भगवान ने वेद के हाथो में पैसे कमाने का गुन दिया था। वह सारी उम्र अपने सौतेले भाई -बहनो की अपेक्षा बहुत अधिक कमाते रहे और उनकी मदद भी करते रहे । लेकिन उनके भाई -बहनो के अंदर उनकी मेहनत को लेकर या उनके अच्छे व्यवहार को लेकर कोई अच्छा अहसास नही रहा। वह उनकी मदद किसी उम्मीद से नही करते थे। जो पैसा उन्होंने एक बार दे दिया वह उन्हें कभी बापिस नही मिला।
उन्होंने अपने सौतेले छोटे भाई की अंतिम क्रिया,उसकी बेटी की शादी में मदद की। लेकिन जब उसके बेटे की शादी का समय आया तब उसके सगे रिश्तेदारो ने वेद को इसकी भनक भी नही लगने दी। वेद के पास शादी का केवल निमंत्रण पत्र पहुंचा। शुरू से वेद के साथ ऐसा ही होता रहा था।
बहनो की शादी के समय उससे पैसे लेने होते थे। इसलिए उसकी सलाह ली जाती थी। लेकिन जब दो भाइयो की शादी का समय आया तब उसे केवल निमंत्रण पत्र भेजा गया। शादी के बाद बिना बात लड़ाई लड़ ली जाती थी। वेद को भूखा -प्यासा अपने परिवार के साथ घर वापस लौटना पड़ता था। किसी के मन में उसके छोटे -छोटे बच्चो के लिए तरस नही आता था। इतने लम्बे सफर में उसके बच्चे कैसे रहेंगे। काम निकल जाने के बाद उनकी इंसानियत मर जाती थी।
अब हालत बदल गए थे। लेकिन उनका रवैया फिर से वैसा ही था। वेद ने उनके ऐसे व्यवहार को देखकर अपना मन कड़ा कर लिया था। मेरी सारी जिंदगी इनका भला करते हुए बीत गयी । लेकिन ये कभी बदले नही अब मै भी इनके साथ इनके साथ वैसा ही व्यवहार करूंगा।
इनके छोटे भाई की पत्नी भी इस बीच ख़त्म हो गयी। अबकी बार वेद मेहमानो की तरह उसमे शामिल हुए और घर वापिस आ गए। अब उसके दो बच्चे भी समर्थ हो चुके थे। उसके सभी चाचा और बुआ थे। वेद ने ज्यादा सोचने की जरूरत महसूस नही की। इससे पहले वेद हर काम के समय किसी के बिना कहे अपना पैसा लगाते रहे थे। इसलिए सभी को लगा अब भी वेद कुछ कहे विना सारी जिम्मेदारी अपने उपर ले लेंगे। इसलिए उनसे छोटा भाई इस काम में आया तो सही लेकिन पैसो का इंतजाम किये बिना आ गया। उसे उम्मीद थी हमेशा की तरह भैया सारा खर्च उठा लेंगे लेकिन वेद इस समय एक वेगाने की तरह आये उन्होंने इस बारे में किसी से विचार -विमर्श नही किया। उन्हें अपने भाई से लगाव था इस लिए हमेशा किसी के बिना कहे उसकी सारी जिम्मेदारी उठा लेते थे। लेकिन छोटे भाई को ख़त्म हुए भी दस साल बीत गए थे। भाई की मृत्यु के बाद उनका उसके परिवार से ज्यादा मिलना जुलना नही होता था क्योंकि वेद बड़े होने के कारण उसकी पत्नी से बात नही कर सकते थे। इसलिए उनके अंदर का अपनापन भी नही रहा था।
अंतिम क्रिया के अगले दिन उनसे छोटे भाई जो सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे अपनी बहन के साथ वेद की फैक्टरी पहुँच गए। वेद को उन्हें देखकर अचरज हुआ।
बात चलने पर पता चला- भाभी की तेरहवी करने के लिए साधन नही है। उन्होंने गिड़गिड़ा कर वेद से ऐसे समय मदद करने के लिए कहा।
वेद ने पूछा -तुम्हे ऐसे समय खुद पेसो का जुगाड़ करके लाना चाहिए था। तुम्हे खाली हाथ आना नही चाहिए था।
उन्होंने दबे शब्दों में कहा -भइया गलती हो गयी। हमें उम्मीद थी उसके बेटे के पास कुछ होगा। लेकिन कल उसने साफ शब्दों में मना कर दिया। उसके पास बिलकुल पैसा नही है। ऐसे में हमारे लिए पैसो का प्रबंध करना बहुत मुश्किल है। हम दिल्ली वालो को जानते भी नही है। हम पर विश्वास करके हमें ऐसे समय कौन पैसा देगा। बस आखिरी उम्मीद आपसे जुडी है। आपके आलावा इस वक्त हमारा सहारा और कोई नही बन सकता।
वेद को उनकी बातो में सच्चाई का अहसास हुआ। लेकिन अपनी बेचारगी दिखाते हुए। वेद ने कहा -देखो। अब मै बूढ़ा हो चुका हूँ। सारे कामकाज का सर्वेसर्वा नही हूँ इसमें नरेश की मेहनत भी है। इसलिए मै पैसा खर्च करने के बाद भूल जाऊ ऐसा नही हो सकता। मुझे उसे पैसे का हिसाब देना पड़ता है। इसलिए मै तुम्हारी मज़बूरी समझ कर इस समय तुम्हे पैसा दे दूँगा। लेकिन इस बार तुम्हे पैसा लौटाना होगा। यदि तुम्हे मनज़ूर हो तो कहो।
उनके पास इसके आलावा और कोई चारा नही था। उन्होंने पैसा लौटाने के लिए हामी भर दी।भाई की तेरहवी का सारा काम इस पैसे के द्वारा निबट गया।
उसके बाद वेद के भाई अपने घर वापिस चले गए। उस काम के ख़त्म होने के कई महीने बाद वेद के पास उधार दिए पैसे वापिस आ गए। जिसकी वेद को कोई उम्मीद नही थी। क्योंकि इससे पहले कभी भी उनको अपने पैसो की वापसी नही मिली थी।
उन्होंने अपने सौतेले छोटे भाई की अंतिम क्रिया,उसकी बेटी की शादी में मदद की। लेकिन जब उसके बेटे की शादी का समय आया तब उसके सगे रिश्तेदारो ने वेद को इसकी भनक भी नही लगने दी। वेद के पास शादी का केवल निमंत्रण पत्र पहुंचा। शुरू से वेद के साथ ऐसा ही होता रहा था।
बहनो की शादी के समय उससे पैसे लेने होते थे। इसलिए उसकी सलाह ली जाती थी। लेकिन जब दो भाइयो की शादी का समय आया तब उसे केवल निमंत्रण पत्र भेजा गया। शादी के बाद बिना बात लड़ाई लड़ ली जाती थी। वेद को भूखा -प्यासा अपने परिवार के साथ घर वापस लौटना पड़ता था। किसी के मन में उसके छोटे -छोटे बच्चो के लिए तरस नही आता था। इतने लम्बे सफर में उसके बच्चे कैसे रहेंगे। काम निकल जाने के बाद उनकी इंसानियत मर जाती थी।
अब हालत बदल गए थे। लेकिन उनका रवैया फिर से वैसा ही था। वेद ने उनके ऐसे व्यवहार को देखकर अपना मन कड़ा कर लिया था। मेरी सारी जिंदगी इनका भला करते हुए बीत गयी । लेकिन ये कभी बदले नही अब मै भी इनके साथ इनके साथ वैसा ही व्यवहार करूंगा।
इनके छोटे भाई की पत्नी भी इस बीच ख़त्म हो गयी। अबकी बार वेद मेहमानो की तरह उसमे शामिल हुए और घर वापिस आ गए। अब उसके दो बच्चे भी समर्थ हो चुके थे। उसके सभी चाचा और बुआ थे। वेद ने ज्यादा सोचने की जरूरत महसूस नही की। इससे पहले वेद हर काम के समय किसी के बिना कहे अपना पैसा लगाते रहे थे। इसलिए सभी को लगा अब भी वेद कुछ कहे विना सारी जिम्मेदारी अपने उपर ले लेंगे। इसलिए उनसे छोटा भाई इस काम में आया तो सही लेकिन पैसो का इंतजाम किये बिना आ गया। उसे उम्मीद थी हमेशा की तरह भैया सारा खर्च उठा लेंगे लेकिन वेद इस समय एक वेगाने की तरह आये उन्होंने इस बारे में किसी से विचार -विमर्श नही किया। उन्हें अपने भाई से लगाव था इस लिए हमेशा किसी के बिना कहे उसकी सारी जिम्मेदारी उठा लेते थे। लेकिन छोटे भाई को ख़त्म हुए भी दस साल बीत गए थे। भाई की मृत्यु के बाद उनका उसके परिवार से ज्यादा मिलना जुलना नही होता था क्योंकि वेद बड़े होने के कारण उसकी पत्नी से बात नही कर सकते थे। इसलिए उनके अंदर का अपनापन भी नही रहा था।
अंतिम क्रिया के अगले दिन उनसे छोटे भाई जो सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे अपनी बहन के साथ वेद की फैक्टरी पहुँच गए। वेद को उन्हें देखकर अचरज हुआ।
बात चलने पर पता चला- भाभी की तेरहवी करने के लिए साधन नही है। उन्होंने गिड़गिड़ा कर वेद से ऐसे समय मदद करने के लिए कहा।
वेद ने पूछा -तुम्हे ऐसे समय खुद पेसो का जुगाड़ करके लाना चाहिए था। तुम्हे खाली हाथ आना नही चाहिए था।
उन्होंने दबे शब्दों में कहा -भइया गलती हो गयी। हमें उम्मीद थी उसके बेटे के पास कुछ होगा। लेकिन कल उसने साफ शब्दों में मना कर दिया। उसके पास बिलकुल पैसा नही है। ऐसे में हमारे लिए पैसो का प्रबंध करना बहुत मुश्किल है। हम दिल्ली वालो को जानते भी नही है। हम पर विश्वास करके हमें ऐसे समय कौन पैसा देगा। बस आखिरी उम्मीद आपसे जुडी है। आपके आलावा इस वक्त हमारा सहारा और कोई नही बन सकता।
वेद को उनकी बातो में सच्चाई का अहसास हुआ। लेकिन अपनी बेचारगी दिखाते हुए। वेद ने कहा -देखो। अब मै बूढ़ा हो चुका हूँ। सारे कामकाज का सर्वेसर्वा नही हूँ इसमें नरेश की मेहनत भी है। इसलिए मै पैसा खर्च करने के बाद भूल जाऊ ऐसा नही हो सकता। मुझे उसे पैसे का हिसाब देना पड़ता है। इसलिए मै तुम्हारी मज़बूरी समझ कर इस समय तुम्हे पैसा दे दूँगा। लेकिन इस बार तुम्हे पैसा लौटाना होगा। यदि तुम्हे मनज़ूर हो तो कहो।
उनके पास इसके आलावा और कोई चारा नही था। उन्होंने पैसा लौटाने के लिए हामी भर दी।भाई की तेरहवी का सारा काम इस पैसे के द्वारा निबट गया।
उसके बाद वेद के भाई अपने घर वापिस चले गए। उस काम के ख़त्म होने के कई महीने बाद वेद के पास उधार दिए पैसे वापिस आ गए। जिसकी वेद को कोई उम्मीद नही थी। क्योंकि इससे पहले कभी भी उनको अपने पैसो की वापसी नही मिली थी।
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