#sarkari chhutiya

        सरकार ने rh  छुटियाँ  7  से घटा कर २ कर दी है।  हर तरह के समुदायों की सरकारी छुटियो में हर साल इजाफा होता जा रहा हे। सरकारी छुटियाँ  हर समुदाय के लोगो के लिए उपयोगी नही होती है। हर प्रान्त के लोग अपने त्यौहार अलग मानते है. जैसे- मुस्लिम त्योहारो की छुटियाँ  हिन्दू समुदाय के लिए अनुपयोगी होती है। जैन  धर्म की छुटियो का उपयोग हर धर्म के लोग नही कर पाते।
      जबकि rh  छुटियो का उपयोग हर समुदाय अपने त्योहारो के हिसाब से रख सकता है।  हम अपने त्योहारो पर कार्यालय जाते है। लेकिन जिन त्योहारो को हम मनाते  नही उन छुटियो का उपयोग हम समझ नही पाते किस तरह से करे।
      लगभग  20  सरकारी छुटिया सरकार हर साल घोषित करती है। जिसका उपयोग हम घर में रह कर करते है। जिनकी हमें अधिक जरूरत नही होती। उन त्योहारो पर हम घर के काम निबटाने  या घूमने में प्रयोग  करते है। जबकि अपने समुदाय के त्योहारो पर किलसते रहते है। हमारे पास पूजा पाठ  ढंग से करने का समय नही होता है।
    सरकार को सरकारी छुटियाँ कम  कर देनी चाहिए उसके स्थान पर rh  की छुटियाँ  बड़ा देनी चाहिए। सरकारी छुटियो के बारे में कुछ समय पहले सुनने में आया था। पंद्रह अगस्त ,26 जनवरी ,२ अक्टूबर केवल सरकारी छुटियो के तहत मनाई जाये।
      20  छुटियाँ हर समुदाय अपने त्योहारो के हिसाब से मनाये तो सभी समुदाय के लोग खुश हो जायेंगे। छठ पूजा, ईद ,दीवाली जैसे त्यौहार लगभग तीन या तीन से अधिक दिन के होते है। सरकार इनपर एक दिन का सरकारी अवकाश घोषित करती है जिससे कोई भी समुदाय खुश नही होता।
       हमें त्यौहार पर कार्यालय जाना पड़ता है। में विद्यालय में काम करती हूँ। छुट्टी बचाने के चककर में हम आधा -अधूरा त्यौहार मना कर विद्यालय पहुंच जाते है। सभी अद्यापक छुट्टी बचाने के लिए पहुँच तो जाते है लेकिन हमारा कर्तव्य बच्चो से जुड़ा हुआ है। अधिकतर बच्चे विद्यालय में आते  ही नही है। जिन्हे पढ़ाने  के लिए हमारी छुट्टियाँ कम की जाती है। हम उस दिन अपने कर्तव्य का पालन करने  के स्थान पर खाली  बैठ  कर आ  जाते है। जैसे अक्टूबर ,नबंबर के महीने में बच्चो की उपस्थिति बहुत कम  रही। जिसके कारण अद्यापन कार्य नही हो सका।
      वोट बैंक बढ़ाने की खातिर सरकार इन्हे घोषित तो कर देती है। लेकिन ये ख़ुशी उस समुदाय के लिए आधी -अधूरी होती है। हमारी तरह हर समुदाय के लोग दूसरे धर्म की छुटियो पर ख़ुशी नही मनाते। लेकिन अपने धर्म की छुटियो पर सरकार को बुरा जरूर कहते है।
    आज भी संयुक्त परिवार में रहने वाले लोगो को सुनना पड़ता है- काम से बचने के लिए नौकरी का बहाना  बना रही है.
       हमारे व्यवसाय में अधिकतर अद्यापिकाए सुबह 4  बजे उठ कर काम करके जाती है। ये हमारा रोज का काम होता है। जबकि त्योहारो पर काम बढ़  जाता है। ऐसे में आप खुद सोचिये यदि सुबह के समय सही तरह से त्यौहार मना कर जाये तो हमें कितने बजे जगना पड़ेगा। हमारे लिए त्यौहार मजा कम सजा अधिक बन रहे है। आप ही बताओ सरकार की दयानतदारी किसे  खुश कर रही है।   

#kshmiri pandit

     कश्मीर से जब हिन्दुओ को राज्य छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। तब किसी ने पुरुस्कार वापस क्यों नही किये थे। पांच लाख हिन्दुओ ने किन परिस्थितियों में कश्मीर छोड़ा होगा  जरा उसकी कल्पना करके देखो।
     आप शायद उन परिश्थितियो की कल्पना नही कर पा  रहे होंगे। एक साथ पांच लाख की संख्या किस तरह से अपना राज्य रातो -रात छोड़ती है।  उस वक्त आप उसका दर्द नही समझ पाये होंगे। वहाँ  के हिन्दू पिता के सामने उनके बेटो को मौत के घाट उतार  दिया जाता था। उसके मांस को परिवार वालो को खाने के लिए मजबूर किया जाता था। अपने अजीज को भोजन के रूप में एक हिन्दू के लिए खाना आप सोच सकते है कितना मुश्किल होता है।  उन दिनों कांग्रेस की सरकार थी इसलिए इस तरह की खबरों पर पाबंदी थी। अधिकतर लोग इन सबसे अनजान रहे।
        90  के दशक में लोगो के लिए हिन्दुओ का जीना  या मरना कोई मायने नही रखता था। कोई समाचार इस तरह की खबरों को छापता भी नही था। हिन्दुओ की औरतो को सरे आम उठा लिया जाता था आप उन औरतो  के साथ मुसलमान किस तरह का सलूक करते होंगे कल्पना करके देखो।
     यदि मुसलमानो के साथ हिन्दुओ जैसा व्यवहार हो रहा होता तो आपको लगता है ये बयानबाजी करने के लिए भारत में होते। आज एक भी कश्मीरी पंडित का बयान  किसी जगह सुनाया जाता है। मेने कही उनके दर्द को बयान करते हुए किसी नेता या बुद्धिजीवी को  नही  सुना है। सारे मुसलमानो को सर आँखों पर बिठाया जा रहा है। लेकिन उस पर ये भारतीयों के लिए कुफ्र बक रहे है। लेकिन भारतीय फिर भी इन पर कुर्बान हुए जा रहे है।
     1984  के दंगो में ३००० हजार सिक्खो का कत्लेआम किया गया। तब किसी ने अपने पुरुस्कार क्यों नही लौटाए।  भारत में रहने वाले केवल मुस्लिम लोगो का दर्द ही सबको द्रवीभूत करता है। किसी सिक्ख या कश्मीरी पंडित का दुःख कोई मायने नही रखता। उन्हें किसी तरह की सुविधा नही मिलती।
     उन्हे  अपने राज्य से निकाल  दिया गया है। इसलिए उन्हें शरणार्थी के फायदे भी नही मिल सकते क्योंकि शरणार्थी दूसरे देश से आये  हुए लोगो को समझा जाता है। उनकी समस्या का आकलन करने का अब तक कोई पैमाना तय ही नहीं किया गया है। जबकि ये समस्या कमसकम 25  साल से हमारे सामने खड़ी  है एक हिन्दू राष्ट्र में कश्मीरी  हिन्दुओ का दर्द कोई नही समझ रहा. हम असहिष्णु है  या मुसलमान जो कश्मीरी पंडितो के दर्द से अनजान है। 
       मोदी उनके कश्मीर में पहुँचाने की कोशिशे कर रहे है। कश्मीर के लोगो को मदद के रूप में हजारो करोड़ रूपये दिए जा रहे है लेकिन वहाँ की सरकार कोई कार्यवाही उन्हें लौटाने की नही कर रही लेकिन कोई उनकी तरफदारी करने के लिए तैयार नही है। जितनी  तरफदारी कर रहे हे वे केवल मुसलमानो के भले के लिए सोच रहे है। एक भी हिन्दू कश्मीरी पंडितो के लिए आवाज क्यों नही उठा रहा। जब हिन्दू ही कश्मीरी पंड़ितों के दर्द में उनका साथ नही  दे रहे तो आप किसी और धर्म के लोगो से कैसे मदद की उम्मीद कर सकते है। 

#ashishnu muslman

      आमिर खान और शाहरुख़ खान के बयानों  ने खलबली मचा दी है  .उनके शब्दों ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है। यदि भारतीय असहिष्णु होते तो ये मुसलमान सितारे अपने नाम के साथ इतनी बुलंदियों तक पहुंच सकते थे। उनके शब्दों की इतनी अहमियत होती। ये इतने अधिक अमीर  हो सकते थे। ये भारत छोड़ने की बात कर रहे होते या किसी और देश में रह रहे होते।
      जो लोग गर्मी होते ही विदेश चले जाते है। बारिश या घर की साफ -सफाई के समय में बड़े होटलों में रहने चले जाते है। वे असहिष्णु देश में कैसे रह सकते थे। उनके केवल शब्द ही उनके व्यवहार की  पोल खोल रहे है।
       आज ये किसी देश का नाम नही ले रहे कि हम इस देश में रहना चाहते है। क्योंकि भारत जैसा सहिष्णु देश इन्हे संसार में कही और नही मिलेगा। मुस्लिम देश अपनी कटटरता से दहक रहे है। वहाँ  रहने वाले लोग दूसरे देशो के शरणार्थी बनने के लिए ढेरो परेशानी उठा रहे है। अपने देश को छोड़ना आसान नही होता है। जिंदगी के आखिरी समय तक इंसान अपनी जमी छोड़ने के लिए तैयार नही होता बहुत जयादा मज़बूरी में ही इंसान शरणार्थी के रूप में पनाह लेता है।
       में तस्लीमा नसरीन के विचारो से प्रभावित हूँ - वह बांग्लादेशी है उसे भारत में शरण मिली हुई है। उसने शब्दों में कभी इस्लाम धर्म के बारे में कुछ गलत नही कहा है। बल्कि उसने अपने उपन्यास में एक पात्र के माध्यम से  इस्लाम धर्म के  ऊपर  कटाक्ष किया है जिसके एवज में उसे पुरे संसार में इधर से उधर जिंदगी के लिए भागना  पड़  रहा है.तमान देश उस की सुरक्षा  में लगे है कही उसे कोई मुस्लिम मार ने दे। अंतत वह अपने को भारत में महफूज समझ रही है।
    आज मुसलमान अपने आप को डरा हुआ महसूस कर रहा है।  पश्चिमी देश और   वहाँ के लोग मुसलमानो से सम्बन्ध रखने से डर  रहे है। एयरपोर्ट पर मुसलमानो की विशेष रूप से जाँच होती है। लोगो के लिए इस्लाम आतंक का दूसरा नाम बन गया है। उनके धर्म के नियम कानून उनकी असहिष्णुता लोगो और समाज को परेशानी में डाल  देती है। उनके कटटर होने से समाज को कितनी परेशानी होती है। उन्हें इसका अहसास नही होता है।

#nilesh ka badlata rup

      नीलेश के जाने के  बाद मीना  को सारी  रात  नींद  नही आई वह बेचैनी की हालत में सारी  रात  तड़पती रही। उसे भगवान  पर गुस्सा आ  रहा था। उसकी किस्मत में ये सब क्यों लिख दिया। जिसका बयान दुसरो के सामने करना घर की बर्बादी का कारण बन  जाता  न बताने पर घर की सारी मर्यादाये भंग  हो जाती।
       अगले दिन  सुबह उसके लिए रौशनी लेकर नही आई बल्कि और ज्यादा कालापन उसमे छिपा था। उसका अपनी ससुराल के लोगो से  अच्छे सम्बन्ध नही थे। इसलिए वह अपनी हालत किसी से साझा नही कर सकी उसका मन बहुत भारी हो रहा था इसलिए  उसने अपने मायके में अपनी माँ को इस बारे में जानकारी दी। मीना  के पिता की मृत्यु कुछ साल पहले हो चुकी थी। इसलिए उसे पिता का सहारा भी प्राप्त नही  हो  सकता था।
      मीना  की माँ हरप्यारी उसकी विपदा सुनते ही उसे सहारा देने के लिए उसके पास आ  गयी। हरप्यारी  इस बारे में सुनते ही सकते में आ  गयी थी। इस तरह की कल्पना करना भी सभी को पाप लगता है। इस सच्चाई को पचा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
     हमारे समाज में पुलिस के लोग भी ऐसे इंसान के प्रति निर्दयी हो जाते है। कोई भी नीलेश का लिहाज नही कर रहा था। पुलिस की यातनाओं ने उस पर से हवस का भूत उतार  दिया था। अब उसे अपनी गलती का अहसास हो गया  था। जो नीलेश मीना  के सामने हठधर्मी से अपने किये को उचित ठहरा रहा था। वही  पुलिस के सामने एकदम नकार गया। उसने सारा इल्जाम मीना  पर लगा दिया।
      पुलिस वालो ने  उसकी बात का यकीन करने से पहले उसकी दोनों बेटियो की जाँच करवाई। जिससे साफ हो गया। उसकी दोनों बेटियो का कौमार्य भंग  हो चुका  है। दोनों बेटियो के ब्यानो से भी बात की सच्चाई पता चल गयी थी।  दोनों बेटियो की उम्र बहुत कम  थी। इसलिए उन बेटियो को चालबाज भी पुलिस समझ नही सकी।
      नीलेश की तरफदारी करने के लिए कोई  रिश्तेदार तैयार नही था। नीलेश के सभी रिश्तेदार संभ्रांत थे। उनका कभी पुलिस वालो से वास्ता नही पड़ा था। इसलिए किसी के मन में उसके प्रति हमदर्दी पैदा नही हो रही थी।  वह पुलिस वालो की मिन्नते करता जिससे उसे अपने रिश्तेदारो को फोन करके अपने जेल में होने की बात बता सके।  उनसे मदद की गुहार लगाता तो वह पिघल कर उससे मिलने चले आये ।
      नीलेश की सारी  दबंगाई  अब खत्म हो गयी थी। वह उनसे कहता - मेरी पत्नी  चरित्रहीन है  वह बहुत लालची है। वह मेरे  मकान पर कब्ज़ा करना चाहती है। मेरी सारी  धन -दौलत  हड़प लेना चाहती है। इसलिए वह मुझ पर ऐसा गलीज इल्जाम लगा रही है..
     वह भूल जाता जिसकी बुराई वह कर रहा है। उसे इस परिवार में आये  हुए 22  साल बीत  गए है। इतने सालो में सबके गुण -दोषो का पता चल जाता है। किसी को समझने के लिए इतना लम्बा अरसा बहुत होता है। कोई भी औरत जो साधनहीन और लाचार है  अपने छोटे-छोटे पांच बच्चो के बाप पर झूठा इल्जाम लगाने से पहले 10  बार सोचेगी।
     यदि वह चरित्र हीन  होती तो  जब उसपर बाँझ होने का इल्जाम लगा कर परेशान किया जा रहा था। तभी किसी और से सम्बन्ध बना लेती लेकिन उसने चुपचाप सारे  दुःख सहते हुए इसी घर में रही। वह तो चरित्र हीन  होती तो कभी का घर छोड़ चुकी होती।  नीलेश के मीना  पर लगाये इल्जाम उसे निर्दोष साबित नही कर पा  रहे थे। बल्कि मीना  से ही लोग ज्यादा प्रभावित हो रहे थे। सब को मीना  पर दया आ  रही थी।  

#pita ki besharmi

      मीना  गुस्से के कारण तिलमिला रही थी। उसे समझ नही आ  रहा था। ऐसे में अपना गुस्सा किस पर उतारे। नीलेश रात  10  बजे घर लौटा। इतनी देर से वह जानबूझ कर घर आया था। उसने समझा अब तक सब सो गए होंगे। इतनी रात  में चुपचाप अपने कमरे में सो जायेगा।
      दरवाजा मीना  ने खोला। वह इस समय गुस्से से आगबबूला हो रही थी। उसका चेहरा लाल हो रहा था। नीलेश का  उसकी तरफ ज्यादा ध्यान नही था। वह सोच रहा था जैसे बड़ी बेटी के साथ के सम्बन्ध किसी को पता नही चले यह भी छिपा रहेगा।
      कमरे में पहुँचते ही मीना  ने उसपर प्रश्नो की बौछार शुरू कर दी। पहले तो नीलेश समझ नही पाया लेकिन कुछ समय बाद उसे अहसास हो गया उसका भांडा  फुट गया है। लेकिन उसे इस समय अपने किये पर कोई शर्मिंदगी महसूस नही हो रही थी। उसने सारा दोष शिखा और हेमा पर मढ़ने की कोशिश की।  मीना अब नीलेश के झांसे में आने वाली नही थी। उसका गुस्सा सीमाये तोड़ रहा था। नीलेश ने सारा दोष फिर मीना  पर भी मढ़ने की कोशिश की। लेकिन मीना  नीलेश को लानत भेजती रही। नीलेश ने फिर से ऐसा गलत काम करने से तौबा  नही की।
      उसने डंके की चोट पर कहा -मुझे ऐसा मौका मिलेगा तो वह फिर से यही सब करेगा।
      मीना  ने कहा -अब तक तुमने मुझे अंधकार में रखकर मेरी बेटियो का फायदा उठाया है। अब मै  ऐसा हरगिज नही होने दूंगी।
     नीलेश बोला -देखता हूँ। तू मुझे कैसे रोक पायेगी। अब ये सब तेरी मौजूदगी में करूँगा। देखता हूँ तू कैसे मुझे रोकती है।
     मीना  बोली -मै  तुम्हारे किये की पुलिस में रिपोर्ट कराऊंगी।
     नीलेश बोला - जरा सोच मेरे से ज्यादा तेरी बेटियो की बदनामी होगी। उनका घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जायेगा। बाहर लोगो में मेरे बारे में सब अच्छा सोचते है। तुझ पर कोई यकीन  नही करेगा। आज तक दो -दो बेटियो के साथ किसी बाप ने ऐसा नही किया। तेरी बातो पर किसी को विश्वास नही होगा।
     मीना  बोली -तुम मुझे कितना भी कहो। अब मै  अपनी मासूम बेटियो को इस तरह सिसकता नही देखूंगी।
    नीलेश फिर बेशर्मी से बोला -यदि तुम  मुझे पुलिस से  पकड़वा दोगी तब तुम्हारे घर का खर्चा  कैसे चलेगा।  तुम्हारा कौन हमदर्द पैसा देने आएगा। मै  ही पैसा देता हूँ इसी से ये गृहस्थी चलती है।
     मीना  बोली - सारी कमाई केवल तुम्हारी है मै  और बच्चे बाहर से काम लाकर के पैसा कमाते है। वह तो तुम्हे दिखाई नही देता। बहुत सारी कमाई करते हो जिसका हमें घमंड दिखा रहे हो।
      नीलेश बोला -मुझे पकड़वा देगी तो तेरा और तेरी बेटियो का बाहर निकलना मुश्किल हो जायेगा। उन्हें लगेगा इन लोगो में बचा ही क्या है। इस घर का अकेला मर्द हूँ  मर्द के बिना सारे  लोग तुम पर खूंखार जानवरो की तरह टूट पड़ेंगे। मुह छुपाने के लिए भी कोई कोना ढूंढे नही मिलेगा।  ये सब तुम्हे अपनी हवस का शिकार बना लेंगे।
       मीना  उस समय बहुत गुस्से में थी। नीलेश की दलीले उसे रोक नही सकी। वह उसी समय घर से बाहर निकल गयी। उसे खुद पता नही था वह कहाँ  जा रही है। वह विचारो में खोये हुए कब पुलिस स्टेशन पहुंच गयी। उसने fir  पति के खिलाफ दर्ज करा दी।
       वह पुलिस के साथ अपने घर आई। उसने दरवाजा खटखटाया। नीलेश ने दरवाजा खोला -पुलिस को देखकर नीलेश को झटका लगा। वह इत्मीनान से सोया पड़ा था। उसे बिलकुल उम्मीद नही थी। मीना  पुलिस को बुला लाएगी।
     उसी हालत में पुलिस नीलेश को पकड़कर थाने  ले गयी। 

#ma ki laparvahi

     नीलेश और हेमा का सच अभी तक किसी के सामने नही आया था। इसलिए नीलेश अपने गलत व्यवहार को भूल गया था। उसे इसके लिए शर्मिंदगी का अहसास भी अब नही रहा था।  वह अब अपनी जरूरत के लिए पत्नी के आलावा हेमा का इस्तेमाल भी करता था।
    नीलेश के अंदर अभी भी हवस पूरी नही हो पाती  थी। इसके आलावा भी उसका ध्यान इधर -उधर घूमता रहता था। उसकी पहुंच में अभी तक कोई बाहर की लड़की नही आई थी। उसका मन मीना  और हेमा से ऊबने लगा था।
      हमारे समाज में लोग अपनी इस जरूरत का इजहार इतनी आसानी से नही कर पाते इसलिए नीलेश हर समय इन्ही ख्यालो में खोया रहता। उसे फिर से एक कमसिन सी नाजुक लड़की का ख्याल सताने लगा। अब हेमा 12  साल की हो गयी थी। उसे इसकी आदत पड़  गयी थी। इसलिए नीलेश को हेमा के साथ मजा आना बंद हो गया था।
        नीलेश का ध्यान अब अपनी 10  साल की बेटी शिखा की तरफ आकर्षित हो गया। वह उसे अनेक तरह से फुसलाने की कोशिश करने लगा। लेकिन हेमा बड़ी होने के कारण पिता के व्यवहार का मतलब समझने लगी थी। अब हेमा को नीलेश के व्यवहार के मायने भी समझ में आने लगे थे।  वह अधिकतर नीलेश के काम खुद कर देती थी। वह शिखा को पिता के पास अकेले रहने नही देती थी कोई ना कोई बहाना  बना कर उसे वहाँ  से ले जाती थी।
     हेमा कब तक पिता की नापाक हरकतों से शिखा को बचा सकती थी। एक दिन हेमा और मीना  दोनों घर में नही थी उस दिन नीलेश के मनसूबे पुरे हो गए। अबकी बार उसके अंदर डर  और शर्मिंदगी का अहसास भी पैदा नही हुआ।
      शिखा  हेमा की तरह डरपोक और सहमी हुई लड़की नही थी।  शाम को जब मीना  घर आई तो उसने शिखा के बारे में पूछा तब उसे पता चला शिखा ऊपर कमरे में है। उसने शिखा को जोर से नीचे आने के लिए आवाज लगाई लेकिन शिखा नीचे  नही उतरी। हेमा लाया हुआ सामान सही जगह पर रखने में लग गयी इतने में नीलेश काम के बहाने से बाहर चला गया।   नीलेश के घर से बाहर जाने पर मीना काम खत्म करके ऊपर शिखा के पास पहुंची।
  शिखा की  हालत देखकर   माँ ने उससे इतना निढाल होने का कारण पूछा तो वह जबाब देते हुए  रोने लगी। मीना  के तसल्ली देने पर शिखा ने माँ के सामने सारा दुःख बयान कर दिया । जिसे सुन कर मीना सन्न रह गई। उसकी आवाज तक गायब हो गयी। उसने अपना माथा पकड़ लिया।
     औरते  अपना दुखड़ा पति के सामने सुना कर अपना मन हल्का कर लेती है। जिसने ऐसा कुकर्म किया हो  उसके परिवार को आड़े  हाथो लेती है। पूरे मुहल्ले में ऐसा बेटा पैदा करने पर लानत भेजती है।
       ऐसी हालत में मीना को समझ नही आ  रहा था। अब वह क्या करे। इसकी फरियाद किससे  करे। बेटी के साथ यदि कोई बाहर का इंसान गलत करता है तो पति के सामने बयान किया जा सकता है लेकिन पति ही अपनी बेटी के साथ ऐसा करे तो वह किसी से कैसे कहे। उसे कुछ भी समझ नही आ  रहा था।
      कुछ समय बाद मीना  को सारे  हालात  समझ में आये  तो वह रोने लगी शिखा को गालियाँ  देते हुए कोसने लगी.अपनी जिंदगी पर लानत भेजने लगी।
      अपनी कोख को गाली  देते हुए कहने लगी-तुम किसलिए पैदा हुई। यदि तुम्हारी जगह बेटा  पहले ही पैदा हो गया होता तो ये दिन ना  देखने पड़ते।
      शिखा और मीना  को रोते  देख कर हेमा भी रोने लगी। कुछ समय बाद मीना  ने अपने आप को संभाल  लिया। वह शिखा को तसल्ली देने लगी। शिखा उसकी सहानुभूति पाकर चुप हो गयी।
      कुछ समय बाद  मीना  का ध्यान हेमा की तरफ गया। उसने उससे रोने का कारण पूछा। उसका जबाब सुन कर वह दंग  रह गयी।   उसने इस बात की कल्पना भी नही की थी। उसके जीते जी उसका पति अपनी बेटियो के साथ ऐसा करेगा।
     मीना  को अपनी लापरवाही पर बहुत गुस्सा आ  रहा था। काम के बोझ के कारण वह अपनी  बेटियो का दर्द ना  जान सकी। वह अपनी बेटियो की माँ के स्थान पर उनके अंदर दहशत का पर्याय बन गयी थी। यदि वह सतर्क होती शुरू से बेटियो की भावनाओ को हमदर्दी के साथ समझने की कोशिश करती तो नीलेश को इस तरह से बेटियो का फायदा उठाने का मौका भी नही मिलता।" अब पछताए होत  क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत। "
     लेकिन अब मै  अपनी बेटियो के साथ ऐसा किसी हालत में नही होने दूंगी। नीलेश को उसके कृत्य की सजा दिला  कर रहूँगी। उसने इसका प्रण  कर लिया। यदि नीलेश को अभी नही रोका  गया तो वह किसी  भी बेटी को अपनी हवस का शिकार बनाये बिना नही छोड़ेगा। 

#maryadao ka ullanghan

      मीना  की सुंदरता में कोई कमी नही थी। वह स्वस्थ थी उसे किसी तरह की बीमारी भी नही थी। उसकी सुंदरता की लोग अक्सर तारीफ करते थे। उसके जैसी सुंदर औरते आसपास आसानी से दिखाई नही देती।  मीना  के चरित्र में कोई खोट नही निकाल  सकता था। वह पूरी तरह परिवार के प्रति समर्पित औरत थी।                 जबकि नीलेश आदमियो के गुणों के  मापदंड पर खरा नही उतरता था। नीलेश का कद छोटा था। उसके बातचीत करने ,उठने बैठने,के तरीके से उसकी तरफ किसी का ध्यान नही जा सकता था। मीना जैसी सुंदर औरत से शादी उसके गुणों के कारण नही बल्कि बाप की बदौलत हो गयी थी। उसकी कमाई भी कम थी।
      उसके साथ मीना  जैसी औरत ही निभा सकती थी। वह मीना  के गुणों का सम्मान करने  की जगह कुंठित होता चला गया। उसकी अंतर्मुखी घुटन अपना वर्चस्व किसी और औरत  पर दिखा नही सकी । उसने दूसरी औरतो की तरफ कदम बढ़ाये लेकिन कोई औरत उसके झांसे में नही आई।
       उसने घर में अपनी इच्छा पूरी कर ली। मर्यादाओ का ध्यान रखने के बारे में सोचने की जगह सिर्फ अपना स्वार्थ साधने में अपनी ताकत लगा दी। मन ही मन  वह  अपने किये पर शर्मिंदा हुआ उसे डर  भी लगा।उसकी हवस ने अच्छे -बुरे के अहसास पर पर्दा डाल दिया। 
       जब उसकी पोल नही खुली तो उसके अंदर का डर  भी ख़त्म हो गया। मीना  पति की सभी जरूरते पूरी करने में  समर्थ थी।  उसके द्वारा कभी नखड़े दिखाने की नौबत नही आती  थी। वह हर तरह से पति का सहयोग करती थी। मीना घर के कामो के आलावा पति के साथ आर्थिक मोर्चा भी सभाल रही थी उसके बाबजूद उसके पति का मन स्थिर ना  रह सका।
      नीलेश की कुंठा उसे इतना जघन्य काम करने से रोक ना  सकी। नीलेश पैसा कमाने के बारे में कम सोचता था। उसका सारा ध्यान इसी तरफ रहता था। इसलिए वह पिता की मर्यादा नही निभा सका। जब नीलेश का कृत्य किसी के सामने नही आया तो उसका भय खुल गया। अब वह पत्नी के साथ -साथ बेटी के साथ भी अपनी हवस पूरी करने लगा।
     ये सारा व्यापर कई सालो तक चलता रहा। हेमा इस विषय पर किसी से बात नही कर सकी।  उसे इस बारे में पता ही नही चल सका जो उसके साथ हो रहा है। वह नही होना चाहिए। उसके अंदर का डर भी इसका एक कारण था। 

#andh vishvas

     मीना  के लिए जिंदगी में आराम नही रहा था। अब वह अपने बच्चो से भी मदद की उम्मीद करने लगी थी। बच्चो को सँभालने में उसकी बड़ी बेटी हेमा मदद करने लगी थी। लेकिन अभी वह भी छोटी थी।  वह  माँ की मदद करने की भरसक कोशिश करती लेकिन छोटी होने के कारण उससे काम में गलती हो जाती। उसकी गलती का कारण मीना  समझ नही पाती। वह सोचती काम ना  करना पड़े इसलिए जानबूझकर काम को गलत कर देती है। काम के बड़े हुए बोझ के कारण मीना हेमा को समझ नही पाती  थी। उसकी गलती पर वह अपना सारा गुस्सा उस पर उतार  देती थी। मीना उसके मनोदगार को समझने में असफल रहती थी या समझना ही नही चाहती थी.हेमा  अब माँ का सामना करने से बचने लगी थी। क्योंकि काम के अतिरिक्त बोझ के कारण मीना हेमा पर आये  दिन अपना गुस्सा निकालती रहती थी।
       हेमा का अपनी माँ से भरोसा उठ गया था। वह अपने मन की बात हेमा से कह नही पाती  थी। जो थोड़ा बहुत भरोसा था वह उसका केवल अपने पिता पर था। बाकि सारे  भाई -बहन उससे छोटे थे वह अपने मन की बात किसी को बता नही पाती थी। उसके मन में  उठा हुआ गुबार उसे परेशान करता रहता था।
    एक दिन मीना  बाजार गयी हुई  थी.
        हेमा का मन नही लग रहा था वह उदास थी।  उसकी सहेली से उसका झगड़ा हो गया था।  उसे उदास देखकर नीलेश उसे ऊपर कमरे में ले गया। वह अपने पिता के साथ चली गयी। नीलेश उसको प्यार से समझाने  लगा। हेमा अपने पिता से अपने मन की  बात कहने से गुरेज नही करती थी। उसे नीलेश पर भरोसा था। मीना बच्चो के मामले में नीलेश पर पूरा भरोसा करती थी। इसलिए वह बच्चो को छोड़कर बाजार से सामान   लेने  चली गयी। उसका भी हर समय घर में काम करते रहने  से मन  ऊबने लगा  था। इस बहाने वह बाजार का काम करके आती  थी और उसका मन भी बहल जाता था।
       नीलेश हेमा को तसल्ली देते हुए उसके शरीर पर हाथ फेर रहा था। उसके हाथ कब सीमा का उल्लंघन कर गए हेमा को अहसास नही हुआ। वह अभी केवल 10  साल की थी उसके लिए पिता और अन्य इंसान के गलत व्यवहार का अंतर कर पाना   बहुत कठिन था। उसे दुनियाँ  की समझ नही थी.उसका वास्ता अभी पुरुष के रूप में केवल पिता से पड़ा  था। बचपन से जिसका मुख देखकर वह बड़ी हुई थी। उसके व्यवहार में आये अंतर को वह समझ  नही सकी।
     जो कुछ उसके साथ हो चूका था। उसे समझ नही आ  रहा था। यह क्या था वह इतनी तकलीफ सहन नही कर पा  रही  थी वह रोने लगी। उसकी हालत बहुत ख़राब  हो रही थी। उससे उठा नही जा रहा था।
       उसके पिता नीलेश ने उसे समझाने की कोशिश की। उसे कई तरह से दिलासा दिया। उसे उपहार में उसकी पसंद की चीजे लाकर देने का वादा किया। हेमा नासमझ होने के कारण समझ ना  सकी कि  उसके साथ कुछ गलत हुआ है।
   बचपन से नीलेश हेमा की देखभाल करता आया था। इसलिए उसने इसे भी पिता के काम का हिस्सा समझ कर स्वीकार कर लिया।हेमा के लिए मीना  डर  का दूसरा नाम था। इसलिए उसने इस वाकया का उससे जिक्र नही किया।
     नीलेश हेमा की तकलीफ समझ गया था। उसने हेमा को ऊपर  आराम करने के लिए कह दिया। हेमा के वापस आने पर नीलेश ने उसे मीना की तबियत ख़राब होने की बात कह दी। हेमा को नीलेश की बातो पर यकीन  आ गया।
      उसने कहा -तुम हेमा का ध्यान रखना। मुझे बहुत काम करने है।
     मीना को सपने में भी इस बात का विचार नही आ  सका हेमा के साथ कुछ गलत हुआ है। 

#mahar

      रिश्तो की डोर बहुत कमजोर हो गयी है। रिश्ते आज के समय में केवल स्वार्थ तक सिमित रह गए है। जिन रिश्तो को समाज के सामने ढाल  समझा जाता था। आज वही  रिश्ते जिंदगी को शर्मसार कर रहे है। ऐसे  ही  एक वाकया मेंरे  सामने आया जिसे सुनकर में   हैरान  रह गयी।
        मेरे घर के सामने   एक परिवार रहता था। उनके घर  शादी के १० साल तक कोई बच्चा नही हुआ। उनकी पत्नी को सबने बाँझ करार दे दिया। उसका अनेक तरह से लोग मजाक बनाया करते थे।  वह घुट -घुट कर जीवन जी रही थी।
     अचानक १० साल बाद उस घर में बच्चे की किलकारी सुनाई दी। उनकी  बर्षो पुरानी  तमन्ना   पूरी हो   गयी  . उनके  दिन -रात  हर तरफ खुशियाँ  छा  गयी।  दो साल बाद उनके घर फिर से एक नन्ही कली आई।
        उनके ससुर जी ने सोचा -आजकल के बच्चे दो के बाद और बच्चे नही बुलाते। अब अगला बच्चा शायद ये न बुलाये उन्होंने बच्चे का बड़ा उत्सब मनाया।
       दो बेटियाँ होने के बाद  अब उनके मन में बेटे की आस जागी। उन्होंने तीसरा बच्चा बुलाया वह भी लड़की पैदा हो गयी। बेटे की इच्छा के कारण उनके घर चार बेटियाँ  आ  गयी चारो बेटियाँ बहुत सुंदर और स्वस्थ  थी। यदि ये लड़कियाँ  किसी और घर में पैदा हुई होती तो उनका जीवन संवर जाता लेकिन उस घर में उन लड़कियों की देखभाल करने के साधन सीमित  होने के बाबजूद उनके मन में बेटे की इच्छा बलबती होती  जा रही थी। उन्होंने 5  वी  बार बहुत पूजा -पाठ की ज्योतिषियों के अनुसार बताये गए सारे अनुष्ठान पुरे किये अंतत भगवान ने उनकी मनोकामना पूरी कर दी। उनके घर में एक सुंदर सा बेटा पैदा हो गया।
     मीना  और सुरेश के घर सीमित  आमदनी में घर का गुजारा  चलाना मुश्किल था। ऐसे में मीना  बाहर फैक्टरी से काम लाकर घर में करने लगी। पांच बच्चो का घर और बाहर का काम, उस पर फैक्टरी का काम उसे सारे काम पूरे करने के लिए पति नीलेश की मदद लेनी पड़ती थी।
      पहले समय में बच्चो के काम औरते अकेली निबटा लेती थी। लेकिन नाजुक सी मीना इतनी सारी जिम्मेदारी निवटाने में असमर्थ थी। उसकी बड़ी बेटी इस बीच 10  साल की हो गयी। इतना समय कैसे गुजर गया मीना को आभास ही नही हुआ।
      इन 20  सालो में मीना के ससुर की मृत्यु  हो गयी। उन्होंने पुराना ससुर जी का मकान बेचकर दूसरा  मकान  दूसरी जगह ले लिया। वह मकान पहले से छोटा लेकिन  दो मंजिला  था। अब दोनों मंजिलो में मीना का परिवार रहने लगा। पहले एक मंजिले मकान में उसका पूरा परिवार उसके सामने रहता था। लेकिन घर बड़ा होने के कारण वह पुरे घर का ध्यान नही रख पाती  थी। उसके बच्चे बड़े होने के कारण सारे बच्चे उसकी निगाहो के सामने नही रह पाते  थे।
      उसके पास बहुत अधिक काम रहने के कारण वह हर समय काम में लगी रहती थी। अब उसे इतने बड़े परिवार की जिम्मेदारी मुसीबत लगने लगी थी। इतने कामो के बीच उसके अंदर की कोमलता और मधुरता ख़त्म हो गयी थी  लेकिन ये सारा संसार उसी का फैलाया हुआ था वह किसी को दोष भी नही दे सकती थी। उसकी परेशानी कोई समझ ही नही पाता था।
      उसके शब्दों को सुनकर सब हंसकर कहते -ये सारा मायाजाल तुम्हारा ही फैलाया है। आजकल इतने बच्चे करने के बारे में विरले ही सोचते है। अब तो ये सब तुम्हे ही भुगतना पड़ेगा।
     अब वह अपने बच्चो को दूसरो को गोद  देने के बारे में सोचने लगी थी। लेकिन उसके किसी बच्चे को गोद  लेने के लिए कोई रिश्तेदार  तैयार नही हुआ। क्योंकि सभी रिश्तेदारो के पास बच्चे थे। आज के ज़माने में अधिक बच्चे पालना  कोई नही चाहता। इसलिए दुसरो के बच्चे को अपने पास रख कर बुराई मोल लेने के लिए कोई तैयार नही हुआ।  उसे अब अपने किये पर पछतावा होने लगा।
    वह सोचती -इतने सारे  बच्चो की जरूरते में कैसे पूरी कर पाऊँगी। हम अभी इनकी जरूरते सही तरीके से पूरी नही कर पा  रहे बाद में इनकी जरूरत बढ़ेगी तब क्या होगा।
      

#ek karmth insan ki maut

     15  दिन बाद वेद पूरी तरह से ठीक होकर घर वापस आ  गए। उनके अंदर जीने और काम करने की लालसा थी। वे फिर से सुबह उठ कर सैर  करने जाते थे। अब डॉ ने उन्हें छड़ी लेकर चलने की हिदायत दी थी। वेद छड़ी हाथ में लेते थे लेकिन उसे जमीन पर टिका कर चलना बिलकुल पसंद नही था। इसलिए उनकी छड़ी लगता था हवा में लहरा रही है। जब उनसे  कोई छड़ी सही तरह से प्रयोग करने के लिए कहता।
     उनका जबाब होता -मुझे इसकी जरूरत नही है। डॉ जबरदस्ती इसका प्रयोग करने के लिए कह रहा है। जब मै  अपने आप सही तरह से चल लेता हूँ। इसलिए मुझे यह खिलोने  के सामान लगती है।  इसलिए  इस प्रकार  हाथ  में  आ  जाती है। यदि मुझे सही मायने में इसकी जरूरत होती तो इसे सही तरीके से इस्तेमाल करना मेरी मजबूरी होती। मुझे इसकी जरूरत नही है इसलिए इसका सही प्रयोग नही हो पाता।
         इस समय तक नरेश के परिवार में कोई सोकर उठा नही होता था। उन्होंने नरेश की शादी करवा दी थी। उसके हालत इतने अजीव थे कि उसकी शादी के बारे में कोई सोचता ही नही था लेकिन वेद की कोशिश से उसका घर बस गया था। उसके कहने पर वेद ने बड़ा घर किराये पर ले लिया था। जिसमे उसकी पत्नी और छोटी बहन भी आकर रहने लगी थी।  वेद  के लिए उनके रहने से जीवन में कोई खास परिवर्तन नही आया था। वे लोग अपनी  तरह से जिंदगी जीते थे। वेद ने उन पर नियंत्रण रखने की  कोशिश नही की। वह सुबह फैक्टरी चले जाते थे। जब नरेश की पत्नी उठती तब वह दादा जी के लिए खाना भिजवा देती। उनको उन सबके काम करने के तरीके को  लेकर दखलंदाजी करना पसंद नही था लेकिन उनको ऐसा रवैया नागवार लगता था। क्योंकि उनकी परवरिश अनुशासित  माहौल में हुई थी।
      अब  वेद को अपने उपर गुस्सा आने लगा था इस उम्र में उनका दिमाग सही तरह से काम करता था। लेकिन स्वास्थ्य ख़राब जल्दी हो जाता था ,इस कारण उनको दुसरो से मदद लेनी पड़ती थी। तब उन्हें बहुत दुःख होता था।  उनका स्वास्थ्य अपनी उम्र के लोगो से बहुत अच्छा था लेकिन वे अपनी तुलना जवानी की उम्र से करते थे। इसका जबाब देना सबके लिए बहुत कठिन था।
    हम भी भगवान  से उनके स्वास्थ्य की दुआ मांगते थे। इसी तरह एक साल बीत  गया। डॉ ने एक साल पहले ही उनके जीवन की उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन उनकी जिजीविषा के कारण उन्होंने एक साल और निकाल  दिया।
     एक दिन उन्होंने बताया -इन सर्दियों में मुझे ठण्ड बहुत लग रही है। मेरा काँपना  बंद नही हो रहा।
     उन्हें जुकाम भी हो रहा था।  इससे ज्यादा उनकी परेशानी का किसी को पता नही चल पाया।  उनके कमरे में हीटर का  इंतजाम कर दिया गया।
     एक दिन उन्होंने कहा -लाली मेरे पाँव  ठन्डे रहते है। लगता है हीटर का इन पर कोई असर नही हो रहा है।
    इसके अतिरिक्त वेद को कोई परेशानी नही थी। एक दिन उनकी मृत्यु की खबर आई। इस समय वेद 89  साल के हो चुके थे। उनकी इच्छा किसी पर अंतिम समय में निर्भर रहने की नही थी। भगवान  ने उनकी इच्छा पूरी कर दी। वे अपने अंतिम समय में किसी के लिए परेशानी का कारण नही बने। उनके जैसे कर्मठ इंसान की  मौत  भी उनकी इच्छा अनुकूल हुई। वे अपने अंतिम समय तक काम करते रहे। हमने उनके जैसा काम  करने वाला इंसान  और कोई नही देखा  अंतिम समय तक दुसरो का भला करने के बारे में सोचता रहा। जिसने अपने बारे में कभी कुछ नही सोचा वे जीवन भर दूसरो की भलाई में लगे रहे। 

#preshaniya

     रमेश और सुनैना  जब 5  साल पहले घर वालो से अलग किराये के मकान  में आने के लिए तैयार हुए मुझे उस समय इस बात की आशंका परेशान कर रही थी। सुनैना ने बहुत आराम -दायक जिंदगी बिताई थी। वह और रमेश दोनों काम करके पैसा कमाते थे। लेकिन जितनी आमदनी थी खर्चे उनके उससे ज्यादा थे.वे हमेशा पैसो  के लिए परेशान रहते थे।  उनकी आमदनी कम नही थी। लेकिन उनका खर्च शाही होने के कारण उनको पैसे जमा करने नही आते थे।
   उन्हें मेरी कंजूसी करना पसंद नही आता  था। वे मेरी कंजूसी का मजाक बनाते थे। उनके मजाक का सामना मै  अपनी मुस्कुराहट से दे देती थी। जब वे अलग हुए उनकी यही दरियादिली मुझे सोचने पर मजबूर कर रही थी। उनको घर का किराया नही देना होता था। घर के नीचे उन्होंने दफ्तर बना रखा था। इसलिए उनके किराये की बचत हो जाती थी। उन्हें आने-जाने का खर्च नही देना पड़ता था। बड़ो के द्वारा दूसरे कई खर्चे बच जाते थे। लेकिन उन्होंने अपने अहंकार के सामने परोक्ष खर्चो के बारे में नही सोचा उनके बड़ो के द्वारा बेटी के ऊपर कुछ नियंत्रण बना रहता।
    उस घर को छोड़ने से उन्हें धन की हानि के साथ मानसिक परेशानी  भी झेलनी पड़ी। इन दोनों परेशानियों ने और अपनों के आभाव में दोनों एक दूसरे पर दोषारोपण करने लगे। इसी कारण जो एक दूसरे के बिना रहने की कल्पना नही कर सकते थे। अब वे एक दूसरे के साथ खड़ा होने में अपनी तौहीन समझ रहे थे। कहते है पैसो का सुख और इंसानो का साथ सभी परेशानियों से निकाल  देता है।
    उन दोनों ने अपनी नासमझी से दोनों का साथ  छोड़ दिया। उनका समाज से ज्यादा सरोकार नही रहा है। वे अपने मन के गुबार को निकालने का जरिया ढूंढने के आभाव में एक दूसरे पर गुस्सा उतारने के कारण  दुनियाँ  से बेजार हो गए है।
    उन्होंने अपने पैसो  को संभाल  कर रखा होता और रिश्तो को आज भी सँभालने की कोशिश करे उनके जीवन में खुशियो के फूल महकने लगेंगे। उनके जीवन की कड़वाहट कुछ समय की है। यदि ये समय शांति से गुजारने की कोशिश करे ,थोड़ी तसल्ली रखे उनका आने वाला समय बहुत सुंदर हो सकता है। भगवान उन्हें सब्र से परेशानियों का सामना करने की हिम्मत दे। मै  उनके लिए जितना कर सकती हूँ। उनका भला हर तरह से करने की कोशिश कर रही हूँ। मै उन्हें खोना नही चाहती हूँ।  

#uljhe hue rishte

     हमारा जीवन कभी इतना उलझ जाता है। जिसमे से निकलना असंभव लगने लगता है। ऐसा ही मेरे साथ हुआ। मेरे जीवन में सुनयना  का पदार्पण  हुआ। जो कभी मेरे लिए प्रेरणा स्रोत्र हुआ करती थी। आज उसका जीवन उलझनों का पुलिंदा बन गया था। वह मुझसे बड़ी है। और खुद को समझदार समझती है। इसलिए उनसे साफ शब्दों में कुछ कहना। मेरे लिए उचित नही था। मेने छिपे हुए शब्दों में उन्हें समझाना चाहा। लेकिन वो इस कदर भावनाओ के समंदर में डूबी  हुई थी। उनके दर्द को मै  कम करने में असमर्थ रही।
     मुझे लोगो की समस्या दूर करने का शगल  नही है। मेरा उनसे वास्ता भी कम पड़ता है।  उनका दर्द जब मैने  समझा तो मै  घबरा गयी। वे मेरे सामने आते ही रो पड़ी। उनका रोने का कारण वाजिब नही था। उन्हें कुछ समय तक सांत्वना देने की कोशिश की। उनसे उलझे हुए रिश्ते  सुलझाने के लिए कहा।
     उन्होंने जबाब दिया -जो ख़त्म हो गया। उसे में फिर से जोड़ नही सकती।
  मै  उनकी समस्याओं से आपको मिलवाती हूँ। ऐसी समस्याएं आज घर -घर में पैठ  बनाये बैठी है। जिन्हे सुलझाना किसी को नही आ  रहा है।
     उनकी बेटी किसी और समुदाय के इंसान से शादी करना चाहती है। वे उससे अपनी बेटी की शादी करने के लिए तैयार भी है। लेकिन लड़के की माँ इस रिश्ते के लिए तैयार नही है।
     वह लड़का साफ शव्दो में कहता है -जब तक मेरी माँ शादी के लिए  हाँ  नही करेगी तब तक मै  तुमसे शादी नही करूँगा।
     इस तरह  उन्हें इस  रिश्ते में बंधे हुए दो साल बीत  गए लेकिन वह लड़का अपनी माँ को मनाने में कामयाब नही हुआ. दोनों एक दूसरे से मिलना बंद नही कर रहे थे। सुनेंना को लगने लगा था वह लड़का शादी ना  करने का बहाना  बना रहा है बल्कि उस लड़की का गलत फायदा उठा कर उसे छोड़ देना  चाहता  है वरना  बालिग  और समर्थ  लड़का माँ का बहाना  कब तक बनाएगा कभी तो शादी के लिए उसे तैयार होना चाहिए था  इसलिए सुनयना  ने अपनी बेटी को 6  महीने से रिश्तेदार के घर भेज रखा था।  ताकि समय के अंतराल में वह उसे भूल जाये या उसके जीवन में किसी और लड़के का आगमन हो जाये। जिससे उसकी दूसरी जगह शादी की जा सके। उसे उसकी किसी से भी शादी पर एतराज नही है लेकिन शादी का मतलब केवल शादी होना चाहिए। वह अपनी बेटी की शादी जबरदस्ती कर नही सकती  क्योंकि  माँ   के  इशारो   पर चलने वाली लड़की वह नही है।    वह बेटी का दिल दुखा  कर उसकी शादी किसी अन्य से नही करना चाहती। वह शादी के लिए बेटी की रजामंदी का इंतजार कर रही है।
     इस बीच सुनैना  और उसके पति रमेश में अनबन हो गयी थी। वह पांच साल पहले तक अपने बड़ो के साथ रहते थे। उस समय दोनों में बहुत प्यार था। उनको देख कर लोग उनके प्यार की दुहाई देते थे। रमेश सुनैना  के  हर इशारे को समझ कर समय से पहले सब काम कर देता था। रमेश जैसा कर्मठ पति के बारे में सोच कर हम जैसे लोगो को जलन होती थी। लेकिन उनके जीवन में इतनी ज्यादा गलत फ़हमिया आ  गयी है  कि दोनों एक दूसरे को बर्दास्त नही कर सकते है।
     उनके जीवन में झाँकने  का मुझे शौक  नही है। लेकिन उन जैसे बहुत से परिवार है। जिनकी उलझने इतनी बड़ी नही है। जितना उन्होंने बना दी है। उन्हें देख कर लगता है। ये मामला नही सुलझा तो एक दिन रमेश पागल हो जायेगा और सुनैना खुदकशी कर लेगी।
     ऐसे रिश्तो को सँभालने के लिए मेने उनके बड़ो का फोन नंबर लेकर उन्हें  फोन करने के बारे में सोचा। लेकिन मुझे कही से उनका नंबर नही मिला। सुनैना  अपने सगे रिश्तेदारो से मिलने के लिए तैयार नही है। साथ रहते हुए हर रिश्ते में कड़वाहट आ  जाती है। लेकिन समय उनसे गर्द हटा भी देता है  क्योंकि खून के रिश्ते इतनी  मजबूती से जुड़े होते है कि  बच्चो का अनिष्ट कोई भी बड़ा सहन करने की जगह उन्हें माफ़ करने में भलाई समझता है।
    कुछ रिश्तो का अलगाव इंसान को तोड़ देता है  य़ही हालत इस रिश्ते की है। उनके बीच की चुप्पी किसी तरह से टूट जाये और वे एक साथ  बाते  करना शुरू कर दे तो उनकी उलझने सुलझ जाये। मुझे लगता है। उनकी सहज बातचीत  धीरे -धीरे उनके अंदर के गुबार को बाहर निकाल  देगा। सभी रिश्तेदारो से मिलने पर  उनकी परस्पर नफरत भी ख़त्म हो जाएगी।
      आपने  सुना होगा संयुक्त परिवार में रहने वाले दम्पत्ति दूसरो  की बुराई भले कर ले। वे आपस में प्यार से  रहते है। जबकि अकेले रहने वाले दम्पत्ति  आपस में दुश्मनो की तरह व्यवहार करने लगते है। इसी कारण बहुत ज्यादा तलाक हो रहे है।  कई लोगो के साथ मन की बात करने से हमारे मन में किसी एक इंसान के प्रति दुर्भावना नही रहती बल्कि वह बंट जाती है।  हमारा मन भी हल्का हो जाता है। 

#sapno ki udan

    जब  मुझे पहली बार हवाई जहाज  में सफर करने का मौका मिला तो मुझे एक बार तो लगा जैसे मै  सपनो की दुनिया में पहुंच गयी हूँ।  टी 3  से जाना एक नए सफर तक पहुँचने  का पहला पायदान था। उसमे समय काफी लगा लेकिन उसकी सुंदरता निहारने में समय का आभास ही नही हुआ। सब कुछ नए तरीके से बनाया गया था। उसकी रचनात्मकता मन को लुभा रही थी।  सब कुछ इंसान की सोच ने बदल दिया था। उसकी चकाचोंध ने मुझे चौंका दिया था।
       ये टर्मिनल अंतर्राष्टीय स्तर का बन गया है। यहाँ किस तरह चल कर कब जहाज में पहुँच  गए ये पता ही नही चला।  वहाँ  बैठने के बाद हमें एहसास हुआ हम जहाज के अंदर पहुँच  चुके है।  यहाँ पर सीडियो से चढ़ने का तरीका ही ख़त्म कर दिया गया है।  पहली बार अंदर जाने का अहसास ही नही हुआ। इस कारण डर  या घबराहट भी नही हुई।
        हम जिस एयरलाइंस  की तरफ से जहाज  में गए थे उन्होंने हमें पहली बार सफर कर रहे है।  इसका एहसास नही होने दिया । बेल्ट बांधने  का तरीका और सारी  बाते  आसान तरीके से शब्दों और विडिओ क्लिप के द्वारा समझाई।  परिचारिका ने सभी छोटे -मोटे कार्य खुद सम्पादित कर दिए। हम उन्हें मूक दर्शक की भांति देखते रहे। वहाँ  शब्दों का प्रयोग बहुत कम लोग कर रहे  थे  जो लोग परस्पर बाते कर रहे थे वे भी फुसफुसाहट मात्र थी।
     काफी समय तक जहाज जमीं पर  घूमता रहा। हमें समझ नही आ  रहा था क्या इसे भी ट्रेन के सामान सिग्नल मिलने का  इंतजार है  जो चारो और चककर  लगा रहा है।  हमारे इंतजार  के पल ख़त्म हुए और जहाज आकाश में उड़ने लगा।  धीरे -धीरे धरती हमसे दूर होने लगी। दूर तक फैली हरियाली सिकुड़ने और धुंधली पड़ने लगी।  मेरा सारा ध्यान  बाहर देखने में लगा था। में हर पल को आँखों में समेट  लेना चाहती थी।  में सारे  दृश्यों को अपने सामने साकार होते  देख रही थी  . धरती आँखों के सामने से गायब हो गयी तब  मेने ऊपर और अंदर की तरफ रुख किया। हमारे आलावा लोग अपने काम में लगे हुए थे मै  ही बाहर एकटक देख रही थी।
     जहाज के अंदर हर सीट के सामने स्क्रीन लगी थी। जिस पर हम मन पसंद फिल्म देख सकते थे। मेने अपने सामने की  स्क्रीन स्टार्ट करने की कोशिश की तो वह शुरू नही हुई।  मेने अपने साथ वाली सीट पर चलने वाली फिल्म देखने की कोशिश करने लगी।  लेकिन उस पर बाहर खिड़की से रौशनी पड  रही थी जिसके कारण  वह सही नही दिखाई दे रही थी। इस कारण मेरा सारा धयान फिर से बाहर चला गया।
     हमारा जहाज बादलो  के बीच में था। बादल  हमारे ऊपर  और नीचे  थे। मेने हमेशा बादलो  को नीचे  से देखा था इसलिए उनकी परतो  की कल्पना इससे पहले मेने नही की थी। बादलो  को छोटे -बड़े पहाड़ो के रूप में देखकर में  हैरान हो रही थी।  काले -सफ़ेद और स्लेटी रंग के बादलो  के बीच का सफर मुझे हैरानी में डाल  रहा था।  उनके बड़े और छोटे आकर साफ पता चल रहे थे। सफ़ेद के अनेक शेडो के कारण बादल पर्वतो के आकर में दिखाई दे रहे थे.काफी देर तक बाहर का माहौल  मुझे अपनी तरफ आकर्षित नही कर सका।
     .बादलो  के बाद मेरा ध्यान जहाज के विंग्स पर गया वे मुझे अपनी सीट से साफ दिखाई दे रहे थे। वैसे तो मुझे सफर पता नही चल  रहा था। लेकिन विंग्स के कारण मुझे उड़ने का पता चल रहा था। उन्हें देख कर  घबराहट हो रही थी,चककर  आने लगते थे। किसी और को मेरे डर  का पता ना  चले इसलिए मै  अपने डर  को छिपाने की कोशिश कर रही थी.
       इस बीच परिचारिका हमारे लिए नाश्ते का सामान ले आई। उनकी पोशाक  और उनका काम करने का तरीका मुझे  उनकी तरफ देखने के लिए मजबूर कर रहा था। सब कुछ बेआवाज और शांति से हो रहा था। ऐसे माहौल  में हमें भी अपने बात करने का तरीका बदलना पड़  रहा था। हमारा सफर दो घंटे का था। लेकिन इस बीच किसी को  आपस में बात न करते देखना मुझे असमंजस में डाल  रहा था। हम जैसे लोग आधे घंटे में पड़ोसी से दोस्ती कर लेते है। ऐसे में हमसे चुप रहना असहनीय हो रहा था। इस कारण कभी जहाज से बाहर तो कभी जहाज के अंदर निहार कर हम अपना समय गुजार  रहे थे। कभी साथ वाली स्क्रीन पर फिल्म देख लेते थे।  धुंधली और बिना आवाज की फिल्म समझने में काफी परेशानी हो रही थी इस कारण उसमे मन लगाना भी मुश्किल हो रहा था। .
       हमारा सफर ख़त्म हुआ हमें बेल्ट बांधने  का आदेश हुआ। उसके बाद हमारा जहाज नीचे  उतरने लगा। अब हमें डर  लग रहा था जिस एयरपोर्ट पर हम उत्तर रहे थे उस  पर कुछ समय पहले जहाज फिसल गया था। ये खबर हमे डरा रही थी। हम भगवान  का नाम जप रहे थे कुछ अनहोनी नही होनी चाहिए। धीरे -धीरे जहाज नीचे  आकर रुक गया। हमें पता ही नही चला। कोई धक्का नही लगा। हमें लगा इन्होने फालतू में हमें बेल्ट बाँधने  के लिए कहा था इसकी तो जरूरत नही थी।
     यहाँ  पर जहाज से उतरने के लिए सीडिया लगी हुई थी। उनसे उत्तर कर हम अंदर आये।  य़े एयरपोर्ट बहुत छोटा था। हमारे सामने एक बस आकर रुकी उसमे पहले उतरने वाले लोग चढ़ गए। हम बाद में उतरे थे। इतने में बस लोगो को लेकर चली गयी। लेकिन यात्री बस के  वापस आने    का इंतजार करने के स्थान पर खुद ही एयरपोर्ट के अंदर आ  गए। हमें वह बहुत पास लगा. जैसे हमने सफर के बारे में सुना था उस तरह का डराने  वाला अहसास हमें कही नही हुआ।  हमें ऐसा लग रहा था मानो  हम स्वर्ग का एक चककर  लगा कर धरती पर आये  है। 

#sexy thappad

      मै  अपने कार्यालय में मन लगा कर काम करती थी   लेकिन  मेरा सहकर्मी  मोहन मेरे पास आकर मुझे अपनी बातो से रिझाने  की कोशिश में लगा रहता था। मै  अधिकतर उसकी तरफ ध्यान नही देती थी। उसकी दिनोदिन हिम्मत बढ़ती जा रही थी। मेरी उपेक्षा , उस पर कोई असर नही कर रही थी। वह दिनों दिन और ज्यादा उद्दंड होता जा रहा था। उसकी हरकते बर्दास्त के बाहर होती जा रही थी। मै  समझ नही पा  रही थी। उसका किस तरह से प्रतिकार करुँ। मेरा हर तरीका उसे और अधिक बेशर्म बना  रहा था।
         एक बार मोहन मेरे पास एक कागज लेकर आया और बोला - देखो मेरे हस्ताक्षर कितने सेक्सी है।
     मै  उसकी बात   सुन कर  सकपका गयी अचानक उसका जबाब देने की हालत में मै  नही थी। मेने उसकी तरफ ध्यान नही दिया। मैने अपने आपको दूसरे काम में मसरूफ दिखाया। मेरी बेरुखी का उस पर कोई असर नही हुआ।  उसने मेरे इस व्यवहार को मेरी शर्म समझा। उसने दुवारा मेरे सामने वही  प्रश्न दोहराया।
    उसके ये शब्द सुनकर मेरी आत्मा तक जल गयी। मेरे लिए अपने गुस्से पर काबू रखना मुश्किल  हो गया।
    मेने जोर से एक थप्पड़ उसे रसीद किया और बोली -कहो कैसा  लगा मेरा सेक्सी  थप्पड़।
      थप्पड़ लगते ही उसके होश ठिकाने आ  गए। वह मुझसे माफ़ी मांगने लगा। लेकिन मेरा गुस्सा उस दिन बहुत ज्यादा बढ़  गया था।
       मैने  उससे कहा -अभी ये तो कुछ नही है। मै  तेरी ऊपर तक शिकायत करुँगी। ताकि  तुम  दुसरो को परेशान करना भूल जाओ ।मेरी चुप्पी को तूने मेरा डर  समझा था। इसलिए मुझे परेशान करने से बाज  नही आ  रहा था। अब देखना मेरी ताकत।
     उसके बाद जिससे वह मिलता उससे अपनी परेशानी बताता उससे इस  समस्या का  समाधान पूछता   -खुद को  माफ़ करने की दरयाफ्त करता।  
    एक दिन मेरे अफसर ने मुझे बुला कर कहा -इसे दो चार थप्पड़ चाहे तो और मार  ले लेकिन इसकी ऊपर  शिकायत मत कर।  इसकी नौकरी का सवाल है।
     मेरा उसकी ऊपर  शिकायत करने का कोई इरादा नही था। मेने सिर्फ उसे डराने  के लिए इन शब्दों का इस्तेमाल किया था। मुझे पता था सरकारी नौकरी कितनी मुश्किल से मिलती हे।  किसी की नौकरी छीन कर  मै  उसका जीवन बर्बाद नही करना चाहती थी।   ये तो उसे रोकने के लिए केवल धमकी थी। लेकिन मेरी एक धमकी ने  उसके सारे  कसबल निकाल  दिए थे। उसका गौरवान्वित चेहरा मुझे फिर दिखाई नही दिया। कुछ समय बाद उसने उस दफ्तर से अपना तबादला करवा लिया।
     इसलिए कहा जाता है। डरने वाले पर सब हावी होते है। बहादुरो के सामने पहाड़ जैसी चुनोतियाँ  भी चींटी के सामान छोटी हो जाती है।



#lambi behoshi

       वेद ने जयपुर में नया काम शुरू कर दिया। वहाँ  पर अभी ज्यादा मुनाफा नही हो रहा था। लेकिन काम की लागत बसूल होने लगी थी। आरम्भ में लागत और मेहनत  ही निकल आए यही बहुत था।  कई दिन तक वेद जयपुर में रहने लगे। वहाँ  रहना उनके लिए मुश्किल नही था। लेकिन बस का इतना लम्बा सफर वेद अब सहन करने की हालत में नही थे। उन्हें खुद नही पता चलता था वह कितने समय काम करने की हालत में होते है। या  कब बेहोश हो जाये और कितने समय तक बेहोशी की हालत में रहे।
      वेद की चिंताजनक हालत देख कर नरेश ने कहा -बाबा आप चिंता मत कीजिये मै जयपुर का काम संभाल लूँगा। आपने जयपुर के काम में बहुत मेहनत कर ली है। अब मै इस काम की जिम्मेदारी सँभालने लायक हो गया हूँ। जहाँ मुझे परेशानी होगी। मै  आपकी मदद ले लिया करुँगा।
      वेद का अपने शरीर पर नियंत्रण ख़त्म होने लगा था। वे अपने शरीर के कारण परेशान रहने लगे थे। लेकिन अपनी परेशानी का कारण उन्हें खुद समझ नही आता  था। वह मन से आज भी काम करने के लिए तैयार थे। वे इस कमजोरी का कारण डॉ से पूछते लेकिन डॉ उनको संतुष्टि दे सकने लायक जबाब नही दे पाते  थे।
     वेद ने हालत से समझोता करके दिल्ली का काम सम्भालना फिर से शुरू कर दिया। यहाँ  उन्हें ज्यादा दिक्क़त  नही आती  थी। वे जब स्वस्थ होते थे खुद फैक्टरी पहुँच  जाते थे। बीमारी की हालत में उनका हेल्पर उन्हें घर से ले जाता था। लेकिन उन्हें घर में रहकर आराम करना बिलकुल पसंद नही था।
     वे अपनी उम्र से ज्यादा काम करते थे। एक बार वे चलते -चलते कई किलोमीटर का सफर पैदल  चल कर आये।  उन्हें इतना पैदल चलते हुए पता नही चला। लेकिन घर पहुँचने  के बाद उनकी तबियत ख़राब होने लगी। उस समय नरेश घर नही था। उन्हें ऐसे में चिंता सताने लगी। जब नरेश घर आएगा। यदि मै  बेहोश हो गया तब उसके लिए दरवाजा कैसे खुलेगा।  उनका अपने शरीर पर से नियंत्रण ख़त्म होने लगा था।
      उन्होंने ऐसे में नरेश को फोन करने की अपेक्षा अपनी बेटी को फोन करके सारे  हालत बताये। अब उसने नरेश को जल्दी घर पहुंचने  की हिदायत दी।
     नरेश को पहले तो बहुत गुस्सा आया। लेकिन वक्त की नजाकत समझते हुए घर पहुँच  गया। वेद ने  घर  पहुँचने  पर नरेश के लिए दरवाजा खोल दिया। उसके बाद वह बेहोश हो गए।
      नरेश ने उनका ध्यान रखा। डॉ को बुलाया लेकिन डॉ उनकी सेहत को लेकर संतुष्टि दायक जबाब नही दे सका। उनको कई दिन तक अपने शरीर का ध्यान नही था। वे कोई जबाब सही नही दे पा  रहे थे। उनकी हालत अर्धबेहोशी की थी।
      दो दिन बाद उन्हें अस्पताल पहुँचाया  गया। लेकिन 6  दिन तक वे इसी हालत में रहे। 7  दिन बाद वे सामान्य हालत में पहुंचे। जब वे होश में आ  गए। तब उस समय का जब उनसे जिक्र किया तो उन्हें कुछ भी पता नही था। उस  तंद्रा का क्या नाम दिया जाये। उन्हें इस बीच के समय का कुछ भी आभास नही था। 

# poti or safai

         काफी समय पहले की बात है। मुझे कुछ समय के लिए घर से बाहर जाना था। इसलिए मै  अपने बच्चो को घर पर छोड़ कर चली गयी। उनके साथ उनके बड़े  कजिन भी थे। वे भी केवल आठ साल के आस -पास थे।  मेरी छोटी बेटी उस समय केवल १ साल की थी उनके भरोसे छोड़ कर मै   चली गयी। इसी बीच छोटी बेटी कविता ने पोटी कर ली। उन सब ने इस समस्या से निकलने के लिए अपना -अपना दिमाग लगाया। उन्हें कविता की पोटी कैसे साफ करनी चाहिए।
       कविता की बड़ी बहन को जो उस समय 5  साल की थी उसे  उन्होंने आदेश दिया -ये तेरी बहन है। इसकी पोटी  तुझे साफ करनी चाहिए क्योंकि तू बड़ी है।
      उसने आदेश का पालन करते हुए कविता की पोटी  साफ कर दी। इतने में उसकी कजिन ने कहा -अभी ये अच्छी तरह से साफ नही हुई है। इसे साबुन से साफ कर।
   सविता को ज्यादा जानकारी नही थी। उसने उसकी पोटी  दूसरी बार कपडे धोने के  साबुन से अच्छी तरह रगड़ -रगड़ कर साफ कर दी। क्योंकि वे इतने छोटे थे कि उन्हें नहाने और कपडे धोने वाले साबुन का अंतर मालूम नही था। 
     उन्हें इस बार भी संतुष्टि नही मिली। उसके भाई ने जो कुछ ही साल बड़ा था। उसने कहा -अभी इसकी पोटी अच्छी तरह से साफ नही हुई है। इसे कपडे धोने के ब्रश से साफ करना चाहिए।
     अबकी बार सविता ने फिर से उनके आदेश का पालन करते हुए ब्रश को उस पर जोर से रगड़ना शुरू कर दिया। सर्दी के समय में कविता की सफाई इस तरह हो रही थी। कविता पर क्या गुजर रही है। इसका ध्यान रखे बिना सारे  बच्चे लगे हुए थे। उन्हें कविता के रोने की आवाज से कोई फर्क नही पड़  रहा था।
       काफी समय तक कविता की सफाई के चककर  में सबने उसे ठन्डे पानी से थोड़ा साफ करने   की जगह उसे पूरा भीगो  दिया था। ठण्ड के कारण वह चीख -चीख कर रो रही थी। लेकिन उसके कजिन पर कोई असर नही हो रहा था। वे पूरा मन लगा कर अपने काम में लगे हुए थे।
        कविता के रोने की आवाज सुन कर उसकी ताई  जी आई उन्होंने कविता का हाल देख कर उसे अपनी गोद  में ले लिया  और  उन्होंने कविता को इस यातना  से मुक्ति दिलाई। आपको भी अपने इस तरह के कारनामे की याद आई या नही। 

#umr kabhi ade nhi ati

       अब वेद 85  साल के हो गए थे। लेकिन उनके काम करने के तरीके में बदलाव नही आया था। वे जितने दिन बीमार रहते उतने दिन आराम करते। स्वस्थ होते ही कारखाने में बैठने लगते थे।
       उन्होंने इस उम्र में नरेश के आने से काम का बोझ कम होने का हवाला देते हुए कहा - अब इस काम को देखने की अपेक्षा में कही और जाकर नई फैक्ट्री शुरू कर देता हूँ।
    हमने कहा -आप अपनी दूसरी फैक्टरी कहाँ  खोलना चाहते है।
   वेद ने कहा -हमारे पास जयपुर से कई ग्राहक काम के सिलसिले में आते है। वे चाहते है। हम अपना एक कारखाना वहाँ  खोल ले। उनके अनुसार हमको जयपुर में काम को लेकर  किसी  परेशानी का सामना नही करना पड़ेगा। वे हमारी भरपूर मदद करेंगे। काम हमारी उम्मीदों से ज्यादा ही मिलेगा जिसकी हम उम्मीद नही कर सकते।  लाली मै  सोच रहा हूँ  एक बार और जयपुर में किस्मत आजमा कर देख लूँ।
      मेने कहा -आप की उम्र इस तरह अनजान जगह पर रहने की नही है। अब आपकी तबियत दिनों दिन बिगड़ती जा रही है। कभी भी आपको देखभाल की जरूरत पड़  जाती है.यहाँ  मदद के लिए आपके पास पहुँचना  आसान है वहाँ  तक पहुँचना बहुत कठिन हो जायेगा। आपकी उम्र अब अकेले रहने के लिए ठीक नही है।
      वेद ने कहा -यहाँ  की फैक्टरी में कोई मेरे लायक काम नही रहा। ये फैक्टरी मेरे बिना भी आराम से चल सकती है। मुझे लगता है.यहाँ का काम नरेश को  दे कर मै नए काम की नींव डालू।
      मेने कहा -आपकी उम्र इतना लम्बा सफर करने लायक नही रही है। उस पर आपकी तबियत कभी भी बहुत ख़राब हो  जाती है। आपको अपने शरीर का होश तक नही रहता। ऐसे में बिना सहायता के आपके लिए जिंदगी जीना कठिन होगा। आप वहाँ नए काम के लिए नरेश को भेज दो। उसे जीवन की सच्चाई का सामना करना आना चाहिए।
      वेद बोले -उसमे अनुभव की कमी है। उसे नही पता नया काम किस तरह शुरू किया जाता है। मेने जीवन  में  काफी अनुभव पा  रखा है। नरेश ने अपने आप जीवन में अभी तक कुछ हासिल नही किया। वह यहाँ भी मेरे भरोसे आया है। मुझे नही लगता उसमे कुछ नया करने की काबिलियत है।  नए  काम के लिए बहुत मेहनत की जरूरत पड़ती है।
    वेद ने दिल्ली की फैक्टरी की जिम्मेदारी नोकरो और नरेश पर छोड़ कर जयपुर के लिए प्रस्थान किया।
       वेद ने ८५ साल की उम्र में जयपुर में नई फैक्टरी का काम करना शुरू कर दिया। इसे कहते है उम्र और बीमारी कभी काम करने वालो के  रास्ते में नही आती। उम्र का बहाना कामचोर लोग बनाते है। 

#kya hindu asahishnu he

       आजकल आप आये  दिन सुन रहे होंगे भारतीय हिन्दू असहिष्णु हो रहे है। इसकी सच्चाई पर आपको यकीन  आता  है। मुझे ये सब नेताओ और संचार माध्यमो के द्वारा फैलाया भ्रम जाल  लग रहा है। इसी संदर्भ में मै  आपको कुछ उदाहरण देना चाहती हूँ।
     शाहरुख़ खान ने अपने जन्मदिन पर ये शव्द दोहराये। जिनको सुनकर मै  तिलमिला गयी। आज आप सोच के देखे। शाहरुख़ खान की फिल्मे क्या सिर्फ मुस्लिम समुदाय की बदौलत चलती है। मेरे चारो और मुस्लिम कलाकारों की फिल्मो को देखने वालो का जमावड़ा है। जो मुस्लिम कलाकारों (सलमान खान ,सैफ अली खान. इमरान खान, इमरान हाश्मी ,इरफ़ान खान.नवाजुद्दीन सद्दीकी, कमल हासन।  आमिर खान )   की कोई फिल्म हॉल पर नही छोड़ते। वे कोशिश करते है उसकी फिल्म पहला दिन और पहले शो को देखे। आपको लगता है वे सब मुस्लिम है। ये सारे  खान भारत में सुपर हिट है. ये केवल मुस्लिम समुदायों के लोगो के कारण इतने हिट हो सकते है कभी नही।
     एक भारत ही ऐसा देश है  जो 80  % हिन्दू आबादी का देश कहलाता है। हिन्दू आबादी को दबाने के लिए सारी  सरकारें  अपना पूरा प्रयास करती है। इसमें जो  हिन्दू अपने को गौरवान्वित महसूस करे उन्हें असहिष्णु की उपाधि दे दी जाती है।
      आप भारत के आलावा कोई और मुस्लिम देश जैसे ईरान ,इराक ,सीरिया ,अफगानिस्तान ,पाकिस्तान , मिस्र,आदि  में उन्हें जाने के लिए कहिये ये किसी और देश में जाने के लिए तैयार नही होंगे क्योंकि उन्हें पता  है केवल भारत ही ऐसा देश है ,जहॉ  बहुसंख्यक आबादी को कितना भी गलत बोल दो। वे एक शब्द भी अपने हित की बात बोल देंगे तो उन्हें सांप्रदायिक की संज्ञा दे सकते है।
       एक भारत ही ऐसा देश है जहॉ  ऊँची जगहों पर पहुंचे लोग हिन्दुओ के लिए असभ्य शब्द बोल देते है ,उन्हें कोई गलत नही कहता। लेकिन एक हिन्दू जहॉ  इसका विरोध करता है ,तो सारी संवेधानिक संस्थाये उसे दबाने में अपना पूरा जोर लगा देती है।
       भारत के आलावा किसी भी मुस्लिम देश में आप एक भी हिन्दू अभिनेता या नेता का नाम मुझे बताये। मेने इतनी किताबे पड़ी ,काफी जगह ढूंढा लेकिन एक भी देश में मुझे कोई भी हिन्दू नही दिखाई दिया। आपको लगता है इन देशो में हिन्दू निवास नही करते या उनमे आगे बढ़ने की योग्यता नही है। आप उन देशो में रहने वालो को सांप्रदायिक कहेंगे या भारतीय  हिन्दुओ को सांप्रदायिक कहेंगे।
       भारत में रहने वाली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा नेहरू  की शादी फिरोज से हुई थी। वह ईरान से आये  पारसी  समुदाय का सदस्य था। जहाँ की सरकार ने पारसियों को अपने देश से खदेड़ दिया था। वह समुदाय मुस्लिम समुदाय से निकला हुआ था। उस समुदाय के  द्वारा उनके नियमो का पालन ना  करने के कारण उनसे ईरान में रहने का अधिकार छीन लिया गया था। ईरान में उनके नियमो का पालन न करने वाले उस देश में नही रह सकते है। वह देश सांप्रदायिक है  या भारत।    जवाहर लाल नेहरू की बेटी ने उससे शादी की.
     नेहरू खुद इस शादी के विरुद्ध थे। लेकिन गांधी जी  के कहने पर उन्होंने अपनी बेटी की शादी एक मुस्लिम से कर दी। उसकी जाति  पर मुलम्मा चढ़ाने के लिए महात्मा गांधी ने  उन्हें गोद  लेकर अपना गांधी उपनाम दिया। वह भारत के सर्वोच्च पद पर बैठी।
      किस कारण से भारत पाकिस्तान का विभाजन हुआ था। नेहरू और जिन्ना की दुश्मनी सत्ता के  सर्वोच्च पद तक पहुँचने के कारण हुई थी। गांधीजी इस वैमनस्य को मिटाने के लिए पाकिस्तान को बनने से रोकने के लिए सारे उच्च पद मुस्लिमो को देने के लिए तैयार थे लेकिन नेहरू अपने सत्ता के मोह  के आगे झुकने के लिए तैयार नही हुए। धर्म के नाम पर पाकिस्तान का उदय हुआ।
        आपने नेहरू परिवार के आलावा किसी और परिवार का उपनाम कभी नेहरू सुना है। मेने आजतक नही सुना। आपको हैरानी नही होती सत्ता के सर्वोच्च पद पर रहने वाले परिवार का उपनाम कैसे पड़ा या किसी ने इस उपनाम को  अपनाने में अपने को गौरवान्वित क्यों महसूस नही किया। जरा इस पर विचार करके मुझे इसका जबाब देने का कष्ट करे।
      दिल्ली की मुख्यमंत्री   शीला दिक्षित की बेटी ने मुस्लिम से शादी की है कितनो को इसका  पता हे।  भारत के अधिकतर हिन्दू  नेताओ   के पारिवारिक लोग मुस्लिम है। लेकिन उनको भारतीयों ने सत्ता के गलियारों तक पहुचने से कभी रोका  है ? कभी नही।
       एक भारतीय हिन्दू पड़ा -लिखा और जागरूक है। वह इस बात को अधिक महत्व नही देता। लेकिन उसे ही दू सरे समुदाय के अल्पसंख्यक  असहिष्णु कह रहे है। पुरुस्कार लौटा  रहे है।
     ये सब उन नेताओ के कहने पर हो रहा है। जिनकी चालबाजियों के कारण भारत तीन हिस्सों में बंटा। और वे भारत को और कई हिस्सों में बाँटने में लगे है। भारत में ही सर्वोच्च स्थानो पर दूसरे समुदायों के लोग मिलेंगे। फिर भी हिन्दुओ को असिष्णु कहने का अधिकार  उनको किसने दिया  भारतीय बहुसंख्यक आबादी ने। इसे उन्हें कभी नही भूलना चाहिए। 

# ummido ka lamba silsila

     भगवान  ने वेद के हाथो में पैसे कमाने का गुन दिया था। वह सारी  उम्र अपने सौतेले भाई -बहनो की अपेक्षा बहुत अधिक कमाते रहे और उनकी मदद भी करते रहे । लेकिन उनके भाई -बहनो के अंदर उनकी मेहनत को लेकर  या उनके अच्छे व्यवहार को लेकर कोई अच्छा अहसास नही रहा। वह उनकी मदद किसी उम्मीद से नही करते थे। जो पैसा उन्होंने एक बार दे दिया वह उन्हें कभी बापिस नही मिला।
      उन्होंने अपने सौतेले छोटे भाई की अंतिम क्रिया,उसकी बेटी की शादी में मदद की।  लेकिन जब उसके बेटे की शादी का समय आया तब उसके सगे  रिश्तेदारो ने वेद को इसकी भनक भी नही लगने दी। वेद के पास शादी का केवल निमंत्रण पत्र  पहुंचा। शुरू से वेद के साथ ऐसा ही होता रहा था।
     बहनो की शादी के समय उससे पैसे लेने होते थे। इसलिए उसकी सलाह ली जाती थी। लेकिन जब दो भाइयो की शादी का समय आया तब उसे केवल निमंत्रण पत्र  भेजा गया। शादी के बाद बिना बात लड़ाई लड़ ली जाती थी। वेद को भूखा -प्यासा अपने परिवार के साथ घर वापस लौटना  पड़ता था। किसी के मन में उसके छोटे -छोटे बच्चो के लिए तरस  नही आता  था। इतने लम्बे सफर में उसके बच्चे कैसे रहेंगे। काम निकल जाने के बाद उनकी इंसानियत मर जाती थी। 
     अब हालत बदल गए थे। लेकिन उनका रवैया फिर से वैसा ही था।   वेद ने उनके ऐसे व्यवहार को देखकर अपना मन कड़ा कर लिया था। मेरी सारी जिंदगी इनका भला करते हुए बीत  गयी । लेकिन ये कभी बदले नही अब मै  भी इनके साथ इनके साथ वैसा ही व्यवहार करूंगा।
       इनके छोटे भाई की पत्नी भी इस बीच ख़त्म हो गयी। अबकी बार वेद मेहमानो की तरह उसमे शामिल हुए और घर वापिस आ  गए। अब उसके दो बच्चे भी समर्थ हो चुके थे। उसके सभी चाचा और बुआ थे। वेद ने ज्यादा सोचने की  जरूरत महसूस नही की। इससे पहले वेद हर काम के समय किसी के बिना कहे  अपना पैसा लगाते  रहे थे। इसलिए सभी को  लगा अब भी वेद कुछ कहे विना  सारी  जिम्मेदारी अपने उपर ले लेंगे। इसलिए उनसे छोटा भाई इस काम में आया तो सही लेकिन पैसो  का इंतजाम किये बिना आ  गया। उसे उम्मीद थी हमेशा की तरह भैया सारा खर्च उठा लेंगे लेकिन वेद  इस समय एक वेगाने की तरह आये   उन्होंने इस बारे में किसी से विचार -विमर्श नही किया। उन्हें अपने भाई से लगाव था इस लिए हमेशा किसी के  बिना  कहे उसकी सारी जिम्मेदारी उठा लेते थे। लेकिन छोटे भाई को ख़त्म हुए भी दस साल बीत  गए थे। भाई की मृत्यु के बाद उनका उसके परिवार से ज्यादा मिलना जुलना नही होता था क्योंकि वेद बड़े होने के कारण उसकी पत्नी से बात नही कर सकते थे। इसलिए उनके अंदर का अपनापन भी नही रहा था। 
      अंतिम क्रिया के अगले दिन उनसे छोटे भाई जो सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे अपनी बहन के साथ वेद की फैक्टरी पहुँच गए।  वेद को उन्हें देखकर अचरज हुआ।
     बात चलने पर पता चला- भाभी की तेरहवी करने के  लिए साधन नही है। उन्होंने गिड़गिड़ा कर वेद से ऐसे समय मदद करने के लिए कहा।
    वेद ने पूछा -तुम्हे ऐसे समय खुद पेसो का जुगाड़ करके लाना चाहिए था। तुम्हे खाली  हाथ आना  नही चाहिए था।
     उन्होंने दबे शब्दों में कहा -भइया गलती हो गयी। हमें उम्मीद थी उसके बेटे के पास कुछ होगा। लेकिन कल  उसने साफ शब्दों में मना  कर दिया। उसके पास बिलकुल पैसा नही है। ऐसे में हमारे लिए पैसो का प्रबंध करना बहुत मुश्किल है। हम दिल्ली वालो को जानते भी नही है। हम पर विश्वास करके हमें ऐसे समय कौन  पैसा देगा। बस आखिरी उम्मीद आपसे जुडी है। आपके आलावा इस वक्त हमारा सहारा और कोई नही बन सकता।
       वेद को उनकी बातो में सच्चाई का अहसास हुआ। लेकिन अपनी बेचारगी दिखाते हुए। वेद ने कहा -देखो। अब मै  बूढ़ा  हो चुका  हूँ। सारे  कामकाज का सर्वेसर्वा नही हूँ  इसमें नरेश की मेहनत  भी है। इसलिए मै  पैसा खर्च करने के बाद भूल जाऊ ऐसा नही हो सकता। मुझे उसे पैसे का हिसाब देना पड़ता है। इसलिए मै तुम्हारी मज़बूरी समझ कर  इस समय तुम्हे पैसा दे दूँगा। लेकिन इस बार तुम्हे पैसा लौटाना  होगा। यदि तुम्हे मनज़ूर हो  तो कहो।
       उनके पास इसके आलावा और कोई चारा नही था। उन्होंने पैसा लौटाने  के लिए हामी भर दी।भाई की तेरहवी का सारा काम इस पैसे के द्वारा निबट गया। 
      उसके बाद वेद के भाई अपने घर वापिस  चले गए। उस काम के ख़त्म होने के कई महीने बाद वेद के पास उधार दिए  पैसे वापिस आ  गए। जिसकी  वेद को कोई उम्मीद नही थी। क्योंकि इससे पहले कभी भी उनको अपने पैसो  की वापसी नही मिली थी। 

#madad

     वेद अब बहुत दुखी  और उदास रहने लगे थे। इस बीच उनके हमउम्र दुनिया से जा चुके थे। उनसे बात करने के लिए उनकी उम्र के लोग नही रहे थे। वे परिवार के सबसे बुजुर्ग इंसान बन गए थे। उनका अकेलापन मन को बहुत तकलीफ देता था। वे अपनी उम्र के लोगो  की  अपेक्षा  स्वस्थ थे। लेकिन उनके मन में  वीरानी छाने  लगी थी।
      वे स्वय कहते -इतनी उम्र पाकर जीना  बहुत दुखदायी हो जाता है।
    जब सारे नाते -रिश्तेदार हमें  छोड़कर जा रहे हो । उनका दर्द सहते हुए जिंदगी की शाम को गुजारना उनके लिए बहुत कष्टप्रद हो गया था। लेकिन उन्होंने हिम्मत का दामन नही छोड़ा था। वे अभी भी अपनी फैक्ट्री सुबह जाते थे। उनके लिए जीने का मतलब काम था। इस उम्र में भी वे अपने काम स्वय करते थे। उनसे यदि कोई किसी भी तरह की मदद चाहता तो वे उसकी भरपूर मदद करने के लिए तैयार रहते थे।
      उन्होंने अपने सौतेले भाई -बहनो की  भरपूर मदद की। उनका छोटा भाई अपनी जिम्मेदारी पूरी किये बिना इस दुनियाँ  से चला गया था। उसके घर में जीवन -यापन के साधन नही थे। उनके तीन बच्चे पिता की गैर मौजूदगी में  अपने को बेसहारा महसूस कर रहे थे। उन्होंने भाई की अंतिम क्रिया का सारा खर्च खुद वहन किया। इसके आलावा उन्होंने उसकी बेटी की शादी में भारी  रकम खर्च की।
      उन्होंने उस समय कहा- अब मै  बूढ़ा  हो चुका  हूँ। इससे ज्यादा मेरी हैसियत नही है। मुझपर अपने बेटे के परिवार की भी जिम्मेदारी आ पड़ी है।जब मुझे कन्धा देने का समय आया तो उनको मुझे कन्धा देना पड़ा।जिसमे में अपने बुढ़ापे का सहारा तलाश रहा था। इससे बढ़कर एक इंसान  की लाचारी और क्या हो सकती है। अब मुझ बूढ़े  के कंधे कमजोर हो चुके है।
      उन्होंने उस परिवार की मदद करने के लिए ओरो को विवश किया। उनके कारण उनका परिवार जिम्मेदारी उठाने के काबिल बन पाया।
     लेकिन उनका भतीजा जिम्मेदार नही बन सका। वह मन लगा कर कोई काम नही कर पाता  था। जिसके कारण उसके  परिवार का  साथ अभावो ने नही छोड़ा। भतीजे की शादी करवा दी। इस उम्मीद में कि  वह अब  मन लगा कर काम करेगा। उसका मन कभी भी पढ़ाई  या मेहनत करने में नही लगता था।
      वे जिससे भी उसके बारे में बात करते। उसका जबाब यही रहता -आपके कहने पर हमने उसे काम पर रख लिया है। लेकिन वह किसी काम को जिम्मेदारी से निभाने की जगह लापरवाही करता है। आपका लिहाज करके हम उसे काम से नही निकाल  रहे। लेकिन उससे किसी काम की उम्मीद करना बेकार है। उसे रखना हाथी पालने जैसा है। उनके शब्दों को सुनकर  वेद चुप हो जाते।
     वेद के जीवन में काम करने वाले व्यक्ति नही आये। बल्कि सभी दुसरो के पैसो  पर ऐश करने को, जीवन का ध्येय समझने थे । वेद जितने मेहनती थे इतने उनके साथ वाले लोग  नही हुए। उन्हें इस बात का अफ़सोस रहा।
     आपको लग रहा होगा। वेद ने उन्हें अपनी फैक्टरी में काम क्यों नही दिया। आपको पता होगा। शुरू में जब वेद ने  जवानी में फैवट्री लगायी थी तब उन्होंने सबके कहने पर अपने सौतेले  छोटे  भाई को अपनी फैक्टरी में  काम पर रखा था.
     उसके बदले में उन्हें सुनना  पड़ा- हमारे बच्चे से जानवरो के सामान काम लेता है। उसकी कमाई पर ऐश कर रहा है.
    इन कड़वे शब्दों के कारण उसमे अब उसके बेटे को अपने कारखाने में नौकरी पर रखने की हिम्मत नही हुई। अब उसमे जवानी के सामान जोश भी नही रहा था। उसको समाज का भय भी सताने लगा था। क्योंकि पारिवारिक सदस्यों से काम करवाना बहुत मुश्किल होता है। आरम्भ में लोग काम पर लगाने के लिए गिड़गिड़ाते है बाद में वे ही सिर  पर सवार हो जाते है। उनके अंदर का शुक्राना एकदम ख़त्म हो जाता है। .  

#karva choth ka vrat

     कुछ समय पहले तक करवा चौथ के त्यौहार का बहुत महत्व होता था। ये कुछ समय पहले की बात है  उस समय औरत की तबियत के बारे में सोचा नही जाता था। बल्कि त्यौहार सही तरह से ना  मनाने  के कारण उनके बेटे का अनिष्ट न हो  जाये सास सिर्फ इस बारे में सोचा करती थी। इस का खामियाजा कई बार बहु का अस्पताल पहुचने से भी उन्हें कोई फर्क नही पड़ता था। ऐसे ही कुछ उदाहरण में आपके सामने बताने जा रही हूँ।
  राधा ने पहली बार करवा चौथ का ब्रत रखा। उसकी एक महीने बाद  बच्चा होने की तारीख डॉ ने दी थी। उसकी नन्द ने जो की शादी शुदा थी अपनी माँ से कहा -इसे चाय और पानी पीने  की छूट  दे दो। हमारे यहाँ सभी चाय और पानी पी  लेते है। इसकी हालत व्रत करने के लिहाज से सही नही है। यदि इसे कुछ हो गया तो परेशानी हो जाएगी।
    लेकिन सास ने इसके बारे में जबाब नही दिया। राधा चुपचाप व्रत करती रही। लेकिन शाम  तक उसकी तबियत ख़राब हो गयी। उसको अस्पताल ले जाना पड़ा। व्हाँ  उसका बच्चा समय से एक महीने पहले हो गया। लेकिन उसकी सास को केवल अपने बेटे की चिंता थी बहू और नए मेहमान की चिंता नही हुई।
     दूसरा उदाहरण मै  क्षमा  के बारे में बता रही हूँ। क्षमा  और उसके पति के बीच बहुत झगड़ा हो गया था। दोनों का तलाक तक होने की सम्भावना बन रही थी। क्षमा  के पति का काम पूरी तरह ख़त्म हो गया था। उसके लिए कर्जदारो का सामना करना कठिन हो गया था। इसलिए वह मायके जाकर रह रही थी। उसका पति उससे समझोता करने के स्थान पर उसकी मेहनत  करने को लेकर गलत बोलता। उसको अपमानित करने की कोशिश करता था। 
     ऐसे माहौल  में उसने गुस्से में आकर करवा चौथ का व्रत नही रखा।  कुछ समय बाद उसके पति ने ख़ुदकुशी कर ली।
     इसके लिए ससुराल के सारे  लोगो ने क्षमा को कसूरवार ठहराया और कहा -यदि वह इस दिन व्रत रख लेती तो उसके पति को इतना दुःख नही पहुँचता। वो ऐसा खतरनाक कदम ना  उठता।
    इस समय तक पति की मौत  के लिए हर तरह से पत्नी को जिम्मेदार ठहराया जाता था। कई बार मुझे ऐसे विचारो पर  हंसी आती  है। कि  पति को यदि व्रत  न रखने से मौत  के घाट पहुँचाया  जा सकता है तो लोगो को अपने  पति की हत्या करने के लिए इतने अधिक पैसो की अपराधियो को सुपारी देने की क्या जरूरत है।
      आज की नारी अपने मन के  हिसाब   से व्रत रखती है। मै  ऐसा उदाहरण आपके सामने रख रही हूँ। नंदा ने इस  त्यौहार के लिए काफी सामान खरीदा। हाथो में सुहाग की मेहँदी भी लगवा ली।  सारा सामान घर में आ  गया था। सास -ससुर भी उनके साथ रहते थे।सास ने अपने पति के लिए व्रत रखा था।  नंदा जिस परिवार से आई थी वहाँ परम्पराओ को निभाया जाता था। अर्थात व्रत रखा जाता था।
     करवा चौथ से एक दिन पहले  पति और पत्नी के बीच लड़ाई हो गयी। नंदा को इतना तेज गुस्सा आ  गया उसने करवा चौथ का व्रत नही रखा।  उसने इस मामले में सास -ससुर का लिहाज करके व्रत रखने का दिखावा करना तक  गवारा नही किया। आप इससे क्या मतलब निकालेंगे। क्या उसका पति अब जीवित रहेगा या नही रहेगा।  ये मै  आप पर छोड़ती हूँ। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...