शादी के समय दोनों अलग माहौल से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व्यवहार क्यों नहीं कर रहा है। वह उसे अपने अनुसार चला सकता है । इसके कारण वह उसमें बदलाव लाने की भरसक कोशिश करता है ।
दोनों में अनुभव की कमी होती है । उन्हें अपने अभिभावकों को एक दूसरे के अनुसार काम करते देखकर लगता है । उनका साथी भी उनके अनुसार काम करने वाला होना चाहिए ।उन्हे पता नहीं चल पाता जवानी मे उनके अभिभावकों का व्यवहार गुस्से वाला था । वे एक दूसरे को समझ नहीं पाते थे । उनमें हर समय बहस होती थी , जिसके परिणाम में मारपीट तक हो जाती थी । दोनों में से कोई झुकने के लिए तैयार नहीं होता था । यह बदलाव उम्र बड़ने के बाद समझदारी आने के कारण हुआ है । उम्र बड़ने पर अनुभव इंसान को समझदारी सिखा देता है ।
बुडापे तक सभी को लगता है कोई पूर्ण नहीं होता है उसकी कमियों के साथ रहना पड़ता है जब हमारे अंदर कमी है तो साथी मे पूर्णता पाना असंभव है जो कभी और कही नहीं मिल सकता है । जो कही नहीं है उसके बारे मे क्यों सोचा जाए इसलिए बुडापे मे जो जैसा है उसके साथ रहना सीख जाते है ।
जवानी मे इंसान की जरूरत ज्यादा होती है उसकी पूर्ति इंसान साथी से चाहता है । लड़कियों को सिखाया जाता है शादी के बाद तेरी हर इच्छा की पूर्ति होगी इसलिए विवाह के बाद वह हर सपने को साकार करना चाहती है वह भूल जाती है जैसा मायका होता है वैसा ही ससुराल मिलता है । यानि उसी श्रेणी का परिवार देखा जाता है जैसा मायका होता है । वहाँ की हैसियत मायके के समान होती है, जिसके कारण सभी कल्पनाएँ साकार नहीं हो सकती हैं। उसके पति की आय सीमित है, उसके लिए उसकी हर जरूरत पूरी करना मुश्किल है । उसे अपने सपने उसकी आय के अनुसार ही रखने पड़ेंगे । उसकी जरूरतों के कारण भी झगड़े होते हैं।
पति शादी के बाद पत्नी को सरवगुनसंपन्न औरत के रूप मे देखना चाहता है वह भूल जाता है उसकी पत्नी एक साधारण नारी है वह औरत सभी काम नहीं कर सकेगी । उसने तुम्हारे घर आकर काम करना शुरू किया है। इससे पहले उसने काम नहीं किया, इसलिए वह निपुण नहीं है । जिसके कारण उससे गलती हो सकती है । वह काम करने की कोशिश करती है, लेकिन आरंभ में सही तरह से काम नहीं कर सकेगी । उसकी गलतियों को न स्वीकारने के कारण झगड़े होते हैं।
जब नई ग्रहस्थी शुरू होती है इंसान सभी के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहता है क्योंकि शादी के बाद अभीभावकों के संबंध से अधिक महत्व हमारे संबंध जोड़ना मायने रखता है इंसान सीमा से बड़कर अन्य के लिए काम करना चाहता है । वह उस समय सीमा को भूल जाता है । जिसके कारण साथी का क्रोध लाजमी हो जाता है । दोनों अपने परिवार को अधिक महत्व देना चाहते है जो दूसरे को गवारा नहीं होता है ।
दोनों अपने रिश्तेदारों के प्रति फर्ज समझकर काम करना चाहते है । लेकिन फर्ज की जिम्मेदारी इतनी अधिक हो जाती है कि साथी अपने को अनदेखा समझने लगता है । जिसके कारण वह विरोध जाहिर करता है ।
भारत मे शादी को स्थाई समझा जाता है जिसके कारण दोनों एक दूसरे को अनदेखा करने की कोशिश करते है वह अन्य को अधिक महत्व देने के कारण साथी के अनुसार काम करने की कोशिश नहीं करते है
भारत में लड़कों की परवरिश इस तरह की जाती है कि वे पत्नी से अधिक महत्व परिवार को देते हैं। जब पत्नी इस तरह का व्यवहार देखती है तब उसे लगता है मै अपना सब कुछ इसके लिए छोड़कर आई और इसके लिए मेरा महत्व कुछ नहीं है । वह विद्रोह करने लगती है ।
लड़कियों के साथ मायके मे अच्छा व्यवहार किया जाता है । उसकी हर इच्छा का मान रखने की कोशिश की जाती है ससुराल मे आते ही उसे अपना महत्व गिरता हुआ दिखाई देता है । उसे नासमझ साबित करने की कोशिश की जाती है । उसकी सलाह के मायने खत्म हो जाते हैं, तब वह बगावत करने लगती है।
आरंभ मे दोनों साथी की अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ तुलना करते है तुलना करते समय साथी की अपेक्षा अपने परिवार के सदस्य श्रेष्ट लगते है ।
अधिकतर लड़के पिता की तरह रौबदार व्यवहार करना चाहते ही । लेकिन अब कोई भी लड़की माँ की तरह त्याग और बलिदान की देवी नहीं बनना चाहती है । वह अधिकार पाने के लिए झगड़ती है ।
अब तक जितने संबंध उनके जीवन में आए थे, वे सब बड़ों के बने थे । शादी के बाद वे अपनी सीमा से बढ़कर संबंध जोड़ने की कोशिश करते हैं। जिसके कारण साथी परेशान हो जाता है, उसे लगता है कि मैं इसके कारण नौकर बन गया हूँ। वह साथी की मजबूरी नहीं समझ पाते हैं। हर समय सामाजिकता निभाने के कारण परिवार अनदेखा रह जाता है ।
भारतीय माहौल मे औरत को नरक का द्वार या पाँव की बेड़ी साबित करने की कोशिश की जाती है जिसके कारण साथी उसे शुभचिंतक नहीं समझ पाता है । उसे लगता है मैं अपनी मर्जी से जी नहीं सकता, ऐसी औरत का क्या फायदा ।
शुरू में साथी को अपने साँचे में ढालने की कोशिश करते हैं। कुछ समय बाद जब जिम्मेदारियां पूरी हो जाती है सबको अपनी मंजिल मिल चुकी होती है दोनों बुडापे मे अकेले रह जाते है । बच्चे दूर हो जाते हैं, तब दोनों को किसी के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं रहती है ।
बाहरी दुनियाँ का माहौल देखकर लगता है साथी की सीमा क्या है, वह उससे समझोता करने की कोशिश करता है । अब वे समझने लगते है हमारे संबंधों में कड़वाहट जिनके कारण थी, वे हमसे दूर चले गए हैं। उनके लिए हमारा महत्व खत्म हो गया है वह अपनी उलझन खुद सुलझा सकते है तब वह एक दूसरे की कद्र करना सीखते है ।
जब वह साथी की तुलना अन्य से करते है तब उन्हे लगता है उनके साथी से अधिक बुरे लोग दुनियाँ मे है उनके साथी ने उनके साथ अच्छा व्यवहार किया है ।अब वे अपनी कमियों के बारे में भी सोचते हैं। अब वे साथी के दोष ही नहीं, अपने दोष भी देख पाते हैं।
उन्हे उम्र और अनुभव से समझ आता है उनका साथी किस सीमा तक काम कर सकता है उसके बाद उसकी सीमा खत्म हो जाती है । अब वे उसकी कमियों को दरकिनार करके उसके गुण देखने की कोशिश करते हैं। अब इतने अनुभव के बाद पता चल चुका होता है उनका साथी कब और किस हालत में काम कर सकता है या नहीं करेगा । इसलिए वह उसकी सीमा समझता है । अब कल्पना की जगह यथार्थ में रहकर जीना सीख जाते हैं, जिसके कारण झगड़े कम होते हैं।
अब बच्चों को साथी को महत्व देते देखते है तब उन्हे लगता है मेरा साथी ही हमेशा मेरी जरूरत पूरी करने की कोशिश करेगा । अन्य मात्र दिखावा करके चलते बनेगे । अब अनेक बीमारियाँ उन्हे घेर चुकी होती है जिसके कारण अन्य लोग उसकी बीमारियों को नहीं समझ सकते केवल साथी हमउम्र होने के कारण उसे समझकर देखभाल कर सकता है ।
बुड़ापा इंसान का गरुर खत्म कर देता है अब वे खुद को लाचार बेबस समझने के कारण साथी के महत्व को स्वीकारने लगते है । अब उन्हें लगता है कि जीवन के अंतिम समय तक उनका साथी ही साथ रहेगा, बाकी सब चले जाएंगे । बुडापे की लाचारी इंसान को समझोंता करना सिखाता है ।
किसी के बच्चे कितने भी काबिल हो लेकिन एक समय के बाद उनके लिए अभीभअवकों के लिए समय निकालना कठिन हो जाता है ।वह आपके लिए सारी सुविधा मुहैया करा सकते है लेकिन समय की कमी के कारण आपके पास बैठकर बाते नहीं कर सकेंगे । उम्र के अंतर के कारण वह आपकी भावना समझ नहीं सकते हैं। आपकी भावना आपका हमउम्र साथी ही समझ सकता है । अब वह जीवन का जरूरी हिस्सा बन जाता है जिसकी अब बहुत जरूरत महसूस होती है ।
जवानी मे इंसान व्यस्त रहता है बुडापे मे व्यस्तता खत्म हो जाती है ।अब उसे मन की बातें सुनने के लिए साथी की जरूरत होती है । उसे सहारे के रूप में साथी ही नज़र आता है, जिसके कारण वह गुस्से को दबाने की कोशिश करता है ।
अब उसे लगता है साथी बुडापे मे मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर हो चुका है अब कुछ दिनों का साथ बचा है उसके जाने के बाद अकेला जीवन काटना पड़ेगा । किसी की कमी उसका महत्व बड़ा देती है । वह शांत रहने की कोशिश करता है ।
इंसान बुडापे मे मजबूरीवश सहनशील हो जाते है ।उन्हें गुस्सा कम आता है। अब वे साथी का महत्व समझते हैं, जिसके कारण एक दूसरे की जरूरतें पूरी करने लगते हैं। उसे अनदेखा नहीं करते हैं।