#sapno ki udan

    जब  मुझे पहली बार हवाई जहाज  में सफर करने का मौका मिला तो मुझे एक बार तो लगा जैसे मै  सपनो की दुनिया में पहुंच गयी हूँ।  टी 3  से जाना एक नए सफर तक पहुँचने  का पहला पायदान था। उसमे समय काफी लगा लेकिन उसकी सुंदरता निहारने में समय का आभास ही नही हुआ। सब कुछ नए तरीके से बनाया गया था। उसकी रचनात्मकता मन को लुभा रही थी।  सब कुछ इंसान की सोच ने बदल दिया था। उसकी चकाचोंध ने मुझे चौंका दिया था।
       ये टर्मिनल अंतर्राष्टीय स्तर का बन गया है। यहाँ किस तरह चल कर कब जहाज में पहुँच  गए ये पता ही नही चला।  वहाँ  बैठने के बाद हमें एहसास हुआ हम जहाज के अंदर पहुँच  चुके है।  यहाँ पर सीडियो से चढ़ने का तरीका ही ख़त्म कर दिया गया है।  पहली बार अंदर जाने का अहसास ही नही हुआ। इस कारण डर  या घबराहट भी नही हुई।
        हम जिस एयरलाइंस  की तरफ से जहाज  में गए थे उन्होंने हमें पहली बार सफर कर रहे है।  इसका एहसास नही होने दिया । बेल्ट बांधने  का तरीका और सारी  बाते  आसान तरीके से शब्दों और विडिओ क्लिप के द्वारा समझाई।  परिचारिका ने सभी छोटे -मोटे कार्य खुद सम्पादित कर दिए। हम उन्हें मूक दर्शक की भांति देखते रहे। वहाँ  शब्दों का प्रयोग बहुत कम लोग कर रहे  थे  जो लोग परस्पर बाते कर रहे थे वे भी फुसफुसाहट मात्र थी।
     काफी समय तक जहाज जमीं पर  घूमता रहा। हमें समझ नही आ  रहा था क्या इसे भी ट्रेन के सामान सिग्नल मिलने का  इंतजार है  जो चारो और चककर  लगा रहा है।  हमारे इंतजार  के पल ख़त्म हुए और जहाज आकाश में उड़ने लगा।  धीरे -धीरे धरती हमसे दूर होने लगी। दूर तक फैली हरियाली सिकुड़ने और धुंधली पड़ने लगी।  मेरा सारा ध्यान  बाहर देखने में लगा था। में हर पल को आँखों में समेट  लेना चाहती थी।  में सारे  दृश्यों को अपने सामने साकार होते  देख रही थी  . धरती आँखों के सामने से गायब हो गयी तब  मेने ऊपर और अंदर की तरफ रुख किया। हमारे आलावा लोग अपने काम में लगे हुए थे मै  ही बाहर एकटक देख रही थी।
     जहाज के अंदर हर सीट के सामने स्क्रीन लगी थी। जिस पर हम मन पसंद फिल्म देख सकते थे। मेने अपने सामने की  स्क्रीन स्टार्ट करने की कोशिश की तो वह शुरू नही हुई।  मेने अपने साथ वाली सीट पर चलने वाली फिल्म देखने की कोशिश करने लगी।  लेकिन उस पर बाहर खिड़की से रौशनी पड  रही थी जिसके कारण  वह सही नही दिखाई दे रही थी। इस कारण मेरा सारा धयान फिर से बाहर चला गया।
     हमारा जहाज बादलो  के बीच में था। बादल  हमारे ऊपर  और नीचे  थे। मेने हमेशा बादलो  को नीचे  से देखा था इसलिए उनकी परतो  की कल्पना इससे पहले मेने नही की थी। बादलो  को छोटे -बड़े पहाड़ो के रूप में देखकर में  हैरान हो रही थी।  काले -सफ़ेद और स्लेटी रंग के बादलो  के बीच का सफर मुझे हैरानी में डाल  रहा था।  उनके बड़े और छोटे आकर साफ पता चल रहे थे। सफ़ेद के अनेक शेडो के कारण बादल पर्वतो के आकर में दिखाई दे रहे थे.काफी देर तक बाहर का माहौल  मुझे अपनी तरफ आकर्षित नही कर सका।
     .बादलो  के बाद मेरा ध्यान जहाज के विंग्स पर गया वे मुझे अपनी सीट से साफ दिखाई दे रहे थे। वैसे तो मुझे सफर पता नही चल  रहा था। लेकिन विंग्स के कारण मुझे उड़ने का पता चल रहा था। उन्हें देख कर  घबराहट हो रही थी,चककर  आने लगते थे। किसी और को मेरे डर  का पता ना  चले इसलिए मै  अपने डर  को छिपाने की कोशिश कर रही थी.
       इस बीच परिचारिका हमारे लिए नाश्ते का सामान ले आई। उनकी पोशाक  और उनका काम करने का तरीका मुझे  उनकी तरफ देखने के लिए मजबूर कर रहा था। सब कुछ बेआवाज और शांति से हो रहा था। ऐसे माहौल  में हमें भी अपने बात करने का तरीका बदलना पड़  रहा था। हमारा सफर दो घंटे का था। लेकिन इस बीच किसी को  आपस में बात न करते देखना मुझे असमंजस में डाल  रहा था। हम जैसे लोग आधे घंटे में पड़ोसी से दोस्ती कर लेते है। ऐसे में हमसे चुप रहना असहनीय हो रहा था। इस कारण कभी जहाज से बाहर तो कभी जहाज के अंदर निहार कर हम अपना समय गुजार  रहे थे। कभी साथ वाली स्क्रीन पर फिल्म देख लेते थे।  धुंधली और बिना आवाज की फिल्म समझने में काफी परेशानी हो रही थी इस कारण उसमे मन लगाना भी मुश्किल हो रहा था। .
       हमारा सफर ख़त्म हुआ हमें बेल्ट बांधने  का आदेश हुआ। उसके बाद हमारा जहाज नीचे  उतरने लगा। अब हमें डर  लग रहा था जिस एयरपोर्ट पर हम उत्तर रहे थे उस  पर कुछ समय पहले जहाज फिसल गया था। ये खबर हमे डरा रही थी। हम भगवान  का नाम जप रहे थे कुछ अनहोनी नही होनी चाहिए। धीरे -धीरे जहाज नीचे  आकर रुक गया। हमें पता ही नही चला। कोई धक्का नही लगा। हमें लगा इन्होने फालतू में हमें बेल्ट बाँधने  के लिए कहा था इसकी तो जरूरत नही थी।
     यहाँ  पर जहाज से उतरने के लिए सीडिया लगी हुई थी। उनसे उत्तर कर हम अंदर आये।  य़े एयरपोर्ट बहुत छोटा था। हमारे सामने एक बस आकर रुकी उसमे पहले उतरने वाले लोग चढ़ गए। हम बाद में उतरे थे। इतने में बस लोगो को लेकर चली गयी। लेकिन यात्री बस के  वापस आने    का इंतजार करने के स्थान पर खुद ही एयरपोर्ट के अंदर आ  गए। हमें वह बहुत पास लगा. जैसे हमने सफर के बारे में सुना था उस तरह का डराने  वाला अहसास हमें कही नही हुआ।  हमें ऐसा लग रहा था मानो  हम स्वर्ग का एक चककर  लगा कर धरती पर आये  है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...