15 दिन बाद वेद पूरी तरह से ठीक होकर घर वापस आ गए। उनके अंदर जीने और काम करने की लालसा थी। वे फिर से सुबह उठ कर सैर करने जाते थे। अब डॉ ने उन्हें छड़ी लेकर चलने की हिदायत दी थी। वेद छड़ी हाथ में लेते थे लेकिन उसे जमीन पर टिका कर चलना बिलकुल पसंद नही था। इसलिए उनकी छड़ी लगता था हवा में लहरा रही है। जब उनसे कोई छड़ी सही तरह से प्रयोग करने के लिए कहता।
उनका जबाब होता -मुझे इसकी जरूरत नही है। डॉ जबरदस्ती इसका प्रयोग करने के लिए कह रहा है। जब मै अपने आप सही तरह से चल लेता हूँ। इसलिए मुझे यह खिलोने के सामान लगती है। इसलिए इस प्रकार हाथ में आ जाती है। यदि मुझे सही मायने में इसकी जरूरत होती तो इसे सही तरीके से इस्तेमाल करना मेरी मजबूरी होती। मुझे इसकी जरूरत नही है इसलिए इसका सही प्रयोग नही हो पाता।
इस समय तक नरेश के परिवार में कोई सोकर उठा नही होता था। उन्होंने नरेश की शादी करवा दी थी। उसके हालत इतने अजीव थे कि उसकी शादी के बारे में कोई सोचता ही नही था लेकिन वेद की कोशिश से उसका घर बस गया था। उसके कहने पर वेद ने बड़ा घर किराये पर ले लिया था। जिसमे उसकी पत्नी और छोटी बहन भी आकर रहने लगी थी। वेद के लिए उनके रहने से जीवन में कोई खास परिवर्तन नही आया था। वे लोग अपनी तरह से जिंदगी जीते थे। वेद ने उन पर नियंत्रण रखने की कोशिश नही की। वह सुबह फैक्टरी चले जाते थे। जब नरेश की पत्नी उठती तब वह दादा जी के लिए खाना भिजवा देती। उनको उन सबके काम करने के तरीके को लेकर दखलंदाजी करना पसंद नही था लेकिन उनको ऐसा रवैया नागवार लगता था। क्योंकि उनकी परवरिश अनुशासित माहौल में हुई थी।
अब वेद को अपने उपर गुस्सा आने लगा था इस उम्र में उनका दिमाग सही तरह से काम करता था। लेकिन स्वास्थ्य ख़राब जल्दी हो जाता था ,इस कारण उनको दुसरो से मदद लेनी पड़ती थी। तब उन्हें बहुत दुःख होता था। उनका स्वास्थ्य अपनी उम्र के लोगो से बहुत अच्छा था लेकिन वे अपनी तुलना जवानी की उम्र से करते थे। इसका जबाब देना सबके लिए बहुत कठिन था।
हम भी भगवान से उनके स्वास्थ्य की दुआ मांगते थे। इसी तरह एक साल बीत गया। डॉ ने एक साल पहले ही उनके जीवन की उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन उनकी जिजीविषा के कारण उन्होंने एक साल और निकाल दिया।
एक दिन उन्होंने बताया -इन सर्दियों में मुझे ठण्ड बहुत लग रही है। मेरा काँपना बंद नही हो रहा।
उन्हें जुकाम भी हो रहा था। इससे ज्यादा उनकी परेशानी का किसी को पता नही चल पाया। उनके कमरे में हीटर का इंतजाम कर दिया गया।
एक दिन उन्होंने कहा -लाली मेरे पाँव ठन्डे रहते है। लगता है हीटर का इन पर कोई असर नही हो रहा है।
इसके अतिरिक्त वेद को कोई परेशानी नही थी। एक दिन उनकी मृत्यु की खबर आई। इस समय वेद 89 साल के हो चुके थे। उनकी इच्छा किसी पर अंतिम समय में निर्भर रहने की नही थी। भगवान ने उनकी इच्छा पूरी कर दी। वे अपने अंतिम समय में किसी के लिए परेशानी का कारण नही बने। उनके जैसे कर्मठ इंसान की मौत भी उनकी इच्छा अनुकूल हुई। वे अपने अंतिम समय तक काम करते रहे। हमने उनके जैसा काम करने वाला इंसान और कोई नही देखा अंतिम समय तक दुसरो का भला करने के बारे में सोचता रहा। जिसने अपने बारे में कभी कुछ नही सोचा वे जीवन भर दूसरो की भलाई में लगे रहे।
उनका जबाब होता -मुझे इसकी जरूरत नही है। डॉ जबरदस्ती इसका प्रयोग करने के लिए कह रहा है। जब मै अपने आप सही तरह से चल लेता हूँ। इसलिए मुझे यह खिलोने के सामान लगती है। इसलिए इस प्रकार हाथ में आ जाती है। यदि मुझे सही मायने में इसकी जरूरत होती तो इसे सही तरीके से इस्तेमाल करना मेरी मजबूरी होती। मुझे इसकी जरूरत नही है इसलिए इसका सही प्रयोग नही हो पाता।
इस समय तक नरेश के परिवार में कोई सोकर उठा नही होता था। उन्होंने नरेश की शादी करवा दी थी। उसके हालत इतने अजीव थे कि उसकी शादी के बारे में कोई सोचता ही नही था लेकिन वेद की कोशिश से उसका घर बस गया था। उसके कहने पर वेद ने बड़ा घर किराये पर ले लिया था। जिसमे उसकी पत्नी और छोटी बहन भी आकर रहने लगी थी। वेद के लिए उनके रहने से जीवन में कोई खास परिवर्तन नही आया था। वे लोग अपनी तरह से जिंदगी जीते थे। वेद ने उन पर नियंत्रण रखने की कोशिश नही की। वह सुबह फैक्टरी चले जाते थे। जब नरेश की पत्नी उठती तब वह दादा जी के लिए खाना भिजवा देती। उनको उन सबके काम करने के तरीके को लेकर दखलंदाजी करना पसंद नही था लेकिन उनको ऐसा रवैया नागवार लगता था। क्योंकि उनकी परवरिश अनुशासित माहौल में हुई थी।
अब वेद को अपने उपर गुस्सा आने लगा था इस उम्र में उनका दिमाग सही तरह से काम करता था। लेकिन स्वास्थ्य ख़राब जल्दी हो जाता था ,इस कारण उनको दुसरो से मदद लेनी पड़ती थी। तब उन्हें बहुत दुःख होता था। उनका स्वास्थ्य अपनी उम्र के लोगो से बहुत अच्छा था लेकिन वे अपनी तुलना जवानी की उम्र से करते थे। इसका जबाब देना सबके लिए बहुत कठिन था।
हम भी भगवान से उनके स्वास्थ्य की दुआ मांगते थे। इसी तरह एक साल बीत गया। डॉ ने एक साल पहले ही उनके जीवन की उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन उनकी जिजीविषा के कारण उन्होंने एक साल और निकाल दिया।
एक दिन उन्होंने बताया -इन सर्दियों में मुझे ठण्ड बहुत लग रही है। मेरा काँपना बंद नही हो रहा।
उन्हें जुकाम भी हो रहा था। इससे ज्यादा उनकी परेशानी का किसी को पता नही चल पाया। उनके कमरे में हीटर का इंतजाम कर दिया गया।
एक दिन उन्होंने कहा -लाली मेरे पाँव ठन्डे रहते है। लगता है हीटर का इन पर कोई असर नही हो रहा है।
इसके अतिरिक्त वेद को कोई परेशानी नही थी। एक दिन उनकी मृत्यु की खबर आई। इस समय वेद 89 साल के हो चुके थे। उनकी इच्छा किसी पर अंतिम समय में निर्भर रहने की नही थी। भगवान ने उनकी इच्छा पूरी कर दी। वे अपने अंतिम समय में किसी के लिए परेशानी का कारण नही बने। उनके जैसे कर्मठ इंसान की मौत भी उनकी इच्छा अनुकूल हुई। वे अपने अंतिम समय तक काम करते रहे। हमने उनके जैसा काम करने वाला इंसान और कोई नही देखा अंतिम समय तक दुसरो का भला करने के बारे में सोचता रहा। जिसने अपने बारे में कभी कुछ नही सोचा वे जीवन भर दूसरो की भलाई में लगे रहे।
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