   सविता उनके जबाब देने से समझ नही पायी .मनोहर गुस्से में बोले या नहीं। उसने दुबारा से यही प्रश्न किया तो मनोहर बोले -यदि तुम घर और बच्चो के साथ नौकरी की जिम्मेदारी निभा सको तो मुझे कोई एतराज नही है।
  ये सुनकर सविता की जान में जान आई।  उसके  गाँव में लड़कियों के विद्यालय में एक अद्यापिका की जरूरत थी।  सविता की सास के सामने पड़ोसिन ने कहा -तुम्हारी बहु बड़ी पढ़ी -लिखी है। उसे विद्यालय में रखवा दो। उसकी पढ़ाई काम आ जायगी।  यहाँ की लड़कियों का भी भला हो जायेगा।
   सविता की सास ने उसके सामने अद्यापिका की नौकरी के बारे में बात चलायी और उससे पूछा -क्या तुम इस विद्यालय में नौकरी करना चाहती हो।
    सविता को मुँह मांगी मुराद मिल गयी थी पर सास का मन जांचने के लिए उसने कहा-माजी आप जैसा कहोगी मै  वैसा ही करूंगी। पर बच्चो का क्या होगा। उनको इतनी देर तक कोन संभालेगा।
   सास ने कहा-उनकी चिंता मत कर मै उन्हें संभाल  लुंगी।
  सविता बोली -तीनो अब बहुत शैतान हो गए है। आपको परेशान कर देंगे।
 सास ने कहा -जितने वे तेरे बच्चे है। उतने ही वे मेरे भी बच्चे है। उनकी तू चिंता मत कर। मेरा भी समय उनके साथ अच्छा गुजर जायेगा।
  सविता ने असम्भव कार्य कर दिखाया था। इससे पहले  उनकी बिरादरी में किसी  भी औरत ने इतनी  पढ़ाई नही की थी। और ना ही अद्यापिका जैसी नौकरी करने के लिए घर से बाहर निकली थी। सविता की मेहनत रंग लायी। उसका सपना पूरा हो गया। 

#bachho ki khatir

      सविता जिस माहौल  से बाहर आयी  थी उस माहौल  की लड़की इतना पड  जाएगी किसीने सपने में भी नही सोचा था। वहाँ आदमी भी इतनी पढ़ाई करने वाले नही मिलेंगे।अब सविता ने दूसरी बार माँ बनने के बारे में सोचा। उसका पढ़ाई का सपना पूरा हो चुका था। उसकी बड़ी बेटी शगुन भी आठ साल की हो चुकी थी।
        पडोसी उसे याद दिलाते रहते थे- शगुन के साथ खेलने बाला  भी कोई होना चाहिए। कब तक पड़ती रहेगी। क्या बुढ़ापे में दूसरा बच्चा बुलाएगी।  वैसे अभी सविता की उम्र सिर्फ २६ साल हुई थी। शहरो में तो इतनी उम्र में शादी होती हे पर सविता अब आठ साल की बच्ची की जिम्मेदार माँ थी।
 सविता की पढ़ाई  पूरी हो चुकी थी।  उसका सपना भी पूरा हो चूका था। अब उसने दूसरी बार माँ बनने का निर्णय लिया।  भगवान ने उसकी सुन ली।  अब वह दूसरी बार गर्भवती हो गयी।
       समय उपरांत उसके घर दोहरी ख़ुशी ने पदार्पण किया। उसके घर एक लड़का और लड़की ने जन्म लिया। कुछ लोगो को एक बच्चा मुश्किल से मिलता है। उसके घर भगवान ने भर-भर हाथ खुशिया लुटाई थी।  मनोहर भी दोनों की सूरत देखता ही रह जाता था।  सविता ने अपने बच्चो के नाम रमन और मीता  रखा।  अब फिर सविता दिन रात  काम में लगी रहती थी।  दो छोटे -छोटे बच्चो की जिम्मेदारी और घर का सारा काम उसे अकेले करना पड़ता था।  मनोहर उस महोल   से निकला था जहाँ आदमी घर का काम नही करते थे। सविता के लिए छोटे -छोटे दो बच्चो को सम्भालना मुश्किल हो रहा था। उसने कई बार मनोहर से अपनी परेशानी बताने की कोशिश की पर उसे समझ ही नही आया। सविता क्या कहना चाहती हे।  उसने मनोहर से साफ शव्दो  में कहा - मै रमन को संभालती हूँ तो मीता रोने लगती है। मीता को संभालती हूँ तो रमन रोता है। में दोनों के साथ न्याय नही कर पा  रही हूँ। आप ही बताओ मै क्या करू।
   मनोहर ने कहा -तुम कहना क्या चाहती हो।
 सविता बोली -में चाहती हूँ मेरी मदद करने के लिए कोई हो।
 मनोहर बोला -अब तक और ओरते भी तो अपने बच्चे अकेले पालती  रही है।  तेरे आलावा किसी ने मददगार नही मांगे  तू अनोखी  नही है जो बच्चे पाल रही है।
    सविता बोली - उनके अलग -अलग बच्चे हुए है। दोनों जुड़वाँ बच्चो को पालना बहुत मुश्किल हो रहा है।  आप भी बच्चो की देखभाल करने में मेरी मदद नही करते।  मुझसे दोनों बच्चो को संभाला नही जाता।  शगुन भी इतनी बड़ी नही है कि  मेरी मदद कर सके।  आप ही सोचो में इंसान हु मशीन नही। में सब को खुश देखना चाहती हूँ। पर मेरे लिए ये संभव नही हो रहा। रमन और मीता की देखभाल में ही सारा समय निकल जाता है शगुन तो दूर से आस लिए मुझे देखती रह जाती है। कुछ कहना भी चाहे तो मेरी मज़बूरी समझ कर मन मसोस कर रह जाती है। आखिर वो भी मेरी बेटी है। आप ही बताओ ऐसे में मै क्या करू।
     मनोहर को सविता के शव्दो ने झकझोर दिया -अब उसे सविता की हालत समझ आई वह बोला -अब तू ही बता ऐसे में क्या किया जाये।
सविता बोली -आप घर सँभालने में मेरी मदद कर दो तो कुछ काम आसान हो जाये। मेने पहले आपसे कुछ मदद नही मांगी। अब तीनो  छोटे -छोटे  बच्चो के साथ अकेले घर की  जिम्मेदारी निभाना बहुत मुश्किल हो रहा हे।
    मनोहर बोला -आदमी कोई घर के काम करते है। ये झंझट मुझसे नही होगा। लोग मुझे जोरू का गुलाम कहेंगे। हमारे यहाँ कोई आदमी औरत के काम में मदद नही करता है। तुझसे होता है तो कर मुझसे कोई उम्मीद मत करना ये मेरे बस का नही है।
    सविता अपना सा मुँह लेकर रह गयी वह ऐसी जगह से ताल्लुक रखती थी जहाँ औरतो के दर्द को समझने वाले आदमी नही होते थे। उनकी अपेक्षा मनोहर ने उसे काफी आजादी दी थी।  जिसके लिए वह मनोहर की एहसानमंद थी।
    एक दिन मनोहर से सविता बोली -मेरी मदद करने के लिए घर के कामो के लिए एक काम वाली लगा दो।
  मनोहर बोल उठा -ये क्या कह रही है। तूने किसी के घर में कामवाली लगी देखी  है। जो कामवाली की बात कर रही है। सविता अपना सा मुँह लेकर रह गयी।
   सविता अब समझ गयी उसकी मदद सहारनपुर  में  रहते हुए कोई नही कर सकता। उसने मनोहर से कहा -आप माँ जी से कहो वो यहाँ आकर रहे।
   मनोहर बोला -में उनसे पूछ कर देखता हूँ। वे हमारे पास आकर रहने के लिए तैयार होती भी हे या नही।
     मनोहर परिवार के साथ गाँव गया और मौका देखकर माँ से बोला -आप हमारे साथ शहर चलो। आप कभी गाँव से बाहर नही गयी हो।  अब की बार तो में तुम्हे शहर लेके चलूँगा।
  माँ बोली -सारी जिंदगी मेरी गाँव में बीत गयी अब बुढ़ापे में क्या शहर देखूंगी।  मेरी कोई इच्छा नही है शहर जाने की।
   जब माँ का मन नही बदला तब मनोहर ने सच्ची बात माँ के सामने रखी।  ये सुनकर माँ बोली-तेरे बच्चो को पालने के लिए में शहर जाऊ ये मेरे बस का नही। यदि तुझे बच्चे पलवाने है। तो बच्चो और सविता को यही छोड़ जा। यहाँ बच्चे हाथो -हाथ पल जायेंगे।  यहाँ इतने सारे काम को छोड़कर शहर में रहना मेरे बस का नही। शहर रहूंगी तो यहाँ का  सारा काम बिगड़ जायेगा।  खेत खलिहान ,डोर डांगर कौन देखेगा।  तेरा शहर में हे ही क्या नौकरी तो तू वहाँ पहले भी कर रहा था। अब भी कर लेगा। तुझे इतनी परेशानी है तो  तू बच्चो और सविता को यहाँ छोड़ जा तेरे बच्चे में पाल दूंगी।
     ये सुनकर मनोहर माँ से बहस नही कर पाया।  उसने सविता के पास जाकर सारे हालत पर विचार -विमर्श किया। तो उन्हें भी माँ की सलाह ही ठीक लगी।  सविता बच्चो को लेकर गाँव में रहने के लिए तैयार हो गयी।
   जिस गाँव को छोड़कर सविता शहर गयी थी। वही  सविता बच्चो की खातिर गाँव में वापिस आ गयी। उसे तसल्ली थी जितने समय वह शहर में रही उसने समय का सदुपयोग किया। अब उसके मन में कोई कुंठा नही थी।


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        हमारे घर काफी रिश्तेदार आये  हुए थे। सारा घर मेहमानो से भरा हुआ था।  हर तरफ चहल -पहल थी।  घर का कोई कोना ऐसा नहीं था जहाँ  एकान्त  मिल सके या अपना शौक  पूरा किया जा सके।  जिन्हे शोर शराबे की आदत हो उसके लिए ये माहौल  अच्छा था। लेकिन जिन्हे कोई शौक  हो जिसे अकेले पूरा किया जा सके उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़  सकता है। ऐसा ही मै  अपना एक अनुभव साझा करना चाहती हूँ।
  मेरे मामा  जी  सोमेश को सिगरेट पीने  की आदत थी उन दिनों इस आदत को ख़राब माना जाता था। इसलिए शर्म -लिहाज के कारण सबके सामने सिगरेट नही पी  जाती थी.   जिन्हे इसकी आदत होती है। वे अपनी इच्छा पर ज्यादा देर तक नियंत्रण नही रख पाते   है।  वे अपने से छोटो के सामने सिगरेट नही पी  सकते थे। ना वे अपने से बड़ो के सामने पी  सकते थे।  उन्होंने सिगरेट पीने  के लिए उठकर बाहर जाना सही समझा।  उन्हें समझ नही आया की जाये तो कहाँ  जाये। उन्होंने टॉयलेट जाने का बहाना  बनाया और   बाहर निकल आये।
     टॉयलेट के बाहर खड़े होकर सिगरेट के कश  लेने लगे। उनके हाथ में जलती हुई सिगरेट थी। बड़े आराम से तसल्ली से कश पे कश  लिए जा रहे थे।  उन्हें बहुत आराम मिल रहा था।  सिगरेट का नशा भी इंसान की मजबूर कर देता है।  इतने में मेरे दादा जी वहाँ आते हुए दिखाई दिये।  सोमेश के पास   सिगरेट को बुझाने का समय भी नही था।  वे अपने मुँह में भरा हुआ धुँआ भी निकाल नही  सकते थे।  उनकी हालत देखने लायक थी।     दादाजी बोले - सोमेश यहाँ कैसे खड़े हो।
सोमेश जबाब देने की हालत में नही थे उन्होंने जल्दी से हाथ की जलती हुई  सिगरेट जेब में रख ली और दरवाजा खोल के अंदर चले गए।  उन्हें टॉयलेट जाना नही था केवल इस हालत से बचने के लिए वे अंदर गए थे।  दादाजी सब समझ गए थे।  पर उन्होंने बाद में सोमेश से इस बात का जिक्र करना ठीक नही समझा।
        एक दिन दादीजी को वे हँसते हुए ये बात बता रहे थे तब ये बात मेने  चुपके से सुन ली।  आज  भी बीती बाते होठो पे मुस्कुराहट ला  देती है। उस ज़माने की शर्म-लिहाज ,मान -मर्यादा  अब  देखने को कहाँ मिलती है।

#manokamna

     सविता में आगे पढ़ने  की हिम्मत आ  गयी अगले दिन सविता ने मनोहर से  आगे पढ़ने की इच्छा जाहिर की । अब मनोहर ने कहा - तुम्हारी  पढ़ने की इच्छा अभी पूरी नही हुई  . मेने तुम्हे पढ़ने के कारण पुरे दिन थका हुआ देखा है  ।तुम्हे सोने का समय तक नही मिल पाता।  अब तुम आराम करो । घर को   सम्भालो।
          सविता ने कहा - मेंने  आपको अपने थकने के लिए कुछ कहा।  आप  मेरी ख़ुशी को भी महसूस करो।  मै
      पढ़ते  हुए अपनी सारी  थकान  भूल जाती हूँ।  पूरे  दिन मुझे याद भी नही आता  मेंने  कितना काम किया।
   मनोहर बोला -मेंने  रात  दिन तुम्हे काम करते हुए देखा है तुम्हारा कुम्हलाया चेहरा देखकर मुझे दुःख होता
है।
  सविता बोली - मै  सच में आगे पढ़ना  चाहती हूँ।  आप मुझ पर तरस  खाओ।  पढ़ना  मुझे सुख देता है।
  मनोहर ने कहा -तुम सच कह रही हो।  ठीक हे मै  तेरा 12 बी  में प्रवेश दिला  देता हूँ
 मनोहर ने सविता का प्रवेश दिला  दिया। अब सविता अपनी पढ़ाई  में ध्यान लगाने लगी।  इस तरह वह एक के बाद  एक क्लास पास करती चली गयी।  अब मनोहर को भी उसके पढ़ने  से कोई एतराज नही था। घर का काम सविता सुचारू रूप से कर रही थी।  वह पूरे समय काम में लगी रहती थी पर उफ़ तक नही करती थी। मनोहर उसकी जिजीविषा देखकर हैरान हो जाता था।  वह घर के काम के लिए ,शगुन के लिए , या पढ़ते  वक्त कभी भी मनोहर से मदद के लिए नही कहती थी  .
      ऐसे ही पढ़ते  हुए बी. ए ,एम ए ,बी ,एड   तक की पढ़ाई  पूरी कर ली  , अब सविता बहुत खुश थी जहाँ  तक पढ़ने  के बारे में उसने सोचा था। अब उसका सपना पूरा हो गया। 

pahla din

आज गर्मियों की छुट्टी के बाद विद्यालय खुल गए है  पर  बच्चे  बहुत कम     आये  जितने बच्चे आये  वे सब तरो ताजा   और जोश से भरे हुए थे । उनकी नई  वर्दी बन गयी थी । उनके अभिभावकों ने उनके पसंद का सामान दिलवा दिया था । वे सब अपने मित्रो को दिखा कर खुश हो रहे थे । उन्होंने अपनी छुट्टी कैसे बितायी आपस में बता रहे थे । बच्चे आज पढ़ने  के मन से नही आये  थे बल्कि अपनी छुट्टियों में उन्होंने क्या किया ,कैसे छुट्टियाँ बितायी,कहाँ घूम के आये इस बारे में परस्पर बता रहे थे । #छुटियाँ ख़त्म 

prinam

      सविता की मेहनत  रंग लाई  उसने डरते -डरते ११ वी  के पेपर दिए । उसे अपने ऊपर  विश्वास नही था क्योंकि पहली बार उसने बिना किसी की मदद के पढ़ाई  की थी । उसे लग रहा था । कही  वह फेल ना  हो जाए । क्योंकि वो एक बार भी विद्यालय नही गयी थी । उसने सारी  पढ़ाई  घर से की थी ।
     आज उसका परिणाम आना था उसका किसी काम में  मन नही लग रहा था उसका सारा ध्यान सिर्फ परिणाम पर लगा था । मनोहर कब घर आकर उसे उसका परिणाम बताएँगे । उसके परिणाम पर आगे का भविष्य निर्भर करता था । यदि वह पास हो गयी तो उसे आगे की पढ़ाई  का अवसर मिलेगा अन्यथा उसे पढ़ने का मौका नही मिलेगा । उसके पास दुबारा पास होने का मौका नही था । उसकी बरसो की इच्छा  मनोहर ने मान तो ली थी पर फेल होने पर दुबारा उसे दाखिला नही दिलवाया जायेगा ।
      मनोहर शाम के समय घर आये  । सविता का सारा दिन मनोहर का इंतजार करते हुए ही बीता  था । सविता मनोहर के चेहरे को देख कर समझने की कोशिश कर रही थी कि  परिणाम कैसा  रहा । पर मनोहर के चेहरे पर कोई ख़ुशी उसे दिखायी नही दी वह परेशान होकर उससे पूछ बेठी - आप मेरा परिणाम देखने गये  थे । क्या रहा ।
    मनोहर बोला - मै  थका हारा  घर आया हूँ  । तूने पानी के लिए पूछना भी जरूरी नही समझा । एकदम प्रश्न पूछना शुरू कर दिया ।
   सविता को अपनी गलती का अहसास हुआ वह रसोई में से गिलास में पानी ले आई । और मनोहर से  बोली - आप मेरी उतावली समझो । मुझे अपने परिणाम के बारे में जानने की बहुत  इच्छा थी । में सुबह से ही आपके आने का इंतजार कर रही थी । आपके बारे में सोच ही नही पाई  । आप बताओ आप के नाश्ते के लिए क्या लाऊ ।
     मनोहर हँस  पड़ा - आज तो बढ़िया सा कुछ बना दे । साधारण खाना नही चलेगा । तू पहला स्थान लेकर पास हुई  है ।
   सविता सन्न रह गयी उसे पास होने की उम्मीद नही थी जबकि वह बहुत अच्छे नंबर लेकर पास हो गयी थी उसने ख़ुशी -ख़ुशी मनोहर की  पसंद का खाना बनाया। तीनो ने खाना खा लिया तो सविता मनोहर से बोली - मेरा आज  मंदिर जाने का मन कर रहा है  । मेने मन्नत मांगी थी ।
     मनोहर ने अनमने मन से कहा - आज मन नही कर रहा कभी और चलेंगे ।
   सविता बोली - आप हमेशा  इतने बजे आओगे । हमेशा ही थके होगे । बाद में चलना है  तो आज ही क्यों नही चले ।
  सविता के काफी इसरार करने पर मनोहर उसके साथ मंदिर के लिए चल पड़ा । सविता को शाम की रौशनी , चारो  और की छटा आज बहुत सुहावनी लग रही थी । उसने श्रद्धा -भक्ति से  भगवान के  दर्शन करके प्रसाद चढ़ाया । ख़ुशी के अहसास के साथ घर वापिस आई । आज उसकी  बरसो की मनोकामना पूरी हुई  थी । 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...