वेद अब बहुत दुखी और उदास रहने लगे थे। इस बीच उनके हमउम्र दुनिया से जा चुके थे। उनसे बात करने के लिए उनकी उम्र के लोग नही रहे थे। वे परिवार के सबसे बुजुर्ग इंसान बन गए थे। उनका अकेलापन मन को बहुत तकलीफ देता था। वे अपनी उम्र के लोगो की अपेक्षा स्वस्थ थे। लेकिन उनके मन में वीरानी छाने लगी थी।
वे स्वय कहते -इतनी उम्र पाकर जीना बहुत दुखदायी हो जाता है।
जब सारे नाते -रिश्तेदार हमें छोड़कर जा रहे हो । उनका दर्द सहते हुए जिंदगी की शाम को गुजारना उनके लिए बहुत कष्टप्रद हो गया था। लेकिन उन्होंने हिम्मत का दामन नही छोड़ा था। वे अभी भी अपनी फैक्ट्री सुबह जाते थे। उनके लिए जीने का मतलब काम था। इस उम्र में भी वे अपने काम स्वय करते थे। उनसे यदि कोई किसी भी तरह की मदद चाहता तो वे उसकी भरपूर मदद करने के लिए तैयार रहते थे।
उन्होंने अपने सौतेले भाई -बहनो की भरपूर मदद की। उनका छोटा भाई अपनी जिम्मेदारी पूरी किये बिना इस दुनियाँ से चला गया था। उसके घर में जीवन -यापन के साधन नही थे। उनके तीन बच्चे पिता की गैर मौजूदगी में अपने को बेसहारा महसूस कर रहे थे। उन्होंने भाई की अंतिम क्रिया का सारा खर्च खुद वहन किया। इसके आलावा उन्होंने उसकी बेटी की शादी में भारी रकम खर्च की।
उन्होंने उस समय कहा- अब मै बूढ़ा हो चुका हूँ। इससे ज्यादा मेरी हैसियत नही है। मुझपर अपने बेटे के परिवार की भी जिम्मेदारी आ पड़ी है।जब मुझे कन्धा देने का समय आया तो उनको मुझे कन्धा देना पड़ा।जिसमे में अपने बुढ़ापे का सहारा तलाश रहा था। इससे बढ़कर एक इंसान की लाचारी और क्या हो सकती है। अब मुझ बूढ़े के कंधे कमजोर हो चुके है।
उन्होंने उस परिवार की मदद करने के लिए ओरो को विवश किया। उनके कारण उनका परिवार जिम्मेदारी उठाने के काबिल बन पाया।
लेकिन उनका भतीजा जिम्मेदार नही बन सका। वह मन लगा कर कोई काम नही कर पाता था। जिसके कारण उसके परिवार का साथ अभावो ने नही छोड़ा। भतीजे की शादी करवा दी। इस उम्मीद में कि वह अब मन लगा कर काम करेगा। उसका मन कभी भी पढ़ाई या मेहनत करने में नही लगता था।
वे जिससे भी उसके बारे में बात करते। उसका जबाब यही रहता -आपके कहने पर हमने उसे काम पर रख लिया है। लेकिन वह किसी काम को जिम्मेदारी से निभाने की जगह लापरवाही करता है। आपका लिहाज करके हम उसे काम से नही निकाल रहे। लेकिन उससे किसी काम की उम्मीद करना बेकार है। उसे रखना हाथी पालने जैसा है। उनके शब्दों को सुनकर वेद चुप हो जाते।
वेद के जीवन में काम करने वाले व्यक्ति नही आये। बल्कि सभी दुसरो के पैसो पर ऐश करने को, जीवन का ध्येय समझने थे । वेद जितने मेहनती थे इतने उनके साथ वाले लोग नही हुए। उन्हें इस बात का अफ़सोस रहा।
आपको लग रहा होगा। वेद ने उन्हें अपनी फैक्टरी में काम क्यों नही दिया। आपको पता होगा। शुरू में जब वेद ने जवानी में फैवट्री लगायी थी तब उन्होंने सबके कहने पर अपने सौतेले छोटे भाई को अपनी फैक्टरी में काम पर रखा था.
उसके बदले में उन्हें सुनना पड़ा- हमारे बच्चे से जानवरो के सामान काम लेता है। उसकी कमाई पर ऐश कर रहा है.
इन कड़वे शब्दों के कारण उसमे अब उसके बेटे को अपने कारखाने में नौकरी पर रखने की हिम्मत नही हुई। अब उसमे जवानी के सामान जोश भी नही रहा था। उसको समाज का भय भी सताने लगा था। क्योंकि पारिवारिक सदस्यों से काम करवाना बहुत मुश्किल होता है। आरम्भ में लोग काम पर लगाने के लिए गिड़गिड़ाते है बाद में वे ही सिर पर सवार हो जाते है। उनके अंदर का शुक्राना एकदम ख़त्म हो जाता है। .
वे स्वय कहते -इतनी उम्र पाकर जीना बहुत दुखदायी हो जाता है।
जब सारे नाते -रिश्तेदार हमें छोड़कर जा रहे हो । उनका दर्द सहते हुए जिंदगी की शाम को गुजारना उनके लिए बहुत कष्टप्रद हो गया था। लेकिन उन्होंने हिम्मत का दामन नही छोड़ा था। वे अभी भी अपनी फैक्ट्री सुबह जाते थे। उनके लिए जीने का मतलब काम था। इस उम्र में भी वे अपने काम स्वय करते थे। उनसे यदि कोई किसी भी तरह की मदद चाहता तो वे उसकी भरपूर मदद करने के लिए तैयार रहते थे।
उन्होंने अपने सौतेले भाई -बहनो की भरपूर मदद की। उनका छोटा भाई अपनी जिम्मेदारी पूरी किये बिना इस दुनियाँ से चला गया था। उसके घर में जीवन -यापन के साधन नही थे। उनके तीन बच्चे पिता की गैर मौजूदगी में अपने को बेसहारा महसूस कर रहे थे। उन्होंने भाई की अंतिम क्रिया का सारा खर्च खुद वहन किया। इसके आलावा उन्होंने उसकी बेटी की शादी में भारी रकम खर्च की।
उन्होंने उस समय कहा- अब मै बूढ़ा हो चुका हूँ। इससे ज्यादा मेरी हैसियत नही है। मुझपर अपने बेटे के परिवार की भी जिम्मेदारी आ पड़ी है।जब मुझे कन्धा देने का समय आया तो उनको मुझे कन्धा देना पड़ा।जिसमे में अपने बुढ़ापे का सहारा तलाश रहा था। इससे बढ़कर एक इंसान की लाचारी और क्या हो सकती है। अब मुझ बूढ़े के कंधे कमजोर हो चुके है।
उन्होंने उस परिवार की मदद करने के लिए ओरो को विवश किया। उनके कारण उनका परिवार जिम्मेदारी उठाने के काबिल बन पाया।
लेकिन उनका भतीजा जिम्मेदार नही बन सका। वह मन लगा कर कोई काम नही कर पाता था। जिसके कारण उसके परिवार का साथ अभावो ने नही छोड़ा। भतीजे की शादी करवा दी। इस उम्मीद में कि वह अब मन लगा कर काम करेगा। उसका मन कभी भी पढ़ाई या मेहनत करने में नही लगता था।
वे जिससे भी उसके बारे में बात करते। उसका जबाब यही रहता -आपके कहने पर हमने उसे काम पर रख लिया है। लेकिन वह किसी काम को जिम्मेदारी से निभाने की जगह लापरवाही करता है। आपका लिहाज करके हम उसे काम से नही निकाल रहे। लेकिन उससे किसी काम की उम्मीद करना बेकार है। उसे रखना हाथी पालने जैसा है। उनके शब्दों को सुनकर वेद चुप हो जाते।
वेद के जीवन में काम करने वाले व्यक्ति नही आये। बल्कि सभी दुसरो के पैसो पर ऐश करने को, जीवन का ध्येय समझने थे । वेद जितने मेहनती थे इतने उनके साथ वाले लोग नही हुए। उन्हें इस बात का अफ़सोस रहा।
आपको लग रहा होगा। वेद ने उन्हें अपनी फैक्टरी में काम क्यों नही दिया। आपको पता होगा। शुरू में जब वेद ने जवानी में फैवट्री लगायी थी तब उन्होंने सबके कहने पर अपने सौतेले छोटे भाई को अपनी फैक्टरी में काम पर रखा था.
उसके बदले में उन्हें सुनना पड़ा- हमारे बच्चे से जानवरो के सामान काम लेता है। उसकी कमाई पर ऐश कर रहा है.
इन कड़वे शब्दों के कारण उसमे अब उसके बेटे को अपने कारखाने में नौकरी पर रखने की हिम्मत नही हुई। अब उसमे जवानी के सामान जोश भी नही रहा था। उसको समाज का भय भी सताने लगा था। क्योंकि पारिवारिक सदस्यों से काम करवाना बहुत मुश्किल होता है। आरम्भ में लोग काम पर लगाने के लिए गिड़गिड़ाते है बाद में वे ही सिर पर सवार हो जाते है। उनके अंदर का शुक्राना एकदम ख़त्म हो जाता है। .
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