#lambi behoshi

       वेद ने जयपुर में नया काम शुरू कर दिया। वहाँ  पर अभी ज्यादा मुनाफा नही हो रहा था। लेकिन काम की लागत बसूल होने लगी थी। आरम्भ में लागत और मेहनत  ही निकल आए यही बहुत था।  कई दिन तक वेद जयपुर में रहने लगे। वहाँ  रहना उनके लिए मुश्किल नही था। लेकिन बस का इतना लम्बा सफर वेद अब सहन करने की हालत में नही थे। उन्हें खुद नही पता चलता था वह कितने समय काम करने की हालत में होते है। या  कब बेहोश हो जाये और कितने समय तक बेहोशी की हालत में रहे।
      वेद की चिंताजनक हालत देख कर नरेश ने कहा -बाबा आप चिंता मत कीजिये मै जयपुर का काम संभाल लूँगा। आपने जयपुर के काम में बहुत मेहनत कर ली है। अब मै इस काम की जिम्मेदारी सँभालने लायक हो गया हूँ। जहाँ मुझे परेशानी होगी। मै  आपकी मदद ले लिया करुँगा।
      वेद का अपने शरीर पर नियंत्रण ख़त्म होने लगा था। वे अपने शरीर के कारण परेशान रहने लगे थे। लेकिन अपनी परेशानी का कारण उन्हें खुद समझ नही आता  था। वह मन से आज भी काम करने के लिए तैयार थे। वे इस कमजोरी का कारण डॉ से पूछते लेकिन डॉ उनको संतुष्टि दे सकने लायक जबाब नही दे पाते  थे।
     वेद ने हालत से समझोता करके दिल्ली का काम सम्भालना फिर से शुरू कर दिया। यहाँ  उन्हें ज्यादा दिक्क़त  नही आती  थी। वे जब स्वस्थ होते थे खुद फैक्टरी पहुँच  जाते थे। बीमारी की हालत में उनका हेल्पर उन्हें घर से ले जाता था। लेकिन उन्हें घर में रहकर आराम करना बिलकुल पसंद नही था।
     वे अपनी उम्र से ज्यादा काम करते थे। एक बार वे चलते -चलते कई किलोमीटर का सफर पैदल  चल कर आये।  उन्हें इतना पैदल चलते हुए पता नही चला। लेकिन घर पहुँचने  के बाद उनकी तबियत ख़राब होने लगी। उस समय नरेश घर नही था। उन्हें ऐसे में चिंता सताने लगी। जब नरेश घर आएगा। यदि मै  बेहोश हो गया तब उसके लिए दरवाजा कैसे खुलेगा।  उनका अपने शरीर पर से नियंत्रण ख़त्म होने लगा था।
      उन्होंने ऐसे में नरेश को फोन करने की अपेक्षा अपनी बेटी को फोन करके सारे  हालत बताये। अब उसने नरेश को जल्दी घर पहुंचने  की हिदायत दी।
     नरेश को पहले तो बहुत गुस्सा आया। लेकिन वक्त की नजाकत समझते हुए घर पहुँच  गया। वेद ने  घर  पहुँचने  पर नरेश के लिए दरवाजा खोल दिया। उसके बाद वह बेहोश हो गए।
      नरेश ने उनका ध्यान रखा। डॉ को बुलाया लेकिन डॉ उनकी सेहत को लेकर संतुष्टि दायक जबाब नही दे सका। उनको कई दिन तक अपने शरीर का ध्यान नही था। वे कोई जबाब सही नही दे पा  रहे थे। उनकी हालत अर्धबेहोशी की थी।
      दो दिन बाद उन्हें अस्पताल पहुँचाया  गया। लेकिन 6  दिन तक वे इसी हालत में रहे। 7  दिन बाद वे सामान्य हालत में पहुंचे। जब वे होश में आ  गए। तब उस समय का जब उनसे जिक्र किया तो उन्हें कुछ भी पता नही था। उस  तंद्रा का क्या नाम दिया जाये। उन्हें इस बीच के समय का कुछ भी आभास नही था। 

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