शादी के समय दोनों अलग माहौल से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व्यवहार क्यों नहीं कर रहा है। वह उसे अपने अनुसार चला सकता है । इसके कारण वह उसमें बदलाव लाने की भरसक कोशिश करता है ।

दोनों में अनुभव की कमी होती है । उन्हें अपने अभिभावकों को एक दूसरे के अनुसार काम करते देखकर लगता है । उनका साथी भी उनके अनुसार काम करने वाला होना चाहिए ।उन्हे पता नहीं चल पाता जवानी मे उनके अभिभावकों का व्यवहार गुस्से वाला था । वे एक दूसरे को समझ नहीं पाते थे । उनमें हर समय बहस होती थी , जिसके परिणाम में मारपीट तक हो जाती थी । दोनों में से कोई झुकने के लिए तैयार नहीं होता था । यह बदलाव उम्र बड़ने के बाद समझदारी आने के कारण हुआ है । उम्र बड़ने पर अनुभव इंसान को समझदारी सिखा देता है ।

बुडापे तक सभी को लगता है कोई पूर्ण नहीं होता है उसकी कमियों के साथ रहना पड़ता है जब हमारे अंदर कमी है तो साथी मे पूर्णता पाना असंभव है जो कभी और कही नहीं मिल सकता है । जो कही नहीं है उसके बारे मे क्यों सोचा जाए इसलिए बुडापे मे जो जैसा है उसके साथ रहना सीख जाते है ।

जवानी मे इंसान की जरूरत ज्यादा होती है उसकी पूर्ति इंसान साथी से चाहता है । लड़कियों को सिखाया जाता है शादी के बाद तेरी हर इच्छा की पूर्ति होगी इसलिए विवाह के बाद वह हर सपने को साकार करना चाहती है वह भूल जाती है जैसा मायका होता है वैसा ही ससुराल मिलता है । यानि उसी श्रेणी का परिवार देखा जाता है जैसा मायका होता है । वहाँ की हैसियत मायके के समान होती है, जिसके कारण सभी कल्पनाएँ साकार नहीं हो सकती हैं। उसके पति की आय सीमित है, उसके लिए उसकी हर जरूरत पूरी करना मुश्किल है । उसे अपने सपने उसकी आय के अनुसार ही रखने पड़ेंगे । उसकी जरूरतों के कारण भी झगड़े होते हैं।

पति शादी के बाद पत्नी को सरवगुनसंपन्न औरत के रूप मे देखना चाहता है वह भूल जाता है उसकी पत्नी एक साधारण नारी है वह औरत सभी काम नहीं कर सकेगी । उसने तुम्हारे घर आकर काम करना शुरू किया है। इससे पहले उसने काम नहीं किया, इसलिए वह निपुण नहीं है । जिसके कारण उससे गलती हो सकती है । वह काम करने की कोशिश करती है, लेकिन आरंभ में सही तरह से काम नहीं कर सकेगी । उसकी गलतियों को न स्वीकारने के कारण झगड़े होते हैं।

जब नई ग्रहस्थी शुरू होती है इंसान सभी के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहता है क्योंकि शादी के बाद अभीभावकों के संबंध से अधिक महत्व हमारे संबंध जोड़ना मायने रखता है इंसान सीमा से बड़कर अन्य के लिए काम करना चाहता है । वह उस समय सीमा को भूल जाता है । जिसके कारण साथी का क्रोध लाजमी हो जाता है । दोनों अपने परिवार को अधिक महत्व देना चाहते है जो दूसरे को गवारा नहीं होता है ।

दोनों अपने रिश्तेदारों के प्रति फर्ज समझकर काम करना चाहते है । लेकिन फर्ज की जिम्मेदारी इतनी अधिक हो जाती है कि साथी अपने को अनदेखा समझने लगता है । जिसके कारण वह विरोध जाहिर करता है ।

भारत मे शादी को स्थाई समझा जाता है जिसके कारण दोनों एक दूसरे को अनदेखा करने की कोशिश करते है वह अन्य को अधिक महत्व देने के कारण साथी के अनुसार काम करने की कोशिश नहीं करते है

भारत में लड़कों की परवरिश इस तरह की जाती है कि वे पत्नी से अधिक महत्व परिवार को देते हैं। जब पत्नी इस तरह का व्यवहार देखती है तब उसे लगता है मै अपना सब कुछ इसके लिए छोड़कर आई और इसके लिए मेरा महत्व कुछ नहीं है । वह विद्रोह करने लगती है ।

लड़कियों के साथ मायके मे अच्छा व्यवहार किया जाता है । उसकी हर इच्छा का मान रखने की कोशिश की जाती है ससुराल मे आते ही उसे अपना महत्व गिरता हुआ दिखाई देता है । उसे नासमझ साबित करने की कोशिश की जाती है । उसकी सलाह के मायने खत्म हो जाते हैं, तब वह बगावत करने लगती है।

आरंभ मे दोनों साथी की अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ तुलना करते है तुलना करते समय साथी की अपेक्षा अपने परिवार के सदस्य श्रेष्ट लगते है ।

अधिकतर लड़के पिता की तरह रौबदार व्यवहार करना चाहते ही । लेकिन अब कोई भी लड़की माँ की तरह त्याग और बलिदान की देवी नहीं बनना चाहती है । वह अधिकार पाने के लिए झगड़ती है ।

अब तक जितने संबंध उनके जीवन में आए थे, वे सब बड़ों के बने थे । शादी के बाद वे अपनी सीमा से बढ़कर संबंध जोड़ने की कोशिश करते हैं। जिसके कारण साथी परेशान हो जाता है, उसे लगता है कि मैं इसके कारण नौकर बन गया हूँ। वह साथी की मजबूरी नहीं समझ पाते हैं। हर समय सामाजिकता निभाने के कारण परिवार अनदेखा रह जाता है ।

भारतीय माहौल मे औरत को नरक का द्वार या पाँव की बेड़ी साबित करने की कोशिश की जाती है जिसके कारण साथी उसे शुभचिंतक नहीं समझ पाता है । उसे लगता है मैं अपनी मर्जी से जी नहीं सकता, ऐसी औरत का क्या फायदा ।

शुरू में साथी को अपने साँचे में ढालने की कोशिश करते हैं। कुछ समय बाद जब जिम्मेदारियां पूरी हो जाती है सबको अपनी मंजिल मिल चुकी होती है दोनों बुडापे मे अकेले रह जाते है । बच्चे दूर हो जाते हैं, तब दोनों को किसी के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं रहती है ।

बाहरी दुनियाँ का माहौल देखकर लगता है साथी की सीमा क्या है, वह उससे समझोता करने की कोशिश करता है । अब वे समझने लगते है हमारे संबंधों में कड़वाहट जिनके कारण थी, वे हमसे दूर चले गए हैं। उनके लिए हमारा महत्व खत्म हो गया है वह अपनी उलझन खुद सुलझा सकते है तब वह एक दूसरे की कद्र करना सीखते है ।

जब वह साथी की तुलना अन्य से करते है तब उन्हे लगता है उनके साथी से अधिक बुरे लोग दुनियाँ मे है उनके साथी ने उनके साथ अच्छा व्यवहार किया है ।अब वे अपनी कमियों के बारे में भी सोचते हैं। अब वे साथी के दोष ही नहीं, अपने दोष भी देख पाते हैं।

उन्हे उम्र और अनुभव से समझ आता है उनका साथी किस सीमा तक काम कर सकता है उसके बाद उसकी सीमा खत्म हो जाती है । अब वे उसकी कमियों को दरकिनार करके उसके गुण देखने की कोशिश करते हैं। अब इतने अनुभव के बाद पता चल चुका होता है उनका साथी कब और किस हालत में काम कर सकता है या नहीं करेगा । इसलिए वह उसकी सीमा समझता है । अब कल्पना की जगह यथार्थ में रहकर जीना सीख जाते हैं, जिसके कारण झगड़े कम होते हैं।

अब बच्चों को साथी को महत्व देते देखते है तब उन्हे लगता है मेरा साथी ही हमेशा मेरी जरूरत पूरी करने की कोशिश करेगा । अन्य मात्र दिखावा करके चलते बनेगे । अब अनेक बीमारियाँ उन्हे घेर चुकी होती है जिसके कारण अन्य लोग उसकी बीमारियों को नहीं समझ सकते केवल साथी हमउम्र होने के कारण उसे समझकर देखभाल कर सकता है ।

बुड़ापा इंसान का गरुर खत्म कर देता है अब वे खुद को लाचार बेबस समझने के कारण साथी के महत्व को स्वीकारने लगते है । अब उन्हें लगता है कि जीवन के अंतिम समय तक उनका साथी ही साथ रहेगा, बाकी सब चले जाएंगे । बुडापे की लाचारी इंसान को समझोंता करना सिखाता है ।

किसी के बच्चे कितने भी काबिल हो लेकिन एक समय के बाद उनके लिए अभीभअवकों के लिए समय निकालना कठिन हो जाता है ।वह आपके लिए सारी सुविधा मुहैया करा सकते है लेकिन समय की कमी के कारण आपके पास बैठकर बाते नहीं कर सकेंगे । उम्र के अंतर के कारण वह आपकी भावना समझ नहीं सकते हैं। आपकी भावना आपका हमउम्र साथी ही समझ सकता है । अब वह जीवन का जरूरी हिस्सा बन जाता है जिसकी अब बहुत जरूरत महसूस होती है ।

जवानी मे इंसान व्यस्त रहता है बुडापे मे व्यस्तता खत्म हो जाती है ।अब उसे मन की बातें सुनने के लिए साथी की जरूरत होती है । उसे सहारे के रूप में साथी ही नज़र आता है, जिसके कारण वह गुस्से को दबाने की कोशिश करता है ।

अब उसे लगता है साथी बुडापे मे मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर हो चुका है अब कुछ दिनों का साथ बचा है उसके जाने के बाद अकेला जीवन काटना पड़ेगा । किसी की कमी उसका महत्व बड़ा देती है । वह शांत रहने की कोशिश करता है ।

इंसान बुडापे मे मजबूरीवश सहनशील हो जाते है ।उन्हें गुस्सा कम आता है। अब वे साथी का महत्व समझते हैं, जिसके कारण एक दूसरे की जरूरतें पूरी करने लगते हैं। उसे अनदेखा नहीं करते हैं।

 

आपके बच्चें आपका कहा क्यों नहीं मानते? आपकी बात वे क्यों माने, कोई ठोस कारण दे सकते हैं?
Madhurima Pathak की प्रोफाइल फ़ोटो

अधिकतर बच्चों को अपने-अपने अभिभावक बुद्धू लगते हैं। इसे समय का अंतर कहा जा सकता था । पहले बच्चे भले अभिभावकों को सम्मान न देते थे, लेकिन शब्दों में गलत नहीं बोलते थे । अब वक्त बदल गया है, जिसके कारण वह जो मन में आता है, उसे बोल देते हैं। अब हर जगह बोलने वाले बच्चे हैं, इसलिए अपने बच्चों को दोष देकर दुखी हो जाएंगे । जो आसपास देख रहे हैं, उसके हिसाब से बोलते हैं।

बच्चे जब तक आर्थिक रूप से समर्थ नहीं होते तब तक उनकी आदतों पर अंकुश लगाया जा सकता है । क्योंकि हाथ मे पैसा न होने के कारण उन्हे आपसे पैसा मांगना पड़ेगा क्योंकि बाहरी दुनियाँ शाब्दिक जाल मे फंसा सकती है लेकिन उनपर आसानी से पैसा खर्च नहीं करती इसलिए इस समय पैसे के जोर पर उसे अपने अनुसार चलने के लिए बाध्य कर सकते है ।

घर के खाने की आदत डालने की कोशिश करे क्योंकि बाहर के खाने के लिए पैसों की जरूरत होगी इसलिए उसे शर्तों के अनुसार पैसा दे । उसकी पसंद का बाहर का खाना किसी अच्छे काम को करने के बाद दे वरना घर के खाने के लिए जोर दे उसकी पौष्टिकता और जरूरत का अहसास कराए ।

जब भी किसी काम के लिए मना करना हो तब आप उसकी कमियाँ अवश्य बताए उसके कारण उसके जीवन मे विपरीत असर के बारे मे बताना जरूरी है । उसके जीवन और भविष्य में किस रूप में इसका असर पड़ेगा, उसके बारे में बताना जरूरी होता है ।

अब बच्चों को डरा कर काम नहीं करवाया जा सकता है इसके लिए उसके साथ दोस्त के समान व्यवहार करना पड़ता है वरना वह छिप कर या झूठ बोलकर गलत काम करते है उन्हे लगता है बड़े रुडिवादी होने के कारण उन्हे आधुनिक बनने से रोक रहे है । इस कारण झूठे बहाने बनाने लगते हैं। जिसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं।

आपका बच्चा घूमने जाने के नाम पर झूठ बोल सकता है इससे बचने के लिए उसके कुछ दोस्तों के फोन नंबर पास रखे । झूठ बोलने पर उसे पकड़ा जा सकता है । एक बार पकड़े जाने पर जब शर्मिंदगी उठानी पड़ती है, तब वह झूठ बोलने से बचेगा ।

बच्चे से मन न होने पर भी बात करें। जब वह आपसे सभी बातें बताएगा, तब आप अपनी राय समय आने पर दे सकते हैं। उसके अच्छे और बुरे परिणाम बताकर सतर्क किया जा सकता है ।बच्चे के सामने व्यस्त होने के बावजूद समय निकालकर उसके मनमाफिक काम करें। इससे वह अपनी सभी बातें आपसे कहने लगता है। उस समय राय दी जा सकती है ।

यदि बच्चे पर गुस्सा भी आए तो बातचीत बंद न करे । क्योंकि गर्म खून होने के कारण वह हर बात मन से लगा लेते हैं। उनकी चुप्पी कहीं हमेशा के लिए न हो जाए । इसलिए बाते करना जारी रखे ।

पहले समय में भगवान के नाम पर बच्चों से काम करवाया जा सकता था । अब वे इससे प्रभावित नहीं होते है इसलिए हमे उनसे काम करवाने के लिए ऐसे हालत पैदा करने पड़ते है जिसके कारण वह हमारे आदेश माने । ऐसा माहौल बनाने से झिझके नहीं ।

बच्चों की जरूरत एक दम पूरी न करे । उसके लिए उसे सब्र करना सिखाए । यदि आप उसकी जरूरत पूरी करने लायक है तब भी उसकी हर इच्छा की पूर्ति न करे । क्योंकि भविष्य में कोई उसकी जरूरत पूरी नहीं करेगा । उसे समझाने की कोशिश करें। जब आप किसी के लिए कुछ करेंगे, तभी वह आपकी इच्छा पूरी करेगा । बिना दिए कुछ नहीं मिलता है । इससे उसके व्यवहार मे बदलाव आएगा ।

बच्चे की जिद पूरी न करे । एक बार पूरी करने पर वह हमेशा जिद करेगा । हमेशा उसकी जिद पूरी नहीं की जा सकती है । जिद्दी बच्चे आपको हर जगह रुसवा करेंगे । इसलिए कुछ समय की कठोरता को बच्चे समझने लगते हैं।

गुस्से में डांटने या मारने की जगह आप बच्चे के सामने गलती होने पर चुप हो सकते हैं। कुछ समय बाद वह आपके चुप होने को गुस्से का प्रतिरूप समझेगा । जिससे डरकर आपके मनमाफिक काम करने लगेगा । क्योंकि छोटे होने पर उसे बड़ों की जरूरत होती है, वह आपको मनाने के लिए अनेक यत्न करेगा ।

बच्चों और अभिभावकों मे उम्र का अंतर होता है हमारे सोचने का तरीका अलग होता है । जिसके कारण हम उन्हें समझ नहीं पाते हैं, इसलिए कुछ उनकी सुने और कुछ सुनाने की कोशिश करें। वह हमारे अनुसार सभी काम नहीं कर सकते है । इसे मन से न लगाए ।

पहले समय में संयुक्त परिवार होते थे । घर की जरूरतें कृषि से पूरी होती थीं, जिसके कारण बच्चों के लिए काम करना अधिक जरूरी नहीं होता था । वह यदि बड़ों की आज्ञा मानते थे तब उनके परिवार की सभी जरूरत पूरी हो जाती थी । उस समय आज्ञाकारी बनकर अच्छा जीवन गुजारा जा सकता था ।

अब कृषि से जुड़े या व्यवसायिक लोग आज्ञाकारी बनकर अच्छी जिंदगी गुजार सकते है लेकिन आजकल अधिकतर लोग नौकरी करते है जिसके कारण उन्हे बाहर की दुनियाँ मे जाकर जीवन -यापन करना पड़ता है जिसमे प्रतियोगिता अधिक है । जो दूसरों की जरूरत के हिसाब से काम करता है, उसे आगे बढ़ने के मौके मिलते हैं, वरना वह पिछड़ जाता है

आजकल शिक्षा पाने और नौकरी के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है जिसके कारण आज्ञाकारी बच्चे बाहरी दुनियाँ का सामना नहीं कर पाते है । जो आधुनिक दुनियाँ के हिसाब से काम करते हैं, वही सफलता पाते हैं। इसलिए अधिकतर अभिभावको का बच्चे कहना नहीं मानते है क्योंकि सभी बच्चों को वाकपटु और सफल देखना चाहते है जिसका आरंभ परिवार से होता है । अब डरे-सहमे और चुप बच्चे सफलता हासिल नहीं कर पाते हैं।

मेरी परवरिश भी आज्ञाकारी बनाने के हिसाब से हुई थी जब नौकरी की दौड़ मे बाहर निकली तब मुझे साक्षात्कार के समय असफलता मिलती । ऐसा कई बार होने के बाद मैं मुँहफट बन गई । जो मन में जवाब आता था, वैसा जवाब देती थी; उसके बाद सभी साक्षात्कार में सफलता मिलती चली गई । क्योंकि जो हमे नौकरी मे रखता है वह हमसे उम्मीद करता है हम सभी समस्या का समाधान अपने आधार पर कर लेगे । यदि हर समय उसे सामने आना पड़ेगा तो कोई क्यों हमें नौकरी देगा? इसलिए आजकल वाकपटु और तेज तरार बनने की जरूरत पड़ती है इसकी शिक्षा आरंभ मे परिवार से मिलती है । वरना बच्चे डरपोक बनकर असफल रहेंगे ।

मै पूरी तरह आज्ञाकारी बनने के लिए नहीं कह रही लेकिन बड़ों के अनुभव से यदि फायदा होता है उसे जरूर माने क्योंकि वे आपके शुभचिंतक होते है वह कभी आपका बुरा नहीं चाहेंगे । वह मरते दम तक केवल आपकी भलाई सोचते हैं। इसलिए आधुनिक और पुरातन का संगम जीवन में ऊंचाई दिलाता है ।

 

क्या रिश्ते ह्यूमन बॉडी जैसे हैं, बाहर से देखने पर भले चंगे, अंदर से दुःख दर्द से भरे ?

हाँ सभी रिश्ते इंसानी शरीर जैसे होते है । सभी रिश्तों के साथ इंसान रहना चाहता है, लेकिन जब उनके साथ रहता है तब वह संभालना मुश्किल होता है । हर रिश्ते से हम जितनी उम्मीद करते है वह कभी पूरी नहीं हो सकती है । इंसान जितना दूसरों के लिए करता है उससे ज्यादा उसे अपने लिए चाहिए जिसके कारण उसके पास जितने संसाधन होते है उससे बड़ी जरूरत होती है । आधुनिक इंसान हमेशा अपनी जरूरतों के लिए दूसरों से उम्मीद करता है वह उसे पूरी करने की जगह उससे दूरी बनाने लगते है ।

रिश्ते पहले पैसे से निभाए जाते थे । कुछ रिश्तों से पाने की उम्मीद नहीं की जाती थी । उन रिश्तों मे केवल इंसान देने के बारे मे सोचता था जैसे बहन -बेटी का रिश्ता । इसमे पूरी जिंदगी देना पड़ता था । इस कारण बेटी के पैदा होने पर मातम छा जाता था । इंसान के लिए मानसिक रिश्तों से खुशी पाने की जगह भौतिक चीजों की अधिक पाने की इच्छा रहती है । जिससे रिश्तों में कड़वाहट आ रही है ।

अधिकतर भारतीय घरों में बेटे के पैदा होने पर खुशी मनाई जाती है । बेटी को हमेशा मजबूरी मे सहन किया जाता था क्योंकि वह शादी से पहले और बाद मे मायके के लिए जिम्मेदारी बनकर रह जाती थी । जबकि बेटे पर जिम्मेदारी सौंपी जाती थी । जो बेटे लोगों की इच्छा पूर्ति नहीं करते ऐसे बेटों से भी दूरी बनाने लगे है ।

आजकल नन्द अपने मायके से उम्मीद नहीं करती उसके मायके से संबंध अच्छे रहते है जहां नंदे मांगती रहती है वहाँ उन्हे बुलाना भी पसंद नहीं किया जाता है ।

कुछ लोगों के सोचने का तरीका नकारात्मक होता है जिसके कारण वह सामने वाले की अच्छाई को देखने की जगह उसमे केवल बुराई देखते है जिसके कारण वह उसके आने पर दुखी होते है उसकी अनुपस्थिति मे भी बुरी बाते सोचकर दुखी रहते है ।

आजकल लोग दूसरों की अच्छाई के बारे मे सोचना नहीं चाहते यदि दूसरों की तारीफ भी करते है तो वह महफ़िल मे अपनी जगह नहीं बना पाते है उन्हे उसकी बाते झूठी लगती है । दूसरे कहते मिल जाएंगे मुझे नहीं लगता जिसकी तारीफ आप कर रहे हो वह सच मे इतना अच्छा है तुम कुछ बड़ा चड़ा कर कह रही हो ।

लोग दूसरों की बुराई सुनना पसंद करते हैं, जिसके कारण उनकी बातों का दूसरों पर असर हो जाता है । उनका दूसरों को देखने का नजरिया बदल जाता है।

कुछ लोग मन से दूसरों के बारे मे बुरा नहीं सोचना चाहते वह फिर भी अनजाने मे दूसरों के बारे मे महफ़िल मे बुरा बोलते है क्योंकि महफ़िल ऐसी बातों को सुनना पसंद करता है । अधिकतर लोग निंदा सुनने में मज़ा लेते हैं।

आजकल इंसान सकारात्मक तरीके से सोचना भूल गया है, जिसके कारण वह हमेशा दुख में डूबा रहता है । उसकी परवरिश के कारण वह दूसरों की बुरी बाते सोचकर सतर्क रहना चाहता है आधुनिक माहौल मे अच्छे लोग कम और बुरे लोग अधिक मिलते है जिसके कारण सावधानी वश भविष्य की चिंता मे वह दूसरों का बुरा पक्ष अधिक देखता है । ताकि भविष्य में कोई उसे धोखा न दे सके । जीवन मे अधिकतर लोगों को धोखा खाते देखकर इंसान हमेशा हर रिश्ते को पहले शक से देखता है बहुत बार मिलने के बाद भरोसा करता है ।

आजकल अधिकतर इंसान हर रिश्ते से निराश है जिसके कारण वह किसी के सामने अपना दुख नहीं रख पाते है हर इंसान मन का गुबार निकालना चाहता है लेकिन उसे भरोसेमंद साथी नहीं मिल पाता है । पहले समय मे इंसान मन से किसी से भी बात करके तनावमुक्त हो जाता था उसे समस्या का समाधान भी मिल जाता था ।

आजकल भरोसेमंद रिश्ते के अभाव मे इंसान तनावग्रस्त रहकर आत्महत्या करने लगा है क्योंकि उसका जीवन घुटन भरा हो गया है । इस घुटन को निकालने के लिए वह डॉ के पास समस्या का समाधान निकालने जाने लगा है अब उसे किसी रिश्ते पर भरोसा नहीं रहा है । अधिकतर लोग मनोवैज्ञानिक के पास जाते हैं। इसलिए मनोवैज्ञानिकों की मांग बढ़ रही है।

अब इंसान के हर रिश्ते से भरोसा उठ गया है। अधिकतर इंसान खुद को अकेला समझते हैं। आजकल घरों मे लोग मानसिक बीमारियों से ग्रस्त देखे जा सकते है । तनाव का शिकार, मुझे लगता है, बच्चे से लेकर बड़े तक सभी हो रहे हैं। कोई भी इंसान सहज रूप से नहीं जी पा रहा है ।

बहुत सारे लोगों के रिश्ते बाहरी रूप से अच्छे दिखाई दे रहे है लेकिन उनके मन मे खलिश अवश्य होती है काश रिश्तेदार उनके मन के अनुसार काम कर पाते लेकिन इंसानी मन भटकता रहता है जिसके कारण जब खुद नहीं समझ पता उसे क्या चाहिए तो दूसरा इंसान उसकी जरूरत कैसे पूरी कर सकता है ।

हर इंसान की काम करने की सीमा होती है जिसके कारण वह दूसरों की हर जरूरत पूरी नहीं कर पाता है जिसके कारण जो इच्छा अधूरी रह जाती है वह केवल उसके बारे मे सोचकर दुखी रहता है । पूरी इच्छा के बारे मे सोचना नहीं चाहता है इस कारण उसे सभी रिश्तों मे बुराई नजर आती है ।

यदि इंसान सामने वाले की सीमा के बारे मे सोचकर काम करे तो उसे दुख न सहना पड़े । जो रिश्ते निभा रहे हैं, वे सामने वाले की अच्छाई अधिक और बुराई कम देखते हैं। वह हमेशा सोचते है जब पूर्ण सुख हम किसी को नहीं दे पा रहे तो सामने वाला हमे पूर्ण सुख कैसे दे सकता है । वह खुद को उसकी जगह रखकर देखता है जिसके कारण संतुष्ट रहता है वह सभी को अच्छाई और बुराई का मेल समझता है ।

पूरी तरह से किसी का शरीर स्वस्थ नहीं होता है । जो खुद को स्वस्थ समझकर जी रहे होते हैं, वे भी नहीं जानते कि उनके शरीर में कौन से बीमारियाँ पनप रही हैं। साधारण इंसान के साथ डॉ भी अपने शरीर मे होने वाले बदलाव को समझ नहीं पाते है यहाँ तक उस बीमारी के विशेषज्ञ भी अनजान रह जाते है । 39 वर्षीय ग्रेडलीन रॉय और सोहराब लुचमेडियन दिल के विशेषज्ञ भी अपने दिल के बारे मे नहीं जान सके छोटी उम्र मे दुनियाँ से चले गए ।

मै भी इसी श्रेणी मे आती हूँ । मुझे दो हार्ट अटैक पड़े, लेकिन उस समय मुझे पता नहीं चल सका कि मुझे क्या हो रहा है । मैं हमेशा दिल के दर्द को हार्ट अटैक समझती थी । मुझे दिल मे दर्द नहीं हुआ जबकि अन्य लोगों की अपेक्षा मेरी स्वस्थ जीवन शैली थी मेने सपने भी इस बीमारी के बारे मे नहीं सोचा था । सभी को मेरी बीमारी का सुनकर अचंभा होता है । इसलिए किसी को भी अपने शरीर का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है तब रिश्तों के बारे मे जानकारी हासिल करना मुश्किल है ।

जो संतुष्ट जीवन जी रहे है वह केवल रिश्तों की अच्छाई देखते है बुराई के बारे मे नहीं सोचते है । कोई रिश्ता बुराइयों से परे नहीं हो सकता है। सभी रिश्ते अच्छाई और बुराई का मिश्रण होते है हम चाहे तो उनमे बुराई देखकर दुखी रहे या केवल अच्छाई देखकर अच्छा समय गुजारे यह हमारी इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है दूसरे हमे सुख या दुख नहीं दे सकते यह हमारे सोचने के तरीके पर निर्भर करता है ।

 हाँ। यह मेरा परखा हुआ सत्य है क्योंकि मुझे आधे घंटे मे दो हार्ट अटैक पड़े । मुझे पता नहीं चला यह हार्ट अटेक है । फिर भी भगवान की कृपा से मै बच गई। यह भगवान की मर्जी के कारण संभव हुआ । उसी समय शेफाली ज़रीवाला और संजय कपूर को दिल का दौरा पड़ा । उनकी उम्र मुझसे कम थी वह हमारी हेसियत से बहुत अमीर थे । उनके पास जिंदा रहने के अनेक साधन थे । उनको बचाने के लिए डॉ. की टीम थी, उसके बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका । जबकि साधनों के अभाव में भी मैं जिंदा रही ।

मुझे उस समय धक्का लगा जब डॉ ने मेरे होश में आने के बाद कहा, 'मैं मर चुकी थी ।' उस समय हैरान रह गई। क्या इतनी आसानी से मौत आती है? इंसान को पता भी नहीं चलता । मै एक महीने तक इसके बारे मे सोचती रही तब अहसास हुआ भगवान अभी मेरे द्वारा काम करवाना चाहते है जिसके कारण मै जिंदा हूँ । अभी मेरे काम खत्म नहीं हुए जबकि मै अपनी सभी जिम्मेदारियाँ पूरी कर चुकी हूँ । यदि मै न रहूँ तब भी सभी की जिंदगी आसानी से चल जाएगी ।

कुछ लोग बिना जिम्मेदारी पूरी किए दुनियाँ से चले जाते है कुछ 95 साल की उम्र मे भगवान से मौत मांगते है लेकिन उन्हे मौत नहीं आती है । जीवन मे इतना दुख देख चुके होते है अब उनका मन जीवन से उचाट हो चुका होता है शरीर की अनेक बीमारियाँ उन्हे दर्द दे रही होती है उनके प्रियजन भी उनसे मुक्ति चाहते है लेकिन उन्हे मौत नहीं आती है ।

अधिकतर सुंदरता, बदसूरती ,किसी का घर विशेष मे जन्म लेना, बड़ों का मर जाना या जिंदा रहना इंसान के बस मे नहीं होता है देश काल और वातावरण भी कोई और निर्धारित करता है हमारे सोचने का तरीका भी अन्य के हाथ मे होता है । एक ही परिवार के सभी लोग बाद मे अलग तरह से जीवन गुजार रहे होते है । एक गरीब तो दूसरा अमीर बन जाता है। जबकि परवरिश के समय सभी को समान अवसर देने की कोशिश की गई थी।

कुछ लोग जीवन की शुरुरात मे काम के असफल होने पर हिम्मत छोड़ देते है दूसरा जीवन पर्यंत अपने लक्ष्य को पूरा करने मे लगा रहता है। किसी का उद्देश्य जीवन मे सुविधा पाना होता है उनके लिए आलस भरा जीवन सबसे सुंदर होता है तो दूसरे के जीवन का उद्देश्य केवल काम करना होता है इस तरह के लोग केवल अपने लिए नहीं बल्कि दुसरो के लिए भी काम करके खुशी पाते है ।

एक इंसान अच्छे परिवार मे पैदा होने के बाबजुद अपाहिज होता है कुछ पैदा होते ही मर जाते है। कुछ लोगों की क्षणिक जिंदगी सोचने पर मजबूर करती है । जिंदगी के रचयिता हम हैं या कोई और है? हम क्या उसके हाथ की कठपुतली हैं, जिसकी डोर वह खींचता है, उसी हिसाब से हम काम करने लगते हैं। हमारी चाहत मायने नहीं रखती है ।

बिल गेट्स ने कंप्यूटर बनाने का सपना अपने दोस्त केंट इवान्स के साथ देखा था । उसकी 17 साल की उम्र मे पर्वतारोहण करते हुए मौत हो गई । उसे कोई नहीं जानता जबकि बिल गेट्स ने कंप्यूटर की दुनिया में नाम कमाया । बहुत समय तक संसार के सबसे धनी व्यक्ति रहे । इसे ईश्वर की महिमा कहा जा सकता है ।

हम जिस पद पर पँहुचते है वह भगवान की इच्छा से पँहुचते है वह हमे उस स्थल पर देखना चाहता है उस स्थिति मे हमसे काम करवाना चाहते है जिसके कारण हम ऊंचाई छूते जाते है । ऊंचाई चुने का मतलब सामान्य लोगों से अधिक काम करना होता हे उनकी जिंदगी आम लोगों से अधिक मेहनत मांगती है ।

कुछ लोग बेकार जिंदगी जीकर दुनियाँ से चले जाते है उनके लिए काम करना सजा के समान होता है कुछ लोग रात मे कुछ घंटे सोकर काम करते रहते है उन पर थकान हावी नहीं होती ।उनके लिए जीवन के सुख मायने नहीं रखते वे बीमारी की अवस्था मे भी काम करते रहते है उस सोच के लिए ईश्वर जिम्मेदार है ।

किसी को काम करने के लिए प्रोत्साहित करना ईश्वर की मर्जी है । अभावों मे पले विख्यात अभिभावकों की संतान जीवन मे सफल नहीं हो पाती है जबकि उन्हे आगे बडने के लिए सभी सुविधा मिलती है जबकि फकीरी मे पले बच्चे भी ऊँचाइयाँ छूते मिल जाते है यह किसकी कृपा से होता है सोचने की बात है ।

सुख दुख , जीवन मरण , पद प्रतिष्ठा,स्वास्थ्य और जन्म मरण सब ऊपर वाले की कृपा से मिलता है हमारे सोचने के तरीके से सुख दुख निर्धारित होते है । मेरे ख्याल से जीवन मे मन मुताबिक कुछ भी इंसान को नहीं मिलता है कुछ जो मिल जाता है उससे संतुष्ट हो जाते है कुछ सब कुछ मिलने के बाबजुद असन्तुष्ट रहते है उन्हे सब कुछ मिलने के बाद भी दुख रहता है वह केवल उस चीज के बारे मे सोचते है जो उन्हे नहीं मिल सका होता है ।

हम उस इंसान के बारे मे सोचकर दुखी रहते है जो जीवन से संतुष्ट है जो असन्तुष्ट है उसे संतुष्टी के बारे मे समझाने पर नाकाम रहते है उसे अपना दुख संसार का सबसे बड़ा लगता है । जिसके कारण अच्छी बातों के बारे मे सोच नहीं पाता है अनजाने मे वह हमेशा अपने दुख के भंवर मे फंसा रहता है ।

मेरी अपनी सहेली से बात करने पर पता चला । उसने दुनिया के हिसाब से बेहतर जिंदगी जी थी, वह सबकुछ होने के बावजूद अपने जीवन से दुखी थी । उसके अनुसार जैसी जिंदगी उसने कल्पना की थी, जिंदगी वैसी नहीं थी । उसने काबिल होने के बावजूद जीवन से समझौता किया था । उसके मनमाफिक कभी कुछ भी नहीं रहा था । जो जैसा था उसे स्वीकारने मे जिंदगी बीता दी

मै जीवन के अंतिम पड़ाव पर पँहुच कर सोचती हूँ जो जीवन जिया वह हमारे अनुसार नहीं था । उसका विधाता कोई और था । हम केवल उसके अनुसार काम करते रहें। अंत में जो कुछ हासिल किया, उसके मायने नहीं थे । जीवनभर कठिनाइयां, सहते हुए, मर्जी के खिलाफ जीवन जीकर ,जो कुछ हासिल किया, वह सभी कुछ इसी दुनियाँ मे छोड़कर जाना पड़ेगा । जबकि अपने हाथ से किसी को इतना नहीं देते जितना इस दुनियाँ में छोड़कर जाना पड़ेगा ।

अभी भी दुख सताता है; कोई धोखा देकर सबकुछ न छीन ले, उसके लिए सतर्क रहते हैं। लेकिन जीवन की विडंबना के रूप मे सभी सुख के साधन ,हमारी मर्जी के खिलाफ, इसी दुनियाँ मे रह जाने है फिर मोह ममता क्यों और किसके लिए है जिसके कारण चिंता ग्रस्त रहते है । अपने अंतिम समय में भी निश्चिंत नहीं रह पाते हैं।

मेरे जैसी स्थिति हर उस इंसान की होती है जो जीवन की अंतिम अवस्था मे होता है हमने जो जीवन जिया वह हमारी इच्छा के हमेशा विपरीत होता है । इसका मतलब हमारे जीवन का नियंता कोई और होता है जिसकी उंगलियों पर हम नाचते हैं।

जीवन की अंतिम अवस्था में पहुँचा इंसान हमेशा दुखी रहता है। वह जो चाहता था, वैसा जीवन नहीं जी सका । उसे समझ नहीं आता कि अनिच्छा से उसने ऐसा जीवन क्यों और किसके कारण व्यतीत किया । वह क्यों विद्रोह नहीं कर सका । उसका जीवन क्यों दूसरों के अनुसार बीता? वह अपने जीवन का नियंता क्यों नहीं बन सका?

जो हालत से बगावत करके जीते हैं, उनके मन में भी खलिश रहती है । उन्होंने जो जिस रूप मे चाहा था जीवन वैसा कभी नहीं हुआ । उनकी इच्छा उसे इस रूप मे पाने की नहीं थी जिस रूप मे जीवन प्राप्त हुआ । मेरे ख्याल से बागी लोग अधिक दुख महसूस करते हैं क्योंकि वे जीवन को समझ नहीं पाते हैं।

जीवन कभी भी किसी के मन मुताबिक नहीं होता है; उसका नियंता भगवान होता है । वह पहले ही सबकुछ किस्मत में लिख देता है। जिसकी काट इंसान के बस में नहीं होती है । हमारे अंदर मेहनत करने की भावना भी उसकी कृपा से पैदा होती है । जिसके कारण जीवन सफल या असफल होता है ।

कुछ बिना मेहनत किए भगवान से सबकुछ मांगना चाहते है भगवान बिना मेहनत के कुछ नहीं देता है उस हिसाब से इंसान का दिमाग भी भगवान बनाता है । वरना कुछ हमेशा सोचते है कोई उन्हे बिना मेहनत के क्यों नहीं देता है वह खुद कुछ करने की अपेक्षा हमेशा दूसरों से उम्मीद लगाकर दुखी रहते है क्योंकि सामने वाला किसी के मन के अनुसार काम नहीं कर पाता है ।

वे किसी की मेहनत नहीं समझते, वे केवल उसे भगवान का वरद हस्त समझकर भगवान को हमेशा कोसते रहते हैं। वह सफल लोगों के जीवन की कठिनाई के बारे में नहीं सोचते, बल्कि केवल उनकी सफलता को देखकर नाखुश रहते हैं। वह भूल जाते है भगवान छप्पर फाड़ कर आजकल किसी को नहीं देता है इंसान जितना काम करता है उसे उसी हिसाब से प्राप्त होता है ।

ईश्वर सफल या असफल सोच बनाता है। इसे उसकी कृपा मानने में भलाई है ।

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