वेद ने जैसे ही दसवी का परिणाम पाया। उसके साथ ही उसे नौकरी के लिए एक पत्र भी प्राप्त हो गया। उन दिनों दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था। सेना में बिना किसी मापदंड के ही नौकरी मिल जाती थी। उन दिनों अनपढ़ लोगो की संख्या ज्यादा थी। पढ़े -लिखे लोग उंगलियो पर गिने जाते थे। इस हिसाब से दसवी पास बहुत बड़ी पढ़ाई कहलाती थी। वेद को सेना की नौकरी का पत्र पाकर बहुत ख़ुशी हो रही थी। उस समय में नौकरियां बहुत मुश्किल से प्राप्त होती थी लेकिन उनके घर में उनके नौकरी के पत्र के कारण ख़ुशी नही मनाई गयी। बल्कि चारो और मातम छा गया।
घर के बड़े लड़के को सेना में भेजने के लिए कोई तैयार नही था। सेना में जाने का मतलब साक्षात मौत मानी जाती थी। कोई भी अपने बच्चे की मौत पसंद नही करता। घर के सभी लोगो के विरोध के कारण वेद सेना की नौकरी में न जा सका। इस बात का वेद को सारी उम्र दुःख रहा। उस समय में बच्चे की इच्छा मायने नही रखती थी बल्कि बड़े लोगो के निर्णय के सामने छोटो को सिर झुकाना पड़ता था। वेद को सारी उम्र सेना की नौकरी ना कर पाने का दुःख रहा। वक्त निकल जाने के बाद पछतावा ही शेष रहता है। वह ताउम्र इस दर्द से जूझते रहे।
अठारह साल की उम्र में उनकी शादी के बारे में सोचा जाने लगा। एक सुंदर युबती सुकन्या से वेद की शादी की बात चल रही थी। वेद की शक्ल सुकन्या के बड़े जीजाजी जिनकी मृत्यु हो चुकी थी उनसे मिलती थी इस कारण सुकन्या के पिताजी का झुकाव थोड़ा सा वेद की तरफ था ।
सुकन्या केवल सोलह साल की थी। उसके विवाह को लेकर उनके पिताजी काफी समय से चिंतित थे। सुकन्या चार बहने थी। सुकन्या की सबसे बड़ी बहन का विवाह जिससे हुआ था। उनकी मृत्यु हो गयी थी। सुकन्या के पिता उसका विवाह अच्छे परिवार में करना चाहते थे। इस परिवार के देखे सुकन्या समृद्ध परिवार की थी। उस हिसाब से वेद का परिवार उतना अमीर नही था। उस पर सौतेली सास का दंश। सुकन्या के पिता को डर सता रहा था। सौतेली सास सुकन्या को बहुत दुःख देगी। वे बेटी की शादी उस घर में नही करना चाहते थे।
जब घर में उन्होंने अपनी राय जाहिर की तो सुकन्या की बडी बहन प्रेमवती ने कहा -आप पैसे की चिंता मत करो। मेरा कोई बेटा नहीं है। उसे में अपना वारिस बना लुंगी। दोनों जब मेरे साथ रहेंगे तो सौतेली सास की परेशानी भी कोई मायने नही रखेगी मेरा सब कुछ उसे मिल जायेगा।सुकन्या को पैसे के कारण कोई परेशानी नही होगी। सुकन्या के पिताजी को ये सुझाव उचित लगा। उन्होंने रिश्ता तय कर दिया।
प्रेमवती की शादी एक बहुत अमीर घर में हुई थी पर उसके पति अपने परिवार की बाइसवीं संतान थे। उनके परिवार में एक के बाद एक उनके बीस भाई -बहनो की मौत हो चुकी थी। वे और उनकी एक बहन ही जीवित थी। शादी के कुछ समय के बाद ही प्रेमवती के पति की भी मौत हो गयी वे उस समय केवल बाइस साल के थे। प्रेमवती केवल सत्रह साल की उम्र में विधवा हो चुकी थी। जब प्रेमवती के पति का स्वर्गवास हुआ तव प्रेमवती गर्भवती थी। उनका बेटा कुछ समय बाद होकर मर गया। जिसके कारण उसकी जिंदगी वीरान हो गयी।
वो समय औरतो के हिसाब से बहुत दुखदायी था। विधवा औरतो से सारे सुख छीन लिए जाते थे। उसे जीते जी मृत के सामान समझ लिया जाता था। उसका दुःख उस परिवार के सभी लोगो ने देखा और सहन किया था। होनी को कौन बदल सकता था। उस ज़माने में विधवा की दूसरी शादी भी नही होती थी। प्रेमवती पति की मौत के बाद पंद्रह बरस तक और जीवित रही। पर उसका दुःख सभी को रुलाता रहता था। उसके परिवार की हंसी गायव हो गयी थी। ऐसे में प्रेमवती की इच्छा को सम्मान देते हुए सुकन्या की शादी वेद से तय कर दी गयी।
इधर रिश्ता तय हुआ उधर वेद को टायफायड हो गया। ये बीमारी उन दिनों जानलेवा थी। सबकी सांसे फिर से ठहर गयी।" देखो अब क्या होता है। ये भी अपने भाई -बहनो के पास तो नही चला जायेगा। सुकन्या के पिताजी को भी वेद की बीमारी ने हिला के रख दिया था। उनकी बीमारी के बारे में सुनते ही वे सीधे ज्योतिषी के पास गए। उन्होंने सबसे पहले जन्मकुंडली दिखा के पूछा -इस लड़के की उम्र कितनी है।
पंडित ने कहा -इसकी उम्र बहुत लम्बी है। ये बीमारी ज्यादा दिन तक नही रहेगी। यह लड़का जल्दी स्वस्थ हो जायेगा। पंडित की बात सुनकर सुकन्या के पिताजी को तसल्ली हुई। उन्हें उनकी बड़ी बेटी का दुःख ही हर समय सालता रहता था। उस दुःख को वे शव्दो में व्यक्त नही कर पाते थे। पर अब वे दुबारा उस दुःख का सामना नही करना चाहते थे।
पंडित के शब्दों पर यकीन करके उन्होंने सुकन्या की शादी की तैयारियाँ शुरू कर दी। धीरे -धीरे वेद की तबियत में भी सुधार आता जा रहा था।
घर के बड़े लड़के को सेना में भेजने के लिए कोई तैयार नही था। सेना में जाने का मतलब साक्षात मौत मानी जाती थी। कोई भी अपने बच्चे की मौत पसंद नही करता। घर के सभी लोगो के विरोध के कारण वेद सेना की नौकरी में न जा सका। इस बात का वेद को सारी उम्र दुःख रहा। उस समय में बच्चे की इच्छा मायने नही रखती थी बल्कि बड़े लोगो के निर्णय के सामने छोटो को सिर झुकाना पड़ता था। वेद को सारी उम्र सेना की नौकरी ना कर पाने का दुःख रहा। वक्त निकल जाने के बाद पछतावा ही शेष रहता है। वह ताउम्र इस दर्द से जूझते रहे।
अठारह साल की उम्र में उनकी शादी के बारे में सोचा जाने लगा। एक सुंदर युबती सुकन्या से वेद की शादी की बात चल रही थी। वेद की शक्ल सुकन्या के बड़े जीजाजी जिनकी मृत्यु हो चुकी थी उनसे मिलती थी इस कारण सुकन्या के पिताजी का झुकाव थोड़ा सा वेद की तरफ था ।
सुकन्या केवल सोलह साल की थी। उसके विवाह को लेकर उनके पिताजी काफी समय से चिंतित थे। सुकन्या चार बहने थी। सुकन्या की सबसे बड़ी बहन का विवाह जिससे हुआ था। उनकी मृत्यु हो गयी थी। सुकन्या के पिता उसका विवाह अच्छे परिवार में करना चाहते थे। इस परिवार के देखे सुकन्या समृद्ध परिवार की थी। उस हिसाब से वेद का परिवार उतना अमीर नही था। उस पर सौतेली सास का दंश। सुकन्या के पिता को डर सता रहा था। सौतेली सास सुकन्या को बहुत दुःख देगी। वे बेटी की शादी उस घर में नही करना चाहते थे।
जब घर में उन्होंने अपनी राय जाहिर की तो सुकन्या की बडी बहन प्रेमवती ने कहा -आप पैसे की चिंता मत करो। मेरा कोई बेटा नहीं है। उसे में अपना वारिस बना लुंगी। दोनों जब मेरे साथ रहेंगे तो सौतेली सास की परेशानी भी कोई मायने नही रखेगी मेरा सब कुछ उसे मिल जायेगा।सुकन्या को पैसे के कारण कोई परेशानी नही होगी। सुकन्या के पिताजी को ये सुझाव उचित लगा। उन्होंने रिश्ता तय कर दिया।
प्रेमवती की शादी एक बहुत अमीर घर में हुई थी पर उसके पति अपने परिवार की बाइसवीं संतान थे। उनके परिवार में एक के बाद एक उनके बीस भाई -बहनो की मौत हो चुकी थी। वे और उनकी एक बहन ही जीवित थी। शादी के कुछ समय के बाद ही प्रेमवती के पति की भी मौत हो गयी वे उस समय केवल बाइस साल के थे। प्रेमवती केवल सत्रह साल की उम्र में विधवा हो चुकी थी। जब प्रेमवती के पति का स्वर्गवास हुआ तव प्रेमवती गर्भवती थी। उनका बेटा कुछ समय बाद होकर मर गया। जिसके कारण उसकी जिंदगी वीरान हो गयी।
वो समय औरतो के हिसाब से बहुत दुखदायी था। विधवा औरतो से सारे सुख छीन लिए जाते थे। उसे जीते जी मृत के सामान समझ लिया जाता था। उसका दुःख उस परिवार के सभी लोगो ने देखा और सहन किया था। होनी को कौन बदल सकता था। उस ज़माने में विधवा की दूसरी शादी भी नही होती थी। प्रेमवती पति की मौत के बाद पंद्रह बरस तक और जीवित रही। पर उसका दुःख सभी को रुलाता रहता था। उसके परिवार की हंसी गायव हो गयी थी। ऐसे में प्रेमवती की इच्छा को सम्मान देते हुए सुकन्या की शादी वेद से तय कर दी गयी।
इधर रिश्ता तय हुआ उधर वेद को टायफायड हो गया। ये बीमारी उन दिनों जानलेवा थी। सबकी सांसे फिर से ठहर गयी।" देखो अब क्या होता है। ये भी अपने भाई -बहनो के पास तो नही चला जायेगा। सुकन्या के पिताजी को भी वेद की बीमारी ने हिला के रख दिया था। उनकी बीमारी के बारे में सुनते ही वे सीधे ज्योतिषी के पास गए। उन्होंने सबसे पहले जन्मकुंडली दिखा के पूछा -इस लड़के की उम्र कितनी है।
पंडित ने कहा -इसकी उम्र बहुत लम्बी है। ये बीमारी ज्यादा दिन तक नही रहेगी। यह लड़का जल्दी स्वस्थ हो जायेगा। पंडित की बात सुनकर सुकन्या के पिताजी को तसल्ली हुई। उन्हें उनकी बड़ी बेटी का दुःख ही हर समय सालता रहता था। उस दुःख को वे शव्दो में व्यक्त नही कर पाते थे। पर अब वे दुबारा उस दुःख का सामना नही करना चाहते थे।
पंडित के शब्दों पर यकीन करके उन्होंने सुकन्या की शादी की तैयारियाँ शुरू कर दी। धीरे -धीरे वेद की तबियत में भी सुधार आता जा रहा था।